समाप्ति की कगार पर : भारतीय टेनिस का स्वर्णिम दौर

हमने टेनिस में जहां से शुरुआत की थी, एक बार फिर से हम वहीं आकर खड़े हो गए हैं. लिएंडर पेस, महेश भूपति और सानिया मिर्ज़ा ने सफलता के जो आयाम ग़ढे हैं, उसको बरकरार रखने का दमखम उनके बाद के युवा टेनिस खिलाड़ियों में नहीं दिखता. एक स्टार खिला़डी किसी भी देश में खेल की रूपरेखा बदल देता है, लेकिन भारतीय टेनिस जगत में सितारों का जमाव़डा होने के बावजूद जैसे लगता है कि होनहार खिलाड़ियों का अकाल प़ड गया है. कहना गलत नहीं होगा कि भारतीय टेनिस जगत का भविष्य अनिश्‍चितताओं  के भंवरजाल में फंस कर रह गया है?.

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भारतीय टेनिस का स्वर्णिम दौर समाप्ति की कगार पर पहुंच गया है. लिएंडर पेस और महेश भूपति का उदय भारतीय टेनिस के लिए एक ऐतिहासिक घटना थी, जिसके बाद भारतीय टेनिस अपनी बुलंदियों पर पहुंच गया. साल की आखिरी ग्रैंड स्लैम प्रतियोगिता अमेरिकी ओपन खत्म हो चुकी है. इस बार लिएंडर पेस के अलावा फाइनल तक कोई खिलाड़ी नहीं पहुंच सका. सानिया मिर्जा महिला युगल में अंतिम चार तक पहुंचने में कामयाब रहीं. सबसे ज्यादा चिंता का विषय यह है कि भारत की नई पीढ़ी के टेनिस खिलाड़ी विश्‍व पटल पर अपनी छाप नहीं छोड़ पा रहे हैं. यही हाल महिला टेनिस का भी है पिछले एक दशक से सानिया मिर्जा अपने कंधों पर आशाओं का बोझ लेकर आगे बढ़ रही हैं. टेनिस में सानिया की धमाकेदार एंट्री के बाद ऐसा लगा था कि देश में टेनिस के हालात बदल जाएंगे. ज्यादा से ज्यादा लड़कियां टेनिस कोर्ट पर चहलकदमी करती नज़र आएंगी, लेकिन सानिया के पदार्पण के एक दशक बाद भी महिला टेनिस सानिया मिर्ज़ा के इर्द-गिर्द ही घूमती नजर आती है.

ऐसा लगता है हमने टेनिस में जहां से शुरुआत की थी, एक बार फिर से हम वहीं आकर खड़े हो गए हैं. लिएंडर पेस ने 1990 में जूनियर यूएस ओपन और जूनियर विंबलडन का खिताब जीतकर खलबली मचा दी थी. 1992 में उन्होंने जूनियर रैंकिंग में पहला स्थान हासिल किया था. 1991 में उन्होंने प्रोफेशनल टेनिस खिलाड़ी के रूप में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई. दो दशक से भी ज्यादा लंबे अपने करियर में पेस ने कुल चौदह ग्रैंड स्लैम खिताब जीते और भारतीय टेनिस को शिखर पर ले गए. इसमें उनका साथ दिया महेश भूपति ने. कुछ समय तक डबल्स पार्टनर के रूप में खेलते हुए दोनों नया इतिहास लिखने लगे थे. भूपति अपने करियर में दुनिया उन्हें इंडियन एक्सप्रेस के नाम से जानने लगी थी. भूपति 1997 में ग्रैंड स्लैम खिताब जीतने वाले पहले भारतीय खिलाड़ी बने थे. इसके बाद टेनिस जगत में भारतीय उपलब्धियों का जो सिलसिला शुरू हुआ वह अब तक नहीं थमा है. उम्र के चालीसवें पड़ाव पर पहुंचने के बावजूद ये खिलाड़ी लगातार सफलता हासिल करने में लगे हैं. साथ ही जूनियर और नये खिलाड़ी सफलता से कोसों दूर नज़र आते हैं.

