मलाला यूसुफजई : महिला शक्ति का नया अवतार

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दुनिया में महिलाओं की संख्या लगभग सा़ढे तीन अरब है, जिसमें लगभग 64 करोड़ महिलाएं अशिक्षित हैं. ऐसे में 16 साल की मलाला यूसुफजई उन सारी बच्चियों एवं महिलाओं के लिए उम्मीद की किरण बनकर आईं हैं, जो प़ढना चाहती हैं. जो काम अमेरिका और उस जैसे अन्य देश नहीं कर पाए, उसे मलाला ने कर दिखाया. हताश तालिबान फिर सकते में है. यही कारण है कि उसने फिर से मलाला को जान से मारने की धमकी दी है, लेकिन मलाला एक सकारात्मक सोच का प्रतीक है, जो कभी मरती नहीं.

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मलाला…मलाला…मलाला…यह वो नाम है, जिसने तालिबान को ख़ौफ़ज़दा कर दिया है. एक बार फिर से तालिबान ने मलाला को जान से मारने की धमकी दी है. सचमुच मलाला से तालिबान हार गया है. भले ही वह यह बात स्वीकार नहीं कर पा रहा हो, लेकिन यही सच है. जो काम अमेरिका और अन्य शक्तियां आज तक नहीं कर पाईं, उस काम को 16 साल की एक छोटी सी बच्ची ने कर दिखाया, वह भी बिना हथियार उठाए, सिर्फ क़लम की ताक़त के बल पर. मलाला कहती हैं कि सबसे शक्तिशाली हथियार क़लम और क़िताब है. एक शिक्षक, एक क़िताब और एक क़लम दुनिया को बदलने का माद्दा रखते हैं. निश्‍चय ही मलाला ने यह सच कर दिखाया है. तालिबान के सिर मलाला का ख़ौफ़ कितना सिर च़ढकर बोलता है, इसका अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि एक बार तालिबान पहले ही मलाला पर जानलेवा हमला कर चुका है. आज एक बार फिर तालिबान ने मलाला को जान से मारने की धमकी दी है. तालिबान यह भूल चुका है कि मलाला एक सोच है, एक विचार है और सोच की कभी हत्या हो ही नहीं सकती. एक ब़डा सवाल यह है कि आख़िर तालिबान इस छोटी बच्ची को क्यों मारना चाहता है? इसका सीधा सा जवाब है-हताशा. तालिबान को लग रहा है कि उसे लेकर दुनिया में जो खौफ है, वह मलाला की वजह से लोगों के ज़ेहन से दूर होता जा रहा है. तालिबान यह समझता है कि मलाला ने अगर महिलाओं में शिक्षा का अलख जगा दी, तो उनमें जागरूकता पैदा होगी, ग़रीबी दूर होगी, लोग अपने अधिकारों के प्रति जागरूक होंगे और अगर ये सब हुआ तो तालिबान से लोग नहीं, बल्कि तालिबान लोगों से ख़ौफ़ खाएगा और ऐसी स्थिति में तालिबान का अस्तित्व समाप्त हो जाएगा.

मलाला यूसुफ़ज़ई का जन्म 1998 में पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वाह प्रान्त के स्वात जिले में हुआ. तालिबानी हमले के बाद मलाला अपने परिवार के साथ बर्मिंघम में रह रही हैं. मलाला के लिए ब्रिटेन की संस्कृति किसी आश्‍चर्य से कम नहीं है. वे कहती हैं कि हमने कभी नहीं सोचा था कि महिलाएं इतनी आज़ाद हो सकती हैं. मलाला मानती हैं कि पाकिस्तान में शांति व स्थायित्व के लिए तालिबान से वार्ता किया जाना ज़रूरी है.

यह मलाला के कारनामों का ही नतीजा है कि उन्हें सखारोव जैसे विश्‍व के शीर्ष पुरस्कारों से नवाजा जा चुका है. नोबेल पुरस्कार के लिए शीर्ष नामों में भी मलाला का नाम शामिल था. यह बात और है कि मलाला को नोबेल पुरस्कार नहीं मिल सका. मलाला को नोबेल पुरस्कार नहीं मिलने के पीछे यह भी कारण बताया जा रहा है कि उनकी उम्र बहुत कम थी और इस उम्र में वह नोबेल शांति पुरस्कार की प्रतिष्ठा को ज़िंदगी भर नहीं संभाल पाएंगी. स्टॉकहोम शांति रिसर्च सिपरी के टिलमन ब्रुएक का कहना है कि मैं पक्के तौर पर नहीं कह सकता कि किसी बच्चे को यह पुरस्कार देना सैद्धांतिक रूप से ठीक होगा. हालांकि मलाला को नोबेल पुरस्कार नहीं मिलने से कोई फ़र्क नहीं प़डता, क्योंकि मलाला जो भी कर रही हैं, वह पुरस्कार पाने के लिए नहीं, बल्कि अपनी आत्मसंतुष्टि के लिए कर रही हैं, महिलाओं को जागरूक करने के लिए कर रही हैं. दुनिया में अमन-चैन कायम करने के लिए कर रही हैं. यही कारण है कि मलाला के कार्यों से प्रसन्न होकर ब्रिटेन की महारानी एलिजाबेथ द्वितीय मिलने के लिए उन्हें बुलाती हैं. संयुक्त राष्ट्र मलाला का 16वां जन्मदिन मलाला डे के तौर पर मनाता है. मलाला के लिए दुनिया की नज़रों में सम्मान है. उनके साथ लोगों का आशीर्वाद और दुआएं हैं. ऐसा नहीं कि मलाला एक ही दिन में अचानक विश्‍व की आंखों का तारा बन गईं, बल्कि इसके लिए उन्होंने जो किया, वह कोई बिरला ही कर सकता है.

