तेलंगाना के बहाने फिर उठी पृथक राज्यों की मांग

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2014 के आम चुनाव क़रीब हैं. सत्ताधारी कांग्रेस ने महज़ राजनीतिक हितों की पूर्ति के लिए वर्षों से चले आ रहे तेलंगाना मसले को फिर से छे़ड दिया है. तेलंगाना राज्य की मांग साकार होगी या नहीं, यह तो बाद की बात है, लेकिन पृथक राज्यों की मांग को लेकर फिलहाल पूरा देश जल रहा है. प्रस्तुत है यह विशेष रिपोर्ट.

30 जुलाई को केन्द्र सरकार द्वारा आंध्र प्रदेश का विभाजन कर तेलंगाना को भारत का 29वां राज्य बनाने की घोषणा की गई. इस घोषणा के साथ ही देश के कई हिस्सों में 21 नये राज्यों की मांग ज़ोर पकड़ने लगी और 1956 के बाद एक बार फिर राज्यों का पुनर्गठन कर अमरीका के तर्ज़ पर 50 राज्यों के गठन की बात की जाने लगी. दूसरी ओर सीमांध्र के 17 सांसदों ने दोनों सदनों से राज्य के विभाजन का विरोध करते हुए इस्तीफ़ा दे दिया. इसी बीच आंध्र क्षेत्र के केन्द्रीय मंत्रियों ने प्रधानमंत्री डॉक्टर मनमोहन सिंह को आंध्र प्रदेश विधानसभा/विधान परिषद में कांग्रेस के सीमांध्र विधान मंडल समेत 17 मंत्री और 80 विधायकों के द्वारा पारित प्रस्ताव पेश किया. इस प्रस्ताव में आंध्र प्रदेश को विभाजित न किए जाने की मांग के साथ ऑल इंडिया कांग्रेस कमेटी से राज्य को विभाजित करने को लेकर कांग्रेस कार्य समिति के निर्णय को पूर्ववत् घोषित करने को कहा गया है.

हालांकि सांसदों ने सदन में विरोध भी किया और कहा कि संसद के अन्दर और बाहर विरोध तब तक जारी रहेगा, जब तक सरकार तेलंगाना निर्णय को वापस नहीं लेती. इस प्रकार संसद के अन्दर भी 5 अगस्त को मानसून सत्र के शुरू होते ही आंध्र प्रदेश को संगठित रखने की आवाज़ भी गूंज उठी है. दूसरी ओर कांग्रेस के लिए तेलंगाना राष्ट्रीय समिति (टीआरएस) के अध्यक्ष के चन्द्र शेखर राव से डील करना भी मुश्किल हो रहा है. कांग्रेस के लिए ये सभी मुसीबतें एक ऐसे समय पर आ गई हैं, जब आम चुनाव बिल्कुल नज़दीक हैं.

ज़ाहिर है कि इस कठिन समय में केन्द्र की कांग्रेस सरकार इस स्थिति में नहीं है कि कोई भी अंतिम निर्णय लेकर स्थिति पर नियंत्रण कर सके. इसे जहां एक ओर 30 जुलाई को ख़ुद तेलंगाना को लेकर किए गए अपने ही फैसले पर अटल रहना मुश्किल हो रहा है, वहीं दूसरी ओर वह इस निर्णय को वापस लेने की स्थिति में भी ख़ुद को नहीं पा रही है, क्योंकि अगर वह तेलंगाना के निर्णय को वापस लेती है, तो इसे तेलंगाना आन्दोलन के लोगों से निबटना पड़ेगा, क्योंकि तेलंगाना आन्दोलन 1969 से जारी है और पूरे क्षेत्र में अपनी जड़ें गहरी कर चुका है. ऐसी स्थिति में अब कोई फैसला कर, इसे वापस लेना आग में घी डालने के बराबर होगा.

अब सवाल यह उठता है कि आख़िर कांग्रेस ने यह जोखिम भरा क़दम क्यों उठाया? दरअसल, इसकी वजह यह है कि आंध्र प्रदेश के सांसद व अन्य समर्थकों ने केन्द्र में यूपीए-1 व यूपीए-2 दोनों सरकारों के शासन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी. इसी बीच आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री वाई एस राज शेखर रेड्डी की हवाई हादसे में अचानक मौत ने राज्य में कांग्रेस को बिखराव की स्थिति में ला दिया, क्योंकि उनके बेटे राज्य के नेतृत्व का दावा लेकर उठ खड़े हुए. अब, जबकि 2014 के आम चुनाव सिर पर हैं, तो कांग्रेस को लगने लगा है कि अगर उसने अपनी स्थिति राज्य में नहीं सुधारी, तो उसका केन्द्र में सरकार बनाना बहुत मुश्किल ही नहीं, बल्कि नामुमकिन हो जाएगा. अतएव, इस बात को ध्यान में रखते हुए कांग्रेस ने तेलंगाना को अलग राज्य बनाने की मांग को स्वीकार करने का जोखिम भरा निर्णय लिया, ताकि आम चुनावों में इसे नुक़सान होने का जो ख़तरा है, उसे ख़त्म किया जा सके. तेलंगाना के इस फैसले से कांग्रेस को ऐसा लगता है कि वहां के सभी 17 सांसदों के समर्थन मिल जाने से वह संसद में बहुमत में आने की राह आसानी से हासिल कर लेगी. इस प्रकार उसने आंध्र प्रदेश के बाक़ी सांसदों की फिलहाल चिंता नहीं की और सोचा कि चुनावों के बाद उनसे कोई न कोई डील हो ही जाएगी. दरअसल, केन्द्र द्वारा तेलंगाना को लेकर इस समय निर्णय लेने के पीछे यही सब कारण थे.

