अराजकता की भेंट च़ढती क्रांति

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मिस्र में अधिनायकवाद के खिलाफ आम जनता के उठ ख़डे होने के बाद 25 जनवरी, 2011 को लोकतंत्र के लिए क्रांति की जो पटकथा लिखी गई थी, वह एक बार फिर अधिनायकवाद की चपेट में आने से रक्तरंजित हो गई है. 60 साल की तानाशाही के बाद उभरे जनाक्रोश ने मिस्र को एक सुनहरा अवसर दिया था कि वह लोकतंत्र का सुगम रास्ता पक़ड सके, लेकिन तीन जुलाई को चुनी हुई सरकार के तख्तापलट के साथ मिस्र ने यह अवसर खो दिया. सेना ने तख्तापलट के पीछे तर्क दिया कि देश की जनता मोहम्मद मोर्सी सरकार से असंतुष्ट है और स़डकों पर उतर आई है. हालांकि, तख्तापलट के बाद तहरीर चौक पर क्रांति की आकांक्षा रखने वाली जनता फिर से स़डक पर उतर प़डी है, परंतु तानाशाही अपने नये रूप में दमन चक्र चला रही है. सात अगस्त को मिस्र की राजधानी काहिरा में 620 लोगों का कत्लेआम हुआ. कुछ लोगों का दावा है कि इस दिन करीब एक हजार लोग मारे गए हैं. नौ अगस्त को भी करीब 180 लोग मारे गए. हर दिन हिंसक प्रदर्शनों और संघर्ष के चलते ब़डी संख्या में लोग मारे जा रहे हैं. मुस्लिम ब्रदरहुड का दावा है कि मोर्सी को हटाए जाने के बाद अब तक संघर्ष में 2200 से ज्यादा लोग मारे जा चुके हैं. लगातार हिंसा के बाद स्थिति इतनी जटिल हो गई है कि अब मिस्र में कोई शांतिपूर्ण समाधान निकालना बेहद कठिन हो गया है. ब़ढती हिंसा और कत्लेआम से परेशान उपराष्ट्रपति मोहम्मद अलबरदेई ने इस्तीफा दे दिया है. 14 अगस्त से देश में आपात स्थिति की घोषणा हो गई है. चुने हुए राष्ट्रपति मोहम्मद मोर्सी को अपदस्थ कर सैनिक शासन लगाए जाने के बाद मोर्सी समर्थक और उनके विरोधी स़डक पर हैं और टकराव के बीच सेना की दमनात्मक कार्रवाई जारी है. हर रोज सैक़डों की संख्या में लोग मारे जा रहे हैं. यह कत्लेआम लोकतंत्र और इस्लामिक कट्टरवाद के बीच सत्ता पर काबिज होने के लिए जारी संघर्ष का नतीजा है.

जो लोग वास्तविक क्रांति के लिए स़डक पर उतरे थे, उन्होंने राष्ट्रपति मोर्सी और मुस्लिम ब्रदरहुड के देश पर इस्लामिक मूल्यों को थोपने के प्रयासों को कबूल नहीं किया और लोकतंत्र के नाम पर मिस्र को इस्लामिक राष्ट्र बनाने के लिए प्रयासरत लोग अपनी हार मानने को तैयार नहीं हैं. फरवरी, 2011 में 30 सालों से मिस्र की सत्ता पर काबिज राष्ट्रपति होस्नी मुबारक ने जनता के व्यापक विरोध के बाद पद छो़डा और सेना को सत्ता सौंपी. 2012 में मुस्लिम ब्रदरहुड के नेता मोहम्मद मोर्सी को राष्ट्रपति चुना गया. लोकतांत्रिक ढंग से राष्ट्रपति चुने जाने के बाद यह उम्मीद जगी थी कि मिस्र की क्रांति जिस उद्देश्य से अमल में लाई गई थी, वह पूरा हुआ, लेकिन उन उम्मीदों पर तब पानी फिर गया, जब मोर्सी ने एक आदेश पारित कर न्यायपालिका के उस अधिकार को खत्म कर दिया, जिसके तहत न्यायपालिका राष्ट्रपति के फैसले को चुनौती दे सकती थी. हालांकि, उनके इस फैसले का व्यापक विरोध हुआ और उन्हें अपना फैसला वापस लेना प़डा, लेकिन सत्ता के इस्लामीकरण की कोशिशें यहीं नहीं थमीं. दिसंबर 2012 में इस्लामी प्रभुत्व वाली संवैधानिक परिषद ने नये संविधान के मसौदे को मंजूरी दी, जिसमें इस्लामिक कानून को खास तवज्जो दी गई. बोलने की आजादी पर पाबंदी लगा दी गई. विपक्षी नेताओं ने इस पर जबरदस्त विरोध-प्रदर्शन शुरू कर दिया, जिसमें तमाम अन्य संगठनों ने भी हिस्सा लिया.

