पुरस्कारों के कारोबार से साख़ गिर रही है

प्रेमचंद के गांव के नाम पर दिया जाने वाला लमही सम्मान इस बार कथाकार मनीषा कुलश्रेष्ठ को दिया गया. इसे लेकर उस समय विवाद पैदा हो गया, जब लमही पुरस्कार के संयोजक विजय राय ने एक साक्षात्कार में मनीषा को पुरस्कार देने को एक चूक बताया. हाल ही में साहित्य अकादमी युवा पुरस्कार अर्चना भैंसारे को दिया गया तो उस पर भी ऐसा ही विवाद पैदा हुआ था. दरअसल, आज हिंदी साहित्य के परिदृश्य में हद से ज़्यादा पुरस्कार हो गए हैं. हर दूसरा लेखक कम से कम एक पुरस्कार से नवाजा जा चुका है. पुरस्कारों की संख्या बढ़ने के पीछे लेखकों की पुरस्कार पिपासा है. इसका फ़ायदा उठाकर साहित्य को कारोबार समझने वाले लोग मुनाफा कमाने में जुटे हैं. इस खेल से पुरस्कारों की गिरती साख़ को बचाने के लिए लेखक संगठन भी कोई ठोस क़दम नहीं उठा रहे हैं.

lamhi

हिंदी साहित्य इन दिनों पुरस्कार विवाद से गरमाया हुआ है. इस गरमाहट की आंच हिंदी से जुड़े लोग अच्छी तरह से महसूस कर रहे हैं. हिंदी के महान साहित्यकार प्रेमचंद के गांव के नाम पर उनके दूर के रिश्तेदार हर साल लमही सम्मान देते हैं. लमही नाम से एक पत्रिका भी निकालते हैं. लमही पुरस्कार पिछले चार सालों से दिया जा रहा है. यह पुरस्कार अपनी विश्‍वसनीयता स्थापित करने में जुटा था, अब तक ये पुरस्कार मशहूर अफ़सानानिगार ममता कालिया, पत्रकार साजिश रशीद और कथाकार शिवमूर्ति को दिया जा चुका है. इन तीन वर्षों के चयन पर विवाद नहीं उठा, न ही कोई सवाल खड़े हुए. इसकी वजह पुरस्कार से हिंदी जगत का अनभिज्ञ होना भी हो सकता है. 30 जनवरी, 2013 हिंदी की उभरती हुई लेखिका मनीषा कुलश्रेष्ठ को चौथा लमही सम्मान देने का ऐलान हुआ. निर्णायक मंडल में संयोजक विजय राय के अलावा वरिष्ठ पत्रकार आलोक मेहता, फिल्मकार चंद्रप्रकाश द्विवेदी, लेखक सुशील सिद्धार्थ और प्रकाशक महेश भारद्वाज थे. इस साल विश्‍व पुस्तक मेले के मौ़के पर इस पुरस्कार की ख़ूब चर्चा रही थी. लमही के मनीषा कुलश्रेष्ठ पर केंद्रित अंक की ज़ोरदार बिक्री का दावा किया गया. थोड़ा बहुत विवाद उस वक्त निर्णायक मंडल में प्रकाशक के रहने पर उठा था, लेकिन चूंकि पुरस्कार की उतनी अहमियत नहीं थी, लिहाजा वो विवाद ज़ोर नहीं पकड़ सका. तक़रीबन छह महीने बाद दिल्ली में 29 जुलाई को दक्षिण दिल्ली के मशहूर सेंटर में सम्मान अर्पण समारोह संपन्न हुआ. पत्र-पत्रिकाओं में इस समारोह की ख़ूब तस्वीरें छपीं. ऐसा पहली बार हुआ था कि लमही सम्मान समारोह उत्तर प्रदेश की सरहदों को लांघ कर दिल्ली पहुंचा. माना गया कि लमही सम्मान अपनी राष्ट्रीय पहचान बनाने के लिए दिल्ली पहुंचा. इस समारोह को इसी आलोक में देखा समझा गया था. इस पृष्ठभूमि को बताने का मक़सद इतना है कि पाठकों को पूरा माजरा समझ में आ सके.

