पुस्तक चर्चा : हिंद-इस्लामी तहज़ीब का ऐतिहासिक दस्तावेज़

शम्सुर्रहमान फ़ारूक़ी मौजूदा दौर के महत्वपूर्ण लेखकों में हैं, जिन्होंने उर्दू साहित्य को ऐतिहासिक तौर पर समृद्ध किया है. उन्होंने अपने लेखन और आलोचना के ज़रिये उर्दू साहित्य में एक तरफ़ जहां नये विचारों को जगह दी, वहीं आज के परिदृश्य के मद्देनज़र बेहद रचनात्मक साहित्य रचा है. अपनी बेहतर रचनात्मकता के कारण पद्मश्री प्राप्त फ़ारूक़ी साहब पूरे महाद्बीप में प़ढे और सराहे जाते हैं. पाकिस्तान ने इस वर्ष अपने स्वतंत्रता दिवस के मौ़के पर शम्सुर्रहमान फ़ारूक़ी को अपने मुल्क़ के तीसरे सबसे महत्वपूर्ण पुरस्कार सितारा-ए-इम्तियाज़ से नवाजा. हाल ही पेंगुइन बुक्स प्रकाशन से उनका उपन्यास छपा है- कई चांद थे सरे-आसमां, जिसने साहित्य-प्रेमियों की बीच धूम मचा दी. यह उपन्यास 18वीं और 19वीं सदी की  हिंद-इस्लामी तहज़ीब से रूबरू कराता है, जिसे उपन्यास की श़क्ल में ऐतिहासिक दस्तावेज़ कहा जा सकता है. सांस्कृतिक और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि की रचनाएं पसंद करने वाले पाठकों और आलोचकों से इस उपन्यास की काफ़ी सराहना मिली है. यह कृति जितनी ऐतिहासिक है, उतनी ही राजनीतिक भी है.  उपन्यास की कहानी राजपूताने से शुरू होती है और दिल्ली के लालक़िले पर जाकर समाप्त होती है. कहानी में उस दौर की तहज़ीब, साहित्य, समाज, अंग्रेज़ी सियासत और बदलते इतिहास की झलक मिलती है. पाकिस्तानी साहित्यकार इंतज़ार हुसैन ने इस उपन्यास के बारे में टिप्पणी की है कि मुद्दतों बाद उर्दू में एक ऐसा उपन्यास आया है, जिसने हिंदो-पाक की अदबी दुनिया में हलचल मचा दी है. क्या इसका मुक़ाबला उस हलचल से किया जाए जो उमरावजान अदा ने अपने व़क्त में पैदा की थी. इस उपन्यास को उस सदी की हिंद-इस्लामी तहज़ीब में कौमी एकजुटता, ज़िंदगी, मुहब्बत और फ़न की तलाश की दास्तान कहें तो सही होगा.

कई चांद थे सरे-आसमां एक महिला वज़ीर ख़ानम की कहानी है. वज़ीर से ही उपन्यास की शुरुआत होती है. वज़ीर ख़ानम महरौली शरीफ़ ख्वाजा कुतुबशाह के दरगाह फ़लक बारगाह से अन्य मुसाफ़िरों के साथ लौट रही हैं, तभी रास्ते में ज़बर्दस्त तूफ़ान के चलते वज़ीर की बहली के पहिए टूट जाते हैं. बहली पर सवार सभी मुसाफ़िर रास्ते में ही रुक जाते हैं, तभी एक घु़डसवार और सांडनी पर सवार कुछ लोग आ पहुंचते हैं. इनमें एक अंग्रेज़ मार्स्टन ब्लैक भी है. उन लोगों ने क़ाफ़िले के लोगों को गंतव्य तक पहुंचाया. इस घटना के बाद ब्लैक कभी-कभार वज़ीर से मिलने आने लगा. चंद महीने बाद वह जयपुर रियासत में असिस्टेंट पॉलिटिकल एजेंट के ओहदे पर तैनात होकर जयपुर चला जाता है. एक-सवा महीने बाद ब्लैक वापस आता है और वज़ीर ख़ानम को ब़ेगम बनाकर अपने साथ ले जाता है.

