ध्यान द्वारा सत्य का अनुभव

परिस्थिति का इलाज प्राणायाम में सांस लेने (पूरक) तथा छोड़ने (रेचक) की अपेक्षा कुम्भक( जब सांस रुकी हुई होती है) का योगाशास्त्र में अधिक महत्व है.dhyan इस कुम्भक के भी तीन प्रकार हैं-आंतर्कुम्भक (सांस अंदर लेने के बाद का समय) वाह्य कुम्भक ( सांस छोड़ने के बाद का समय) व कैवल्य कुम्भक (अपने आप होने वाला कैवल्य कुम्भक) कैवल्य कुम्भक किया नहीं जा सकता. वह यदि हुआ तो अपने आप ही कभी होगा. बाह्य कुम्भक अभी मैं ठीक तरह से नहीं कर पाता हूं. दम घुटने लगता है, लेकिन आंतर्कुम्भक (सांस अंदर लेकर कुछ समय उसे वहीं रहने देना व स्थिर रहना) सध गया है. कई दिनों से धीरे-धीरे सध रहा था. आज सांस अंदर लेने के बाद आंतर्कुम्भक के कुछ क्षणों के काल में अचानक मन शांत प्रतीत हुआ. मन का आकाश निस्तब्ध, निर्विचार हो गया था. एक पंक्षी पंख पसारकर ऊंचे आकाश में स्थिर होकर तैरे, वैसे ही अस्तित्व की मात्र एक अनुभूति तरंगित हो रही थी. कहीं कोई गड़बड़ी-हड़बड़ी न थी. असीम शांति भर गई थी. प्रत्येक सांस के बांद दस-बारह क्षणों का यह शांति का अनुभव एकदम भिन्न था. कुम्भक का महत्व अब कुछ-कुछ समझ में आ रहा था.

कुम्भक से कुछ क्षणों की शांति मिलती, लेकिन टिकटी नहीं थी. मन में सतत् चमकने वाले विचारों से यह मौन की धारा बारंबार खंडित हो जाती थी. कभी विचार, तो कभी केवल शब्द. हवा के साथ कागज के टुकड़ों जैसे उड़नेवाले शब्द. उनके मन में सतत् कोलाहल चलता रहता. ये ही मन को शांत नहीं रहने देते, यह बात मेरी समझ में आने लगी. ये विचार, ये शब्द क्यों आते हैं? मुझे दिखाई दिया कि मेरे न बुलाने पर भी, आवश्यकता न होने पर भी, वे स्वयं अपनी गति से आ धमकते हैं. थोड़ी सी भी शांति हुई नहीं कि विचारों के बुलबुले तुरंत ऊपर आ जाते हैं. विचार-असंगत, निरर्थक विचार, थका डालने वाले, त्रस्त कर देने वाले विचार. अनेक बार तो सार्वजनिक लाउडस्पीकर की भांति दो-दो विचार एक साथ आ धमकते. विचारों का शोर ही शोर. मन में यह चक्की सतत् चलती ही रहती. मेरे मन को शब्दों की चक्की पीसने की आदत हो गई थी. मजबूत पक्की आदत.

