सत्ता के पूर्ण विकेंद्रीकरण से संभव है : पार्टीविहीन लोकतंत्र

गांधी और जेपी की सोच पार्टीविहीन लोकतंत्र को कभी उभरने नहीं दिया गया, क्योंकि अगर ऐसा होता, तो आज जो राजनीतिक दल सत्ता पर कुंडली मारे बैठे हैं, उनका अस्तित्व ही ख़त्म हो चुका होता. गांधी और जेपी का यह सपना कभी पूरा न होने देने की साजिश इस देश में हर काल में रची गई और अभी भी रची जा रही है. बहरहाल, सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या पार्टीविहीन लोकतंत्र संभव है? अगर हां, तो कैसे?

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वर्ष 1857 के आंदोलन की वजह और उसके शुरू होने के तरीके को समझने के लिए अंग्रेजों ने अपने वरिष्ठ सिविल सर्विस अधिकारी सर ए ओ ह्यूम के नेतृत्व में एक कमेटी बनाई. इस कमेटी ने तीन साल तक घूमने और जांच करने के बाद कहा कि भारत में गांव एक समाज है, जो अपनी व्यवस्था स्वयं करता है. वह किसी पर निर्भर नहीं है. यदि कोई अकस्मात बात होती है या ख़तरा आता है, तो गांव समाज उसका प्रतिकार करता है. यह समाज जब कोई संकट आता है, तो एक हो जाता है और उसके बाद फिर अपने-अपने काम में लग जाता है. अंग्रेजों को यह बात समझ में आ गई. इसका नतीजा यह हुआ कि 1860 के बाद जितने भी क़ानून बने, उनमें से किसी में भी गांव समाज को कोई स्थान नहीं दिया गया. ऐसा कोई क़ानून नहीं, जिसमें गांव की कोई भूमिका हो. यही माहौल आज़ादी के बाद भी चलता रहा. सदियों से स्वशासन की स्वायत्त इकाई के तौर पर चली आ रही ग्राम व्यवस्था पर जिले से लेकर राज्य और फिर केंद्र का कब्जा हो गया. आज़ादी के बाद दलीय प्रणाली ने सत्ता और शासन (केंद्र से लेकर गांव तक) पर कब्जा करने के लिए तमाम उपाय किए. आज़ादी के काफी समय बाद देश में यह कहकर पंचायती राज लागू किया गया कि हम सत्ता का विकेंद्रीकरण कर रहे हैं. सैद्धांतिक तौर पर देखने-सुनने में यह बात अच्छी ज़रूर लगती है, लेकिन हकीकत इसके उलट है. ग्रामसभा को संवैधानिक संस्था का दर्जा दिया गया. सरकार के मुताबिक, पंचायत स्वशासन की सबसे अहम इकाई होगी, लेकिन क़ानून बनने के बाद भी इस संस्था को मजबूत बनाने के लिए किसी भी सरकार (राज्य या केंद्र) ने कोई ईमानदार कोशिश नहीं की. भारत में लोकतंत्र का अर्थ ही उलट गया और इसे लोक नियुक्त तंत्र बना दिया गया है, जबकि इसे लोक नियंत्रित तंत्र होना चाहिए था.

बहरहाल, क़रीब छह लाख गांवों से बना भारत अपने इन ही गांवों की दुर्दशा आज़ादी के 65 साल बाद भी दूर करने में सफल नहीं हो पाया है, तो इसकी स़िर्फ एक ही वजह है और वह यह कि राजनीतिक दलों का सत्ता एवं शासन पर एकाधिकार बनाने का वह लालच, जिसके चलते सत्ता का विकेंद्रीकरण सही मायनों में आज तक नहीं हो सका. दलीय प्रणाली ने इस देश का क्या हाल किया है, इस बारे में स़िर्फ एक लाइन में कहा जाए, तो संपूर्ण भ्रष्टाचार और कुव्यवस्था की गंगोत्री, यमुनोत्री या जो भी नाम देना चाहें, ये राजनीतिक दल ही हैं. ऐसे में, अगर पार्टीविहीन लोकतंत्र की बात की जाए, तो क्या इसे सिरे से खारिज किया जा सकता है? शायद पहली बार इसे सुनकर आज कोई भी आदमी इसे मानने से इंकार कर दे या फिर यह तर्क दे कि राजनीतिक दलों के बिना लोकतंत्र की कल्पना ही नहीं की जा सकती है. लेकिन यह एक ऐसा भ्रम है, जिसे इस देश के आम आदमी ने नहीं, बल्कि उन्हीं राजनीतिक दलों ने रचा है, जो नहीं चाहते कि जनता उनसे सही सवाल पूछ सके, क्योंकि जब जनता सही सवाल पूछेगी, तो उनके पास कोई जवाब नहीं होगा.

