बिहार में उपेक्षित हैं क़ानून के रखवाले

नीतीश सरकार जिस बेहतर क़ानून व्यवस्था को अपनी उपलब्धि के तौर पर प्रचारित करती है, उसमें विशेष सहायक पुलिस यानी सैप जवानों का बेहद अहम योगदान है, लेकिन आज स्थिति यह है कि इन जवानों को उपेक्षित कर दिया गया है. जवानों में वेतनमान और अन्य सुविधाओं को लेकर असंतोष है. कार्यस्थल पर उनके साथ होने वाला भेदभाव भी उन्हें आहत करता है. रैली और सम्मेलन कर जवानों द्बारा अपनी मांगें रखने के बाद भी नीतीश सरकार इस ओर ध्यान नहीं दे रही है.

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जब पहली बार नीतीश की सरकार बनी तो उसके सामने सबसे बड़ी चुनौती थी सूबे के लॉ एंड ऑर्डर को पटरी पर लाना और आम लोगों के मन से अपराधियों के ख़ौफ़ को निकालना. यह हुआ भी. सरकार, सुशासन की सरकार कहलाई. बेहतर विधि-व्यवस्था पर इतराते हुए खुद मुख्यमंत्री भी कहा करते थे कि आकर देखिए हमारे पटना में रात के बारह बजे भी लड़कियां डाक बंगला चौराहे पर आइसक्रीम खाते हुए मिल जाएंगी. तो जिस सुशासन पर सत्तादल के नेता-कार्यकर्ता कॉलर खड़ी करते हैं, उसे बनाने में अहम भूमिका रही है सैप (स्पेशल ऑग्जिलीएरी पुलिस) जवानों की. सैप जवान यह स्वीकारते हैं कि हमारी ही वजह से बिहार में आज सुशासन का माहौल है. सैप जवानों की हनक यह रही है कि उन्हें देखते ही असामाजिक तत्वों के हाथ-पांव फूलने लगते थे. अपराधी सैप जवानों को देखते ही भागने लगते हैं, लेकिन आज यही सैप जवान उपेक्षा में जीने को विवश हैं.

बिहार में पुलिस बल की कमी तो थी ही, अभी भी है. ऐसे में बेहतर लॉ एंड ऑडर के लिए नीतीश सरकार ने भूतपूर्व सैनिकों को सैप के रूप में बहाल किया. सरकार को कम पैसे और सीमित संसाधन खर्च करके बेहतर और प्रशिक्षित जवान मिल गए. सैप की पहली बहाली 2006 में की गई. अब तक 6 से 7 हजार सैप जवानों को बहाल किया जा चुका है. तब इनकी सैलरी 10 हजार तय की गई थी. विडंबना देखिए कि छठा वेतनमान लागू होने के बाद भी इनके वेतन और सुविधाओं में बढ़ोत्तरी नहीं हुई. सैप जवानों की भर्ती का मुख्य उद्देश्य था कि उनकी सेवा नक्सल प्रभावित इलाकों में ली जाएगी या फिर उन्हें आपात स्थिति में इस्तेमाल किया जाएगा. लगभग एक साल तक ऐसा हुआ भी. उन्हें रिजर्व पुलिस के रूप में रखा गया, लेकिन अब जिला पुलिस के तर्ज पर उनका इस्तेमाल किया जाने लगा है. जितने भी सैप जवानों से मुलाकात होती है, वे इस बात से आहत दिखते हैं कि अब उन्हें अधिकारियों के घर की रखवाली में लगाया जाता है. स्थिति यह है कि अधिकारियों के बच्चों को स्कूल पहुंचाना, उनके बगीचे में पानी डालना और शाम के समय उनके घर की सब्जी लाने जैसा काम भी अब बिहार पुलिस के बड़े अधिकारी उनसे लेने लगे हैं.