अब सवाल यह है कि कांग्रेस वर्तमान परिस्थितियों से कैसे निबटे? अगर वह तेलंगाना के निर्णय पर अड़ी रहती है, तो वह सीमांध्र के अपने सांसदों व अन्य समर्थकों को कैसे मनाएगी? दूसरी ओर वह देश के विभिन्न क्षेत्रों में छोटे-छोटे अलग राज्यों की मांग की सुलग रही चिंगारी को कैसे बुझाएगी?

कहा जा रहा है कि इन दिनों पूरे भारत में 21 नये राज्यों की मांगें उठ रही हैं. इन मांगों में मौजूदा उत्तर प्रदेश से निकाल कर अवध प्रदेश, पूर्वांचल, बुन्देलखंड, हरित प्रदेश, या पश्‍चिमांचल, उत्तर प्रदेश, राजस्थान और मध्यप्रदेश से निकाल कर बृज प्रदेश, पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार और छत्तीगढ़ से निकालकर भोजपुर, बिहार से निकाल कर मिथलांचल, बंगाल से निकाल कर गोरखालैंड, पश्‍चिम बंगाल और असम से निकाल कर कामतापुर, असम से निकाल कर बोडोलैंड्स, कर्बी अंग लांग, असम और नागालैंड से निकाल कर डीमाराजी या डीमालैंड, छत्तीसगढ़, ओडीशा और झारखडं से निकाल कर कोसल, महाराष्ट्र से निकाल कर विदर्भ, मणिपुर से निकाल कर कूकीलैंड, गुजरात से निकाल कर सौराष्ट्र, कर्नाटक से निकाल कर कुर्ग और टोडोलैंड, पूर्वी भारत से निकाल कर कोणकी भाषा बोलने वाले लोगों के लिए कोंकण, मेघालय से निकाल कर गारूलैंड और तमिलनाडु से निकाल कोंगूनाडू जैसे नये और छोटे राज्यों के गठन की बात है. यह सारी मांगें दरअसल, 21 राज्यों के गठन को लेकर हैं. इतना ही नहीं, इनके अलावा भी कुछ अन्य क्षेत्रों में भी मांगें की जा रही हैं. मसलन प्रसिद्ध स्तंभकार शोभा डे ने अपने ट्वीट में मुंबई को फिर से राज्य का दर्जा देने की बात उठा दी है और इस पर हंगामा भी हो रहा है.

सवाल यह भी उठता है कि ऐसे समय में, जब वर्तमान यूपीए-2 सरकार का कार्यकाल ख़त्म होने को है, तो क्या वह इस स्थिति में है कि इन मांगों पर विचार करते हुए दूसरे स्टेट री-आर्गनाइज़ेशन कमीशन (एसआरसी) को लेकर इतना महत्वपूर्ण निर्णय ले सके? ज़ाहिर है कि कांग्रेस या यूपीए सरकार अपने कार्यकाल के अंतिम समय में दूसरे एसआरसी के गठन के निर्णय लेने के बारे में बिल्कुल नहीं सोचेगी, क्योंकि इस स्थिति में विपक्षी दल इसकी नाक में दम कर देंगे, जबकि स्वयं कांग्रेस और भाजपा के अन्दर भी ऐसा एक तबक़ा मौजूद है, जो  1953 के बाद दूसरे एसआरसी का गठन चाहता है और इसके समर्थन में है. इस समय पूरे देश में अन्य राज्यों की मांगें ज़ोरों पर हैं. बोडोलैंड के अन्दर की गैरबोडो आबादी को वहां से विस्थापित करके असम के दूसरे क्षेत्रों में बेघर होने को मजबूर किया जाता है. अब तेलंगाना के निर्णय के बाद बोडोज़ एक बार फिर उत्तेजित हो गए हैं और केन्द्र सरकार से बोडोलैंड को अलग राज्य बनाने की ज़बरदस्त मांग कर रहे हैं. ज़ाहिर है कि ऐसी स्थिति में हिंसा की शंका से गैर बोडोज़ की चिंता अब और बढ़ गई है, क्योंकि वे पहले से ही अपनी जान-माल को लेकर डरे हुए हैं. यही कारण है कि असम के कुछ हिस्सों में कर्फ्यु भी लगाना पड़ा.

