अभिव्यक्ति पर हमला : बोलने की आज़ादी पर बढ़ते ख़तरे

एशियाई देशों में कट्टरपंथी संगठनों द्बारा लेखकों, पत्रकारों, सामाजिक कार्यकर्ताओं पर हमले ब़ढ रहे हैं. अफगानिस्तान में भारतीय लेखिका सुष्मिता बनर्जी की हत्या इसी सिलसिले की एक क़डी है. आतंकी, तालिबानी, कट्टरपंथी संगठन और यहां तक की सरकारें भी अपनी जायज आलोचना बरदाश्त नहीं करती हैं. अन्याय के खिलाफ उठने वाली हर आवाज को दबाने की कोशिश की जाती है. ब़ढती संकीर्णता और असिष्णुता के खिलाफ एकजुट होकर आवाज बुलंद करने की जरूरत है.

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अन्याय के खिलाफ एक और आवाज को दबा दिया गया. यह आवाज थी अफगानिस्तान में रह रहीं भारतीय लेखिका सुष्मिता बनर्जी. बनर्जी की हत्या ने अभिव्यक्ति और न्याय के पक्ष में ख़डे लोगों पर आसन्न खतरे के सवालों को पुन: उठाने पर विवश किया है. बनर्जी की हत्या कोई पहला घटना नहीं है. ऐशियाई देशों में, खासकर, भारत, पाकिस्तान, बाग्लांदेश और अफगानिस्तान में लेखकों, पत्रकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं पर हाल में हमले ब़ढे हैं. आतंकी, तालिबानी, कट्टरपंथी संगठन और यहां तक की सरकारें भी अपनी जायज आलोचना बरदाश्त नहीं करती हैं. उनके द्बारा बरते जा रहे अन्याय के खिलाफ उठने वाली हर आवाज को वे दबा देना चाहते हैं. आज जब पूरी दुनिया में लोकतंत्र, वैयक्तिक स्वतंत्रता और बोलने की आजादी के स्वर बुलंद हो रहे हैं, इस तरह न्यायप्रिय आवाजों को दबाने की घटनाएं दुर्भाग्यपूर्ण हैं. आज कट्टरता और अलोकतांत्रिक कृत्यों के खिलाफ एकजुट होकर इससे निपटने के सवाल हमारे सामने फिर से जीवंत हो उठे हैं. हालांकि, तालिबान ने सुष्मिता की करने से इन्कार करते हुए कहा कि हमें बदनाम किया जा रहा है. लेखिका की हत्या में तालिबान शामिल नहीं हैं. लेकिन तालिबान ऐसी गतिविधियों को लगातार अंजाम देते रहे हैं. इसने पहले भी फरमान नहीं मानने वाली महिलाओं की हत्या की है. हाल ही में पाकिस्तान में मलाला यूसुफजई को गोली मारी गई थी. वह भी महज इसलिए कि वह अपनी हमउम्र बच्चियों को शिक्षा के लिए प्रेरित कर रही थी.