क्रिकेट में जिस तरह सचिन तेंदुलकर का प्रारंभिक करियर रहा, उससे प्रभावित होकर अभिभावकों ने अपने बच्चों को क्रिकेटर बनाने की ठान ली. क्रिकेट के समानांतर ठीक उसी समय पेस की सफलता के साथ लोगों का टेनिस के साथ जुड़ाव नहीं हो सका. आज पेस, भूपति और सानिया मिर्जा भारत के क्रिकेट खिलाड़ियों की तरह ही प्रसिद्ध हैं. उन्हें हर कोई जानता है. बावजूद इसके, टेनिस को लोग करियर के रूप में नहीं चुन रहे हैं. इसका सबसे बड़ा कारण इस खेल के सामान और संसाधनों का मंहगा होना. जो कि देश के आम आदमी की पहुंच से कोसों दूर था. देश का सबसे समृद्ध तबका इन खेलों पर हमेशा से हावी रहा. इस कारण यह आम लोगों का खेल नहीं बन सका.

आज लिएंडर पेस और भूपति अपनी उम्र के चालीस पड़ाव पार कर चुके हैं. इनकी विरासत को संभालने के लिए देश में कुछ गिने चुने खिलाड़ी ही दिखाई पड़ रहे हैं, जिनमें रोहन बोपन्ना और सोमदेव बर्मन का नाम प्रमुखता से लिया जा सकता है. बोपन्ना अब तक कोई ग्रैंड स्लैम खिताब अपने नाम नहीं कर सके हैं. 2010 में वह ग्रैंड स्लैम खिताब से एक कदम दूर रह गए थे. वह यूएस ओपन के फाइनल में पाकिस्तान के एहसान उल हक़ कुरैशी के साथ पहुंचे थे, लेकिन उन्हें वहां हार का मुंह देखना पड़ा था. उसी तरह सोमदेव बर्मन अकेले ही लंबे समय से पुरुष एकल की लगाम थामे हुए हैं. 2010 में दिल्ली में हुए राष्ट्रमंडल खेलों और चीन के ग्वांगझू शहर में हुए एशियाई खेलों में एकल स्पर्धा का स्वर्ण पदक जीतकर सोमदेव ने आगे बेहतर प्रदर्शन की उम्मीद जताई थी, लेकिन वह भी कसौटी पर खरे नहीं उतरे. ग्रैंड स्लैम प्रतियोगिताओं में अधिकांशतः वह दूसरे दौर से आगे नहीं बढ़ सके.

भारतीय टेनिस का नया सितारा बनने की आस यूकी भांबरी ने भी दिखाई. 2008 की शुरुआत से ही यूकी जूनियर रैंकिंग में नंबर एक पर रहे. उन्होंने 2009 में  16 वर्ष की उम में ऑस्ट्रेलियन ओपन का जूनियर खिताब जीता. इसके बाद उन्होंने प्रोफेशनल टेनिस की दुनिया में कदम रखा, लेकिन वह जूनियर लेवल की सफलता प्रोफेशनल लेवल पर दोहरा नहीं सके. कभी-कभी अप्रत्याशित तौर पर जीत दर्ज कर वह सबको चौंका देते हैं, लेकिन वह अब तक स्वयं को पेस और भूपति के उत्तराधिकारी के रूप में स्थापित नहीं कर पाए है. इसी तरह लंदन ओलंपिक में डबल्स में लिएंडर पेस के साथी बने विष्णुवर्धन भी हैं. उनका नाम आखिरी बार सुर्खियों में पेस के साथ जोड़ी बनाने के दौरान ही आया था. उसके पहले  एशियाई खेलों में अपने खेल को लेकर वे सुर्खियों में कभी नहीं रहते है. इसी तरह सनम सिंह का नाम एशियाई खेलों के दौरान सोमदेव बर्मन के साथ युगल स्पर्धा का स्वर्ण पदक जीतने के दौरान सामने आया था. सनम सिंह इसके बाद कोई कारनामा नहीं कर सके.

