परिस्थिति का इलाज

देश ने यह दिशा छोड़ दी. इसीलिए वह आज समस्याओं का एक जंगल बन गया है. हर आदमी एक या दूसरी समस्या  से घिरा होकर परेशान है. अलग-अलग समस्याओं से लड़ने की कोशिश में लोग हताश हो जाते हैं, टूट जाते हैं या फिर परिस्थिति से समझौता कर लेते हैं, क्योंकि समस्याएं वास्तव में अलग-अलग हैं नहीं, वे मौजूदा व्यवस्था और मूल्यों की गिरावट के परिणाम हैं.

गांधी ने कहा था कि आज़ादी नीचे से शुरू होनी चाहिए. हर गांव में प्रजातंत्र या पंचायत का राज होगा. उसके पास पूरी सत्ता और ताकत होगी. इसका मतलब यह है कि हर गांव को अपने पांवों पर खड़ा होना होगा, अपनी जरूरतें खुद पूरी कर लेनी होंगी, ताकि वह अपना सारा कारोबार खुद चला सके. सच्चा स्वराज्य थोड़े से लोगों द्वारा सत्ता प्राप्त कर लेने से हासिल नहीं होगा, बल्कि तब होगा, जब हर व्यक्ति में सत्ता के दुरुपयोग का प्रतिकार करने की क्षमता आ जाएगी.

देश ने यह दिशा छोड़ दी, इसीलिए वह आज समस्याओं का एक जंगल बन गया है. हर आदमी एक या दूसरी समस्या से घिरा होकर परेशान है. अलग-अलग समस्याओं से लड़ने की कोशिश में लोग हताश हो जाते हैं, टूट जाते हैं या फिर परिस्थितियों से समझौता कर लेते हैं, क्योंकि समस्याएं वास्तव में अलग-अलग हैं नहीं, वे मौजूदा व्यवस्था और मूल्यों की गिरावट के परिणाम हैं.

इस अंधकार में भी आज कई जगह परिवर्तन की आकांक्षा से प्रेरित अनेक नि:स्वार्थी व्यक्ति परिस्थिति से जूझ रहे हैं, यह आशा का चिन्ह है. पर आज की परिस्थिति की पुकार है कि ये सब शक्तियां संगठित हों. अलग-अलग समस्याओं या प्रश्‍नों पर शक्ति लगाना अब कारगर नहीं होगा. मौजूदा व्यवस्था का आमूल बदलकर एक स्वावलंबी, विकेंद्रित और शोषणरहित व्यवस्था के निर्माण के लिए जनता तैयार हो, यही आज की परिस्थिति का इलाज और उसकी मांग है. ऐसा करना आज आदर्श का सवाल नहीं है, अस्तित्व बचाने का धर्म है. एक-एक दिन जो बीत रहा है, वह इस संकट को और अधिक गहरा तथा लाइलाज बनाता जा रहा है, क्योंकि मौजूदा व्यवस्था में जिनका निहित स्वार्थ है, वे इस बीच अपना शिकंजा और मजबूत करते जा रहे हैं.

अत: नई व्यवस्था के निर्माण के लिए अपनी प्रतिबद्धता प्रकट करते हुए हम राष्ट्र को नीचे लिखी दिशा में बढ़ने का निवेदन करते हैं.

1-नागरिक-अधिकार, व्यक्ति स्वातंत्र्य, प्रेस तथा न्यायपालिका की स्वतंत्रता स्वस्थ लोकतंत्र की बुनियाद है. इनका सतत विस्तार होना चाहिए. इन्हें कुंठित करने वाली सभी गतिविधियों का सजग होकर प्रतिकार करना चाहिए.

2– अपना कारोबार खुद चलाना हर गांव का जन्मसिद्ध अधिकार है. अत: गांव के अंर्तगत आने वाली जमीन, जंगल आदि को व्यवस्था, गांव के झगड़ों का गांव में निबटारा, सफाई, कंपोस्ट, साक्षरता, व्यसन-मुक्ति आदि रचनात्मक काम ग्राम स्तरीय सरकारी कर्मचारियों पर देख-रेख तथा नियंत्रण आदि के काम ग्रामसभाएं अपने हाथ में लें. ग्रामसभा के अंतर्गत गांव के कमजोर तबकों को सशक्त करने का अभिक्रम हाथ में लिया जाना चाहिए, ताकि ग्राम-सभा में व अन्य स्वायत्त संस्थाओं में उनकी पूरी भागीदारी बने. गांव की तरह नगरों और कस्बों की जनता भी मुहल्ले-मुहल्ले में संगठित होकर यथासंभव अपनी व्यवस्था संभालने की ओर बढ़े.

