मध्य प्रदेश : क्या सिंधिया मध्य प्रदेश कांग्रेस की कमान संभाल पाएंगे?

मध्य प्रदेश विधानसभा चुनावों में दो बार भाजपा से पटखनी खाने वाली कांग्रेस पार्टी भीतर की गुटबाजियों से निजात पाकर एकजुटता प्रदर्शित करने में लग गई है. ज्योतिरादित्य सिंधिया को चुनाव प्रचार अभियान समिति की कमान दी गई है तो चुनाव प्रबंधन की जिम्मेदारी कमलनाथ ने संभाली है. अटकलें हैं कि यदि पार्टी को बहुमत मिलता है तो सिंधिया मुख्यमंत्री पद के सबसे मजबूत दावेदार होंगे, साथ में यह सवाल भी है कि कार्यकर्ताओं से कटकर रहने वाले सिंधिया क्या कांग्रेस की कमान संभाल सकेंगे?

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लंबे समय से जबर्दस्त गुटबाजी की वजह से पिछले दो विधानसभा चुनावों में भाजपा के हाथों करारी हार झेलती आ रही मध्य प्रदेश कांग्रेस ने आखिरकार पार्टी में प्रभावी गुटों में न सिर्फ एकजुटता का फार्मूला ढूंढ लिया, बल्कि इसे अमलीजामा पहनाने की कवायदें भी शुरू कर दी हैं. इन कवायदों के शुरुआती क्रम में गुटों में विभाजित पार्टी नेताओं के बीच परस्पर एकता का प्रदर्शन किया जाना है. ऐसे में प्रमुख नेताओं मसलन, ज्योतिरादित्य सिंधिया, कमलनाथ, सुरेश पचौरी एवं अजय सिंह राहुल को आगामी विधानसभा चुनाव के मद्देनजर अलग-अलग जिम्मेदारियां सौंपी गई हैं. ये सभी मिलकर दो कार्यकाल से सत्ता पर काबिज भाजपा को हैट्रिक लगाने से रोकने की कवायद करेंगे. चुनाव प्रचार अभियान समिति की कमान ज्योतिरादित्य सिंधिया को दी गई है तो चुनाव प्रबंधन की जिम्मेदारी कमलनाथ ने संभाली है. विधानसभा चुनाव का घोषणा पत्र तैयार करने का काम सुरेश पचौरी के जिम्मे आया है. जबकि सत्तारू़ढ भाजपा सरकार के खिलाफ आरोप पत्र तैयार करने का दायित्व विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह राहुल को दिया गया है. सर्वविदित है की मध्य प्रदेश कांग्रेस में बड़े नेताओं के नाम पर कार्यकर्ताओं में निचले स्तर तक गुटबाजी और इसके चलते पार्टी की खस्ता हालत की शिकायतें आम हैं. यह सब पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष राहुल गांधी के प्रदेश दौरे के समय भी उजागर हो चुका है. इसी का नतीजा है कि प्रदेश के प्रभारी महासचिव बीके हरिप्रसाद के स्थान पर मोहन प्रकाश को नियुक्त किया गया और अब पार्टी में एकजुटता प्रदर्शित करने के लिए जगह-जगह सभाओं का आयोजन किया जा रहा है. आयोजनों का मकसद कार्यकर्ताओं तक एकजुटता का संदेश पहुंचाना है.

उल्लेखनीय है कि प्रदेश में पार्टी का एक धड़ा काफी समय से केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया को प्रदेश संगठन की कमान सौंपे जाने हेतु दबाव बना रहा था. इस मामले में संभवतः सिंधिया की भी गंभीर रूचि नहीं रही, लिहाजा यह जिम्मेदारी आदिवासी नेता कांतिलाल भूरिया के कंधों पर आई. लेकिन न तो संगठन में उनका अपेक्षित प्रभाव बन सका, न ही पार्टी में लाइलाज गुटबाजी का ठोस निदान निकल पाया. इस बीच मध्य प्रदेश कांग्रेस संगठन में नई जान फूंकने के प्रयासों के सिलसिले में नित नये फार्मूलों की खोजबीन भी जारी रही. आगामी विधानसभा चुनावों के मद्देनजर सिंधिया को बतौर मुख्यमंत्री पेश किए जाने की भी मांग उठी. दिग्विजय सिंह ने भी इस पर अपनी सहमति दी, लेकिन खुद सिंधिया आदिवासी मुख्यमंत्री की हिमायत में कांतिलाल भूरिया का नाम लेने लगे. प्रदेश में पार्टी नेतृत्व को लेकर कोई ठोस निष्कर्ष नहीं निकला. पार्टी का आलाकमान भी मप्र में किसी को मुख्यमंत्री के रूप में प्रस्तुत करने के पक्ष में नहीं रहा, न ही इनमे से किसी में अपनी दिलचस्पी जाहिर की. राज्य कांग्रेस में जारी गुटबाजी को लेकर पार्टी जो कमजोरियां अनुभव करती आ रही थी, इससे निजात पाने की कोई पुख्ता तरकीब तब भी नहीं मिल पाई. बस पार्टी के आला नेताओं को बार बार एक मंच पर प्रस्तुत होने और एकजुटता दिखाने संबंधी ऊपरी निर्देश प्राप्त होते रहे. इन निर्देशों के मुताबिक ऐसे श्रंखलाबद्ध आयोजनों का दौर जारी है.

