उत्तर प्रदेश में तैयार है राजनीतिक जमीन : मोदी माया मुलायम का महाभारत

भाजपा खेमे का ऐसी ख़बरों से उत्साहित होना ग़लत नहीं है. सब जानते हैं कि 2004 में भाजपा की केंद्रीय सत्ता में वापसी नहीं हुई तो इसकी ब़डी वजह उत्तर प्रदेश ही था. अबकी बार प्रदेश भाजपा हिसाब बराबर कर देना चाहती है. भाजपा आलाक़मान द्वारा नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का दावेदार बनाने के बाद उत्तर प्रदेश के लिए भारतीय जनता पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व ने कमर कस ली है.

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उत्तर प्रदेश में राजनीति की धारा पूरे देश से अलग बहती है. यहां पिछले दो दशकों से कोई भी चुनाव विकास के मुद्दे पर नहीं लड़ा गया है. ऐसा ही नज़ारा इस बार भी देखने को मिलेगा. इसकी संभावनाएं प्रबल होने लगी हैं. सभी दल चाहते हैं कि वे मुख्य मुक़ाबले में रहें. इसके लिए साज़िशों और लोक-लुभावन वायदों का दौर चल रहा है. किसी को पुचकारा जा रहा है तो किसी को दुत्कारा जा रहा है. 20 करोड़ से अधिक जनता वाले प्रदेश को ओछी राजनीति ने खंड-खंड कर दिया है. अखिलेश सरकार की नाकामी और प्रदेश में फैलता जातीय-धार्मिक विद्वेष समाजवादी पार्टी के लिए ग्रहण बन गया है, जो आग सपा नेताओं ने अपना वोट बैंक मजबूत करने के लिए लगाई थी, उस आग में सपा के ही हाथ झुलसने लगे हैं. मुजफ्फरनगर में सांप्रदायिक दंगा के बाद सूबे की सियासत में सफलता के लिए तमाम राजनीतिक दांव-पेंच आज़माए जा रहे हैं. मुजफ्फरनगर से सपा के लोकसभा प्रत्याशी सोमपाल शास्त्री ने चुनाव लड़ने से इन्कार कर दिया है. अयोध्या में चौरासी कोसी परिक्रमा पर ड्रामेबाजी हुई, जिसके चलते सपा-भाजपा पर मिलीभगत के आरोप लगे और मुसलमानों का सपा से विश्‍वास हिला. ब़डी बात यह है कि सपा के ही मुस्लिम मंत्री आज़म ख़ान ने मुख्यमंत्री को ही इसके लिए कठघरे में खड़ा कर दिया है. यूपी में सधे हुए क़दमों के साथ मोदी टीम की सक्रियता ब़ढ रही है. भाजपा के प्रदेश प्रभारी अमित शाह के यूपी की ज़िम्मेदारी संभालते ही हिंदुत्व का ज्वार फिर उठ रहा है. भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार मोदी के यूपी से चुनाव लड़ने की संभावनाएं जताई जा रही हैं. कांगे्रस द्वारा सपा-भाजपा को एक ही साथ खड़ा दिखाने की कोशिश की जा रही है. बसपा द्वारा अखिलेश सरकार की नाकामी का ढिंढोरा पीटा जा रहा है. वोट बैंक की राजनीति को परवान चढ़ाने के लिए प्रधानमंत्री और कांगे्रस अध्यक्ष सोनिया तथा राहुल गांधी ने मुजफ्फरनगर का दौरा किया, जो एक संप्रदाय तक ही सीमित रहा. ये ऐसे दांव हैं, जिसकी बदौलत हर पार्टी सियासत में एक-दूसरे को शिकस्त देने के सपने देख रहा है.

