मुज्जफरनगर दंगों का चुनावी असर

हो सकता है मज़फ़्फ़रनगर दंगे की साज़िश राजनीतिक पार्टियों ने अपने फ़ायदे के लिए रची हो, लेकिन वहां इसके मूल कारण अगर मौजूद ही न रहे होते, तो क्या राजनीतिक दल इसे बढ़ावा दे पाते. शायद नहीं. सच पूछा जाए तो ऐसे हादसे केवल आईडेंटिटी पॉलिटिक्स की वजह से नहीं होते, बल्कि उसके पीछे आर्थिक कारकों की भी बड़ी भूमिका होती है.

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कभी ख़त्म न होने वाली धर्मनिरपेक्षता और सांप्रदायिकता का आपसी टकराव एक बार फिर उत्तर प्रदेश में लौट आया है. इसकी परिणति पिछले दिनों हमें इस राज्य के मुज़फ़्फ़रनगर और उससे सटे अन्य ज़िलों में हुए दंगों में दिखाई दी. धर्मनिरपेक्ष ताक़तों का आरोप है कि प्रदेश के पैदा हुए इन हालातों के लिए भगवा बिग्रेड और उनके द्वारा लोगों में बांटी गई भड़काऊ भाषणों की सीडी ज़िम्मेदार है, जबकि भारतीय जनता पार्टी के समर्थक उत्तर प्रदेश में समाजावदी पार्टी की सरकार पर तुष्टीकरण का आरोप लगाते हैं. इससे अलग कुछ राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि इन दंगों के लिए भारतीय जनता पार्टी और समाजावादी पार्टी दोनों ही ज़िम्मेदार हैं. दरअसल, उनका मानना है कि धर्म के आधार पर धुव्रीकरण करना दोनों ही पार्टियों के लिए आगामी लोकसभा चुनावों में फ़ायदेमंद होगा, लेकिन सवाल यह है कि राजनीति के इस खेल में जाट और मुस्लिम, राजनीतिक दलों का साथ क्यों देंगे. वे भी उस आपसी सद्भाव की बलि चढ़ाकर, जिसे दशकों से उन्होंने संजोया है.

हो सकता है कि राजनीतिक पार्टियों ने अपने फ़ायदे के लिए लोगों के बीच तनाव फैलाया हो, जिसने दंगे का रूप ले लिया, लेकिन वहां इसके मूल कारण अगर मौजूद ही न रहे होते, तो क्या राजनीतिक दल इसे बढ़ावा दे पाते. शायद नहीं. उत्तर प्रदेश की राजनीति की खास समझ रखने वाली और जवाहरलाल नेहरू विश्‍वविद्यालय में प्राध्यापिका सुधा पाई के मुताबिक, ऐसे हादसे केवल आईडेंटिटी पॉलिटिक्स की वजह से नहीं होते, बल्कि उसके पीछे आर्थिक कारकों की भी बड़ी भूमिका होती है.

आख़िर वे कौन से आर्थिक कारक हैं, जिसकी वजह से सदियों से साथ रह रहे जाट और मुसलमानों के बीच वैमनस्यता की गहरी खाई खिंच गई? दरअसल, पश्‍चिमी उत्तर प्रदेश में जाट हमेशा से ही प्रभावशाली रहे हैं, क्योंकि क्षेत्र की अधिकतर ज़मीन उनके हिस्से में हैं, जिस पर बड़े पैमाने पर खेती होती है. चौधरी चरण सिंह के दौर से ही इस इलाके में जाट और मुस्लिमों का विश्‍वसनीय गठबंधन बना रहा है. यह गठबंधन दोनों ही वर्गों के लिए फायदेमंद रहा. हां, यह ज़रूर कहा जा सकता है कि दोनों के लिए यह लाभ अलग-अलग दृष्टिकोण से था.

विशेषज्ञों का मानना है कि 1987 में जब चरण सिंह की मृत्यु हुई, उसके बाद धीरे-धीरे इस गठबंधन में तनाव आने शुरू हो गए. कानपुर के क्राइस्ट चर्च कॉलेज में प्रोफेसर व सेंटर फॉर डेवलपिंग स्ट्डीज द्वारा कराए गए सर्वेक्षणों का हिस्सा रह चुके डॉ ए. के. वर्मा बताते हैं कि चरण सिंह वह व्यक्ति थे, जिन्होंने इन दोनों समुदाय के लोगों को एक डोर में बांधे रखा था, लेकिन उनके निधन के बाद इन दोनों समुदायों के बीच के रिश्तों की खाई गहरी होती गई. चरण सिंह के बाद मुलायम सिंह और अजीत सिंह ने इन दोनों समुदायों पर अपना-अपना दावा ठोंकना शुरू किया, जिससे दोनों समुदाय बंटने लगे. डॉ वर्मा बताते हैं कि मुसलमान इस क्षेत्र में संख्या बल में तो हमेशा से ज़्यादा रहे, लेकिन उनके आत्मविश्‍वास में धीरे-धीरे बढ़ोत्तरी होने लगी, क्योंकि समय के साथ उनकी आर्थिक स्थिति मजबूत हो रही थी. धनबल और आत्मबल के इस मेल ने उन्हें राजनीतिक स्तर पर भी मजबूत करना शुरू किया. जनगणना 2001 के आंकड़ों के मुताबिक, पश्‍चिमी उत्तर प्रदेश के 12 ज़िलों में मुसलमानों की आबादी कुल आबादी के 33 फीसद से अधिक है. 2012 के विधानसभा चुनावों में इस क्षेत्र की सभी सीटों में से 26 सीटों पर मुस्लिम प्रत्याशी विजयी हुए.

