भाजपा में उत्साह कांग्रेस निराश

छत्तीसग़ढ राज्य के गठन के बाद वहां पर तीसरा विधानसभा चुनाव होना है. भाजपा के अन्य मुख्यमंत्रियों की ही तरह रमन सिंह भी विकास का नारा देकर जनता का दिल जीतने की कोशिश में लगे हैं. इस चुनाव में भाजपा जहां तीसरी बार सत्ता में आने के लिए ज़ोर लगाएगी, वहीं कांग्रेस भाजपा को मात देकर सत्ता में आने की कोशिश करेगी. फ़िलहाल चुनावी तैयारियों को लेकर भाजपा जहां बाज़ी मारती दिख रही है, वहीं कांग्रेसी आपसी कलह में उलझे हुए हैं. राज्य कांग्रेस से लेकर आलाकमान तक के क़द्दावर नेता अजीत जोगी को मनाने में जुटे हैं.

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जिन पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं, उनमें से एक छत्तीसग़ढ भी है, जहां राजस्थान और मध्य प्रदेश की तरह भाजपा व कांग्रेस में सीधा मुकाबला होना है. मुख्यमंत्री रमन सिंह समेत भाजपा राज्य में तीसरी बार सरकार बनाने का न स़िर्फ सपना देख रही है, बल्कि वह इस अभियान में जी-जान से जुट भी गई है. रमन की विकास यात्रा पूरी हो गई है. एक महीने में अपने सिपहसालारों के साथ रमन गांव-गांव में घूमकर अपने विकास कार्यों को जनता के बीच ले जाने के प्रयास में लगे हैं. रमन सिंह सभी 90 विधानसभा क्षेत्रों में घूमकर जनता को संदेश दे चुके हैं. उनके सभी मंत्रियों ने भी अपने-अपने क्षेत्रों में यात्रा आयोजित कर जनता को विश्‍वास में लेने की कोशिश की. दो कार्यकाल सत्ता में रहने के बाद अपने विकास कार्यों और मौजूदा राजनीतिक माहौल को लेकर भाजपाई ख़ासे उत्साहित हैं. इसके उलट दस साल तक सत्ता से बाहर रहने वाले कांग्रेसी आपसी कलह में उलझे हुए हैं. प्रदेश के आला कांग्रेसी दिल्ली के चक्कर काट रहे हैं. अजीत जोगी कम महत्व मिलने से नाराज़ चल रहे हैं, जिन्हें मनाने के लिए पार्टी उपाध्यक्ष राहुल गांधी प्रयासरत हैं. छत्तीसग़ढ कांग्रेस में कुर्सी की आपसी खींचतान ने पार्टी में जहां निराशा का माहौल पैदा कर दिया है, वहीं रमन सिंह के विकास ने नारे और मोदी की लहर की वजह से भाजपाइयों में उत्साह है.

हाल ही में रमन सिंह की विकास यात्रा की शुरुआत और अंत में मोदी की दो सभाएं रखी गईं. मोदी के लिए एक मॉडल लालकिला बनाकर राजनीतिक संदेश देने की कोशिश की गई. भाजपा छत्तीसग़ढ समेत पूरे देश में यह संदेश देने की कोशिश कर रही है कि भाजपा शासित राज्यों में प्रशासन और विकास की स्थिति बेहतर है. विकास यात्रा के दौरान रमन सिंह ने जूता, सा़डी, लैपटॉप और साइकिल बांटकर भी जनता को लुभाने की कोशिश की. इसके उलट कांग्रेस की परिवर्तन यात्रा, जो झीरम घाटी नक्सली हमले के कारण स्थगित हो गई थी, दोबारा शुरू नहीं हो सकी. हालांकि, हमले के तुरंत बाद कांग्रेस ने कहा था कि यात्रा फिर वहीं से शुरू की जाएगी, लेकिन पार्टी के भीतर कलह के चलते ही यह यात्रा पूरी नहीं हुई.

हालांकि कांग्रेस को यह भरोसा है कि रमन सिंह के ख़िलाफ़ भ्रष्टाचार के आरोपों और झीरम घाटी नक्सली हमले के बाद वह चुनावी सफलता गांठने में कामयाब रहेगी. इंदिरा प्रियदर्शिनी बैंक घोटाले मामले में रमन सिंह और उनके मंत्रियों पर करो़डों रुपये घूस खाने के आरोप हैं. जुलाई में कांग्रेस पार्टी ने एक सीडी जारी की, जिसमें प्रियदर्शिनी बैंक के तत्कालीन मैनेजर उमेश सिन्हा नार्को टेस्ट के दौरान यह दावा कर रहे हैं कि बैंक की चेयरमैन रीता तिवारी के आदेश पर उन्होंने मुख्यमंत्री रमन सिंह और चार अन्य मंत्रियों को उन्होंने एक-एक करो़ड रुपये दिए. कांग्रेस इस मामले को लगातार मुद्दा बनाकर ब़ढत लेने की कोशिश कर रही है. कांग्रेस को यह भी भरोसा है कि नक्सली हमले में नंदकुमार पटेल और विद्याचरण शुक्ल समेत आला पार्टी नेताओं की हत्या से उसे जनता की सहानुभूति मिलेगी. इसे भुनाने के लिए मारे गए नेताओं के बेटों को टिकट दिए गए हैं. नक्सली हमले मामले में कांग्रेस के ही कुछ नेताओं की संदिग्ध भूमिका के बावजूद पार्टी की ओर से लगातार यह कहा जा रहा है कि उसके लिए रमन सरकार ज़िम्मेदार है. हालांकि, पार्टी न तो अभी तक ढंग से हमलावर हो सकी है, न ही अपनी चुनावी तैयारियों को अंतिम रूप दे सकी है. पार्टी अभी 90 सीटों में से सिर्फ 40 पर ही प्रत्याशी तय कर सकी है, जिनमें ज़्यादातर नक्सल हमले में मारे गए नेताओं के परिजन हैं या फिर वे नेता हैं, जिनके नाम पर कोई विवाद नहीं है.