यह आजीविका की मजबूरी ही है कि अनुशासित और सम्मानित जिंदगी जी चुके ये सेना के जवान आज उपेक्षित हैं. फुलवारीशरीफ जेल परिसर में कुछ सैप जवानों से मुलाकात होती है. अन्य बातों को अगर छोड़ भी दें तो न्यूनतम सुविधा भी इन जवानों को नसीब नहीं है. एक बड़े से हॉल में बीस-पच्चीस चौकी लगा दी गई है, और हर जवान को एक-एक चौकी आवंटित कर दी गई है. जिन्हें चौकी नहीं मिली है वे जमीन पर ही अपना बिस्तर लगाकर रात काटते हैं. ये जवान इसी एक चौकी के दायरे में अपना खाना भी खुद बनाते हैं और अपने लिए बिजली और पंखे की व्यवस्था भी खुद ही करते हैं. छत्रपाल सिंह राठौर 2006 से ही सैप में हैं. कहते हैं कि हमारी बदौलत ही ये सुशासन बाबू कहलाते हैं और देखिए कि राजधानी के सैप जवानों की क्या स्थिति है. जो जवान दुर्गम क्षेत्र में होंगे, उनकी यह व्यवस्था कितना ख्याल रखती होगी, आप अंदाजा लागा सकते हैं. सैप के जवानों के साथ ही सेना के ही सेवानिवृत्त जेसीओ, कुक, ड्राइवर आदि की बहाली हुई. बिहार पहला राज्य बना जिसने सेवानिवृत सैनिकों को बहाल किया था, इसके बाद कई राज्यों ने इसका अनुकरण भी किया. शुरुआत में व्यवस्था यह बनाई गई थी कि इन सैप जवानों की अलग सेल होगी और ये जवान जेसीओ को रिपोर्ट करेंगे. उनके कुक और ड्राइवर भी अलग ही होगे. फिलहाल झारखंड और उड़ीसा में यही व्यवस्था है, लेकिन यह बात बिहार में कागज पर ही रह गई. स्थिति यह है कि जेसीओ से लेकर कुक और ड्राइवर तक बिहार पुलिस के बड़े अधिकारियों की सेवा में लगा दिए गए हैं.