राष्ट्रपति मोर्सी ने लगातार लोकतांत्रिक व्यवस्था में इस्लाम को मजबूत करने की कोशिश की. जनवरी में एक राजनीतिक प्रदर्शनों में 50 लोगों की मौत हो गई, जिसके बाद सेना की ओर से चेतावनी दी गई कि राजनीतिक तनाव के चलते देश टूटने के कगार पर पहुंच गया है. जून, 2013 में उन्होंने 27 गर्वनरों में से 13 इस्लामी सहयोगी नियुक्त कर दिए. सबसे विवादित नियुक्ति रही पूर्व हथियारबंद इस्लामिक गुट के एक सदस्य की, जिनका नाम लक्जर में पर्यटकों की हत्या के मामले में आया था. इसके बाद फिर प्रदर्शन शुरू हो गए. देशव्यापी प्रदर्शनों के बाद सेना ने पूरे काहिरा को अपने कब्जे में लेकर तोपें तैनात कर दीं और मोर्सी को पद से हटा दिया. हजारों की संख्या में विपक्षी स़डक पर उतरे, तो दूसरी ओर मोर्सी समर्थक भी ब़डी संख्या में स़डक पर उतर आए. सेना प्रमुख जनरल अल सीसी ने सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश अदली मंसूर को नया अंतरिम राष्ट्रपति नियुक्त कर दिया और देश के संविधान को अपदस्थ करते हुए घोषणा की कि फिर से चुनाव होने तक मंसूर राष्ट्रपति बने रहेंगे. मंसूर ने जो नये चुनाव की  योजना पेश की, उसे मोर्सी समर्थकों ने खारिज कर दिया और लगातार प्रदर्शन शुरू कर दिया. प्रदर्शनकारियों की सेना के साथ झ़डपें शुरू हो गईं. अगस्त में मोर्सी समर्थकों ने काहिरा में कैंप बनाया और प्रदर्शन शुरू किया. इस दौरान सैक़डों की संख्या में लोग मारे गए. लगातार काहिरा में प्रदर्शन, हिंसा और टकराव जारी है. लगातार हत्याओं से मिस्र की स़डकें खून से नहाई हुई हैं. 19 अगस्त को मिस्र की एक अदालत ने होस्नी मुबारक की रिहाई का आदेश जारी कर दिया है, लेकिन अब मुबारक मिस्र के राजनीतिक फ्रेम से बाहर हो चुके हैं. फिलहाल कोई समाधान निकलता नहीं दिख रहा है. लगातार हो रही हिंसा पर संयुक्त राष्ट्र, अमेरिका और यूरोपीय संघ गंभीर चिंता तो जताई है, लेकिन फिलहाल कोई मध्यस्थता या हस्तक्षेप जैसी स्थिति नहीं है.

