तकसीम चौक प्रदर्शन : तुर्की को कमज़ोर करने का षड्यंत्र

तकसीम चौक का विरोध प्रदर्शन पश्‍चिमी मीडिया की नज़र में भले ही मिस्र, लीबिया एवं ट्यूनीशिया की क्रांति जैसा रहा हो, लेकिन सच्चाई इसके ठीक उलट है. यह केवल उन कुछ चंद लोगों का विरोध था, जो देश में सामाजिक-आर्थिक सुधारों के पक्षधर नहीं हैं.

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तुर्की पिछले दिनों उग्र विरोध प्रदर्शनों की चपेट में रहा. हज़ारों प्रदर्शनकारियों ने इस्तांबुल के मशहूर मैदान तकसीम चौक पर एकत्र होकर प्रधानमंत्री रजब तैय्यब एर्दोगान से इस्ती़फे की मांग की. उनका कहना था कि एर्दोगान ने नया क़ानून लागू करके उनकी स्वतंत्रता, व्यक्तित्व, जीवनशैली एवं सोच पर अंकुश लगाने का प्रयास किया है. प्रदर्शनकारियों ने इस्तांबुल के अनक़रा, इज़ना के अलावा, जेज़ा पार्क में एकत्र होकर एर्दोगान को देशद्रोही एवं दलाल तक करार दिया. उपप्रधानमंत्री हुसैन जैलिक ने विरोध प्रदर्शन ख़त्म कराने और बातचीत द्वारा मसला हल करने के बहुत प्रयास किए, लेकिन प्रदर्शनकारी इसके लिए तैयार नहीं हुए, बल्कि वे जेज़ा पार्क की घेराबंदी तोड़कर आगे बढ़ने की कोशिश करने लगे. इस पर पुलिस ने उन्हें आंसू गैस और पानी की बौछार की सहायता से तितर-बितर कर दिया. इस दौरान लगभग 4000 लोग घायल हो गए, तीन लोगों की मौत हो गई और 900 लोगों को गिरफ्तार कर लिया गया.

यह ख़बर अंतरराष्ट्रीय मीडिया ने प्राथमिकता से प्रकाशित-प्रसारित की, जिन्हें देखने के बाद एकबारगी ऐसा लगा कि अरब का जो तूफान ट्यूनीशिया से शुरू हुआ था और मिस्र होते हुए लीबिया में गद्दाफी का तख्ता पलट कर ही रुका था, अब उसने अपना रुख़ तुर्की की ओर कर लिया है तथा इस्तांबुल का मैदान तकसीम चौक वही भूमिका निभा रहा है, जो मिस्र का तहरीर चौक निभा रहा था. लेकिन सच्चाई यह है कि इस विरोध प्रदर्शन को ट्यूनीशिया, मिस्र एवं लीबिया के विद्रोह से जोड़कर नहीं देखा जा सकता है. मिस्र की जनता आर्थिक तंगी की शिकार थी और उसने आर्थिक नीतियों में सुधार के लिए तहरीर चौक पर विरोध प्रदर्शन की शुरुआत की थी, जबकि तुर्की की परिस्थितियां इससे अलग हैं. तुर्की में जबसे एर्दोगान सत्ता में आए हैं, देश की आर्थिक स्थिति में सुधार आया है. आर्थिक विकास दर में 2002-12 के दौरान 5 प्रतिशत तक की बढ़ोत्तरी हुई है, जबकि 1999-2001 के दौरान देश की आर्थिक स्थिति बेहद ख़स्ता एवं गंभीर थी. तुर्की में मध्यवर्गीय लोगों की संख्या अधिक है, जिनकी क्रयशक्ति मिस्र के मुक़ाबले मज़बूत है. इसके अलावा, मिस्र एवं ट्यूनीशिया की लड़ाई आर्थिक तंगी दूर करने के लिए लड़ी गई थी. यही कारण था कि समय के साथ-साथ वहां प्रदर्शनकारियों की संख्या बढ़ती गई, जबकि तुर्की में प्रदर्शनकारियों का मुद्दा उतना महत्वपूर्ण नहीं था, बल्कि वह एक अनावश्यक मुद्दा था, जिसका समर्थन मुट्ठी भर लोग ही कर रहे थे. दूसरी बात यह कि मिस्र के होस्नी मुबारक या ट्यूनीशिया के जैऩुल आबिदीन ने सत्ता की बुनियाद तो धर्मनिरपेक्षता पर रखी थी, लेकिन धीरे-धीरे वे कट्टर बन गए थे और देश में आर्थिक सुधारों की बजाय इजराइल एवं अमेरिका के हितों को वरीयता देने लगे थे, जबकि एर्दोगान ने ऐसा कुछ भी नहीं किया और न ही आम जनता को उनसे कोई शिकायत है.