हमें यह भी समझना होगा कि आख़िर वे कौन से कारण हैं, जिन्होंने इस क्षेत्र में मुसलमानों को आर्थिक रूप से मजबूत किया. 2006 में जारी सच्चर कमेटी की रिपोर्ट के आंकड़ों पर गौर करें तो कुछ हद तक इसे समझा जा सकता है. रिपोर्ट के मुताबिक, भले ही उन कृषि कार्यों में मुसलमानों की संख्या अन्य समुदायों से कम हो, लेकिन मैन्यूफैक्चरिंग और ट्रेड के मामले उनकी संख्या (विशेषकर पुरुषों की) दूसरे सामाजिक-धार्मिक समूहों से काफी ज्यादा है. साथ ही निर्माण क्षेत्र में भी इस समुदाय के लोगों की भागीदारी अन्य समुदाय से ज़्यादा है.

रिपोर्ट के मुताबिक, विनिर्माण के अलावा थोक व फुटकर व्यापार, भू-यातायात, मोटरगाड़ियों की मरम्मत, तंबाकू उत्पाद, टेक्सटाइल व वस्त्र उद्योगों के साथ-साथ धातुओं के सामान के उत्पादन जैसे व्यापार में मुसलमानों की हिस्सेदारी बहुत है. रिपोर्ट के मुताबिक, मैन्यूफैक्चरिंग सेक्टर में यह हिस्सेदारी दिल्ली, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र व राज्स्थान में 25 प्रतिशत से भी अधिक है.

हालांकि रिपोर्ट यह नहीं बताती कि इन क्षेत्रों में विकास दर क्या है. हां, रिपोर्ट में इस बात का ज़िक्र ज़रूर है कि 1994 से 2001 के बीच तंबाकू उत्पाद सेक्टर में रोजगार की दर 7.7 प्रतिशत थी. वस्त्र उद्योग में 14.4 प्रतिशत, ऑटो रिपेयर सेक्टर में 9.4 प्रतिशत व इलेक्ट्रिकल मशीनरी सेक्टर में रोजगार की दर 18.6 रही है. स्पष्ट है कि पिछले दस वर्षों में कंन्सट्रक्शन और ऑटो सेक्टर में पिछले 10 वर्षों में जो तेजी आई, उसका लाभ मुसलमानों को मिला.

मेरठ में कांग्रेस से जुड़े एक विश्‍लेषक अपना नाम न छापने की शर्त पर बताते हैं कि पिछले कुछ वर्षों में कुशल कारीगरों की मांग बढ़ी है और इसका फायदा मुसलमानों को मिला है. साथ ही इस क्षेत्र में फल व्यापार पर पूरी तरह से मुसलमानों का कब्जा है. उनके मुताबिक, पश्‍चिमी उत्तर प्रदेश के अधिकांश फलों के बागीचे या तो मुसलमानों के अपने हैं या फिर वे उनके द्वारा संचालित हैं. इन क्षेत्रों से नजदीक के बड़े शहरों, जैसे दिल्ली से भारी मात्रा में फलों का आयात होता है.

इसके विपरीत जाट समुदाय के लोगों की माली हालत कमज़ोर होती जा रही है. क्षेत्र की अधिकांश चीनी मिलों पर जाटों का कब्ज़ा है, लेकिन चीनी मिलों की हालत दिन-ब-दिन खस्ता होती जा रही है. कभी पश्‍चिमी उत्तर प्रदेश को राज्य का चीनी का कटोरा कहा जाता था. अकेले मुज़फ़्फ़रनगर में ही 11 चीनी मिलें हैं. भारतीय चीनी मिल के मुख्य निदेशक अविनाश वर्मा बताते हैं कि सरकार ने जो गन्ना नीति बनाई, उसने इस राज्य में इससे जुड़े उद्योग को काफी नुकसान पहुंचाया. एक अनुमान के मुताबिक, वित्तीय वर्ष 14 में प्रदेश की चीनी मिलों को तकरीबन 3,000 करोड़ का नुकसान हुआ है. साथ ही मिलों पर तकरीबन 3000 करोड़ की देनदारी भी बाक़ी है, जो मिलें किसानों को चुकाएंगी.