मिस्र का संकट यह है कि मुबारक की तानाशाही के खात्मे के बाद राष्ट्रपति बने मोहम्मद मोर्सी ने लोकतांत्रिक व्यवस्था को इस्लामिक रंग देना शुरू कर दिया, तो विपक्षी पार्टियों ने अपनी हार के बाद मोर्सी का खेल बिगा़डने का काम शुरू कर दिया. सभी विपक्षी पार्टियां नेशनल साल्वेशन फ्रंट के तहत इकट्ठा हो गईं और तख्तापलट को समर्थन दिया. इस अस्थिरता को कहीं न कहीं अमेरिका और ब्रिटेन का भी मौन समर्थन हासिल रहा. अब इसमें कोई दो राय नहीं है कि तानाशाही से मुक्त हुआ मिस्र सैन्य शासन के चंगुल में फंस गया है. हालांकि, ब़डी संख्या में ऐसे भी लोग संघर्षरत हैं, जो मिस्र में एक लोकतांत्रिक व्यवस्था की आशा अभी भी पाले हुए हैं.

मिस्र का संकट यह है कि होस्नी मुबारक की तानाशाही के खात्मे के बाद राष्ट्रपति बने मोहम्मद मोर्सी ने लोकतांत्रिक व्यवस्था को इस्लामिक रंग में रंगने की कोशिश शुरू कर  दी,  तो विपक्षी पार्टियों ने अपनी हार के बाद मोर्सी का खेल बिगा़डने का काम शुरू कर दिया.

क्या है क्रांतियों की कमज़ोर नब्ज़

मिस्र और कुछ अन्य देशों, जहां पर क्रांतियां या विद्रोह हुए, उन पर गौर करने के बाद मन में सहज सवाल उठ सकता है कि क्या कारण है कि ज्यादातर बदलाव की आकांक्षा से हुए विद्रोह के बाद जनता को अराजकता ही नसीब होती है? सीरिया में 21 अगस्त को हुए रासायनिक हमले में 1300 से अधिक लोग मारे गए. वहां विद्रोह उठने के बाद से अब तक एक लाख से अधिक लोग मारे जा चुके हैं. मिश्र में हर दिन नरसंहार जैसी स्थिति है. यमन, ट्यूनीशिया, लीबिया आदि देशों में भी क्रांति का ज्वार उठने के बाद अस्थिरता बनी हुई है. अरब देशों में हमेशा क्रांतियों का अंजाम वही हुआ है, जो आज मिस्र, लीबिया या अन्य देशों का हुआ. अगस्त 1970 में पत्रकार राजेंद्र माथुर ने अपने एक लेख में लिखा था कि क्रांतियां अरब देशों में इस तरह होती हैं, जैसे कस्बे के सिनेमा में नई स्टंट पिक्चर लगी हो. 1948 से 1969 के बीच इन देशों में 25 सफल क्रांतियां हुईं और कम से कम 38 असफल रहीं. अरब मुल्कों की ज्यादातर क्रांतियां फौज ने की हैं. इससे जाहिर है कि वहां की बहुतेरी राजनीति फौजी छावनियों में चलती है. फौज में ही राजनीतिक पार्टियां हैं और फौज में ही गुट हैं. फौजी राजनीति शायद मुस्लिम देशों का आवश्यक अंग है.

इतिहास गवाह है कि दुनिया में जिन-जिन देशों में क्रांतियां हुई हैं, वहां-वहां निर्माण से ज्यादा विध्वंस हुआ है. पिछली तीन-चार सदियों में कुछ ही देश ऐसे हैं, जहां पर लोकतंत्र की स्थापना टिकाऊ साबित हुई. हालांकि, क्रांतियों के कुछ-एक सुखद उदाहरण भी हैं, जहां जनता ने क्रांति का झंडा बुलंद किया और नई व्यवस्था का सूत्रपात हुआ. क्रांतियों में आमतौर पर दो तरह की प्रवृत्तियां देखने को मिलती हैं. एक तो यह कि बदलाव की सोची-समझी रणनीति के तहत लंबे समय तक संघर्ष कर के क्रांति आई और वह पूर्णतः या आंशिक तौर पर सफल रही. दूसरी यह कि अचानक एक ज्वार उठा, तख्ता पलट हुआ, लेकिन नई सत्ता का नजरिया नई व्यवस्था को दिशा दे पाने को लेकर स्पष्ट नहीं रहा और अंजाम के तौर पर क्रांति अपने उद्देश्यों से दूर ही रह गई. उदाहरण के तौर पर भारत में 1857 की क्रांति का यही हश्र हुआ, जब अचानक सैनिकों ने विद्रोह किया, लेकिन ब्रिटिश शासन ने उसे बेरहमी से कुचल दिया. पाकिस्तान में उसके जन्म के बाद से कई बार तख्ता पलट हुए, लेकिन आज भी पाकिस्तान अस्थिर बना हुआ है. 1979 में ईरानी क्रांति का नतीजा हुआ कि ईरान कट्टर इस्लामी राष्ट्र ही रह गया.

