खाद्य सुरक्षा बिल : रोटी से खेलने वाला कौन है देश की संसद मौन है …..

ईस्ट इंडिया कंपनी की लूट को भी पीछे छोड़ चुकी कांग्रेस सरकार दरअसल सरकार नहीं, परिवार चला रही है. भ्रष्टाचार में आकंठ डूबी इस सरकार के लिए खाद्य सुरक्षा बिल 80 करोड़ लोगों की भूख का नहीं, बल्कि उनकी रोटी की लूट का मामला है. यह सरकार ग़रीबों एवं भूखों की रोटी से सियासत का एक भी मौक़ा नहीं छोड़ती, लेकिन येन-केन-प्रकारेण खाद्य सुरक्षा बिल पास कराकर फिर से सत्ता में आने का सपना देख रही इस पत्थर दिल सरकार की ज़ुबान पर इसकी लालची लार साफ़ झलकने लगी है.

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युपीए और खासकर, कांग्रेस ने खाद्य सुरक्षा बिल पर हो-हल्ला मचा रखा है. सवाल यह उठता है कि कहीं सरकार का यह उतावलापन और छटपटाहट किसी बड़ी लूट की साजिश का हिस्सा तो नहीं? मनरेगा की तरह कहीं सरकार इस बिल को पास कराकर इसमें बड़े पैमाने पर पैसों की बंदरबांट और लूट की संभावना तो नहीं तलाश रही है? यह बात हम यूं ही नहीं कह रहे. दरअसल, मनरेगा के बूते लगातार दूसरी बार केंद्र में सरकार बनाने वाली कांग्रेस हर हाल में आम चुनाव से पहले खाद्य सुरक्षा बिल को क़ानूनी जामा पहनाना चाहती है. कांग्रेस के रणनीतिकारों को उम्मीद है कि इससे पार्टी का भाग्य फिर से चमक सकता है. मनरेगा और इसी तरह की कुछ अन्य लोक-लुभावन योजनाओं के बल पर वह पिछले चुनाव में सत्ता में आई. पूरे शासनकाल के दौरान उसने जमकर लूटपाट मचाई और अभी भी जनता को लूटने का काम ही कर रही है, लेकिन अब उसकी लूटपाट के दिन ख़त्म होने वाले हैं, क्योंकि चुनाव सिर पर हैं. ऐसे में साफ़ है कि सरकार खाद्य सुरक्षा बिल को लेकर इतनी बेचैन क्यों है. सवाल यह उठता है कि वह पिछले चार सालों से क्या कर रही थी? आख़िर कांग्रेस को ग़रीब और भूखी जनता की चिंता चुनाव के पहले ही क्यों सताने लगती है? दरअसल, उसकी मंशा यह बिल लागू करके चुनाव में लाभ लेना और फिर उसके बाद सत्ता में आकर मनरेगा की तरह खुली लूट की है. निजी तौर पर कई सांसदों एवं पार्टियों को खाद्य सुरक्षा बिल पर आपत्ति है, क्योंकि इसे लागू करने के लिए देश में आवश्यक ढांचागत सुविधाएं नहीं हैं और साथ ही यह आशंका भी है कि इससे बड़े पैमाने पर बर्बादी और भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिलेगा, जिससे अर्थव्यवस्था पर प्रतिकूल असर पड़ेगा.

यूपीए की सहयोगी एनसीपी के प्रमुख एवं कृषि मंत्री शरद पवार ने तो यहां तक कह दिया है कि सरकार के पास न तो यह योजना चलाने के लिए पैसा है और न ही इसे लागू करने के लिए पर्याप्त सरकारी ढांचा. उन्होंने यह भी दावा किया कि इसे लागू करने के लिए सरकार के पास पर्याप्त अनाज भंडार हैं ही नहीं. सुप्रीम कोर्ट ने भी सरकार से सवाल करते हुए कहा था कि क्यों न अनाज को ग़रीबों में बांट दिया जाए, लेकिन सरकार ने ऐसा करने से इंकार कर दिया था. सच पूछिए, तो सरकार की असली मंशा बिल पास कराना नहीं, बल्कि विशेष सत्र है. जब अगस्त में मानसून सत्र होना सुनिश्‍चित है, तो सरकार इस बिल को लेकर इतनी उतावली क्यों है? सीधी सी बात है कि कांग्रेस खाद्य सुरक्षा बिल पारित तो कराना चाहती है, लेकिन वह इसके क्रियान्वयन में होने वाली खामियां उजागर होने का ख़तरा नहीं उठा सकती. अगर आम चुनाव अगले साल के शुरुआती महीनों में हुए, तो खाद्य सुरक्षा को लेकर मिलने वाली शिकायतें किसी भी वाहवाही को पीछे छोड़ देंगी. ऐसे में, बेहतर विकल्प यही है कि इसे पारित करा लिया जाए और नवंबर-दिसंबर में चुनाव की घोषणा कर दी जाए.

