सोच बदलें राजनीतिक दल

जरूरत है कि संसद का एक दिन निर्धारित हो और उस दिन सिर्फ संविधान में कही गई मूल बातों पर बहस हो और उस  बहस का कोई निष्कर्ष निकले.

यह देश अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने में समर्थ है या नहीं? क्या हमने अपना संयम खो दिया है? क्या कांग्रेस सोचती है कि सत्ता में होने के कारण वह भ्रष्टाचार को जारी रखेगी, फिर चाहे उसे नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) कठघरे में खड़ा करे, या सुप्रीम कोर्ट?

वक्ततव्य 

मुझसे कुछ पत्रकारों ने पूछा एक व्यक्ति विशेष के बारे में कि मैं उन्हें सांप्रदायिक समझता हूं कि नहीं, तो मैंने उन्हें तुरंत जवाब दिया कि मेरे पास कोई सुबूत नहीं है. इसका मतलब यह नहीं है कि वे सांप्रदायिक हैं या नहीं हैं. वे एक ऐसे दल में हैं, जिस दल की मान्यता है कि वह इस समुदाय के पक्ष में है और बाकी समुदायों के खिलाफ है और खासकर कि एक समुदाय के बहुत खिलाफ है, यह तो सर्वविदित है. अब रहा सवाल मेरे कथन का, जिसकी मैं देख रहा हूं काफी चर्चा हो रही है, उससे यह अंदाजा नहीं लगाना चाहिए कि मैंने किसी को भी सर्टिफिकेट दिया है, क्योंकि मैं सर्टिफिकेट देने वाला कोई नहीं हूं. भारत का संविधान धर्मनिरपेक्ष है और सभी पार्टियों को उसी के मुताबिक चलना पड़ेगा और जो पार्टियां उसके मुताबिक नहीं चलेंगी, उनको बहुमत नहीं मिल सकता. मैं एक व्यक्ति विशेष को लेकर आगे नहीं बढ़ा हूं, यह दल का मामला है, जिसने उन्हें अभियान समिति का अध्यक्ष बनाया है. इसलिए उस दल का जो मत है, उसी को तो प्रतिबिंबित करेंगे. मैं किसी व्यक्ति विशेष तक सीमित नहीं रहना चाहता हूं. मैं तो आम अभियान चला रहा हूं भ्रष्टाचार के खिलाफ.

संसद का मानसून सत्र 5 अगस्त से शुरू होगा. दिल्ली, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान और मिजोरम जैसे राज्यों में विधानसभा चुनाव से पहले होने वाले इस संसद सत्र के महत्व का अंदाजा लगाया जा सकता है. इस मानसून सत्र में सरकार लंबित विधेयकों को पारित कराना चाहेगी. विभिन्न मुद्दों को लेकर पिछले कुछ सत्रों में सदन की कार्यवाही का बहिष्कार करते आ रहे प्रमुख विपक्षी दल भाजपा को इसकी पुनरावृत्ति नहीं करनी चाहिए. यह खराब रणनीति मानी जाएगी. सभी विधेयकों पर चर्चा होनी चाहिए और उन्हें आवश्यक संशोधनों या बिना संशोधनों के पारित किया जाना चाहिए. यही लोकतंत्र है. सिर्फ बहुमत नहीं है, इसलिए बिल में बाधा डालना और उसे लटकाए रखना अच्छी बात नहीं है. खासकर तब, जब कई राज्यों में चुनाव है. इससे लोगों में यही संदेश जाएगा कि उनका नेतृत्व गलत हाथों में है. खाद्य सुरक्षा विधेयक भी अब संसद के समक्ष आएगा, जिस पर अध्यादेश आने के बाद पहले ही काफी हो-हल्ला हो चुका है.

इससे पहले कि यह कानून का रूप ले, न सिर्फ भाजपा, बल्कि अन्य दलों को भी खाद्य सुरक्षा अध्यादेश में आवश्यक बदलाव के लिए सकारात्मक सुझाव देना चाहिए. इस विधेयक का पारित होना लगभग तय है, क्योंकि कोई भी पार्टी ऐसे विधेयक का विरोध करने का जोखिम नहीं उठा सकती, जो गरीबों को रियायती दर पर भोजन देने जा रहा हो. नि:संदेह सरकारी खजाने पर इससे बड़ा बोझ पड़ेगा और वित्तीय निहितार्थ भी देखने को मिलेंगे. लिहाजा, तर्कसंगत और उचित विधेयक पारित होना चाहिए. आखिरकार इसके क्रियान्वयन की जिम्मेदारी अंत में राज्यों की ही है और ऐसे कई राज्य हैं, जहां कांग्रेस नीत सरकार नहीं है. यही वजह है कि विधेयक को पारित किए जाने से पूर्व इस पर समुचित विचार-विमर्श होना चाहिए.