गुल मकई

2009 में महज 11 साल की उम्र में ही मलाला ने बीबीसी उर्दू सेवा के लिए गुल मकई नाम से डायरी लिखनी शुरू की. ये ऐसा वक्त था, जब स्वात घाटी पर चरमपंथियों का लगभग पूरी तरह कब्ज़ा हो गया था. डर के कारण कोई चरमपंथियों के ख़िलाफ़ ज़ुबान तक नहीं खोलता था. स्वात घाटी के केंद्र मिंगोरा में हालात ऐसे हो गए थे कि रोज़ाना जब लोग सुबह उठते तो उन्हें शहर के चौराहों पर या खंभों से लटकी हुई या गला रेती हुई लाशें मिलती थीं. इन्हीं हालात में मलाला बीबीसी ऊर्दू के लिए लिखी जाने वाली अपनी डायरी में वहां के हालात और चरमपंथियों के ज़ुल्मो-सितम की कहानियां बयान करती रहीं. गुल मकई उपनाम से डायरी लिखने वाली मलाला ने अपनी डायरी में लिखा है कि आज स्कूल का आख़िरी दिन था, इसलिए हमने मैदान पर कुछ ज़्यादा देर खेलने का फ़ैसला किया. मेरा मानना है कि एक दिन स्कूल खुलेगा, लेकिन जाते समय मैंने स्कूल की इमारत को इस तरह देखा, जैसे मैं यहां फिर कभी नहीं आऊंगी.

गुल मकई की नज़र से दुनिया ने तालिबान के शासन में जिंदगी के बारे में जाना. खास तौर पर लड़कियों और महिलाओं की जिंदगी के बारे में. डायरी जनवरी से मार्च 2009 के बीच दस किस्तों में बीबीसी उर्दू की वेबसाइट पर पोस्ट हुई. स्वात से लेकर दुनिया के कई हिस्सों में इस डायरी ने तहलका मचा दिया.फौजी कार्रवाई खत्म होने के बाद दिसंबर 2009 में पता चला कि गुल मकई कोई और नहीं, बल्कि स्वात की ही बेटी है और उसका नाम मलाला यूसुफजई है. तालिबान से बचाने के लिए उसे यह नाम दिया गया था, लेकिन पहचान जाहिर होते ही वह दुनिया की नजरों में बहादुर मलाला बन गई, लेकिन तालिबान की आंखों की किरकिरी. मलाला का पूरा परिवार तालिबान के निशाने पर आ गया. मलाला को अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय स्तर कई सम्मान मिले. इधर तालिबान मलाला से बदले की आग में जलता रहा और आखिरकार उसने पिछले साल 9 अक्टूबर को मलाला पर जानलेवा हमला कर ही दिया, लेकिन खुदा को कुछ और ही मंजूर था. मलाला की जान बच गई. इसके बाद वह और सशक्त होकर उभरी.

तालिबान फिर से मलाला को जान से मारने की धमकी दे रहा है. मलाला को अपनी जान की परवाह नहीं है. वे कहती हैं कि मैं आखिरी दम तक महिलाओं की शिक्षा के लिए संघर्ष करती रहूंगी. मलाला बेनजीर भुट्टो को अपना आदर्श मानती हैं और उनके पदचिन्हों पर चलते हुए भविष्य में पाकिस्तान की प्रधानमंत्री बनना चाहती हैं, ताकि वे पाकिस्तान में हर उस महिला को शिक्षित कर सकें, जो प़ढना चाहती हैं.

उम्मीद की किरण

मलाला, उन बहुत सी बच्चियों के लिए उम्मीद हैं, जो स्कूल जाना चाहती हैं. मलाला आदिवासियों और लड़कियों की शिक्षा का पूरजोर समर्थन करती हैं. मलाला तालिबान के ख़ौफ़ की कभी परवाह नहीं की और अपने उद्देश्य को पूरा करने में लगी रहीं. तालिबान के मलाला पर हमले के पीछे भी यही कारण था.

