क्षेत्रीय दल पहल कर सकते हैं

उपचुनावों के ताजा परिणामों को लेकर चर्चा तेज है कि फलां शख्स की व्यक्तिगत जीत हुई और फलां शख्स की व्यक्तिगत हार. क्या वास्तव में यह सच है? इसी विषय पर पेश है यह विश्‍लेषणात्मक टिप्पणी.

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कुछ  राज्यों में चुनाव परिणाम आए हैं और सभी उनका अपने-अपने ढंग से विश्‍लेषण कर रहे हैं. चुनाव परिणाम अख़बारों की सुर्खियां बने. किसकी हार और किसकी जीत हुई, इस पर बहस हुई. कहा गया कि यह मोदी के लिए एक बड़ी जीत है गुजरात में, लेकिन यह अप्रत्याशित नहीं था. दूसरी ओर यह भी कहा गया कि नीतीश कुमार को एक बड़ा झटका लगा है, लेकिन क्या सच में ऐसा हुआ है? उपचुनाव से पहले भी लालू प्रसाद यादव की पार्टी राजद का ही इस सीट (महाराजगंज) पर कब्जा था. राजद ने फिर से यह सीट जीत ली. महराजगंज ठाकुरों के प्रभुत्व वाला निर्वाचन क्षेत्र है. प्रभुनाथ सिंह लालू यादव के उम्मीदवार होने से पहले भी सांसद रह चुके थे और उन्होंने यह सीट जीती. अब इसमें क्या खास है, यह मुझे समझ में नहीं आता.

उत्तर प्रदेश, तमिलनाडु, उड़ीसा, पश्‍चिम बंगाल एवं बिहार जैसे विभिन्न राज्यों की कई पार्टियां राष्ट्रीय पार्टी नहीं हैं. वे अपने स्वयं के उम्मीदवार लोकसभा के लिए चुनती हैं. कम से कम चार या पांच क्षेत्रीय पार्टियां यह तय करेंगी कि प्रधानमंत्री कौन होगा? हां, नीतीश कुमार अभी एनडीए का हिस्सा हैं और अगर नरेंद्र मोदी को आगे करने की कोशिश की जाती है, तो वह एनडीए छोड़ देंगे और इसका सीधा लाभ कांग्रेस पार्टी को ही मिलेगा. दूसरी ओर, भाजपा ने अटल बिहारी वाजपेयी के रूप में, 1999 को छोड़कर, कभी भी पीएम पद को अभी तक प्रोजेक्ट नहीं किया है. उसकी रणनीति यही होगी कि इस सबका फैसला चुनाव परिणाम आने के बाद हो. प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार तय करने के लिए भाजपा ने यही नीति अपनाई है. अगर भाजपा  प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार का ़फैसला नहीं करती है, तो एनडीए जैसा है, वैसा ही रहेगा.

आज जो हालत है, जिस तरह से घोटाले सामने निकल कर आए हैं, उसमें कांग्रेस पार्टी ने इस देश पर शासन करने के अपने सभी नैतिक अधिकार खो दिए हैं. आज औसत मतदाता कांग्रेस पार्टी से निराश है. हालांकि भाजपा अपने आंतरिक क्लेश की वजह से इस स्थिति का फ़ायदा उठा पाने में अक्षम साबित हुई है. आडवाणी की तरह निर्विवाद नेता को अगर भाजपा आगे करती है, तो शायद सत्ता में आने की भी गुंजाइश बनेगी. इसलिए मोदी को सही समय का इंतज़ार करना चाहिए. अगर ऐसा नहीं होता है और भाजपा मोदी को आगे करती है, तो इसका लाभ कांग्रेस को ही मिलेगा. अब समय आ गया है कि कांग्रेस के अलावा, अन्य सभी धर्मनिरपेक्ष पार्टियां एक साथ आएं, मिलकर बैठें, एक रणनीति बनाएं और यह निश्‍चित करें कि वे एक धर्मनिरपेक्ष गठबंधन चाहती हैं या फिर राजग के साथ जाकर सरकार बनाना पसंद करेंगी?

इन महत्वपूर्ण खिलाड़ियों में मुलायम सिंह यादव, ममता बनर्जी, जयललिता, नवीन पटनायक एवं मायावती हैं, लेकिन अभी तक ऐसा कोई संकेत नहीं मिला है और न ही इस मामले में प्रारंभिक चर्चा के लिए वे बैठक कर रहे हैं. वैसे, एक बात तय है कि कांग्रेस पार्टी अगला चुनाव जीतने नहीं जा रही है, जो अक्टूबर-नवंबर 2013 या मई 2014 में होना है. अगर मई 2014 में चुनाव होता है, तब तो समय है, लेकिन अगर यह समय पूर्व होता है, तब वक्त बहुत कम है.

 

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