फ्रांस, रूस, क्यूबा, चीन, वियतनाम आदि देश क्रांतियों के माध्यम से नई व्यवस्था के सूत्रपात की कहानी कहते हैं. 19वीं सदी में मार्क्स और एंगेल्स ने क्रांति का जो विचार प्रस्तुत किया था, वह 20वीं सदी को विरासत में मिला. बीसवीं सदी क्रांतियों की सदी रही है. दुनिया भर में तमाम देशों की जनता को पुरानी व्यवस्थाओं को उलट कर नई व्यवस्था स्थापित की, लेकिन ज्यादातर जगहों पर उनकी सफलता पर ग्रहण लग गया. सोवियत रूस के ढहने के बाद समाजवादी देशों की क्रांतियों पर भी प्रश्‍नचिन्ह लग गया, जिसने दुनिया को दो ध्रुवों में बांट दिया था. ज्यादातर क्रांतियों के बारे में आप पाएंगे कि वे शुरू हुईं किसी और मकसद के साथ, पहुंच गईं कहीं और उनका अंत कहीं और जाकर हुआ. ज्यादातर क्रांतियों के बाद निरंकुश शासन की स्थापना हुई. आखिरकार आप यह कह सकते हैं कि बदलाव के लिए सिर्फ आक्रोश ही काफी नहीं है. उसे एक निश्‍चित राजनीतिक दिशा दिए बिना किसी क्रांति का कोई अर्थ नहीं. वैसे भी क्रांतियां तुरंत  नहीं हो जातीं. यह पीढियों के संघर्ष का परिणाम है. फ्रांस, रूस और चीन की क्रांति इसका उदाहरण है, जहां पर बदलाव के लिए दशकों तक संघर्ष चलता रहा.

फेसबुक से उठी क्रांति पर भी सवाल

फेसबुक पर आह्वान के बाद काहिरा के तहरीर चौक पर उम़डे जन समुदाय के बाद भारत समेत कई देशों में ऐसी घटनाएं हुईं, जब लगा कि क्रांति के रास्ते में फेसबुक अथवा सोशल मीडिया बहुत निर्णायक भूमिका निभाने वाला है. यह सवाल उठे कि क्या दुनिया की अगली क्रांति की पटकथा फेसबुक, ट्विटर और मोबाइल फोन के जरिये लिखी जाएगी? अरब देशों में हुई क्रांति फेसबुक के इस्तेमाल की अनोखी मिसाल रही. भारत में अन्ना हजारे का भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन भी फेसबुक के जरिये काफी प्रसारित हुआ. इन हालातों को देखते हुए सोशल साइट्स का क्रांति के लिए कैसे इस्तेमाल करें, इसकी प़ढाई के लिए इटली में एक केंद्र खोला गया है, लेकिन अरब जगत के हालात और भारत में अन्ना आंदोलन यह सबक देते हैं कि फेसबुक जन संवेदनाओं के उभार में मदद करने वाला एक माध्यम तो हो सकता है, लेकिन उससे संपूर्ण क्रांति नहीं हो सकती. क्रांति के लिए स्पष्ट नेतृत्व, व्यापक रणनीति और उसे दिशा देने का कौशल होना चाहिए. हालांकि, इसमें कोई दो राय नहीं कि फेसबुक या सोशल मीडिया के अन्य मंच क्रांति में मदद के लिए बेहतर माध्यम हो सकते हैं.

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