खाद्य सुरक्षा बिल लागू करना बड़ी बात नहीं है. दरअसल, इसके प्रावधानों का ईमानदारी से क्रियान्वयन और उसे बनाए रखना बड़ी बात है, लेकिन इस भ्रष्टाचारी सरकार के घोटालों और पिछली योजनाओं में लूट को देखकर इसकी नीयत पर संदेह होना लाजिमी है. झूठे वादे, लोक-लुभावन योजनाएं लाकर उन्हें चुनाव के समय लागू करने के लिए धींगामुश्ती करना, भोली-भाली जनता का वोट लेकर सत्ता में आने के बाद मामा, दामाद एवं भाई-भतीजावाद के माध्यम से अपने शासन के दौरान जनता को ही लूटना और सहयोगी दलों को भी खुले हाथों लूटने की खुली छूट देना, कांग्रेस की पहचान बन गई है.

क्या कांग्रेस के पास उन सवालों के जवाब हैं, जो अभी भी इस योजना को लेकर अनुत्तरित हैं. मसलन, केंद्र सरकार द्वारा समर्थन मूल्य में मनमाने ढंग से वृद्धि का खामियाजा अनाज खरीदने वाली राज्य सरकारों को भुगतना पड़ता है. यही वजह है कि सरकार पर सब्सिडी का बोझ बढ़ता है और यदि एफसीआई द्वारा अनाज की खरीदारी नहीं हुई, तो वह धीरे-धीरे बर्बाद हो जाता है. लाभार्थियों की सटीक पहचान में हेराफेरी हो सकती है. उन्हें खाद्यान्नों का समय पर वितरण हो पाना मुश्किल है, क्योंकि मनरेगा में इस तरह की गड़बड़ियां आम हैं. वितरण के लिए राज्यों द्वारा प्रयास में उदासीनता ज़रूर देखने को मिलेगी. प्राथमिकता के आधार पर सार्वजनिक वितरण प्रणाली में सूचना प्रौद्योगिकी का त्वरित क्रियान्वयन होना ज़रूरी है, जो संभव नहीं दिखता. लक्षित सार्वजनिक वितरण प्रणाली नेटवर्क का कंप्यूटरीकरण ज़रूरी है, जो अभी तक नहीं हो सका है. बायोमीट्रिक पहचान और खाद्यान्नों का स्मार्ट कार्ड आधारित वितरण सुनिश्‍चित करना ज़रूरी है, जो इतना आसान नहीं है. प्रौद्योगिकी का उपयोग करके खाद्यान्न वितरण पर जीपीएस ट्रैकिंग के तहत सटीक निगरानी भी ज़रूरी है, लेकिन जब अन्य क्षेत्रों में उक्त तकनीकें नहीं लागू की जा सकी हैं, तो इसके लिए लागू होना टेढ़ी खीर ही है. लाभार्थियों को एसएमएस एलर्ट भी मिलना चाहिए, जो संभव नहीं दिखता. सीसीटीवी निगरानी और मीडिया अभियानों के जरिए सार्वजनिक जागरूकता पैदा नहीं की जा सकती, जो घपलों को रोक सकें. नौकरशाही की दखलंदाजी रोकना एवं प्रशासन की जवाबदेही सुनिश्‍चित करना इतना आसान नहीं है और जब तक प्रशासन की लगाम नहीं कसी जाएगी, तब तक किसी भी बिल या योजना की सफलता में संदेह है.