उत्तर प्रदेश में राष्ट्रीय राजनीतिक परिदृश्य पर नरेंद्र मोदी की सक्रियता से समाजवादी पार्टी, बसपा और कांगे्रस के कान कुछ ज्यादा ही खड़े हो गए हैं. हालांकि, नरेंद्र मोदी की सक्रियता भाजपा को कोई सफलता दिलाएगी, इसमें संदेह ही है, क्योंकि मोदी गुजरात के विकास का नारा लेकर उत्तर प्रदेश में प्रवेश कर रहे हैं, लेकिन इस सूबे की राजनीति में अब तक विकास कोई मुद्दा नहीं है. यहां पर अभी भी चुनाव जाति और धर्म के आधार पर ल़डा जाता है. यह महज संयोग नहीं है कि अमित शाह ने उत्तर प्रदेश में प्रभारी के रूप में नमो का नारा बुलंद किया, तब तक वहां पर अखिलेश सरकार सूबे की जनता को 104 दंगे अता कर चुकी थी और ये सभी दंगे हिंदू और मुस्लिम समुदाय के बीच हुए. इतने दंगे न तो नरेंद्र मोदी के गुजरात में हुए, न ही उत्तर प्रदेश में ही भाजपा के शासनकाल में. दूसरे, नरेंद्र मोदी के कमान संभालने के दौरान ही विहिप ने राममंदिर का मुद्दा उठाया और सपा सरकार के फैसलों के चलते माहौल गरमाने में उसे मदद ही मिली. एक तरह से देखा जाए तो भाजपा राममंदिर का सांप्रदायिक मुद्दा अब भी छो़डने को तैयार नहीं दिख रही है. सवाल यह है कि क्या नरेंद्र मोदी का विकास का नारा यूपी में मुद्दा बनेगा या फिर इस बार भी हिंदू-मुस्लिम और जात-पात ही चुनावी मुद्दे होंगे?

उत्तर प्रदेश में राष्ट्रीय राजनीतिक परिदृश्य पर  नरेंद्र मोदी की सक्रियता से समाजवादी पार्टी, बसपा और कांगे्रस के कान कुछ ज़्यादा ही खड़े हो गए हैं. हालांकि, नरेंद्र मोदी की सक्रियता भाजपा को कोई सफ़लता दिलाएगी, इसमें संदेह ही है, क्योंकि मोदी गुजरात के विकास का नारा लेकर उत्तर प्रदेश में प्रवेश कर रहे हैं, लेकिन इस सूबे की राजनीति में अब तक विकास कोई मुद्दा नहीं है. यहां पर अभी भी चुनाव जाति और धर्म के आधार पर ल़डा जाता है.

इसे महज संयोग नहीं कहा जा सकता कि प्रदेश में मोदी के प्रवेश करते ही वहां पर दंगे शुरू हो गए. सूबे में मोदी के आने के पहले पूरे साल सांप्रदायिक माहौल बना रहा. मोदी के आने से भाजपा की ब़ढत की संभावना देखते ही सपा भी अपने धर्मनिरपेक्षता के चोले में सांप्रदायिक कार्ड खेलने पर आमादा है. मुजफ्फरनगर दंगों में सपा के आला नेताओं की संदिग्ध भूमिका, प्रशासन को पंगु करके उन्मादी जनता को उनके हाल पर छो़डना और आरोपी विधायकों पर कार्रवाई न होने जैसी घटनाएं बताती हैं कि अगले चुनाव में सभी पार्टियां उन्हीं पुराने मुद्दों का सहारा लेकर चुनावी वैतरणी पार करने की कोशिश करेंगी.

सपा के कुछ प्रत्याशी तो बदले माहौल में सपा के टिकट से लोकसभा चुनाव लड़ने तक से कतराने लगे हैं. मुजफ्फरनगर से सपा के घोषित प्रत्याशी और पूर्व केंद्रीय मंत्री सोमपाल सिंह ने दंगों के बाद टिकट वापस कर दिया है. इसी तरह से गोंडा के सपा उम्मीदवार नंदिता शुक्ला, जो अपने टिकट को लेकर काफी उत्साहित थी, बदले माहौल (दंगा और मोदी) में परेशान दिख रही हैं. उनके कुछ करीबी कहते हैं कि अल्पसंख्यकों की सपा से नाराजगी के बाद नंदिता किसी अन्य प्रत्याशी को मैदान में देखने का सपना पाल बैठी हैं. जब यह चर्चा आम हुई तो सपा आलाकमान ने उनसे एक प्रेस कॉन्फे्रंस करा कर यह घोषणा कराई कि वह पूरी मजबूती के साथ चुनाव लड़ेंगी. कैसरगंज से सपा के उम्मीदवार बृजभूषण शरण के बारे में भी कुछ इसी तरह की चर्चा है. उनके बारे में तो यह भी कहा जाता है कि वह अपने कुछ राजनीतिक क्षत्रिय दोस्तों के साथ दिल में कमल खिला रहे हैं.

