जुझारू महिला ने दिया खेती को नया आयाम

भारतीय समाज के लिए यह सुखद तस्वीर है कि देश की आधी आबादी अब चहारदीवारी से बाहर निकलकर पुरुषों की बराबरी में खड़ी दिखाई देती है, लेकिन अभी भी कई क्षेत्र ऐसे हैं, जहां काम के नज़रिये से तो महिला पुरुषों के बराबर है, लेकिन नाम के नज़रिये से काफ़ी पीछे, लेकिन मोरारका फाउंडेशन की मदद से राजस्थान के शेखावटी क्षेत्र के सीकर ज़िले की एक महिला संतोष पचार ने इस जुमले को ख़ारिज कर दिया है और खेती के क्षेत्र में वह नये मुकाम गढ़ रही हैं. उनके इस प्रयास को आज बड़े पैमाने पर पहचान भी मिल रही है.

ghjth

जब किसी किसान का ज़िक्र आता है, तब अनायास ही हमारे ज़ेहन में खेत में हल चलाते एक पुरुष की तस्वीर उभरती है. चाहे धान की रोपाई हो या फ़सल की कटाई, हर जगह महिलाएं ही काम करती दिखती हैं. इतना सब होने के बाद भी हम एक महिला को किसान के रूप में स्वीकार नहीं कर पाते. आज हम बताते हैं आपको एक ऐसी महिला के बारे में, जो इन पारंपरिक मापदंडों को धता बताकर जैविक खेती के क्षेत्र में सफलता की नई कहानी लिख रही है. राजस्थान के शेखावटी क्षेत्र के सीकर जिले के एक गांव में यह महिला संतोष पचार पुरुषों के साथ क़दम से क़दम मिलाकर चल रही हैं. माध्यमिक शिक्षा प्राप्त करने वाली संतोष को भारत के राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने कृषि क्षेत्र में उनकी उपलब्धियों के लिए 3 लाख रुपये का राष्ट्रीय नवरत्न प्रतिष्ठा पुरस्कार प्रदान किया है. संतोष की कहानी उन सभी महिलाओं के लिए एक मिसाल है, जो गांव में रहकर चांद छूना चाहती हैं और अपने सपनों में मनचाहे रंग भरना चाहती हैं.

संतोष की कहानी वर्ष 2002 से शुरू होती है. उस साल संतोष के पति जाबरमल पचार के भाइयों के बीच पारिवारिक बंटवारा हुआ. बंटवारे के बाद उनके परिवार के हिस्से में पांच एकड़ ज़मीन आई. इस पांच एकड़ ज़मीन से उन्हें अपना परिवार चलाना था. उनका गांव राजस्थान के पानी की कमी वाले इलाके में आता है. इस वजह से उपज भी कम होती थी. उस दौरान संतोष को मोरारका फाउंडेशन द्वारा चलाए जाने वाले जैविक कृषि कार्यक्रम के बारे में जानकारी मिली. वह अपने पति के साथ फाउंडेशन की जैविक कृषि से संबंधित बैठक में शामिल होने गईं. उस समय वह कृषक बैठकों में शामिल होने वाली उस क्षेत्र की पहली महिला किसान थीं. ऊपर से पर्दा प्रथा के कारण सामाजिक बंदिशें, जिसकी वजह से वह खुलकर अपनी बातें सबके सामने नहीं रख पाती थीं, लेकिन जैविक कृषि कार्यक्रम में शामिल होने के बाद उन्हें इसके फायदे समझ में आए और इस तरह से खेती करने का तरीक़ा उनकी समझ में आया. इसके बाद उन्होंने जैविक खेती को अपनाने की ठानी, लेकिन उनके पास शुरुआती संसाधन जुटाने के लिए भी पैसे नहीं थे. इसके लिए मोरारका फाउंडेशन ने उनकी मदद की और उन्हें बर्मी कंपोस्ट बनाने के लिए केंचुए उपलब्ध कराए. संतोष ने अपने खेत में बर्मी कंपोस्ट बनाने के लिए बेड बनाया और केंचुए उसमें छोड़ दिए. दस-पंद्रह दिन बाद उन्हें बेड में चायपत्ती की तरह दिखने वाली बर्मी कंपोस्ट बनती दिखाई दी. इससे उनका हौसला बढ़ा. 40-45 दिन बाद जब खाद पूरी तरह बनकर तैयार हुई तो उन्होंने सबसे पहले अपनी नर्सरी में इसका प्रयोग किया. संतोष ने जैविक और रासायनिक दोनों तरह की खादों का इस्तेमाल प्याज और गोभी में किया. जब दोनों तरह की सब्जियां तैयार हुईं तो दोनों में उन्हें बहुत अंतर दिखाई पड़ा. खाने में भी दोनों तरह के उत्पादों में ज़मीन-आसमान का फर्क था.

