तानाशाही के अनुभव

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सबसे गजब की बात यह थी कि सर्वोच्च न्यायालय ने इस तर्क को स्वीकार कर लिया. 42 वां संशोधन इस प्रकिया का चरम बिन्दु था. इसने संविधान को इस तरह संशोधित किया कि ऊपर से देखने में तो इसका लोकतांत्रिक स्वरूप बनाए रखा गया, लेकिन वास्तव में देश पर तानाशाही लाद दी गई. उस समय संविधान के दूसरे संशोधन ने राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति व प्रधानमंत्री को कानून के ऊपर रखने की कोशिश की, ताकि उनके खिलाफ कोई भी दीवानी या फौजी कार्रवाई ना हो सके. 

हाईकोर्टों के उन जजों का सजा के तौर पर दुरस्थ जगहों में तुरंत तबादला हुआ, जिनके स्वतंत्र निर्णय सरकार के खिलाफ गए. स्वतंत्र संचार साधन और निष्पक्ष न्याय-व्यवस्था लोकतंत्र के दो सबसे महत्वपूर्ण आधार हैं और आपातकाल में उनकी ही स्वतंत्रता समाप्त हो गई. व्यक्ति के मौलिक अधिकारों की गारंटी देने वाले संविधान के अनुच्छेदों को निरस्त कर दिया गया. इन अनुच्छेदों में मनुष्य का जीवित रहने का अधिकार भी शामिल था. उस समय के सरकारी महाधिवक्ता स्वर्गीय नीरेन डे ने एक बन्दी-प्रत्यक्षीकरण मामले में सर्वोच्च न्यायालय के सामने यह बहस की कि चूंकि मौलिक अधिकार निरस्त हो चुके थे, इसलिए नागरिकों का जीने का अधिकार भी समाप्त हो गया था. ऐसी स्थिति में यदि किसी सरकारी अधिकारी द्वारा गैरकानूनी या विद्वेष वृत्ति से भी कत्ल करवा दिया जाता तो किसी को अदालत में जाने या हर्जाने की मांग करने अधिकार नहीं था. सबसे गजब की बात यह थी कि सर्वोच्च न्यायालय ने इस तर्क को स्वीकार कर लिया. 42 वां संशोधन इस प्रकिया का चरम बिन्दु था. इसने संविधान को इस तरह संशोधित किया कि ऊपर से देखने में तो इसका लोकतांत्रिक स्वरूप बनाए रखा गया, लेकिन वास्तव में देश पर तानाशाही लाद दी गई. उस समय संविधान के दूसरे संशोधन ने राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति व प्रधानमंत्री को कानून के ऊपर रखने की कोशिश की, ताकि उनके खिलाफ कोई भी दीवानी या फौजी कार्रवाई ना हो सके. यानी यदि ये लोग किसी की हत्या भी कर देते या किसी की सम्पत्ति छीन लेते तो भी उनके खिलाफ कुछ भी न होता. यह याद रखना चाहिए कि आज दुनिया में ऐसे बीसों तानाशाह हैं, जिन्होंने अपने को कानून के ऊपर रखा है और सैकड़ों या हजारों खून के इल्जाम भी उनके सिर पर हैं. यह तो एक संयोग था कि सर्वोच्च न्यायालय ने यह संशोधन स्वीकार नहीं किया और राज्यसभा से पास होने के बाद भी यह निकाल दिया गया. सौभाग्य से मार्च 1977 में इस आशा से चुनाव की घोषणा की गई कि विरोधी नेताओं के अभी-अभी जेल से बाहर आने व जे. पी. के रोग-शय्या पर पड़े रहने के कारण श्रीमती इंदिरा गांधी की जीत एकदम आसान हो जाएगी. उन्हें चुनाव कराने की सख्त जरूरत थी, ताकि पश्‍चिमी देशों से मांग कर रुपये की नितांत कमी की शीघ्रपूर्ति के लिए वह उनकी नजरों में अपने प्रशासन का औचित्य सिद्ध कर सकतीं, लेकिन भारत के लोगों ने उनकी चालों को व्यर्थ कर दिया और जनता शासन को सत्ता में आने का मौका दिया. अपनी तमाम कमियों