सरकार की नीयत में खोट!

खाद्य सुरक्षा बिल के लिए इतनी जल्दबाजी क्यों?

कहीं यह ग़रीब जनता को गुमराह करने की साजिश तो नहीं?

मनरेगा की तरह यह योजना भी लूट की भेंट तो नहीं चढ़ जाएगी?

पिछले चार सालों से इस बिल को लेकर क्या कर रही थी सरकार?

इस योजना के लिए बुनियादी ढांचे का निर्माण अब तक क्यों नहीं हुआ?

कहीं इस बिल का हश्र भी शिक्षा का अधिकार क़ानून जैसा तो नहीं हो जाएगा?

खाद्य सुरक्षा बिल का मकसद कहीं आम चुनाव में वोट हासिल करना तो नहीं?

प्रावधान

दावा किया गया है कि इससे देश की दो तिहाई आबादी को सस्ता अनाज मिलेगा.

खाद्य सुरक्षा विधेयक का बजट पिछले वित्तीय वर्ष के 63,000 करोड़ रुपये से बढ़ाकर 95,000 करोड़ रुपये करने का प्रस्ताव.

कृषि उत्पाद बढ़ाने के लिए 1,10,000 करोड़ रुपये का निवेश करने का प्रस्ताव.

ग्रामीण क्षेत्रों में 75 प्रतिशत आबादी को इस विधेयक का लाभ दिया जाएगा, जिनमें से कम से कम 46 प्रतिशत प्राथमिकता श्रेणी के लोगों को दिया जाएगा.

शहरी इलाकों में कुल आबादी के 50 फ़ीसद लोगों को खाद्य सुरक्षा प्रदान की जाएगी, इनमें कम से कम 28 फ़ीसद प्राथमिकता श्रेणी के लोग होंगे.

विधेयक के प्रावधानों के तहत देश की 63.5 फ़ीसद जनता को खाद्य सुरक्षा प्रदान की जाएगी.

गर्भवती या बच्चों को दूध पिलाने वाली महिलाओं, आठवीं कक्षा तक के विद्यार्थियों एवं बुजुर्गों को पका हुआ खाना मुहैय्या कराया जाएगा.

नया क़ानून लागू होने पर कम दाम में गेहूं और चावल पाना निर्धन लोगों का अधिकार बन जाएगा.

स्तनपान कराने वाली महिलाओं को प्रति माह 1,000 रुपये भी दिए जाएंगे.

अगर सरकार प्राकृतिक आपदा के कारण लोगों को खाद्य सुरक्षा प्रदान नहीं कर पाती है, तो योजना के लाभार्थियों को उसके बदले पैसा दिया जाएगा.

आगे हैं कई राज्य

छत्तीसगढ़, तमिलनाडु एवं उड़ीसा समेत तकरीबन आधा दर्जन से अधिक राज्यों ने केंद्र सरकार के सोचने के साथ ही खाद्य सुरक्षा विधेयक के अधिकांश प्रावधान लागू कर दिए हैं, जबकि केंद्र में दूसरी बार सरकार बनाने के बाद से ही यूपीए सबको अति रियायती दर पर अनाज देने की घोषणा ही करता रह गया. इतना ही नहीं, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, केरल, छत्तीसगढ़, उड़ीसा एवं राजस्थान ने खाद्य सुरक्षा का दायरा और बढ़ा दिया है. सवाल यह भी है कि जिन राज्यों में पहले से ही सब्सिडी खाद्य कार्यक्रम चल रहे हैं, वहां दोनों एक साथ कैसे चलेंगे अथवा क्या इससे दोनों कार्यक्रम अस्त-व्यस्त नहीं होंगे?

गंभीर सवाल

बिल कहता है कि राज्य ग़रीबों की सूची प्रदान करेंगे, लेकिन राज्यों के पास ऐसा कोई रिकॉर्ड नहीं है. सरकार ने ग़रीबी रेखा निर्धारण के लिए विभिन्न कमेटियों का गठन किया, लेकिन उनके आंकड़े भिन्न हैं.