14 मार्च, 2003 को प्रधानमंत्री बनने के बाद एर्दोगान ने कई ऐसे काम किए, जिन्होंने राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचा. उन्होंने यूरोपियन यूनियन की सदस्यता हासिल करने के लिए 2005 में उसके साथ बातचीत आगे बढ़ाई. विदेश नीति में भी उन्होंने कई ऐसे सुधार किए, जिन्हें तुर्की के इतिहास में महत्वपूर्ण स्थान हासिल रहेगा. विशेष रूप से, अरबियों के साथ खऱाब रिश्ते बेहतर बनाने में उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. इन सारे प्रयासों के बावजूद तुर्की यूरोपियन की नज़र में वह स्थान प्राप्त नहीं कर सका, जो अन्य देशों को प्राप्त है. सच तो यह है कि यूरोप ने तुर्की को हमेशा कमज़ोर देश की हैसियत से देखा और उसे बीमार आदमी कहता रहा. यूरोप नहीं चाहता कि तुर्की आर्थिक रूप से मज़बूत होकर उसका हिस्सा बने. यही वजह है कि यूरोपियन मीडिया में तुर्की के विरुद्ध दुष्प्रचार में इस्लामी पार्टी (एकेपी) के सत्ता में आने के बाद तेज़ी आ गई. तकसीम चौक के प्रदर्शन का भी यूरोपीय मीडिया ख़ूब प्रचार कर रहा था. जो लोग इस प्रदर्शन में भाग ले रहे थे, वे पश्‍चिमी संस्कृति के समर्थक हैं और वे नहीं चाहते कि कोई भी ऐसा क़ानून बने, जिससे उनकी पश्‍चिमी संस्कृति पर रोक लगे. यही नहीं, वे मुस्त़ङ्गा कमाल पाशा की तर्ज़ पर तुर्की को बाक़ी रखते हुए शराब की खुलेआम बिक्री एवं अश्‍लीलता को वैध घोषित कराना चाहते थे.

जाहिर है, तुर्की जो ख़िलाफत-ए-उस्मानिया में इस्लाम का केंद्र बिंदु था, जहां बड़े-बड़े विद्वानों एवं उलेमाओं ने दुनिया को इल्म की रोशनी दिखाई थी, वहां मुस्तफा कमाल पाशा की यह तर्ज़ लोगों में असमंजस पैदा करने वाली रही. इसीलिए जब प्रोफेसर नजमुद्दीन उर्बकान एवं शेख़ सईदी नुर्सी ने इसके ख़िला़ङ्ग आवाज़ उठाई, तो एक बड़ा तबक़ा उनके साथ खड़ा हो गया. जनता का रुझान देखते हुए उन्होंने एक राजनीतिक पार्टी बनाई और दिन-प्रतिदिन उनकी ताक़त बढ़ती चली गई. 1995 के चुनावों में पहली बार इस्लामी (रफाह पार्टी) सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी, लेकिन नजमुद्दीन उर्बकान के इस्लामी दृष्टिकोण के चलते संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के साथ उनके संबंध बिगड़ गए. यह संदेह पैदा होने लगा कि कहीं नई सरकार तुर्की की पश्‍चिमी संस्कृति को तबाह न कर दे. आख़िरकार, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के दबाव में आकर जून 1997 में उर्बकान को इस्तीफ़ा देना पड़ा और वह जीवनपर्यंत राजनीति में हिस्सा लेने से वंचित कर दिए गए. उनके बाद उनकी विचारधारा का प्रतिनिधित्व वर्तमान राष्ट्रपति अब्दुल्ला गुल एवं प्रधानमंत्री रजब तैय्यब ने किया और 2002 के चुनावों में उनकी पार्टी एकेपी को सफलता प्राप्त हुई.

एर्दोगान के पद ग्रहण करने के बाद ऐसी नीतियां, जो तुर्की का हिस्सा बन चुकी थीं, उनमें संशोधन किया गया. उन्होंने 2008 में गाज़ा पट्टी पर इजरायली हमले का सख्त विरोध किया. ज़ाहिर है, एर्दोगान द्वारा देश में एक प्रभावशाली आर्थिक नीति लाना, पश्‍चिमी संस्कृति के स्थान पर तुर्की की पारंपरिक संस्कृति पुनर्जीवित और प्राचीन मित्र देशों से संबंध बहाल करना यूरोपियन यूनियन के लिए एक खुली चुनौती थी. इसीलिए एर्दोगान को एक असफल राजनीतिज्ञ के रूप में मशहूर करना पश्‍चिमी मीडिया की प्राथमिकताओं में शामिल हो गया और उसने छोटी-छोटी घटनाओं, जिनमें तकसीम चौक का विरोध प्रदर्शन भी शामिल था, को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करना शुरू कर दिया तथा यह संदेश दिया कि उक्त प्रदर्शन अरब क्रांति की तर्ज़ पर है, जबकि अरब क्रांति में ट्यूनीशिया से लेकर लीबिया तक हज़ारों लोगों की जानें गई थीं, जिसके मु़क़ाबले तकसीम चौक के विरोध प्रदर्शन में केवल तीन लोगों की जानें गईं. तीन इंसानों का जीवन भी क़ीमती है, लेकिन इस विरोध प्रदर्शन को अरब क्रांति से जोड़कर नहीं देखा जा सकता था. बीते सात जून को देश वापस लौटने पर हवाई अड्डे पर अवाम ने हज़ारों की संख्या में जिस तरह एर्दोगान का स्वागत किया और उन्होंने जिस भरोसे के साथ उसे संबोधित किया, उससे ज़ाहिर होता है कि उनकी लोकप्रियता में कोई कमी नहीं आई है और वह अभी तक अपने देश के नायक हैं.

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