अपने नर्सरी के प्रयोग के बाद उन्होंने एक एकड़ जमीन में जैविक और 4 एकड़ में रासायनिक खेती की. उन्होंने एक एकड़ में जैविक तरीके से प्याज की खेती की. इसके बाद जो परिणाम निकलकर सामने आए, वे बहुत ही आश्‍चर्यजनक थे. चार एकड़ में उगाई गई प्याज की तुलना में उन्हें एक एकड़ में उगाई गई प्याज से ज्यादा फायदा हुआ. इसके बाद संतोष ने मुड़कर नहीं देखा. उन्होंने अपनी इस सफलता की जानकारी जिले के कृषि विभाग और ज़िला कलेक्टर को दी. जिले की तत्कालीन कलेक्टर मंजूराज पाल ने संतोष से मुलाक़ात की और उनसे जैविक खेती के बारे में जानकारी हासिल की. कलेक्टर साहिबा ने संतोष के खेतों का दौरा किया. कलेक्टर साहिबा संतोष द्वारा उपजाई गई सब्ज़ियों से इतना प्रभावित हुईं कि बाद में उन्होंने जैविक तरीके से उगी गोभी, गाजर और पालक का सेवन भी किया. कलेक्टर उत्पादों की गुणवत्ता से भी बहुत प्रभावित हुईं. संतोष को जैविक खेती के क्षेत्र में प्रयास के लिए पंचायत स्तर पर ग्यारह हजार रुपये का प्रोत्साहन पुरस्कार भी दिया गया.

इसके बाद संतोष को कृषि विभाग ने अपनी पूरी खेती जैविक रूप से करने के लिए कहा. इसके लिए उन्होंने हामी भर दी और अपने पति के साथ मिलकर बर्मी कंपोस्ट के पांच बेड बनाए. उन पांच बेडों के लिए आवश्यक गोबर उनके पास उपलब्ध नहीं था. इसके लिए उन्होंने ज्यादा गायें पालनी शुरू कीं, लेकिन इसका नकारात्मक प्रभाव उनके जैविक खेती पर पड़ा. तब उनका अधिकांश समय जानवरों की देखभाल में लग जाता था. उन्होंने अपने दिमाग का उपयोग करते हुए जानवरों से जुड़े सारे कामों को ऑटोमेटिक बना डाला. उन्होंने जानवरों के दाना-पानी देने के कार्य को एयर वॉल्व और अन्य संसाधनों की मदद से आसान बना लिया. इससे खेत में काम करते वक्त उन्हें जानवरों के दाना-पानी की चिंता नहीं रहती थी. इसके बाद उन्होंने अपनी पूरी खेती जैविक तरीके से करनी शुरू की. उनके इस प्रयास को राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने सराहा और उन्हें 25000 रुपये से पुरस्कृत किया. इसके बाद संतोष शेखावटी के किसानों के लिए मिसाल बन गईं. हर साल उनका प्रयास निखार लाता गया. इस साल मार्च में भारत के राष्ट्रपति ने उन्हें गाजर की उन्नत किस्म उगाने के कारण राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया. संतोष यहां भी नहीं रुकीं. अब संतोष ने बाजरे का उत्पादन बढ़ाने का एक अनोखा तरीका इजाद किया. उन्होंने बाजरे की फसल के एक फीट के होने के बाद उसकी कटाई कर दी. कटाई का मकसद था कि तना टूटने के बाद पे़ड से पांच से आठ शाखाएं निकलें. हर शाखा में बाजरे का भुट्टा आया और इससे बाजरे का उत्पादन बढ़ गया. संतोष के अनुसार, इस तकनीक का उपयोग करके प्रति बीघा पांच से आठ क्विंटल उत्पादन लिया जा सकता है.