सुष्मिता बनर्जी प्रगतिशील विचारों वाली साहसी महिला थीं. उन्होंने अफगानिस्तानी कारोबारी जांबाज खान से शादी की थी और वहीं बस गई थीं. अफगानिस्तान में सैयदा कमाला के नाम से जानी जाने वाली सुष्मिता एक स्वास्थ्यकर्मी के रूप में काम कर रही थीं और वहां की महिलाओं की जिंदगी पर फिल्में बना रही थीं. सुष्मिता ने काबुलीवालार बंगाली बोउ (काबुलीवाले की बंगाली पत्नी) नाम से किताब लिखी थी, जिसमें उन्होंने अफगानिस्तान में पति के साथ अपनी रहनवारी और तालिबान से बचने की कहानी लिखी थी. यह किताब 1995 में आई थी. 2003 में इस पर आधारित एस्केप फ्राम तालिबान नाम से एक फिल्म भी बनी. किताब में उन्होंने तालिबान से बचकर भागने और पक़डे जाने और फिर बचने की लंबी जद्दोजहद की कहानी लिखी थी. सुष्मिता 1989 में खान से शादी करके अफगानिस्तान गईं थीं. बाद में उन्होंने एक पत्रिका में लिखा कि 1993 तक उनकी जिंदगी सुचारु चल रही थी. इसके बाद तालिबान सत्ता पर काबिज हुए और उनकी जिंदगी मुश्किल हो गई. बनर्जी की हत्या के पहले तालिबान ने उन्हें कमजोर नैतिकता वाली महिला होने का आरोप लगाते हुए उनका दवाखाना बंद करने का फरमान सुनाया था. हाल ही में भारत से फिर अफगानिस्तान लौटी थीं और स्वास्थ्यसेवा संबंधी अपना काम दोबारा शुरू किया था. अफगानिस्तानी पुलिस के अनुसार पिछले बुधवार की रात उनके परिजनों को बंधक बनाकर कुछ नकाबपोश बंदूकधारियों ने उन्हें घर से बाहर निकाला और गोलियों से छलनी कर दिया।

सुष्मिता की हत्या पूरे एशिया में मानवाधिकार, लोकतंत्र और आजादी पर बढ़ रहे हमले का एक उदाहरण है. इस हत्या ने सांप्रदायिक ताकतों और उनको शह देने वाली सरकारों के खिलाफ उठ ख़डे होने की आवश्यकता को एक बार फिर से प्रासंगिक बना दिया है. एक तरफ मध्यपूर्व के कई देशों में सरकारों के खिलाफ जनांदोलन हो रहे हैं, तो दूसरी तरफ कट्टर सांप्रदायिक शक्तियां अपनी सत्ता कायम रखने की कोशिशों में लगी हुई हैं. पूरे भारतीय उपमहाद्वीप या दक्षिण एशिया में भी ऐसी कट्टर ताकतें सक्रिय हैं. बांग्ला लेखिका तस्लीमा नसरीन को लगातार मौत की धमकियों के बीच इस देश से उस देश भटकना पड़ रहा है. बांग्लादेश में धार्मिक कट्टरपंथियों के खिलाफ उभरे जनांदोलन में साथ देने वाले एक युवक ब्लॉगर  की भी हत्या कर दी गई. आस्ट्रेलियाई ईसाई मिशनरी के फादर स्टोंस की भारत में ही हत्या हुई. 20 अगस्त को अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति के संस्थापक डॉ. नरेंद्र दाभोलकर की हत्या कर दी गई. भारत में इस तरह की असहिष्णु हरकतें बार-बार हो रही हैं. शिवसेना के पूर्व प्रमुख बाल ठाकरे की मौत के बाद मुंबई बंद को लेकर फेसबुक पर टिप्पणी करने वाली लड़की और उसे लाइक करने वाली उसकी दोस्त की गिरफ्तारी, कार्टून बनाने को लेकर असीम त्रिवेदी की गिरफ्तारी, ममता का कार्टून बनाने वाले प्रोफेसर की गिरफ्तारी, हाल में सरकार की विफलता को लेकर टिप्पणी करने को लेकर लेखक कंवल भारती की गिरफ्तारी आदि इसके उदाहरण हैं. हाल ही में दुष्कर्म के आरोप में जेल गए आसाराम बापू के समर्थकों ने लगभग हर शहर में पत्रकारों पर हमले किए. इस तरह की सांप्रदायिक और धार्मिक कठमुल्लापन की प्रवृत्ति को रोकने के लिए आज व्यापक स्तर पर जनचेतना को जागृत करने की जरूरत है.