इस फार्मूले पर कमलनाथ की ओर से यह भी कहा गया है कि जिस तरह वे दिग्विजय को आगे लाए थे, उसी तरह इस बार सिंधिया को आगे बढ़ाया है. कमलनाथ के इस बयान का अर्थ यह निकाला जा रहा है कि कमलनाथ समेत सिंधिया के करीबी चुनाव में पार्टी के प्रचार अभियान की तो कमान संभालेंगे ही, यदि कांग्रेस बहुमत जुटाकर भाजपा को हैट्रिक लगाने से रोकने में कामयाब हो गई तो मुख्यमंत्री का सेहरा भी सिंधिया के सिर बंधेगा. क्योंकि दिग्विजय एक बार फिर अपने को मुख्यमंत्री पद की दौड़ से बाहर बता रहे हैं. ऐसे में इसके भी संकेत नहीं हैं कि सिंधिया के नाम पर उन्हें कोई आपत्ति होगी. अब कमलनाथ, सिंधिया और दिग्विजय अगर एक राय हो जाते हैं तथा सुरेश पचौरी इनसे बाहर नहीं जाते, तब कांतिलाल भूरिया हों या अजय सिंह अथवा अन्य नेता, सबके पास सिंधिया को समर्थन देने के अलावा कुछ शेष नहीं बचता. इनमें सत्यदेव तो पहले ही सिंधिया के कसीदे पढ़ चुके हैं.

अब यह माना जा सकता है कि मध्य प्रदेश में कांग्रेस ज्योतिरादित्य सिंधिया को अपनी संगठनात्मक एकजुटता का अग्रणी चेहरा बनाकर भाजपा की शिवराज बिग्रेड से विधानसभा में भ़िडने हेतु कमर कसकर तैयार हो रही है. परंतु जानकारों के मुताबिक यह सब फिर भी इतना आसान नहीं है. पार्टी को सत्ता से बाहर हुए दस साल का लंबा अरसा हो चुका है. पार्टी में कमलछाप कांग्रेसियों का खुलकर जिक्र होता है. इसके अतिरिक्त मध्य प्रदेश कांग्रेस के सामने भाजपा से चुनावी मुकाबले के लिए सबसे बड़ी चुनौती है टिकटों का आबंटन. इस चुनौती से पार पाने को पार्टी को अभी कितने पापड़ बेलने पड़ेंगे, कहना मुश्किल है. जो टिकिट से वंचित रह जाएंगे वे दावेदार, उनके समर्थक तथा उनके आका क्या गुल खिलाएंगे, यह देखने की बात होगी. खुद अपनी जड़ें काटने की आदत के चलते इस स्थिति तक पहुंचने के बाद भी क्या ऐसे कांग्रेसी अपनी आदत से बाज आएंगे?

सिंधिया को राज्य विधानसभा चुनाव प्रचार अभियान का मुख्य चेहरा बनाए जाने से पार्टी का बड़ा तबका उत्साहित होने लगा है. इनमें ऐसे लोगों की तादाद कम नहीं है जो मानने लगे हैं कि टिकट आबंटन को लेकर पार्टी की चाहे जैसी प्रक्रिया चल रही हो, सिंधिया की अनुकंपा अब सबसे बड़ा संबल हो सकती है. इसके उलट बहुतेरे दावेदार अभी से यह मानने लगे हैं कि सिंधिया की सूची से पहले ही बाहर होने का नतीजा उन्हें टिकट मिलने की संभावना पर विपरीत असर डालेगा. कमलनाथ के करीबी उनमें और सिंधिया में तालमेल के बूते जुगाड़ तलाशने में जुटने लगे हैं. वहीं सुरेश पचौरी समर्थक अपने आका से मिलने वाले आगे के संकेतों के लिए प्रतीक्षारत हैं. अलबत्ता दिग्गी राजा के अनुयाइयों को उनके विधानसभा चुनावों से दूरियां दर्शाने के बाद भी उनके अचूक दांव-पेंचों का भरपूर आसरा है, जिनकी वजह से वे किसी भी समय पलड़े को अपने पक्ष में करने की कला के माहिर समझे जाते हैं.

ऐसे परिदृश्य में ज्योतिरादित्य सिंधिया को आगे कर लाया गया फार्मूला भविष्य में भाजपा और शिवराज सिंह के मुकाबले हेतु कितना कारगर हो सकेगा, इसकी जांच परख राज्य के राजनीतिक क्षेत्रों और प्रेक्षकों के मध्य अभी से होने लगी है. मुख्यमंत्री शिवराज सिंह ने सिंधिया की अगुवाई को कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष कांतिलाल भूरिया के रूप में आदिवासी समाज का अपमान बता दिया है. हालांकि, कांग्रेस के आला नेता यह कह रहे हैं कि कांग्रेस को बहुमत मिलने की स्थिति में चुने हुए विधायक ही अपना नेता चुनेंगे. कोई हेलीकॉप्टर से आकर इनका नेता नहीं बन सकेगा. प्रदेश में हर तरफ सिंधिया को कांग्रेस के चुनाव प्रचार अभियान की कमान दिए जाने पर कांग्रेस के भीतर और बाहर इन सवालों के उत्तर तलाशे जाने लगे हैं कि क्या सिंधिया आने वाले चुनाव में भाजपा के मुकाबले कांग्रेस की चुनावी नैया को सफलतापूर्वक पार लगा सकेंगे?

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