संतोष की कहानी वर्ष 2002 से शुरू होती है. उस साल संतोष के पति जाबरमल पचार के भाइयों के बीच पारिवारिक बंटवारा हुआ. बंटवारे के बाद उनके परिवार के हिस्से में पांच एकड़ ज़मीन आई. इस पांच एकड़ ज़मीन से उन्हें अपना परिवार चलाना था. उनका गांव राजस्थान के पानी की कमी वाले इला़के में आता है. इस वजह से उपज भी कम होती थी. उस दौरान संतोष को मोरारका फाउंडेशन द्वारा चलाए जाने वाले जैविक कृषि कार्यक्रम के बारे में जानकारी मिली. वह अपने पति के साथ फाउंडेशन की जैविक कृषि से संबंधित बैठक में शामिल होने गईं.

संतोष प्रतिवर्ष जैविक खेती करके पांच से सात लाख रुपये की वार्षिक आमदनी कर लेती हैं. फसल चक्रण से वे अपने कुछ खेतों में दो और कुछ में तीन फसल पैदा करती हैं. गाजर की जिस किस्म के लिए उन्हें राष्ट्रपति ने सम्मानित किया, उस गाजर का रंग एक जैसा, लंबाई लगभग ढाई फुट है और गाजर के बीच का कड़ा भाग बेहद ही पतला है. अब संतोष का लक्ष्य भारत की सबसे लंबा गाजर और उसके बाद दुनिया का सबसे लंबा गाजर उगाना है. वह आत्मविश्‍वास से लबरेज हैं और अपनी सफलता की कहानी को एक नया आयाम देना चाहती हैं. उन्होंने गावों में, घरों में रहने वाली हर महिला को एक सपना दिया है. जब वह पहले खेती कार्यक्रमों में भाग लेती थीं तो समाज उनका विरोध करता था, लेकिन आज वही समाज उनकी मुखर होकर प्रशंसा करता है और कहता है कि संतोष ने हमारे घर-गांव का नाम देश-विदेश में रोशन किया है. संतोष बड़े विश्‍वास के साथ बताती हैं कि पहले किसान बैठकों में जाने वाली अकेली महिला होती थीं, लेकिन मैंने धीरे-धीरे घर, गांव और आसपास की महिलाओं को बैठकों में ले जाना शुरू किया. मैं अब तक 800 से ज्यादा महिलाओं को जैविक खेती का प्रशिक्षण देकर उनकी जिंदगी में बदलाव की पहल कर चुकी हूं. अब वे सभी महिलाएं समाज और परिवार के बेवजह के डर की परवाह किए बिना और कृषि कार्यक्रमों में हिस्सा लेकर एक बेहतर किसान बनने की दिशा में अग्रसर हैं.

संतोष की बेटी राजस्थान पुलिस में एसआई के पद पर कार्यरत हैं और उनका बेटा जयपुर में कानून की पढ़ाई कर रहा है. दोनों बच्चों को अपने माता-पिता के किसान होने पर गर्व है. उन्हें इस बात पर फ़ख़्र है कि उनकी मां की एक प्रगतिशील महिला किसान के रूप में पहचान है. संतोष को भी अपनी किसान वाली पहचान पर गर्व है. वह कहती हैं कि किसान होना कोई मजबूरी नहीं है. खेती करना किसान का कर्म है. किसान के काम को मैं नौकरी से ज्यादा महत्व देती हूं. वे कहती हैं कि सरकार को किसानों को एक कुशल श्रमिक के रूप में मान्यता देनी चाहिए.