इसी प्रकार गोरखालैंड समस्या भी तूल पकड़ चुकी है और वहां से भी हिंसा की घटनाओं की ख़बरें आ रही हैं. वहां गोरखा जन मुक्ति मोर्चा (जीजेएम) ने तेलंगाना को लेकर निर्णय होते ही अलग राज्य की मांग तेज़ कर दी है और निरंतर प्रदर्शन किए जा रहे हैं. इसने पश्‍चिम बंगाल की राज्य सरकार से असहयोग का निर्णय कर रखा है. जीजेएम अध्यक्ष बिमल गोरंग ने राज्य सरकार को धमकी दी है कि अगर पहाड़ी क्षेत्रों में कुछ होता है, तो इसके लिए ज़िम्मेदार पश्‍चिमी बंगाल सरकार होगी. गुरूंग गोरखालैंड आन्दोलन के अगुवा घीसींग की तरह गोरखालैंड को राज्य का दर्जा दिलाने को लेकर ममता सरकार से बात न करके केन्द्र सरकार से बातचीत करने को तैयार हैं. वहां जीजेएम के समर्थक मंगल सिंह राजपूत के गोरखालैंड के लिए आत्मदाह से पहाड़ी आबादी में आक्रोश है और इस घटना ने गोरखालैंड को राज्य का दर्जा दिलाने के आन्दोलन को भी हिंसात्मक बना दिया है. उल्लेखीय है कि जीजेएम ने 2014 के आम चुनावों से पूर्व कांग्रेस और भाजपा दोनों से दूरी बनाए रखी है. दिलचस्प बात यह है कि मुस्लिम आबादी गोरखालैंड के आन्दोलन के साथ है, तभी तो उन्होंने इस बार सामूहिक रूप से सादगी के साथ ईद मनाना तय किया है.

असम में भी कर्बी अंग लांग को राज्य का दर्जा देने की मांग पहले से हो रही है. तेलंगाना को लेकर घोषणा होते ही वहां भी हिंसा भड़क उठी. पश्‍चिम बंगाल और असम में कामतापुर को राज्य का दर्जा दिलाने का आन्दोलन भी चल रहा है.

अंत में सवाल यह उठता है कि देश के विभिन्न हिस्सों में नये एवं छोटे राज्यों के लिए जो हिंसा प्रदर्शन शुरू हो चुके हैं, उससे यूपीए कैसे निपटेगी, जबकि चुनाव सिर पर है. जहां तक तेलंगाना की समस्या का सवाल है, तो इसका संबंध 1953 में गठित हुए एसआरसी से है. क्यों एसआरसी की ही अनुशंसाओं पर आंध्र प्रदेश कुछ राज्यों के क्षेत्रों को लेकर अस्तित्व में आया था और इसमें तेलंगाना का क्षेत्र भी शामिल था. जब इस क्षेत्र का सशक्तिकरण नहीं हुआ और इसको लेकर किए गए वादे पूरे नहीं किए गए, तो असंतोष बढ़ा और फिर 1969 से अलग राज्य की मांग शुरू हो गई. आम चुनावों से ठीक पहले तेलंगाना के 17 सांसदों की लालच में यूपीए सरकार ने तेलंगाना को राज्य का दर्जा देने के लिए जो क़दम उठाया है, वह नेकनीयती पर आधारित नहीं है, बल्कि उसमें इसके राजनीतिक हित शामिल हैं और इसका फैसला लेते समय देश के सामूहिक हितों को ध्यान में नहीं रखा गया.

तेलंगाना के इस फैसले से कांग्रेस को ऐसा लगता है कि वहां के सभी 17 सांसदों के समर्थन मिल जाने से वह संसद में बहुमत में आने की राह आसानी से हासिल कर लेगी. इस प्रकार उसने आंध्र प्रदेश के बाक़ी सांसदों की फिलहाल चिंता नहीं की और सोचा कि चुनावों के बाद उनसे कोई न कोई डील हो ही जाएगी. दरअसल, केन्द्र द्वारा तेलंगाना को लेकर इस समय निर्णय लेने के पीछे यही सब कारण थे.

ध्यान देने की बात है कि भारत में राज्यों का पुनर्गठन करके कुल 50 राज्यों का जो हल सामने आ रहा है, इसका सिरा सीधे अमरीका यानी युनाईटेड स्टेट्स ऑफ अमेरिका से मिलता है. क्या इसका यह मतलब समझा जाए कि अब हम अपने देश के ढांचे को भी अमेरिकी ढांचे पर ढालने की ओर बढ़ रहे हैं?