भाजपा खेमे का ऐसी खबरों से उत्साहित होना गलत नहीं है. सब जानते हैं कि 2004 में भाजपा की केंद्रीय सत्ता में वापसी नहीं हुई तो इसकी ब़डी वजह उत्तर प्रदेश ही था. अबकी बार प्रदेश भाजपा हिसाब बराबर कर देना चाहती है. भाजपा आलाकमान द्वारा नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का दावेदार बनाने के बाद उत्तर प्रदेश के लिए भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व ने कमर कस ली है. हालात बदलने के लिए यूपी से मोदी ही नहीं अमित शाह, उमा भारती जैसे हिंदुत्व के चेहरों को भी चुनाव मैदान में उतारा जा सकता है. भाजपा साम-दाम-दंड-भेद, किसी भी तरह से यहां से लोकसभा में अधिक से अधिक सांसद भेजना चाहती है.

इसके पीछे कारण भी है. भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री राजनाथ सिंह यह बात भली-भांति जान रहे होंगे कि नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कराने के लिए उन्होंने पार्टी के शीर्ष नेताओं लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, सुषमा स्वराज से जो नाराजगी मोल ली है, नतीजे ठीक-ठाक नहीं आने पर ये नेता उन्हें कहीं का नही छोड़ेंगे. भले ही राजनाथ की पीठ पर संघ का हाथ हो, लेकिन मोर्चे पर राजनाथ को ही कौशल दिखाना होगा. उन्हें यूपी के हालात का भी अच्छी तरह से अंदाजा है. वैसे तो चुनाव अभियान समिति के अध्यक्ष बनने के बाद ही मोदी और राजनाथ सिंह के एजेंडे में उत्तर प्रदेश आ चुका था. उन्होंने अपने नजदीकी और विश्‍वासपात्र अमित शाह को प्रदेश का प्रभारी बनाकर इसके संकेत भी दे दिए थे, पर अब जब मोदी को प्रधानमंत्री पद का दावेदार घोषित कर दिया गया है तो उनके लिए यह जिम्मेदारी और अधिक गंभीर हो गई है. जरा सी चूक उनको दिल्ली के ताज से दूर कर सकती है. वह जानते हैं कि उत्तर प्रदेश में भाजपा पिछले एक दशक से बहुत मुश्किल दौर से गुजर रही है. सांगठनिक ढांचा चरमराया हुआ है. गुटबाजी चरम पर है. पुरानी पीढ़ी ने नई पौधों को आगे नहीं आने दिया है. पार्टी के कई वरिष्ठ और जमीन से जुड़े नेताओं ने एक तरह से पार्टी से किनारा कर लिया है.

मोदी अतीत से भी सीखना चाह रहे हैं. 1996 में अटल बिहारी वाजपेयी ने गुजरात के गांधीनगर और उत्तर प्रदेश के लखनऊ से एक साथ चुनाव लड़कर दिल्ली में भाजपा के लिए सत्ता का रास्ता खोला था. भले ही 13 दिन के लिए सही, भाजपा ने वाजपेयी के नेतृत्व में केंद्र में सरकार बनाई जरूर. दोनों ही राज्यों में भाजपा को अच्छी संख्या में सीटें मिली थीं. बाद में अटल ने गांधीनगर से त्यागपत्र दे दिया था. संघ नेतृत्व ने जब मोदी के जरिये दिल्ली की गद्दी पर एक बार फिर भगवा सरकार स्थापित करने के लिए अभियान शुरू कर दिया है तो यह चर्चा फिर शुरू हो गई है कि क्या मोदी भी उसी राह पर चलते हुए गुजरात व उत्तर प्रदेश से एक साथ चुनाव लड़ेंगे? पार्टी के छोटे-बड़े सभी नेता इस सवाल का जबाव हां में देते हैं. कानपुर भाजपा के नेताओं ने तो प्रस्ताव तक पास करके दिल्ली भेज दिया है. वहीं लखनऊ-वाराणसी से भी मोदी का नाम सुर्खियों में है.

बात आंकड़ों की करें तो नतीजे भाजपा के पक्ष में नहीं नजर आते हैं. मोदी जिस राज्य से आते हैं, उस राज्य में लोकसभा की 26 सीटें हैं. इसके विपरीत यूपी में 80 सीटें हैं, लेकिन यहां उसके सदस्यों की संख्या दस तक ही सीमित है. विधानसभा में भी वह तीसरे नंबर की पार्टी है. वोट प्रतिशत की बात की जाए तो 1998 के लोकसभा चुनाव में 36.48 प्रतिशत वोट लेकर 57 सीटें पाने वाली भाजपा, 2002 में न सिर्फ वोट प्रतिशत में, बल्कि सीटों की संख्या भी नीचे गिरती चली गई. 2004 के लोकसभा चुनाव में भी पार्टी को मात्र 22.17  प्रतिशत वोट और 10 सीटें मिली थीं. विधानसभा के 2012 के चुनाव में पार्टी को लगभग 15.21 प्रतिशत वोटों से ही संतोष करना पड़ा. यह दयनीय स्थिति थी. उत्तर प्रदेश में भाजपा के पास अभी 10 सीटें हैं. जाहिर है कि 40 का आंकड़ा छूने के लिए मोदी को इन सीटों को बरकरार रखते हुए 30 अन्य सीटों का इंतजाम करना होगा, जो सिर्फ उनके नाम से नहीं हो सकता. इसके लिए संगठनात्मक ढांचा मजबूत करने, गुटबाजी पर विराम लगाने के अलावा जिताऊ प्रत्याशी तलाशने के अलावा राजनीतिक जमीन भी तैयार करनी होगी.