आइए, यहां हम कुछ सवालों पर नज़र डालते हैं. एक गांव की शासन व्यवस्था चलाने के लिए किसकी ज़रूरत होती है? जवाब है, एक ग्राम प्रधान/ मुखिया/ सरपंच. इसी तरह, प्रखंड/ ब्लॉक/ तहसील स्तर पर भी ऐसा ही एक प्रमुख होता है. इसी तर्ज पर जिला स्तर पर जिला परिषद होती है और शहरों के लिए नगर निगम का प्रावधान है. इन सभी संस्थाओं को चलाने के लिए स्थानीय स्तर पर ही जनता अपने प्रतिनिधि चुनती है. आम तौर पर उक्त चुनाव पार्टी लाइन से हटकर होते हैं, यानी इन संस्थाओं के चुने गए प्रतिनिधि किसी राजनीतिक दल के प्रतिनिधि नहीं होते हैं, बल्कि वे स्थानीय स्तर पर स्वशासन के लिए ज़िम्मेदार होते हैं. वर्तमान परिदृश्य में स्थानीय स्वशासन के लिए धन राज्य एवं केंद्र द्वारा भेजा जाता है, कई योजनाएं भेजी जाती हैं और विकास कार्यों के लिए तकनीकी सहायता उपलब्ध कराई जाती है. हालांकि, केंद्र या राज्य सरकार की तरफ़ से योजनाएं बनाकर भेजने का प्रावधान इसलिए जायज नहीं ठहराया जा सकता, क्योंकि समयकाल एवं भौगोलिक दृष्टि से हर इलाके की विभिन्न ज़रूरतें होती हैं. ऐसे में, अमुक पंचायत की कब, क्या ज़रूरत है, उसकी पूर्ति ऊपर से बनाकर भेजी गई योजनाएं नहीं कर पाती हैं. खैर, असल मुद्दा यह है कि जब भारत के छह लाख गांवों का स्थानीय शासन पार्टीविहीन यानी बिना राजनीतिक दल की भागीदारी के चल सकता है, तो फिर देश में पार्टीविहीन लोकतंत्र की स्थापना क्यों नहीं हो सकती?

पार्टीविहीन लोकतंत्र की सफलता के उदाहरण देखने के लिए हमें दुनिया के किसी कोने में नहीं, बल्कि खुद अपने ही घर में झांकने की ज़रूरत है. हमारे देश की कई ग्राम पंचायतों ने वे काम कर दिखाए हैं, जो न केवल विकास की नई इबारत लिख रहे हैं, बल्कि विकास शब्द को पुन: परिभाषित कर रहे हैं. जाहिर है, ये पंचायतें बिना दलीय व्यवस्था के चल रही हैं और स्थानीय स्वशासन की महत्वपूर्ण इकाई हैं. इनकी व्यवस्था प्रणाली में किसी राजनीतिक दल की कोई भूमिका नहीं है. यह तंत्र आज भी गांव के लोगों के लिए और गांव के लोगों द्वारा चलाया जा रहा है. महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले की हिवरे बाज़ार ग्राम पंचायत आज पूरी दुनिया में मशहूर हो चुकी है. यहां के सरपंच पोपटराव पवार ने बीस सालों में इस गांव को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लाकर खड़ा कर दिया है. आज इस गांव के स्कूल में शहर के बच्चे पढ़ने आते हैं. गांव के सारे मकान पक्के हैं और सड़कें साफ़-सुथरी, चमचमाती हुई. ग्राम पंचायत की अपनी ग्राम संसद है, जिसकी इमारत देखकर आपको आश्‍चर्यमिश्रित खुशी होगी. इसी तरह अन्ना हज़ारे का गांव रालेगन सिद्धि दुनिया भर में अपने जल संरक्षण उपायों एवं विकास कार्यों के लिए जाना जाता है. स्थानीय स्तर पर पार्टीविहीन लोकतंत्र के सफल उदाहरणों की यह सूची यहीं पर ख़त्म नहीं होती. भारत में दर्जनों ऐसी ग्राम पंचायतें हैं, जिन्होंने जन-सहभागिता और सामूहिक प्रयासों से अपने-अपने यहां विकास की नई धारा बहाई है. जाहिर है, इन गांवों में यह सब कुछ बिना किसी राजनीतिक दल के प्रयास या भागीदारी के हुआ है. ऐसे में, फिर से वही सवाल उठता है कि जब हमारे देश की करोड़ों की आबादी दिन-प्रतिदिन पार्टीविहीन लोकतंत्र (स्थानीय स्तर पर पार्टीविहीन व्यवस्था) के जरिए अपना जीवनयापन कर रही है, तो फिर इस देश में राजनीतिक दलों की ज़रूरत क्या है?