 

Ganga_Prasad_Vimalअसल में एशियाई समुदाय संकीर्णता में जक़डे हुए हैं, इसलिए वे यह नहीं सोच पाते कि लेखक, रचनाकार आदि हमारे समाज के जरूरी स्तंभ हैं. बुद्धिजीवियों से कट्टरपंथियों को खतरा महसूस होता है, क्योंकि इनकी वजह से उनके संकीर्ण उद्देश्यों में बाधा ख़डी होती है. अंध धार्मिक मतों वाले लोग अंधेरी दुनिया में रहते हैं. वे न किसी धर्म यकीन रखते हैं, न ही किसी आस्था में. वे निर्दोष और निहत्थे बुद्धिजीवियों को निशाना बनाते हैं. यह बहुत खतरनाक है. समाज में इतनी उदारता होनी चाहिए कि इस तरह मत-मतांतरों की ल़डाई को लेकर हत्याएं न की जाएं. दूसरी चीज कि हमें अंधभक्तों, अंधश्रद्धा वाले लोगों को तवज्जो देना बंद करना चाहिए.  -गंगा प्रसाद विमल, साहित्यकार

 

 

 

 

 

 

 

downloadजब कभी, जहां कहीं सर्वसत्तावादी शक्तियां प्रभुत्व में आती हैं, हर स्वतंत्र लेखक, बुद्धिजीवी खतरों में घिर जाता है. कहावत है कि जब धार्मिक सत्ता कायम होती है तो सबसे अधिक सूफी और सच्चे संत मारे जाते हैं. जब समाज में उग्र, हिंसक अस्मितावादी, राजनीतिक या धार्मिक-जाति-वर्णवादी तत्त्व अति-सक्रिय होते हैं और सब कुछ उनके इशारों पर चलने लगता है, यह खतरा और बढ़ जाता है. दक्षिण एशियाई देशों में उग्रवादी, प्रतिगामी, कट्टर जाति-धर्म के तत्व ही राजनीति और भाषा-संस्कृति का संचालन करते हैं. जिस राजस्थान में अमिताव कुमार जैसे प्रतिष्ठित लेखक को गिरफ्तारी  से बचने को भागना प़डता है, आशीष नंदी के महज़ एक वाक्य के लिए पुलिस गिरफ्तारी को फ़ौरन हाज़िर हो जाती है, उसी राजस्थान में एक नाबालिग लड़की के यौन उत्पी़डन पर आसाराम नामक अपराधी को पुलिस ऍफ़आईआर दर्ज कर 6 दिन तक छूती नहीं. लेखक-विचारक कंवल भारती को फेसबुक टिप्पणी पर गिरफ्तार कर लिया गया. अभी परसों ही हेनरी जेरो ने लिखा है कि नब्बे के दशक के बाद से जिस कारपोरेट पूंजी तंत्र का प्रभाव सारी दुनिया में ब़ढा है, उसमें बुद्धिजीवी ही उसका शिकार (आब्जेक्ट) और शिकारी (सब्जेक्ट) है. वही कर्ता और भोक्ता है. वे तथाकथित बुद्धिजीवी, जो शासन-प्रशासन की कृपा पर आश्रित हैं, वे यह समझने में असमर्थ हैं कि उनके द्वारा ऐसे कितने लेखकों-कलाकारों, बुद्धिजीवियों का जीवन संकट में घेर दिया गया है, जो स्वतंत्रता के साथ लिखते और सोचते हैं. उदहारण सिर्फ मकबूल फ़िदा हुसैन, तसलीमा नसरीन या रश्दी ही नहीं हैं, जिन्हें जलावतनी का दुःख झेलना पड़ा. बहुत से लेखक-बुद्धिजीवी आतंरिक जलावतनी में हैं. कहते हैं की इस नयी उदारवादी अर्थनीति ने समाज से मध्यवर्ग को चालाकी से नव-धनाढ्य वर्ग में बदल दिया और फिर उन सबको उनकी कट्टर लघु अस्मिताओं में, ऐसे समय में हर वह लेखक और बुद्धिजीवी असंख्य संकटों, अवमानानाओं, प्रता़डनाओं से घिरा हुआ है. हम सब एक भयावह पोलराइज्ड सामाजिक समय में रह रहे हैं. -उदय प्रकाश, साहित्यकार

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