विश्व साहित्य : बुकर पुरस्कार की दौ़ड में बंगाली कहानी

भारतीय मूल की अमेरिकी लेखिका झुंपा लाह़िडी को उनके नये उपन्यास द लोलैंड के लिए मैन बुकर और अमेरिका के नेशनल बुक अवॉर्ड के लिए नामित किया गया है. द लोलैंड 1960 के दशक में कोलकाता में रहने वाले दो भाइयों सुभाष और उदयन की कहानी पर आधारित है, जो नक्सली आंदोलन से प्रभावित होकर राजनीति में सक्रिय होते हैं. अप्रवासी भारतीयों को अपने लेखन का विषय बनाकर कहानियां रचने वाली झुंपा लाह़िडी ने इस बार एकदम अलग विषय चुना है.

JPBOOKLAHIRI-popupभारतीय मूल की लेखिका झुंपा लाह़िडी एक बार फिर चर्चा में हैं. पुलित्ज़र पुरस्कार विजेता इस लेखिका को उनके नये उपन्यास द लोलैंड के लिए अमेरिका नेशनल बुक अवॉर्ड के लिए उपन्यास श्रेणी में नामित किया गया है. इसके अलावा इसी उपन्यास के लिए उन्हें प्रतिष्ठित मैन बुकर पुरस्कार के लिए भी नामित किया गया है. बुकर के लिए लाह़िडी के अलावा पांच अन्य लेखक दौ़ड में हैं, जिनमें से तीन महिलाएं हैं. इसकी घोषणा 15 अक्टूबर को होनी है. जबकि नेशनल बुक अवॉर्ड की दौ़ड में लाह़िडी के द लोलैंड के साथ टॉम ड्रूरी का पेसिफिक, एलिजावेथ ग्रैवर्स का द एंड ऑफ द प्वाइंट और रचेल कुशनर का द फ्लेमथ्रोअर्स भी है. नेशलन बुक फाउंडेशन की ओर से कहा गया है कि अंतिम दौर में पहुंचने वाले लेखकों के नाम की घोषणा 16 अक्टूबर को होगी और विजेता का नाम 20 अक्टूबर को घोषित किया जाएगा.

द लोलैंड 1960 के दशक में कोलकाता में रहने वाले दो भाइयों सुभाष और उदयन की कहानी पर आधारित है. इस उपन्यास की समीक्षा में न्यूयॉर्क टाइम्स ने लिखा है कि लाह़िडी ने भारतीय अप्रवासियों के अमेरिका में ख़ुद को ढालने की कोशिश की ध्यानपूर्वक प़डताल कर लिखी गई कहानियों से अपनी पहचान बनाई थी. उनका नया उपन्यास द लोलैंड इसके विपरीत आश्‍चर्यजनक रूप से पेश किया पेश किया गया ओपरा है. यह निश्‍चित ही लाह़िडी का सबसे महत्वाकांक्षी कार्य है. उदयन एक आदर्शवादी छात्र है, जो माओ से प्रभावित क्रांतिकारी राजनीति में सक्रिय है. उपन्यास की शुरुआत में ही राजनीतिक हिंसा में उदयन की मौत हो जाती है, जिसके बाद उसका प्रतिबद्ध और कर्त्तव्यनिष्ठ भाई सुभाष उसकी गर्भवती विधवा गौरी से शादी कर लेता है. वह उसे लेकर भारत से अमेरिका जाता है और इस तरह वे नये देश में नई शुरुआत की कोशिश करते हैं. हालांकि, उनकी शादीशुदा जिंदगी उदयन की यादों से प्रभावित होती है. कहानी में यह भी देखने में आता है कि गौरी के भीतर तमाम भयावह रहस्य जज्ब हैं. लाह़िडी की सबसे ब़डी ख़ासियत यह है कि वे अपने पात्रों की भावुकता और मन:स्थिति को विस्तार से पक़डती हैं और बेहद नाटकीय अंदाज में गद्य रचती चलती हैं.