अखिल भारतीय टेनिस ऐसोसिएशन (एआईटीए) में सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है. इसका उदाहरण लंदन ओलंपिक में भारतीय टेनिस टीम के भेजे जाने के समय सबके सामने आया था. महेश भूपति और रोहन बोपन्ना ने लिएंडर पेस के साथ जोड़ी बनाने से इंकार कर दिया था और इसके बाद जो बवाल मचा उससे हर कोई वाकिफ है.

महिला टेनिस खिलाड़ियों का तो देश में एक बार फिर से आकाल पड़ा हुआ है. अंकिता रैना भारत की नंबर एक महिला टेनिस खिलाड़ी बनकर उभरी हैं. सानिया मिर्जा के एकल स्पर्धाओं में भाग लेना बंद करने के बाद उन्हें सबके सामने आने का मौका मिला है. इसी तरह यूकी भांबरी की बहन प्रेरणा भांबरी और ऋषिका सुंकारा भी नई महिला टेनिस खिलाड़ी हैं, जिनकी उपलब्धियां अभी सीमित हैं. कुछ दिन पहले पूर्व भारतीय महिला टेनिस खिलाड़ी निरुपमा वैद्यनाथन ने अपनी आत्मकथा मूनबॉलर के विमोचन के दौरान कहा था कि उन्होंने अपने अनुभव का फायदा युवा खिलाड़ियों के देने के लिए भारतीय टेनिस एसोसिएशन से कहा था, लेकिन उन्होंने मेरे प्रस्ताव को नकार दिया था. मुझे लगता है कि देश में प्रतिभा की कमी नहीं है, लेकिन जरूरत उस प्रतिभा को आकार देने की है. देश में बड़ी संख्या में प्रोफेशनल टेनिस प्रतियोगिताएं आयोजित करने की आवश्यकता है. इसके साथ ही खिलाड़ियों को प्रशिक्षण के लिए और प्रतियोगिताओं में भाग लेने जाने देने की आवश्यकता है, खिलाड़ियों के प्रदर्शन में निखार लाने का यह एकलौता और कारगर तरीका है. अखिल भारतीय टेनिस ऐसोसिएशन (एआईटीए) में सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है. इसका उदाहरण लंदन ओलंपिक में भारतीय टेनिस टीम के भेजे जाने के समय सबके सामने आया था. महेश भूपति और रोहन बोपन्ना ने लिएंडर पेस के साथ जोड़ी बनाने से इन्कार कर दिया था और इसके बाद जो बवाल मचा उससे हर कोई वाकिफ है. महेश भूपति और रोहन बोपन्ना के ऊपर देश के लिए खेलने पर प्रतिबंध लगा दिया. बाद में इस प्रतिबंध को जून, 2014 तक बढ़ा दिया गया. एआईटीए देश में टेनिस के विकास के लिए कोई नये कदम नहीं उठा रहा है, लेकिन महेश भूपति इंटरनेशनल टेनिस लीग का आयोजन करने की तैयारी करने में जुटे हैं, जिसमें देश-विदेश के नामचीन खिलाड़ी शिरकत करते नज़र आएंगे. भारतीयों के लिए दुनिया के दिग्गज टेनिस खिलाड़ियों को सामने खेलते देखने का मौका मिलेगा. यह एक व्यावसायिक लीग होगी, जिससे जमीनी स्तर पर खिलाड़ियों को फायदा हो न हो, लेकिन युवा खिलाड़ियों को इससे जरूर फायदा मिलेगा, लेकिन यही वक्त की दरकार है. इस दिशा में एआईटीए को कदम उठाने होंगे.

 

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