यदि तुलनात्मक रूप से भाजपा और कांग्रेस की तैयारियों पर गौर करें तो छत्तीसग़ढ में भाजपा बाज़ी मारती दिख रही है. भाजपा ने अपनी विकास यात्रा पूरी कर ली है. रमन सिंह के नेतृत्व में चुनाव अभियान समिति बन गई है.

छत्तीसग़ढ भाजपा प्रत्याशियों का फैसला अपने आधार पर कर रही है. नरेंद्र मोदी के प्रोजेक्ट के मुताबिक, राज्य के सभी जिलों में आईटी सेल सक्रिय हो गई है. गुजरात, राजस्थान और मध्य प्रदेश की तरह रमन सरकार भी चुनाव को आईटी वार में तब्दील करने में लगी है. मोबाइल, इंटरनेट-सोशल मीडिया के ज़रिये भी लोगों तक पहुंचने का उपक्रम किया जा रहा है, जबकि कांग्रेस की परिवर्तन यात्रा पूरी नहीं हो पाई है. मारे गए कांग्रेसी नेताओं को श्रद्धांजलि देने की गरज़ से कलश यात्रा ज़रूर पूरी कर ली. अजीत जोगी के नाराज़ होने और उन्हें मनाने से लेकर पार्टी के प्रत्याशी चयन में उलझी पार्टी चुनाव समितियों के गठन और अन्य तैयारियों में मात खा रही है. पार्टी नेता एक-दूसरे के ख़िलाफ़ दिल्ली में मोर्चा संभाले हैं.

दरअसल, छत्तीसग़ढ कांग्रेस अध्यक्ष नंदकुमार पटेल के नक्सली हमले में मारे जाने के बाद अजीत जोगी अध्यक्ष बनना चाह रहे थे, लेकिन चरणदास महंत को अध्यक्ष बना दिया गया. बाद में चुनाव अभियान समिति के अध्यक्ष पद पर उन्होंने दावेदारी ठोंकी, लेकिन उसे भी पार्टी ने नकार दिया. इसके बाद से जोगी नाराज़ चल रहे हैं. पहले जोगी के अलग पार्टी बनाने की अफवाहें सामने आईं. फिर उनमें और पार्टी अध्यक्ष चरणदास महंत में सुलह होने की बातें कही गईं. इसी बीच पार्टी से अलग प्रचार के लिए जोगी एक्सप्रेस चलाई गई. महीने भर से पार्टी जोगी प्रकरण में उलझी हुई है. इसमें कोई दो राय नहीं कि छत्तीसग़ढ में जोगी कांग्रेस के सबसे लोकप्रिय नेता हैं. हाल ही में पार्टी प्रभारी बीके हरिप्रसाद को एक कार्यक्रम के दौरान मंच पर ही जोगी ने झ़िडक दिया था और हरिप्रसाद की नाराज़गी के बावजूद उन पर कोई कार्रवाई नहीं हो सकी. महंत जोगी को मनाने के लिए रायपुर से दिल्ली के चक्कर लगा रहे हैं. पार्टी आलाकमान को भी यह पता है कि यदि जोगी पार्टी से किनारा कर लेते हैं तो कांग्रेस को भारी नुकसान हो सकता है. कह सकते हैं कि पार्टी की चुनावी गतिविधियां  जोगी के फैसलों पर टिकी हुई हैं. पार्टी छिटपुट कार्यक्रम करके एकजुट दिखने की कोशिश कर रही है, लेकिन ज़मीनी तौर पर बिना मज़बूती से मैदान में उतरे रमन सरकार को हटा पाना कांग्रेस के लिए आसान नहीं होगा. अब पार्टी जगदलपुर में राहुल गांधी की अगुआई में अजीत जोगी, चरणदास महंत, बीके हरिप्रसाद, नेता प्रतिपक्ष रवींद्र चौबे और मोतीलाल वोरा समेत सभी नेताओं को एक मंच पर लाने की कोशिश में जुटी है. पार्टी आलाकमान की ओर से जोगी को मनाने का उपक्रम जारी है और जोगी फ़िलहाल चुपचाप हैं. वे कांग्रेस के अंतिम फैसले का इंतजार कर रहे हैं. ऐसा भी कहा जा रहा है कि कांग्रेस आलाकमान जोगी को लोकसभा चुनाव ल़डाकर प्रदेश की राजनीति से दूर रखना चाह रहा है, जबकि जोगी प्रदेश की राजनीति में अपना जमा-जमाया पैर हिलने नहीं देना चाहते. अब अगर फैसला जोगी के पक्ष में नहीं रहा तो जोगी अलग रास्ता भी अख्तियार कर सकते हैं.

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