उदयन प्रेरणा देने वाला भाई है, लेकिन स्वभाव से बाग़ी है. उसके बिना सोचे-समझे निर्णय उसे प्रेम करने वाले हर व्यक्ति को प्रभावित करते हैं. सुभाष स्वभाव से शालीन और तार्किक है जो अपने भाई की करतूतों की वजह आई परेशानियों से ल़डते हुए जीवन का ज़्यादातर हिस्सा बिता देता है. वहीं गौरी एक गुस्सैल और स्वार्थी स्त्री है. सुभाष उसे नई ज़िंदगी देने की कोशिश करता है, लेकिन उसकी उदारता और करुणा के बदले में गौरी उसकी अवहेलना करती है. सुभाष की मां उसे गौरी से शादी करने से रोकते हुए कहती है कि वह उदयन की बीवी है, तुम्हें प्रेम नहीं करेगी और उसका स्वभाव जैसा है, वह एक मां के प्रकृति से बहुत दूर है. बाद में सुभाष की मां की यह बातें सच साबित होती हैं, जब गौरी उदयन से पैदा हुई अपनी बेटी को अपनी दर्शन की प़ढाई और अकादमिक कॅरियर को आगे ब़ढाने के लिए छो़ड देती है, जिसे सुभाष ने उसके साथ मिलकर ब़डे प्रेम से पाला था. कहानी में गौरी का चरित्र बेहद क्रूर रूप में सामने आता है.

द लोलैंड की कहानी के बारे में लाह़िडी कहती हैं कि यह किताब एक बेहद दुखद घटना पर आधारित है. घटना तब की है, जब मैं अपनी किशोरावस्था में थी और पहली बार भारत आई थी. हिंसक राजनीतिक आंदोलन में सक्रिय दो भाइयों को उनके परिजनों के सामने मारा जाता है. इस घटना के बारे में सुनकर मुझे बहुत दुख हुआ, मैं दहल गई और अंतत: इसने मुझे किताब लिखने को प्रेरित किया.

इससे पहले झुंपा लाह़िडी को 2000 में कहानी संग्रह इंटरप्रेटर ऑफ मेलोडीज़ के लिए पुलित्ज़र पुरस्कार दिया गया था. इस पुस्तक के लिए उन्हें पीईएन-हेमिंग्वे अवॉर्ड  भी मिला था. इसमें झुंपा ने अमेरिका में भारतीय अप्रवासियों को विषय बनाया था. यह पुस्तक काफी चर्चित रही थी. 2003 में उनका चर्चित उपन्यास आया द नेमसेक. इसपर फिल्मकार मीरा नायर ने इसी नाम से फिल्म बनाई. इसके अलावा उनका एक अन्य कहानी संग्रह है-अनअकस्टम्ड अर्थ जिसको न्यूयॉर्क टाइम्स बुक रिव्यू में शीर्ष दस पुस्तकों में जगह दी गई थी. 46 वर्षीय झुंपा लाह़िडी लंदन में जन्मी हैं और न्यूयॉर्क के ब्रूकलिन में रहती हैं. उनके माता पिता कोलकाता से लंदन जाकर बस गए थे. झुंपा लाहिडी अप्रवासियों को लेकर किए गए अपने लेखन को लेकर जानी जाती हैं, हालांकि, द लोलैंड की कहानी में उन्होंने अपनी इस पहचान को तो़डकर भारत की उत्तर उपनिवेशवादी राजनीति और समाज को विषय बनाया है. द लोलैंड की कहानी के बारे में लाह़िडी कहती हैं कि यह किताब एक बेहद दुखद घटना पर आधारित है. घटना तब की है जब मैं अपनी किशोरावस्था में थी और पहली बार भारत आई थी. हिंसक राजनीतिक आंदोलन में सक्रिय दो भाइयों को उनके परिजनों के सामने मारा जाता है. वे कहती हैं कि इस घटना के बारे में सुनकर मुझे बहुत दुख हुआ, मैं दहल गई और अंतत: इसने मुझे किताब लिखने को प्रेरित किया. हालांकि, अपने उपन्यास में उन्होंने घटना को जस का तस न लिखकर उसमें फेरबदल भी किया है. बकौल लाह़िडी, मैंने सोचा कि यह बहुत ही दिलचस्प होगा कि दो भाइयों में विरोधाभास पैदा किया जाए, एक राजनीति में सक्रिय है और दूसरा उससे दूर है. मेरा ख्याल था कि यह दोनों भाइयों में स्वाभाविक द्बंद्ब पैदा करेगा.

बहरहाल, झुंपा लाह़िडी अपनी इस किताब को लेकर चर्चा में हैं और दो-दो पुरस्कारों के लिए नामित हो चुकी हैं. उम्मीद की जानी चाहिए कि जल्द ही मैन बुकर और यूएस नेशनल बुक अवॉर्ड झुंपा लाह़िडी की झोली में होंगे.

 

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