एक अन्य पहलू भाजपा के चुनावी अभियान का है. अभियान समिति के अध्यक्ष अपनी जुबां पर नियंत्रण खो चुके हैं. वह कुछ भी अनाप-शनाप बोलते हैं. एक अंतरराष्ट्रीय समाचार एजेंसी को दिए गए साक्षात्कार में जिस तरह उन्होंने गुजरात दंगों और हिंदुत्व पर अपना रुख रखा, वह कहीं से भी तर्कसंगत नहीं है. उनसे सवाल किया गया था कि क्या उन्हें गुजरात दंगों में मारे गए लोगों का दुख है. इस पर उनका जवाब था कि कुत्ते का पिल्ला भी यदि कार के नीचे आ जाए, दुख तो तब भी होता है. इंसानी जिंदगी से जानवर की तुलना करना कतई अविवेकपूर्ण है. यह बिल्कुल गलत राजनीति है. सवाल यहां 2002 के गुजरात दंगों में मौत के मुंह में समा चुकीं एक हजार से अधिक जिंदगियों का है. इस तरह के अनुचित बयानों के बाद उनकी ओर से कैसी भी सफाई दी जाए, बेमानी ही लगती है. मैं नहीं जानता कि यह किसी रणनीति के तहत किया गया है, लेकिन उन्हें एक अच्छा व्यक्ति माना जाता है. अयोध्या में जाकर राम मंदिर बनाने की बात करना ठीक है. अयोध्या जाकर कोई भी राजनेता यही कहेगा, लेकिन यह कहीं से भी देश हित में नहीं है.

अब मैं मुख्य बिंदु पर आता हूं. वह यह है कि क्या संविधान में की गई परिकल्पना के अनुसार, यह देश अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने में समर्थ है या नहीं? क्या हमने अपना संयम खो दिया है? क्या कांग्रेस सोचती है कि सत्ता में होने के कारण वह भ्रष्टाचार को जारी रखेगी, फिर चाहे उसे नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) कठघरे में खड़ा करे, या सुप्रीम कोर्ट? क्या भाजपा सोचती है कि धर्मनिरपेक्षता की देश में मौत हो चुकी है और उसे मुस्लिम भावनाओं को रौंदने का ठेका मिल गया है?

2002 में की गई गलतियों को सुधारने की बजाय वह मंदिर के बारे में बात कर भावनाओं को हवा देने में लगी है. पार्टी के अभियान समिति के अध्यक्ष आग में घी डालने का काम कर रहे हैं. इसलिए मैं मानता हूं कि इन सब बातों को देखते हुए इस संसद को पूरा एक दिन संविधान की मूल बातों के निहितार्थ को समझने के लिए आरक्षित करना चाहिए. मैं मानता हूं कि राजनीतिक संवाद को सम्यक स्तर पर लाया जाना चाहिए. एक दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगाने के चलन को समाप्त करना चाहिए. निश्‍चित ही हमें बहस करनी चाहिए. अमेरिका में डेमोक्रेट और रिपब्लिकन बहस करते हैं, ब्रिटेन में कंजर्वेटिव और लेबर बहस करते हैं. पर, यह बहस राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक बिंदुओं पर होनी चाहिए. व्यक्तिगत छींटाकशी इसका हिस्सा नहीं होने चाहिए. मुझे याद है, जब अंतिम बार रॉबर्ट वाड्रा का मुद्दा उठाया गया था, भाजपा इसे मुद्दा बनाने से बच रही थी. अंदरखाने पार्टी के सदस्यों में तय हो गया था कि वे परिवार के सदस्यों को निशाना नहीं बनाएंगे. इसका सीधा मतलब है कि उन्हें इस बात का डर है कि इसका असर उनकी अपनी पार्टी पर भी पड़ेगा. जब उनमें इतना डर है, तो उन्हें भ्रष्टाचार पर बातें नहीं करनी चाहिए, संसद में हंगामे से बाज आना चाहिए और सदन के बहिष्कार से बचना चाहिए. यदि आप कोई मुद्दा सिर्फ इस डर से नहीं उठा सकते कि दूसरा भी आपको घेरेगा, तो आप प्रमुख विपक्ष की भूमिका नहीं निभा सकते. मैं सोचता हूं, यह मानसून सत्र अच्छा अवसर होगा. बीते मानसून सत्र में बमुश्किल सोलह बैठकें हो पाई थीं. इस सत्र में अधिक से अधिक काम होना चाहिए.

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