3-जमीन पर गैर-हाजिर मालिकी समाप्त होनी चाहिए और जमीन जोतने वाले की होनी चाहिए. गाय-बैल खेती तथा ग्रामीण अर्थ-व्यवस्था के अपरिहार्य आधार हैं. उनकी हर तरह से रक्षा और संवर्द्धन होना चाहिए. किसानों को अपनी उपज का वाजिब दाम और खेतिहर मजदूरों तथा कारीगरों को उनके काम की उचित मजदूरी मिले, साथ ही उपभोक्ताओं को भी उचित मुल्य शुद्ध चीजें मिले, इसके लिए कदम उठाने चाहिए. बेकारी निवारण, स्वावलंबन, तथा अंत्योदय की दृष्टि से गांव की योजना गांव में बननी चाहिए. गांव में घरेलू व ग्रामीण उद्योग प्रारंभ करने चाहिए और ग्रामकोश इक्ट्ठा करना चाहिए. जो चीजें गांव में छोटे उद्योगों द्वारा बन सकती हैं, उन्हें केंद्रित उद्योगों द्वारा बनाए जाने पर प्रतिबंध लगाना चाहिए. आर्थिक शोषण से बचने के लिए, ग्रामद्योगों से होड़ करने वाली केंद्रित उद्योग से बनी वस्तुओं का बहिष्कार करना चाहिए और गांधी जी की कल्पना के अनुसार स्वदेशी पर जोर देना चाहिए.

4– आजादी के बाद भी बड़े उद्योगों के हित में ग्रामीण क्षेत्र की उपेक्षा करके योजनाएं बनाई गईं. उनकी जगह सामान्य जन के हित, पर्यावरण के संतुलन व आगे आनेवाली पी़िढयों के हितों को ध्यान में रखते हुए योजनाएं बननी चाहिए. राष्ट्रीय योजना में आम आदमी की जरूरतों की पूर्ति को प्राथमिकता दी जाय तथा भोगवादी संस्कृति को बढ़ावा देने वाली विलास की वस्तुओं के उत्पादन व आयात पर रोक लगाई जाय. बड़े पैमाने के उद्योग-व्यवस्था की मालिकी और प्रबंध समाज, यानी उन उद्योगों में काम करने वाले कच्चे माल के उत्पादकों, उपभोक्ताओं, स्थानीय समाज तथा राज्य के प्रतिनिधियों के हाथ में होना चाहिए.

5– गांव के बाद जिला, प्रदेश या केंद्रीय स्तर पर जो सरकारें होंगी, उन पर तथा जनप्रतिनिधियों पर जनता का प्रभावकारी नियंत्रण रह सके, इसके लिए हर स्तर पर लोक-समितियां बनाई जाएं. लोकसभा, विधानसभा आदि हर स्तर की प्रतिनिधिक संस्थाओं में उनके क्षेत्र का प्रतिनिधि कौन हो, यह संबंधित मतदाता स्वयं संगठित होकर तय करें. लोकप्रतिनिध की पहली जिम्मेदारी मतदाताओं के प्रति हो, पार्टी के प्रति नहीं. चुनाव निष्पक्ष और स्वतंत्र हो सके, इसके लिए चुनाव के कानून और नियमों में सुधार तथा दल-बदल का कानून बनाने के लिए जनता को दबाव लाना चाहिए. राजनीतिक दल खुद भी इस बारे में आचार संहिता बनाकर उसका कड़ाई से पालन करें. राजनीतिक दल रजिस्टर्ड होने चाहिए. उनके हिसाबों की विधिवत जांच होनी चाहिए और उनका सार्वजनिक प्रकाशन होना चाहिए.

6– संविधान के निर्देश के अनुसार शराबबंदी के लक्ष्य को ध्यान में रखते हुए शराब के उत्पादन व बिक्री पर कड़ा नियंत्रण होना चाहिए. उसे सरकारी आमदनी का जरिया हर्गिज न बनाया जाय. पीने वालों को समझाकर उनकी आदत छुड़ाने तथा गांव व मुहल्ले को शराब-मुक्त करने के लिए पहल करनी चाहिए.

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