इन विचारों की वजह से मेरी एकाग्रता भंग होती थी. इतना ही नहीं. मैं उस क्षण के अवधान से ढल जाता था. मैं ध्यान द्वारा सत्य का अनुभव करना चाहता था, लेकिन अनुभव की बजाय ये विचार ही चित्त को व्याप्त कर रहे थे और ये विचार सत्य नहीं थे. सत्य का अनुभव व्यक्त करने के लिए शब्दों के प्रतीकों के बुलबुले  किसी ने बनाए थे. ये सत्य के सबस्टीटयूट थे. नकली माल. भस्मासुर की तरह वह मुझ पर उलट पड़े थे. सारे मन को व्याप कर, वे मुझे सत्य के अनुभव से वंचित कर रहे थे. अनुभव को जीने की बजाय उस अनुभव को शब्दों का रूप देने की इतनी ललक मुझे क्यों है? बहुत दिन हुए एक उपन्यास पढ़ा था. उस उपन्यास में एक पात्र कहता है. मेरे अंदर का लेखक क्षणभर के लिए भी मुझे अकेला नहीं छोड़ता. सतत् मेरी गर्दन पर बैठकर मुझे यंत्रणा देता है. यह अनुभव मैं कैसे लिखूंगा? यही विचार मुझे सताता रहता है. मेरा इकलौता लड़का मर गया. उसका शव चिता पर रखकर अग्नि देते समय भी मेरे मन में विचार आया-यह दुख अब मैं किस तरह अभिव्यक्त करूंगा? मैं अपने अंदर झाकने लगा. किसी अन्य की तो बात ही छोड़िए. एंजिओप्लास्टी टेबल पर मौत के मुंह में पहुंचने पर भी उस अनुभव को अणुविसर्जन यह नाम मैंने दे ही दिया था. अब याद आया कि 18 अप्रैल को सीने में दर्द उठने पर शोध ग्राम में स्वयं का ईसीजी जब देख रहा था, तब एक ओर अपने हार्टअटैक की चिंता सता रही थी, लेकिन दूसरी ओर विचार भी चल रहे थे. अपनी भी क्या हालत है, स्वयं का हार्टअटैक स्वयं ही देखना पड़ रहा है. यह तो उस रसियन सर्जन जैसी हालत हो गई. उत्तर ध्रुवीय बर्फीले प्रदेश में अकेला होते हुए अपेंडसायटिस का दौरा पड़ने पर अपनी जान बचाने के लिए एक रसियन सर्जन को खुद अपने पेट का ऑपरेशन आईने में देखकर करना पड़ा था. अपनी हालत उस सर्जन जैसी. मन में वाक्य उठा था. मृत्यु की छाया में भी शब्दांकन की यह आदत पीछा नहीं छोड़ रही थी. अनुभव हुआ नहीं कि तुरंत उसके बाद उठते शब्दों के बुलबुले. हर अनुभव को विचारों के रूप में संगठित करने का पागलपन ही मेरे मन पर सवार था. विचार यह जैसे मेरे मन का कैंसर था. लगातार पीड़ा देने वाला, जीवन रस चूसने वाला परोपजीवी. फिर समझ में आया-अरे मन यानी और कुछ नहीं. ये संबद्ध-असंबद्ध विचारों की सतत् चलने वाली अव्यवस्था-यही मन है. विचार व उसके पीछे उठने वाली प्रतिक्रियाएं, यही मेरा मन है. वह मुझे सतत् व्यस्त रखता है, पीड़ा देता है. यह मेरी अशांति की जड़ है. मुझे मिलने वाले प्रत्येक क्षण को यह मन निगल लेता है. यह क्षण सत्य है, इस क्षण का अनुभव सत्य है, लेकिन मैं उसे कहां जी रहा हूं? मैं तो सतत् उस क्षण के संबंध में उठनेवाली शाब्दिक प्रतिक्रियाओं में जी रहा हूं. जी रहा हूं? कि जीवन व्यर्थ कर रहा हूं? इन विचारों को शांत करने के अलावा और कोई उपाय नहीं है. ध्यान से ये विचार शांत होंगे क्या? शांत होंगे तो आखिर कैसे?

सच पूछो तो ध्यान बुद्धि का क्षेत्र नहीं है, लेकिन मेरी बुद्धि शांत बैठती ही नहीं थी. ध्यान को वह अपने तरीके से समझने का प्रयत्न कर रही थी. धीरे-धीरे योगशास्त्र एवं आधुनिक मनोविज्ञान की कुछ बातों में समानता नजर आने लगी. एल्बर्ट एलिस नामक विश्‍व प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक द्वारा विकसित की गई रेशनल इमोटिव थैरपी (आर.ई.टी) नामक उपचार-पद्धति के विषय में पढ़ा. इसके अनुसार हमारी भावनाओं एवं मूड्स को आकार देने का मुख्य कार्य हमारे मन के विचार ही करते हैं. ये विचार माने अपने से ही बातचीत अर्थात सेल्फ टॉक होती है. अपना यह सेल्फ टॉक ध्यान से सुना जाए और उसे सही तरीके से बदला जाए तो मन की भावनात्मक प्रतिक्रिया भी बदलने लगती है. बड़ी मजेदार बात है. मन के पेटेंट वाक्य (जैसे-मेरा भाग्य ही खराब है, मैं कुछ नहीं कर सकता) बोल-बोलकर हम स्वयं ही अपनी भावना गढ़ते रहते हैं. ये वाक्य सुनेंगे तो समझने लगेंगे कि भावनाएं किस प्रकार गढ़ी जाती हैं. वाक्य बदलिए तो भावनाएं भी बदल जाएंगी.

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