तालिबान फिर से मलाला को जान से मारने की धमकी दे रहा है. मलाला को अपनी जान की परवाह नहीं है. वे कहती हैं कि मैं आख़िरी दम तक महिलाओं की शिक्षा के लिए संघर्ष करती रहूंगी. मलाला बेनजीर भुट्टो को अपना आदर्श मानती हैं और उनके पदचिन्हों पर चलते हुए भविष्य में पाकिस्तान की प्रधानमंत्री बनना चाहती हैं, ताकि वे पाकिस्तान में हर उस महिला को शिक्षित कर सकें, जो निरक्षर है. मलाला कहती हैं कि किसी की हत्या करना, शोषण करना और सज़ा देने को इस्लाम में बिल्कुल भी जगह नहीं दी गई है. तालिबान इस्लाम को बदनाम कर रहा है. मलाला ने उम्मीद जताई है कि ऐसा भी एक वक्त आएगा, जब पाकिस्तान इन सभी सामाजिक बुराइयों से मुक्त होगा, वहां शांति होगी, सभी लड़कियां स्कूल जाएंगी. इंग्लैंड के प्रधानमंत्री डेविड कैमरून ने मलाला को साहस और उम्मीद की एक किरण बताया था. वे कहती हैं कि मैं अपने देश का भविष्य बदलना चाहती हूं. मैं शिक्षा को अनिवार्य बनाना चाहती हूं. मुझे उम्मीद है कि एक दिन ऐसा ज़रूर आएगा, जब मेरे देश के लोग आज़ाद होंगे. उनके पास उनके अधिकार होंगे. सभी लड़के और लड़कियां स्कूल जाएंगे. हमारे समाज की सबसे बड़ी कमी यह है कि हम सुधार के लिए किसी दूसरे की पहल का इंतज़ार करते हैं.

आई एम मलाला

द गर्ल हू स्टुड अप फॉर एजुकेशन एंड वाज शॉट बाय तालिबान नाम से मलाला ने एक पुस्तक लिखी है. यह मलाला की आत्मकथा है, जिसमें उन्होंने अपने अनुभव का उल्लेख किया है. पाकिस्तानी मानवाधिकार कार्यकर्ता मलाला यूसुफजई महात्मा गांधी के अहिंसा के मार्ग से प्रेरित हैं. मलाला चाहती हैं कि तालिबान समेत सभी आतंकियों के बेटे और बेटियों को शिक्षा मिले. वे कहती हैं कि अहिंसा का पाठ मैंने गांधीजी, ख़ान अब्दुल गफ़्फ़ार ख़ान और मदर टेरेसा से सीखा है. गौरतलब है कि 16 साल की मलाला उस वक्त ख़बरों में आई थीं, जब एक साल पहले अक्टूबर 2012 में पाकिस्तान के स्वात घाटी इलाके में उस पर तालिबानी हमलावर ने गोली चलाई थी. आज मलाला एक सिलेब्रिटी बन गई हैं. वह जो कुछ बोलती हैं, सोचती हैं, उस पर विश्‍व मीडिया का ध्यान रहता है और वह ब़डी ख़बरों में शुमार हो जाती हैं.

मलाला यूसुफजई

12 जुलाई, 2013 को मलाला ने संयुक्त राष्ट्र महासभा के विशेष सत्र को संबोधित किया.

वर्ष 2012 में संयुक्त राष्ट्र महासचिव बान की मून ने 10 नवंबर को मलाला यूसुफजई दिवस के रूप में मनाए जाने की घोषणा की थी.

गुल मकई उपनाम से मलाला डायरी लिखती थीं.

लड़कियों की शिक्षा के लिए आवाज़ उठाने वाली मलाला को 2013 के अंतरराष्ट्रीय बाल शांति पुरस्कार से सम्मानित किया गया.

मलाला यूसुफजई और सामाजिक न्याय कार्यकर्ता हैरी बेलाफोंटे को संयुक्त रूप से एमनेस्टी इंटरनेशनल का एंबेसेडर ऑफ कंसाइंस अवार्ड, 2013 देने की घोषणा की गई है.

मलाला को उसकी बहादुरी और स्वात की प्रतिकूल परिस्थितियों में महिलाओं की शिक्षा के लिए आवाज उठाने हेतु वर्ल्ड पीस एंड प्रॉस्पेरिटी फाउंडेशन के वीरता पुरस्कार से 19 नवंबर, 2012 को सम्मानित किया गया.

9 अक्टूबर 2012 को खैबर पख्तूनख्वा प्रांत में तालिबानी आतंकियों ने मलाला के सिर में गोली मार दी थी.

मलाला को फ्रांस के सिमोन डी बेवॉर पुरस्कार से 9 जनवरी, 2013 को सम्मानित किया गया.

पाकिस्तान का राष्ट्रीय युवा शांति पुरस्कार (2011) दिया गया.

मलाला को यूरोपीय संघ के प्रतिष्ठित सखारोव मानवाधिकार पुरस्कार से सम्मानित किया गया है.

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