पिछले दिनों बिहार के सैप जवान विभिन्न मांगों को लेकर सामूहिक अवकाश पर चले गए थे. उन्होंने राजधानी पटना में एक रैली भी की और कहा कि अगर हमारी मांगें नहीं मानी गईं तो हम अपने-अपने हथियार सौंप कर घर वापस चले जाएंगे. सूत्र बताते हैं कि इसके बाद बिहार पुलिस के बड़े अधिकारियों के द्वारा यह निर्णय लिया गया कि सैप जवानों की जगह पर बिहार पुलिस को ही तैनात किया जाए, लेकिन दाल गली नहीं. बिहार पुलिस के जवानो ने कहा कि सिर्फ विधि-व्यवस्था के लिए हैं, सैप जवानों का काम हमसे नहीं होगा. हम सक्षम नहीं हैं. तब आनन-फानन में आकर सैप जवानों की कुछ मांगों को मान लिया गया. जवानों का वेतन दस हजार से बढ़कर बारह कर दिया गया और जेसीओ का वेतन 15 हजार कर दिया गया. इनकी छुट्टी भी बढ़ाकर बीस से चालीस दिन कर दी गई. भर्ती के वक्त कहा गया था कि इन्हें बिहार पुलिस की तरह ही वर्दी भत्ता चार हजार दिया जाएगा, लेकिन अबतक इन्हें 2600 ही मिलता रहा. पांच साल बाद अब इनके वर्दी भत्ते को बिहार पुलिस के समतुल्य किया गया है. कुल मांगों के साथ सैप के जवान हड़ताल पर गए थे. सारी मांगें नहीं मानी गई है. सैपर्स एसोसिएशन के प्रदेश अध्यक्ष धर्मदेव सिंह कहते हैं कि अगर हमारी सभी मांगें नहीं मानी गईं और और हमारे साथ भेदभावपूर्ण व्यवहार बंद नहीं हुआ तो हम फिर से आंदोलन को मजबूर होंगे. भारतीय नौ सेना से सेवानिवृत्त हुए एक जवान पटना के ही एक कारा में कक्षपाल हैं, कहते हैं कि जेल में बिहार पुलिस के कक्षपाल और अधिकारियों के द्वारा हमारे साथ सौतेलेपन का व्यवहार किया जाता है. यह कहकर हमारा मजाक उ़डाया जाता है कि हमें भाड़े पर लाया गया है. प्रदेश अध्यक्ष धर्मदेव सिंह सैप के जवान और बिहार पुलिस के बीच बेहतर सामंजस्य के अभाव की भी बात करते हैं. पिछली जुलाई में  औरंगाबाद के गोह थाना पर नक्सलियों ने हमला किया था. इस हमले में सैप के तीन जवान शहीद हो गए थे. धर्मदेव कहते हैं कि कई बार औरंगाबाद जिला पुलिस मुख्यालय को कहा गया था कि यहां मोर्चा बनाने की आवश्यकता है, नक्सली हमले हो सकते हैं. लेकिन हमारी बातों पर अमल नहीं किया गया और जिला पुलिस की लापरवाही की वजह से हमारे तीन साथी शहीद हुए. कितने सैप जवानों को अबतक मुआवजा मिला है, इस पर धर्मदेव कहते हैं कि हमने आरटीआई के तहत इसकी जानकारी छह महीने पहले विभाग से मांगी थी कि अब तक बिहार में कितने सैप के जवान नक्सली हमले में शहीद हुए और कितनों को मुआवजा मिला है, लेकिन अभी तक विभाग ने जानकारी उपलब्ध नहीं कराई है. साथ ही यह भी बताते हैं कि बीस लाख मुआवजे का प्रावधान है, लेकिन विभाग दोहरा रवैया अपनाते हुए कहता है कि यह सिर्फ माओवादी घटना में मिलेगा, किसी अन्य वजह से हताहत हुए तो क्षतिपूर्ति नहीं दी जाएगी. कुछ सैप जवान तो यह भी बताते हैं कि पुलिस अधिकारी हमें बेवजह प्रताड़ित भी करते हैं. शाम के समय अगर कहीं सब्जी लाने या चाय पीने भी चले गए तो अनुपस्थित मान लिया जाता है. इतना ही नहीं, ड्युटी पर जाने के वक्त कमान भी नहीं दिया जाता है. अगर कमान मांगा जाता है तो अनुशासनहीनता का आरोप लगाकर अनुबंध रद्द कर देने की धमकी तक दी जाती है.  सूत्र बताते हैं कि इन्हीं सब उपेक्षाओं और पक्षपातपूर्ण रवैये की वजह से अबतक 70 से 80 सैप जवान नौकरी छोड़कर जा चुके हैं, लेकिन बिहार के मुख्यमंत्री सैप जवानों की हो रही उपेक्षा से शायद अंजान हैं. तभी तो पिछले जनता दरबार में उन्होंने कहा कि बिहार पहला राज्य है जिसने भूतपूर्व सैनिकों की सेवा लेनी शुरू की है. और हमने सेवानिवृत सैनिकों के लिए जितना किया है, किसी ने नहीं किया और हमें इसके लिए किसी से प्रमाणपत्र लेने की आवश्यकता नहीं है. लेकिन इसे मुख्यमंत्री का भ्रम ही कहेंगे. अभी गत जून माह में ही भूतपूर्व सैनिक सेवा परिषद की बैठक हुई थी. इसमें भी राज्य सरकार पर आरोप लगाया गया था कि पूर्व सैनिक, उनकी विधवाओं और उनके आश्रितों के लिए बिहार सरकार कुछ भी नहीं कर रही है. सूबेदार एसजीत शर्मा ने इस बैठक में मांग की थी कि बिहार में मौजूद सैनिक कल्याण निदेशालय को एक अलग विभाग का दजार्र् दिया जाए. साथ ही यह आरोप भी लगाया गया कि बिहार सरकार हमारी समस्याओं के निदान के लिए तत्पर नहीं दिखती है.