मुजफ्फनगर दंगों से यदि कोई सबसे अधिक आहत है तो वह सपा प्रमुख और खुद को प्रधानमंत्री की रेस में शामिल मानने वाले मुलायम सिंह यादव हैं. वह विधानसभा-2012 वाला प्रदर्शन लोकसभा में भी दोहराना चाहते थे, लेकिन प्रदेश की बिगड़ी कानून व्यवस्था, फिर चौरासी कोसी परिक्रमा पर विवादास्पद निर्णय और अब दंगों ने तो उनकी इच्छाओं पर आखिरी कील ठोंक दी. वह यहां तक कहने लगे हैं कि प्रधानमंत्री पद की दौड़ में मैं शामिल नहीं हूं. मुसलमानों के बीच सपा की विश्‍वसनीयता गिरने से मायावती को जरूर राहत मिली. वह डंके की चोट पर कहने लगी हैं कि उनके राज में मुसलमानों का बाल भी बांका नहीं होता था. भाजपा और सपा अल्पसंख्यकों को डरा रही हैं, ताकि दोनों के वोट बैंक मजबूत हो सकें. कांगे्रस भी मुस्लिम वोटरों को लुभाने के लिए तरह-तरह के हथकंडे अपना रही है, लेकिन 2012 में राहुल को नकार चुकी प्रदेश की जनता उन्हें अब भी गंभीरता से नहीं ले रही है.

दारुल उलूम की कोई प्रतिक्रिया नहीं

ल्पसख्यकों पर मजबूत पकड़ रखने वाला दारुल उलूम गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की ताज़पोशी पर मुंह नहीं खोल रहा है. वहीं कई प्रमुख मुस्लिम संगठन जानना चाहते हैं कि मोदी यदि देश के प्रधानमंत्री बनते हैं तो अल्पसंख्यकों, खासकर मुस्लिमों के लिए उनका क्या एजेंडा होगा. बात दारुल उलूम की है तो उसका साफ कहना है कि मोदी के प्रधानमंत्री पद की दावेदारी पर वह कुछ नहीं कहना चाहेगी. उनकी संस्था मजहबी और गैर सियासी है. राजनीतिक मामलों पर हम अपनी राय नहीं देते हैं. दारुल उलूम के अशरफ उस्मानी कहते हैं कि हमेशा से ही हमारी संस्था द्वारा सियासी मामलों पर राय नहीं देने की परंपरा रही है. यहां बता देना जरूरी है कि कुछ समय पूर्व दारुल उलूम के एक मोहतमिम मौलाना गुलाम मोहम्मद बस्तानवी को मोदी समर्थन के कारण अपना पद गंवाना पड़ा था. इसके बाद से उलेमा मोदी का नाम लेने से भी परहेज करते हैं. यह स्थिति तब है, जबकि आम मुसलमान उनकी तरफ काफी उम्मीदों के साथ देख रहा है. एक तरफ विरोध है तो दूसरी तरफ समर्थन भी. राष्ट्रीय एकता अंबेडकर सोसायटी के संयोजक नवाब अख्तर ने नरेंद्र मोदी को बधाई देते हुए उम्मीद जताई कि उनके नेतृत्व में भाजपा केंद्र में अगली सरकार बनाने में सफल रहेगी. मुस्लिम मजलिस के प्रांतीय उपाध्यक्ष और प्रवक्ता बदर काजमी ने कहा कि देश के मुस्लिमों ने अटल बिहारी वाजपेयी को प्रधामनंत्री के रूप में सराहा और कबूल किया था. मुस्लिमों की अपेक्षा है कि मोदी, अटल बिहारी वाजपेयी जैसा किरदार पेश करते हैं और उसमें सफल रहते हैं तो यह भाजपा की सियासत का सकारात्मक पहलू होगा.

 

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