इस बकाए के अलावा किसानों के सामने दूसरा एक और संकट है कि पिछले 10 साल से गन्ने की उत्पादकता लगातार घट रही है. अविनाश वर्मा के मुताबिक, 10 साल पहले एक हेक्टेयर में 55 टन गन्ने का उत्पाद होता था और आज भी एक हेक्टेरयर में उतना ही उत्पादन हो रहा है. गन्ना उत्पादन का जो राष्ट्रीय औसत है, वह राज्य में राष्ट्रीय औसत से 10-12 टन प्रति हेक्टेयर कम है. हालांकि गन्ने की कीमतों में इजाफा हुआ है. 2005 में एक क्विंटल गन्ने का मूल्य 115 था, जो बढ़कर 2010 में 165 रुपये प्रति क्विंटल हो गया. बावजूद इसके, किसानों को इसका कोई फायदा नहीं हुआ, क्योंकि कंपनियां मूल्यों में होने वाली इस बढ़ोत्तरी को चुकाने की स्थिति में नहीं हैं. मिलें पहले नवंबर में किसानों का भुगतान कर देती थीं, लेकिन अब इसमें छह से सात महीने की देरी होने लगी है. विशेषज्ञों का कहना है कि इस क्षेत्र में किसान आर्थिक तौर पर बेहद दबाव में हैं.

यह दबाव के ही संकेत हैं ( हो सकता है कि सही हो या केवल प्रतीत होता है) कि जाट पिछले कुछ समय से यह मांग कर रहे हैं कि उन्हें अन्य पिछड़ी जातियों की श्रेणी में शामिल किया जाए, ताकि सरकारी नौकरियों में आरक्षण पा सकें. सुधा पाई बताती हैं कि 20 साल पहले यह सोचना भी अकल्पनीय था कि जाट भी ओबीसी के दर्जे की मांग कर सकते हैं. जाट आर्थिक तौर पर कमज़ोर होते गए और मुसलमान आर्थिक तौर पर मजबूत. जाटों के लिए यह बेहद असहनीय सी स्थिति हो रही थी कि मुसलमान उनके बराबरी पर आ गए हैं और कुछ क्षेत्रों, मसलन राजनीति में उनसे भी आगे निकलते जा रहे हैं. आगरा युनिवर्सिटी से जुड़े मेरठ निवासी शशिकांत पांडे इस स्थिति को स्पष्ट करते हुए बताते हैं कि इन स्थितियों ने दोनों समुदायों के बीच तनाव पैदा करना शुरू किया और जब यह तनाव बढ़ गया तो इस तरह के टकराव सामने आने लगें. वे कहते हैं कि इसे हम केवल दो समुदायों के बीच का झगड़ा नहीं मान सकते, इन समुदायों के बीच की प्रतिस्पर्धा भी इसका एक कारण है.

प्रसिद्ध समाजशास्त्री दीपांकर गुप्ता इन दंगों के प्रति अलग नज़रिया रखते हैं. इन सांप्रदायिक दंगों की मुख्य वजह गांवों की बदलती अर्थव्यवस्था है, जिसके चलते अंदर ही अंदर तनाव की स्थिति बन रही थी. वे मानते हैं कि शहरों में जो अल्पमत और बहुमत की सोच है, वह गांवों में प्रवेश कर रही है, जिससे गांवों में जो पारंपरिक भाईचारे की भावना है, वह कमजोर पड़ रही है.

एक सवाल यह भी है कि जाट और मुस्लिमों के बीच पैदा हुई दरार, जो कि इन दंगों के दौरान दिखाई दी, उसका असर आने वाले चुनावों पर क्या पड़ेगा?  पाई मानती हैं कि मायावती की बहुजन समाज पार्टी को इसका सबसे बड़ा फायदा होगा. वो कहती हैं कि असुरक्षा की भावना में कोई नहीं जीना चाहता. साथ ही हमें यह भी समझना होगा कि जरूरी नहीं है कि धार्मिक स्तर पर ध्रुवीकरण का फायदा भाजपा और सपा को हो ही, क्योंकि देश 1991 के दौर से काफी आगे निकल चुका है. उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव जब मुजफ्फरनगर के दंगा प्रभावित इलाकों का दौर करने गए, तो जिस तरह की प्रतिक्रियाओं से उन्हें दो-चार होना पड़ा, उससे जाहिर होता है कि वास्तव में देश 1991 को पीछे छोड़ आया है.