बहरहाल, चंद विकसित गांवों (जिनका उदाहरण यहां दिया जा रहा है) के अलावा, और भी बाकी गांवों की हालत अच्छी हो सकती है और वह भी बिना पार्टी तंत्र के. इसके लिए महज इतना करना होगा कि सत्ता और शासन पर एकाधिकार जमाए बैठे राजनीतिक दलों से सारे अधिकार एवं शक्तियां लेकर उन्हें भारत के छह लाख गांवों के बीच बांटना होगा, यानी सत्ता का पूर्ण विकेंद्रीकरण गांव तक पहुंचाना होगा. एक बार अगर सत्ता, शासन, संसाधनों एवं अधिकारों का पूर्ण विकेंद्रीकरण हो गया, तो यह तय मानिए, फिर इस देश को राजनीतिक दलों की ज़रूरत नहीं होगी और शायद यही वजह है कि राजनीतिक दल सत्ता, शासन, संसाधनों एवं अधिकारों का पूर्ण विकेंद्रीकरण नहीं होने देना चाहते हैं.

पार्टीविहीन लोकतंत्र के सफल उदाहरण 

पिपलांत्री : उदयपुर से तक़रीबन 70 किलोमीटर दूर राजसमंद ज़िले में एक ग्राम पंचायत है पिपलांत्री. अरावली की संगमरमर की पहाड़ियों पर बसे पिपलांत्री को देखकर गर्व होता है कि भारत गांवों का देश है और अब गांव भारत के लोकतंत्र को सही मायनों में परिभाषित कर रहे हैं. यह स्थानीय लोगों द्वारा मिलजुल कर लिए गए फैसलों का ही नतीजा है कि पिछले कई सालों से सूखे की मार झेल रहे पिपलांत्री की पहाड़ियों से मीठे पानी के स्रोत फूट रहे हैं और पत्थरों पर फूल खिल रहे हैं. पूरे गांव में पक्की सड़कें, हर घर में पानी का कनेक्शन, दूधिया स्ट्रीट लाइटों से जगमगाती गलियां, प्राइमरी से लेकर इंटर तक अच्छे स्कूल-कॉलेज, महापुरुषों की प्रतिमाओं से सजे चौराहे और स्थानीय लोगों को सुकून देता वातानुकूलित पंचायत भवन, यानी वह हर सुख-सुविधा, जो किसी अच्छे शहर में भी मयस्सर नहीं होती. पिपलांत्री में राजस्थान का पहला वातानुकूलित पंचायत भवन है. पंचायत भवन से शुरू हुई गांव की विकास यात्रा स्कूल-कॉलेज, सड़क, पानी एवं स्ट्रीट लाइट से होती हुई आज तक बदस्तूर जारी है. पिपलांत्री में खास बात यह है कि यहां के हर काम में गांव के लोग जुड़े हुए हैं. मसलन, यहां स्ट्रीट लाइटें सड़क पर किसी खंभे पर न लगकर घरों के बाहर लगी हैं और उनका कनेक्शन घर के मीटर से है. स्ट्रीट लाइट के बिजली ख़र्च से लेकर रखरखाव तक पूरी ज़िम्मेदारी संबंधित घर पर है. जो परिवार स्ट्रीट लाइट का रखरखाव नहीं करता, उसके घर से वह लाइट उतरवा ली जाती है.