कुछ समय बाद जयपुर में महाराजा के क़त्ल की आशंका में भी़ड मार्स्टन ब्लैक को मार डालती है. वज़ीर के मार्स्टन ब्लैक से दो औलादें होती हैं, लेकिन उन्हें ब्लैक की संपत्ति मे हिस्सा नहीं मिलता. उपन्यास की ख़ामी कहें या ख़ूबी कि इसकी कहानी सीधे तौर पर नहीं चलती. इसका शिल्प इस ढंग से बुना गया है कि कहानी बिल्कुल वैसी चलती है, जैसे दुनिया में एक साथ कई-कई घटनाएं घटती हैं और उनका रा़जनामचा आपस में उलझा हुआ रहता है. कहानी के बीच-बीच में तमाम प्रसंग आते हैं. इतिहास आता है. समाज और साहित्य आता है. घटनाओं को लेखक ख़ूब तफ़्सील से बयान करता है. कहानी के केंद्र में वज़ीर ख़ानम हैं, जिनके बहाने लेखक इतिहास के कई अनछुए पहलुओं की प़डताल करता है. वज़ीर की भी कहानी उपन्यासकार तमाम पात्रों के ज़रिये जुटाता है. बाद में वज़ीर दिल्ली आ जाती हैं. एक दिन वज़ीर दिल्ली के रेजिडेंट बहादुर विलियम फ्रेजर के बुलावे पर एक मुशायरे में जाती है, जिसमें ग़ालिब भी हैं. फ्रेजर, वज़ीर पर फ़िदा था, लेकिन वज़ीर की निगाह शमसुद्दीन खान पर लग जाती है. फ्रेजर और शमसुद्दीन में टकराव की स्थिति बनती है और इस प्रेमयुद्ध में शमसुद्दीन की विजय होती है. इसके बाद फ्रेजर शमसुद्दीन के ख़िलाफ़ षडयंत्र करता है और उनकी जागीर छिन जाती है. शमसुद्दीन इससे बेहद दुखी रहने लगते हैं. इसे देखते हुए शमसुद्दीन का एक विश्‍वस्त फ्रेजर की हत्या कर देता है. इस प्रकरण में शमसुद्दीन को फांसी हो जाती है. शमसुद्दीन और वज़ीर का प्रेम-प्रसंग काफ़ी रोचक है, जिसका वर्णन उपन्यास के ब़डे हिस्से में फैला हुआ है. शमसुद्दीन और वज़ीर ख़ानम से जो बेटा हुआ, वही आगे चलकर दाग़ देहलवी के नाम से मशहूर हुआ. दूसरी ओर शमसुद्दीन की क़ब्र क़दम शरीफ़ के नाम से प्रसिद्ध हो जाती है और वहां लोग दुआ मांगने पहुंचने लगते हैं. बाद में वज़ीर ख़ानम की तीसरी शादी आगा मिर्ज़ा तुराब से होती है. शायराना मिजाज़ मिर्ज़ा के साथ वज़ीर की भी शायरा जाग उठती है. हालांकि, हाथी-घो़डों की ख़रीद के लिए सोनपुर गए मिर्ज़ा जब लौट रहे थे, ठगों ने उनका भी क़त्ल कर दिया.

वज़ीर अपने अब बेटे को लेकर दिल्ली में रहने लगती हैं, तभी उनकी ख़ूबसूरती के क़िस्से फैलते हैं. दिल्ली बादशाह के वली अहद सोयम मिर्ज़ा फ़तहुल मुल्क ने उनकी तस्वीर मंगवाई और इश्क़ कर बैठे. वज़ीर की चौथी शादी हो गई. नसीब ने वज़ीर को बादशाहत से मिलवाया तो लेकिन फिर धोखा दे दिया और फ़तहुल मुल्क स्वर्ग सिधार गए और वज़ीर को क़िले से बाहर निकलना प़डा. क़िले से निकलते व़क्त वज़ीर कहती है-हक़ क्या चीज़ है साहिबे-आलम? सारी ज़िंदगी मैं हक़ की तलाश में रही हूं. वह पहा़डों की किसी खोह में मिलता हो तो मिलता हो, वरना आसमान तले तो कहीं देखा नहीं गया. इस उपन्यास के बारे में वरिष्ठ आलोचक विश्‍वनाथ त्रिपाठी का कहना है, कई चांद थे सरे आसमां एक विशिष्ट रचना है. यह उपन्यास दर्शाता है कि जब कोई विद्बान कोई रचनात्मक कृति रचता है तो वह अपने समय के ज्ञान को कथानक में कैसे ढालता है. हिंदी में ऐसी क्षमता हजारी प्रसाद द्बिवेदी में थी. फ़ारूक़ी जी काफ़ी विद्बान लेखक हैं और अपनी विद्बता को उन्होंने ब़डी ख़ूबसूरती से ढाला है. उपन्यास मूलत: उर्दू में लिखा गया है और नरेश नदीम से इसका उम्दा अनुवाद किया है. भाषा की रवानगी प़ढते वक्त ख़ूब मज़ा देती है. हालांकि, 748 पृष्ठों का यह उपन्यास आकार में काफ़ी भारी-भरकम बन प़डा है, लेकिन धैर्यवान प़ढाकू पाठकों के लिए यह निश्‍चित ही अद्भुत उपन्यास साबित होगा.

You May also Like

Share Article

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *