विदेशी दौरे और असफल विदेश नीति

मनमोहन सिंह बतौर प्रधानमंत्री दस साल का कार्यकाल पूरा करने जा रहे हैं. पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और इंदिरा गांधी के बाद, वे तीसरे ऐसे प्रधानमंत्री हैं, जो सबसे ज्यादा कार्यकाल तक इस पद पर बने हुए हैं. बहुत संभावना है कि मनमोहन सिंह आगामी लोकसभा चुनाव के बाद अपनी कुर्सी से हट जाएं. ऐसे में यह ज़रूरी हो जाता है कि उनकी उपलब्धियों और असफलताओं पर बहस हो और देश को उन्होंने बतौर प्रधानमंत्री क्या दिया और किन अवसरों, उपलब्धियों और प्रगतिमार्गों से वंचित रखा, इसकी सघन प़डताल हो. हाल ही में सूचना के अधिकार के तहत मांगी गई जानकारी से पता चला है कि इस पूरे कार्यकाल के दौरान उनकी विदेश यात्राओं पर 642 करो़ड रुपये से अधिक ख़र्च हो गए. ऐसे में यह सवाल उठता है कि इन दौरों का हासिल क्या रहा?manmohan

इतिहास किसी को भी उसकी सार्वजनिक उपलब्धियों और असफलताओं के आधार पर ख़ुद में जगह देता है. किसी भी व्यक्ति को इतिहास इसी आधार पर परखता है कि देश और समाज के प्रति उसका अवदान कितना ब़डा है. यह ज़रूरी नहीं है कि कोई नेता अथवा प्रशासक अगर लंबे समय तक शासन करता है तो वह देश की महान विभूतियों में गिना ही जाए. आज का दौर ही ऐसा है कि इस दौर में दुनिया बुरी तरह बाज़ारवाद की चपेट में है. और शायद यह ऐसी आंधी है, जिससे बचने का विकल्प किसी भी देश के पास नहीं दिखता. इसका नतीजा यह है कि जनता की सरकारें जनता की जेब से पैसे निकाल कर बाज़ार के हवाले कर रही हैं. बाज़ार का मतलब है कुछ पूंजीपति और भ्रष्ट नेता. यह एक तरह की सरकारी लूट है, जिसे अलग-अलग तरीके से अंजाम दिया जा सकता है. सरकारी नीतियों की समीक्षा के क्रम में निगाह डालने पर आप पाएंगे कि विभिन्न रास्तों से जनता का पैसा कैसे पानी की तरह बह रहा है, जबकि जन सामान्य महंगाई और ग़रीबी से जूझ रहा है. ज़ाहिर तौर पर ये परेशानियां आम जनता को सरकारी नीतियों की ख़ामियों की वजह से मिली हैं. अब जब प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह अपने दूसरे कार्यकाल के आख़िरी दौर में हैं, यह ज़रूरी है कि भारतीय राजनीति को उनके अवदान, उनकी उपलब्धियों और असफलताओं पर चर्चा की जाए.

हाल ही में सूचना के अधिकार के तहत मांगी गई जानकारी के तहत प्रधानमंत्री कार्यालय ने जानकारी सार्वजनिक की कि पिछले नौ साल में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के विदेश दौरों पर 642 करोड़ रुपये से ज्यादा ख़र्च हुए हैं. ध्यान देने की बात यह है कि प्रधानमंत्री कार्यालय मनमोहन सिंह के 5 विदेशी दौरों का हिसाब नहीं दे सका. प्रधानमंत्री की विदेश यात्राओं के कुल हिसाब-किताब में सामने आया है कि उन्होंने नौ साल में 67 विदेश यात्राएं कीं. इनमें से 62 यात्राओं में 642 करोड़ रुपये से ज्यादा का ख़र्च आया और 5 यात्राओं कोई हिसाब नहीं है. प्रधानमंत्री कार्यालय में इसका कोई लेखा-जोखा नहीं मिल सका.

विदेश यात्राओं का कीर्तिमान  बताया जाता है कि प्रधानमंत्री डॉक्टर मनमोहन सिंह को ज्यादा यात्रा करना पसंद नहीं है. वे कभी रात में हवाई यात्रा नहीं करते. यात्रा के दौरान वे पढ़ना पसंद करते हैं. मनमोहन सिंह ज्यादा खाना भी नहीं खाते. ज्यादा यात्राएं पसंद न होने के बावजूद मनमोहन सिंह ने विदेश यात्राओं का रिकॉर्ड बनाया है. विदेश यात्राओं को लेकर डॉक्टर सिंह अटल बिहारी वाजपेयी और अन्य पूर्व प्रधानमंत्रियों से आगे निकल गए हैं. इसी के चलते उन्हें अनिवासी प्रधानमंत्री का ख़िताब भी मिल गया है. 2004 में प्रधानमंत्री बनने के बाद से वे अबतक 70 विदेशी यात्राएं कर चुके हैं और उन पर क़रीब 642 करोड़ रुपये ख़र्च हो चुके हैं. अपने दूसरे कार्यकाल में वे 37 विदेश यात्राएं पूरी कर चुके हैं. इनमें से वे 15 बार तब विदेश यात्रा पर गए थे, जब संसद का कोई न कोई सत्र चल रहा था. पिछले चार सालों में मनमोहन सिंह 14 में से 9 संसद सत्रों के दौरान थोड़े या ज्यादा दिन देश से बाहर रहे. मुख्य विपक्षी पार्टी भाजपा का आरोप है कि संसद सत्र के दौरान प्रधानमंत्री ने विदेश यात्राओं पर जाकर संसदीय परंपरा को तोड़ा है. इसके पूर्व कभी भी प्रधानमंत्रियों ने संसद सत्र के दौरान विदेश यात्रा नहीं की. चाहे वे जवाहर लाल नेहरू हों, इंदिरा गांधी हों या अटल बिहारी वाजपेयी. आम चुनाव होने से पहले प्रधानमंत्री संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) समेत कई देशों की यात्रा पर जाने वाले हैं. प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के मुकाबले पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी (1999-2004) अपने कार्यकाल में 35 विदेश यात्राओं पर गए थे, जिनपर 185 करोड़ रुपये ख़र्च हुए थे. अपने दो कार्यकाल के दौरान प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह सबसे ज्यादा यानी 10 बार अमेरिका की यात्रा पर गए. अमेरिका के बाद दूसरा नंबर रूस का आता है. उन्होंने नौ बार रूस की यात्रा की. हालांकि, मनमोहन सिंह भारत के पड़ोसी देशों की यात्रा पर कम ही गए, जिसकी शायद ज्यादा ज़रूरत थी.

मनमोहन सिंह 2004 में प्रधानमंत्री की कुर्सी संभाली थी. तब से अब तक क़रीब नौ साल हो चुके हैं और इस बीच उन्होंने 67 विदेशी दौरे किए. प्रधानमंत्री कार्यालय की ओर से बताया गया कि उनकी हवाई यात्रा पर कुल 642.45 करोड़ रुपये खर्च हुए हैं, जिनमें से पांच यात्राओं का हिसाब नहीं है. मनमोहन सिंह 2012 में जी-20 शिखर सम्मेलन के लिए मैक्सिको, और रियो प्लस-20 शिखर सम्मेलन के लिए ब्राजील गए थे. उनके इस सात दिवसीय दौरे पर सबसे ज्यादा 26.94 करोड़ रुपये खर्च हुए. 2010 में प्रधानमंत्री परमाणु सुरक्षा सम्मेलन, ब्रिक सम्मेलन और इब्सा सम्मेलन में भाग लेने के लिए अमेरिका के वॉशिंगटन डीसी और ब्राजील गए थे. इस दौरे की हवाई यात्रा पर 22.70 करोड़ रुपये खर्च

हुए थे.

दरअसल, हाल ही में केंद्रीय सूचना आयोग ने मंत्रिमंडल सचिवालय को आदेश दिया था कि व्यापक जनहित के मद्देनज़र मंत्रियों और वीवीआईपी की यात्राओं पर हुए ख़र्च का ब्यौरा सार्वजनिक किया जाए. मुख्य सूचना आयुक्त सत्यानंद मिश्र का कहना था कि देखने में आया है कि राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति और प्रधानमंत्री जैसी हस्तियों की यात्राओं को लेकर लोगों की गहरी दिलचस्पी रहती है. आरटीआई आवेदनों के ज़रिए अक्सर इन दौरों के बारे में लोग जानकारी मांगते हैं. आयोग ने सामान्य जन की इस दिलचस्पी को जनहित में माना और तमाम रसूख़दार हस्तियों के दौरों का ख़र्च सार्वजनिक करने का आदेश दिया. लोकतंत्र के लिहाज से इसे अच्छी पहल माना जा रहा है. चूंकि,

नेताओं पर हो रहा सरकारी ख़र्च जनता का पैसा है, इसलिए जनता को यह जानने का अधिकार है कि कहां पर कितना ख़र्च किया जा रहा है.

पूर्व राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल के भी दौरों की जानकारी सामने आने के बाद दौरों पर हो रही फिजूलख़र्ची की चर्चा गर्म हुई थी. अब दूसरे अतिविशिष्ट लोगों के बारे में जानकारियां सामने आ रही हैं. प्रतिभा पाटिल के बारे में भी आरटीआई के तहत मांगी गई जानकारी से ही उनके विदेशी दौरों पर हुए ख़र्च का ख़ुलासा हुआ था. पूर्व राष्ट्रपति के पांच साल के कार्यकाल के दौरान विदेशी दौरों पर 223 करोड़ रुपये ख़र्च हुए थे.

सवाल यह नहीं है कि प्रधानमंत्री के दौरे पर कितने रुपये ख़र्च हुए. सवाल यह है कि इन भारी-भरकम ख़र्चों से हासिल क्या हुआ? हाल के वर्षों में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने जितने विदेशी दौरे किए हैं, उनमें किसी भी दौरे को लेकर बेहतर विदेश नीति के लिए उनकी तारीफ़ होने के बजाय उनकी आलोचना ही हुई है. उनके विदेशी दौरों से भारत को राजनीतिक तौर पर कुछ ख़ास फ़ायदे नहीं हुए.

सितंबर में प्रधानमंत्री ने अमेरिका का दौरा किया और वहां पाकिस्तान को आतंकवाद का केंद्र बताया था, लेकिन उनकी अमेरिका यात्रा के दौरान राष्ट्रपति बराक ओबामा से हुई उनकी मुलाकात औपचारिकता मात्र थी. अमेरिकी राष्ट्रपति ने उनका गर्मजोशी से स्वागत तो किया, लेकिन उनके ठीक बाद पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ़ से ओबामा ने अफगानिस्तान से अमेरिकी फौज़ को सुरक्षित निकालने में मदद के बदले पाकिस्तान को रणनीतिक और आर्थिक मदद का वादा किया. शरीफ और ओबामा ने संयुक्त वक्तव्य में भारत को बचपना छा़ेडने और कश्मीर पर बात करने की नसीहत दे डाली. पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ़ से भी उनकी मुलाक़ात हुई, लेकिन इस मुलाक़ात से आतंकवाद की समस्या पर भी कोई हल नहीं निकला.

जिस दौरान नवाज शरीफ़ अमेरिकी दौरे पर थे, मनमोहन सिंह पहले मॉस्को गए और फिर बीजिंग. उसी दौरान जसवंत सिंह की एक क़िताब चर्चा में थी-इंडिया एट रिस्क: मिस्टेक्स, मिसकॉन्सेप्शन ऑर मिसएडवेंचर ऑफ सिक्योरिटी पॉलिसी. जसवंत सिंह अपनी किताब में कहते हैं कि भारत ख़तरे में है, क्योंकि इसने कभी भी रणनीतिक संस्कृति का विकास नहीं किया. यह सही भी है कि पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के समय से ही भारत पाकिस्तान और चीन से मात खाता रहा है और आजतक रणनीतिक स्तर पर उससे निपटने तौर-तरी़के हम विकसित नहीं कर सके हैं. नेहरू ने शांति के जिन उच्च विचारों से प्रेरित होकर पाकिस्तान और चीन से निपटने की कोशिश की, उसी के चलते मात खा गए.

आज पाकिस्तान रणनीतिक स्तर पर भारत से ज्यादा मज़बूत स्थिति में है. यह ग़ौर करने की बात है कि पिछले छह दशकों से भारत के संबंध पाकिस्तान, चीन, रूस और अमेरिका के साथ अस्थिर ही रहे हैं और मनमोहन सिंह भी इसमें कोई नया अध्याय नहीं जो़ड सके. पिछले एक दशक से पाकिस्तान को लगातार शांति प्रस्ताव देने के बदले भारत को क़ायदे से सकारात्मक जवाब तक नहीं मिल सका है. मिश्र के शर्म अल शेख में पाकिस्तानी प्रधानमंत्री यूसुफ़ रज़ा गिलानी द्बारा मनमोहन सिंह को दी गई पटकनी कौन भूल सकता है, जब पाकिस्तान ने बलूचिस्तान में आतंकवाद के लिए भारत को दोषी ठहरा दिया था.

मनमोहन सिंह कभी भारतीय अर्थव्यवस्था को उबारने वाले बेहतर अर्थशास्त्री के रूप में जाने जाते थे, लेकिन आज वे दस साल से प्रधानमंत्री हैं और चारों तरफ से भयावह असफलताएं उनका पीछा कर रही हैं. एक अर्थशास्त्री और कूटनीतिज्ञ के रूप में उनकी विश्‍वसनीयता पर गंभीर सवाल हैं. अगले कुछ महीनों में चुनाव होने वाले हैं. आगामी चुनाव के मद्देनज़र सरकार का सारा ध्यान वोट बैंक पर है, जिसके चलते विदेश नीति, राजनय और राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे संवेदनशील मुद्दे पीछे छूट गए हैं. सरकार नौ साल तक सत्ता में रहकर जिन मोर्चों पर असफल रही, अब आख़िरी साल में वह उन मोर्चों पर कुछ ख़ास कर पाएगी, ऐसी आशा करना कतई बेमानी है.

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