सरकार का ग़रीबों को सब्सिडी प्रदान करने के लिए पब्लिक डिस्ट्रिब्यूशन सिस्टम (सार्वजनिक वितरण प्रणाली) इस्तेमाल करने का इरादा है. पीडीएस का इस्तेमाल पहले से ही ग़रीबों को खाद्य सब्सिडी प्रदान करने के लिए किया जाता है, लेकिन इस तरीके से वितरित अनाज का क़रीब 52 फ़ीसद फिलहाल बर्बाद हो जाता है.

क्या भारत इस बिल द्वारा उत्पन्न मांग के बराबर अनाज का उत्पादन कर सकता है?

सूखे अथवा बाढ़ की स्थिति में क्या होगा?

सब्सिडीकृत अनाज के बहुत कम दाम बाज़ार एवं उन किसानों को, जो सरकार द्वारा लागू कार्यक्रम के लिए अपना अनाज नहीं बेच सकते, विकृत कर देंगे. ऐसे किसान खुले बाज़ार में बर्बाद हो जाएंगे, क्योंकि दाम दबाव वश कम होंगे.

खाद्य सुरक्षा विधेयक के क़ानून बन जाने की दशा में राशन प्रणाली समेत अन्य कल्याणकारी योजनाओं के लिए कुल 6.13 करोड़ टन अनाज की ज़रूरत होगी और इसके लिए सवा लाख करोड़ रुपये चाहिए.

इस व्यापक कार्यक्रम के लिए भारी खाद्य सब्सिडी की ज़रूरत होगी. इसकी लागत सकल घरेलू उत्पाद के 0.9 फ़ीसद से 1.1 फ़ीसद हो सकती है. जब सरकार के पास ज़्यादा स्रोत नहीं हैं, तो यह एक गंभीर वृद्धि होगी.

कुल मिलाकर खाद्य सब्सिडी लगभग डेढ़ लाख करोड़ रुपये बैठ रही है. सूत्रों के अनुसार, खजाने की सेहत यह बोझ उठाने के काबिल नहीं है.

सरकार कहती है कि वह इस बिल के तहत सालाना 62 मिलियन टन अनाज प्रदान करेगी और सब्सिडी का आकार अनुमानत: 24 बिलियन डॉलर होगा, जो भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़ा बोझ साबित होगा.

बढ़ती आबादी की वजह से इस बात की संभावना है कि अनाज वितरण की मात्रा में भी वृद्धि होगी.

अनाज की लदाई, ढुलाई, सस्ते गल्ले की दुकानों के संचालन, उनके लाभ मार्जिन और अन्य खर्च के लिए 24 हज़ार करोड़ रुपये की अतिरिक्त ज़रूरत होगी.

सरकार प्रत्यक्ष नकद हस्तांतरण पर भी विचार कर रही है. उन मामलों में, जहां सरकार पीडीएस के तहत अनाज उपलब्ध नहीं करा पाएगी, वहां वह लोगों के बैंक खातों में अनाज खरीदने के लिए नकद भुगतान करेगी. लेकिन इसकी क्या गारंटी है कि लोगों के पास कैश होने पर उचित दर पर अनाज मिलेगा ही.

योजना की बढ़ती लागत देखते हुए, इसकी निरंतरता सवालों के घेरे में है.

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One thought on “खाद्य सुरक्षा बिल : रोटी से खेलने वाला कौन है देश की संसद मौन है …..

  • July 4, 2013 at 4:20 PM
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    उत्तर प्रदेश पुलिस पीएसी कल्याण परिषद् से जुड़ने के लिए अपनी
    पूरी जानकारी मोब. न, पता सहित उपलब्ध कराये
    आईपीएस पी पी एस की यूनियन है और वोह भी फर्जी
    चतुरश्रेणी पुलिस कर्मचारियों को कोर्ट ने अनुमति दी है आप की का घठन होना बाकी है सिर्फ आप लोगो के साथ की जरुरत है उत्तर प्रदेश पुलिस पीएसी कल्याण परिषद् वैधानिक है सिर्फ आईपीएस मान्यता नही होने दे रहे है
    आपको यह हक है परिषद् मै शामिल होने का आदेश प्राप्त करने के लिए
    संपर्क करे 9458044777
    धन्यवाद्
    दानिश खान समाज सेवी

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