के बावजूद यह शासन इतिहास में इस घृणित 42 वें संशोधन को समाप्त करने और लोकतंत्र को फिर से अपनी राह पर लाने के लिए याद किया जाएगा, लेकिन जनता शासन अपने नेताओं के आपसी झगड़े के कारण टूट गया और इन बातों से ऊबी जनता ने अपने मतदान से इंदिरा कांग्रेस को फिर सत्ता में बिठा दिया. काफी लोगों ने यह उम्मीद की थी कि तानाशाही शासन के अनुभव, विशेषत: लोगों की, उसके प्रति तीव्र प्रतिक्रिया से श्रीमती गांधी में गंभीरता आएगी और वे आगे लोकतंत्र और आजादी में दस्तंदाजी करने में सावधानी बरतेंगी. उन्होंने उस अनुभव से पाठ जरूर सीखा है, लेकिन दूसरी ही किस्म का. उनकी आंखे अभी भी किसी-न-किसी तानाशाही पर ही लगी हैं, लेकिन उन्होंने उसके लिए कोई नाटकीय कदम न उठाने की बात सीखी है. 1975 की आपातस्थिति उस चक्रवात की तरह थी, जो कुछ ही मिनटों में हर चीज को बेढ़ंगा कर देता है, हजारों को मृत और घायल कर देता है और तुरंत सारी दुनिया का ध्यान आकर्षित कर लेता है. दूसरी ओर सूखा दबे पांव आता है, धीरे-धीरे चुपचाप. लोग बराबर यह आशा लगाए रहते हैं कि यदि कल नहीं तो अगले सप्ताह वर्षा जरूर होगी और जब एक दिन उनकी आशाएं समाप्त हो जाती हैं, वे अपने को भूखमरी औऱ मृत्यु के किनारे पाते हैं. सूखे का समाचार दुनिया के समाचार-पत्रों में मोटी सुर्खियों में नहीं छपता, हालांकि इसके द्वारा मरे लोगों की संख्या चक्रवात से मरे लोगों की तुलना में कहीं ज्यादा होती है. तानाशाही अब सूखे की तरह ही लाई जा रही है, चुपचाप, एक-एक कदम, बिना किसी नाटकीय हलचल के. हममें से ज्यादातर लोग जितना समझते हैं, उससे यह कहीं ज्यादा निकट आ चुकी है. यह करीब-करीब हमारे सिर पर आ चुकी है. आइए हम इसकी पदचाप सुनें. मिसा (आन्तरिक सुरक्षा कानून) को जनता सरकार ने रद्द कर दिया था. उसी की प्रतिकृति अब राष्ट्रीय सुरक्षा कानून में मिलेगी, जिसके अन्तर्गत कोई भी व्यक्ति जीवन भर के लिए जेल में बन्द हो सकता है. सिवाय इसके कि जेल से छूटने और उसमें दुबारा डाल दिए जाने के बीच उसे कुछ आजादी महसूस हो जाए. ऐसा ही घिनौना दूसरा कानून है, आवश्यक सेवा सुरक्षा कानून. यह कानून किसी भी औद्योगिक या व्यावसायिक प्रतिष्ठान में हड़ताल पर रोक लगाने में प्रयुक्त हो सकता है. इसके अन्तर्गत आवश्यक सेवाओं की विस्तृत परिभाषा है. इसका वास्तविक इस्तेमाल होटलों में हड़ताल रोकने मे किया गया है. ऐसा नहीं है कि इस कानून के लागू होने के पहले देश में अस्पताल, पानी व बिजली आपूर्ति तथा  ऐसी ही अन्य चीजों में रुकावट डालने के विरुद्ध कोई सुरक्षा कानून नहीं था. काफी कानून पहले से मौजूद हैं, लेकिन यह नया कानून सारे श्रमिक आन्दोलन को पंगु बनाने के लिए एक हथियार के तौर पर निकाला गया है. किसी भी धंधे को आवश्यक सेवा घोषित किया जा सकता है और हड़ताली कर्मचारियों को नौकरी से तुरंत बर्खास्त किया जा सकता है. हड़ताल में शामिल होने वाले, उनको मदद करने या सहायक होने वोलों पर संक्षिप्त अदालतों में मुकदमा चलाया जा सकता और उन्हें लंबी सजाओं और जुर्माने का भागीदार बनाया जा सकता है.

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