कुटुंबकम : तमिलनाडु की राजधानी चेन्नई से क़रीब 40 किलोमीटर दूर बसा गांव कुटुंबकम पिछले 15 सालों से ग्राम स्वराज के रास्ते पर चल रहा है. आज इस गांव में आपसी झगड़े लगभग ख़त्म हो गए हैं. जातियों की दीवारें अब काफी छोटी हो गई हैं. अब वही परिवार एकदम पड़ोस में रह रहे हैं, जो कल तक नीची-ऊंची जाति के झगड़े में उलझे हुए थे. यहां तक कि गांव में अंतरजातीय विवाह भी हुए हैं. शराब पीकर घर में मारपीट करना अब थम चुका है. सवाल यह उठता है कि ऐसा हुआ कैसे? इसका श्रेय गांव के पूर्व सरपंच रंगास्वामी इलांगो को दिया जा सकता है. इलांगो एक सफल वैज्ञानिक थे, लेकिन वह 1996 में अच्छी-ख़ासी नौकरी छोड़कर अपने गांव में पंचायत का चुनाव लड़े और जीत भी गए. 15 साल पहले के कुटुंबकम गांव का आज के कुटुंबकम में परिवर्तन यहीं से शुरू होता है. यह शुरुआत 1996 में इलांगो के सरपंच बनने से हुई. उन्होंने पंचायत चुनाव जीतने के लिए न पैसा ख़र्च किया और न शराब बांटी. धीरे-धीरे लोग ग्रामसभा की बैठकों में आने के लिए प्रेरित हुए. इलांगो ने गांव के विकास के लिए एक पंचवर्षीय योजना बनाई और उस पर गांव में जमकर चर्चा हुई. यह चर्चा एक बैठक तक सीमित नहीं थी, बल्कि वार्ड स्तरों पर भी इसके लिए बैठकें आयोजित की गईं. इन बैठकों में आए सुझावों के आधार पर पंचवर्षीय योजना में सुधार किए गए और उस पर काम शुरू हुआ. पूरी पारदर्शिता और हर काम के बारे में खुली बैठकों में चर्चा से लोग पंचायत के कामकाज में दिलचस्पी लेने लगे.

बख्तावरपुरा : ग्रामसभा की नियमित बैठक से किसी गांव का विकास कितना संभव है? इस सवाल का जवाब जानना हो, तो आप राजस्थान का बख्तावरपुरा गांव देख आइए. इस गांव ने व्यवस्था में बैठे लोगों को बाध्य किया कि वे ग्रामसभा के निर्णय के अनुसार चलना शुरू करें. निष्क्रिय ग्रामसभा को ज़िंदा कर गांव वालों ने तंत्र से जुड़े लोगों को भी इसमें शामिल किया. आज यह गांव पूरे देश के लिए एक उदाहरण बन गया है. बख्तावरपुरा, यानी दिल्ली-झुंझुनू मार्ग पर, झुंझुनू से क़रीब 20 किलोमीटर पहले पड़ने वाला एक गांव. यहां की साफ़-सफाई और चमचमाती सड़क बरबस ही इधर से गुजरने वालों का ध्यान अपनी ओर खींचती है. रास्ते में एक बोर्ड लगा है, जिस पर लिखा है, मुस्कराइए कि आप राजस्थान के गौरव बख्तावरपुरा गांव से गुज़र रहे हैं. गांव के अंदर जाकर देखने और गांव वालों से बात करने पर पता चलता है कि यहां आज पानी की एक बूंद भी सड़क पर या नाली में व्यर्थ नहीं बहती. घरों से निकलने वाले पानी की एक-एक बूंद ज़मीन में रिचार्ज कर दी जाती है. पानी की कमी से जूझ रहे राजस्थान के गांवों के लिए यह एक बड़ी उपलब्धि है.

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