पुरस्कार अर्पण समारोह तक सबकुछ ठीक रहा. असल खेल शुरू हुआ पुरस्कार अर्पण समारोह के डे़ढ महीने बाद. सोशल नेटवर्किंग साइट पर किसी ने लिखा कि लमही पुरस्कार के संयोजक ने किसी पत्रिका को साक्षात्कार में कहा है कि इस साल मनीषा कुलश्रेष्ठ को पुरस्कार देकर उनसे चूक हो गई. किसी ने पत्रिका को देखने की जहमत नहीं उठाई. किसी ने विजय राय समेत जूरी के सदस्यों से बात करने की कोशिश नहीं की. किसी सोशल नेटवर्किंग साइट पर उनमें से किसी का पक्ष छपा. लेकिन शोर ऐसा मचा कि कौआ कान लेकर भाग गया और बजाए अपने कान को देखने के उत्साही साहित्यप्रेमी कौए के पीछे भागने लगे. फेसबुक की अराजक आज़ादी ने कौए के पीछे भागनेवालों की संख्या बढ़ाने में उत्प्रेरक का काम किया. नतीजा यह हुआ कि मनीषा कुलश्रेष्ठ ने फौरन अपने फेसबुक पेज पर लिखा- मैं यहां जयपुर में हूं. लमही सम्मान की बाबत तमाम विवाद से अनभिज्ञ हूं. विजय राय जी का बयान अगर सत्य है कि उन्होंने दबाव में पुरस्कार दिया है, तो इस अपमानजनक सम्मान को मैं लौटाने का निर्णय ले चुकी हूं. कौआ के पीछे भागने की एक और मिसाल. फिर लेखिका ने दावा किया उसने पुरस्कार के लिए न तो प्रविष्टि भेजी थी और न ही अपनी क़िताब. उन्होंने जूरी और संयोजक से माफ़ी मांगने की बात भी की. उन्होंने आहत होकर लेखन छोड़ देने का संकेत भी दिया था. एक माहिर राजनेता की तरह चले इस दांव से फिर फेसबुकिया ज्वार उठा और लेखिका ने अपना निर्णय बदल लिया. खैर, यह तो होना ही था. लेखिका का आग्रह था कि पुरस्कार लौटाने के निर्णय को हिंदी में एक परंपरा की शुरुआत के तौर पर देखा जाना चाहिए, लेकिन वो यह भूल गईं कि हिंदी में पुरस्कार लौटाने की एक लंबी परंपरा रही है. लेकिन ज़्यादातर साहित्यक वजहों से. ज़्यादा पीछे नहीं जाकर अगर हम याद करें तो दो हज़ार दस में आलोचक पुरुषोत्तम अग्रवाल ने हिंदी अकादमी का पुरस्कार ठुकरा दिया था. उनका विरोध कृष्ण बलदेव वैद के लेखन के समर्थन और हिंदी अकादमी के उस लेखक के एतराज़ पर था. अग्रवाल के पुरस्कार लौटाने के बाद हिंदी अकादमी की साख़ पर सवाल खड़ा हो गया था.

लमही सम्मान पर यह विवाद इतने पर ही नहीं रुका. अब पुरस्कार, लेखक, जूरी सदस्यों के बारे में निहायत घटिया और बेहूदा बातें भी सामने आने लगीं. लोग चटखारे ले लेकर इन व्यक्तिगत बातों से आनंद उठाने लगे. लेकिन वो बातें इतनी घटिया थीं कि उसको पढ़ने के बाद हमको अपने को हिंदी साहित्य से जुड़े होने पर भी शर्म आ रही थी. हिंदी साहित्य में व्यक्तिगत आरोप-प्रत्यारोप की कोई जगह होनी नहीं चाहिए और हमें उसका घोर प्रतिवाद भी करना चाहिए. यही फर्क हिंदी और अंग्रेज़ी की मानसिकता का और कुंठा का है. हिंदी का लेखक इतना कुंठित हो गया है कि उसको मर्यादा की परवाह ही नहीं रही. मैं लंबे समय से इस पर लिखता आ रहा हूं, लेकिन राजेंद्र यादव को यह छाती कूटने और मात्र विलाप करने जैसा लगता है. हक़ीक़त यही है कि हिंदी के ज़्यादातर लेखक छोटे से लाभ-लोभ के चक्कर में इतने उलझ गए हैं कि वो बड़ा सोच ही नहीं सकते हैं. अब देखिए कि पंद्रह हज़ार रुपये के इस पुरस्कार के लिए इतना बड़ा विवाद. इस विवाद के पीछे भी हाय हुसैन हम न हुए की मानसिकता ही है.

दरअसल, आज हिंदी साहित्य के परिदृश्य में इतने पुरस्कार हो गए हैं कि हर दूसरा लेखक कम से कम एक पुरस्कार से नवाजा जा चुका है. पुरस्कारों की संख्या बढ़ने के पीछे लेखकों की पुरस्कार पिपासा है. इसी पुरस्कार पिपासा का फ़ायदा उठाकर हिंदी साहित्य को कारोबार समझने वाले लोग फ़ायदा उठाने में जुटे हैं. पुरस्कारों के खेल पर लेखक संगठनों की चुप्पी भी ख़तरनाक है. हिंदी के तीनों लेखक संगठनों ने अब तक हिंदी में पुरस्कारों की गिरती साख़ को बचाने के लिए कोई भी ठोस क़दम नहीं उठाया है. लेखक संगठन भी पुरस्कृत लेखक या फिर विवादित लेखक की विचारधारा को देखकर ही फैसला लेते हैं. उनके लिए साहित्य प्रथम का सिद्धांत कोई मायने नहीं रखता है. उनके लिए तो विचारधारा सर्वप्रथम है. लमही सम्मान पर भी लेखक संगठनों ने चुप्पी साधे रखी. उसके बाद के अप्रिय प्रसंगों पर भी लेखक संगठनों ने उसको रोकने के लिए कोई क़दम उठाया हो, ये ज्ञात नहीं है.