राजनीति

राजनीतिक विकल्प की मुश्किलें : तीसरा मोर्चा और नीतीश की दुविधा

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बात समता पार्टी के दिनों की है. तब नीतीश और उनकी समता पार्टी का बिहार में माले के साथ गठबंधन हुआ था. दोनों ने मिलकर चुनाव भी लड़ा था. छह सीटें हाथ लगी थीं. आशा के अनुरूप फल नहीं मिलने पर उन्होंने 1996 में भाजपा के साथ गठबंधन किया. नीतीश और उनकी पार्टी की विचारधारा का अंदाजा आप इसी से लगा सकते हैं कि कभी एक्सट्रीम लेफ्ट के साथ गलबहियां कर रहे नीतीश अचानक से एक्सट्रीम राइट के साथ चले गए. दोनों के ही साथ उन्होंने निभाया भी लंबे समय तक. अब अलग हुए हैं तो छाती पीट-पीटकर एक-दूसरे को कोस भी रहे हैं. दोनों एक-दूसरे को विश्‍वासघाती बताने पर तुले हुए हैं, लेकिन इन सब उठापटक के बीच नीतीश के साथ अब दूसरी समस्याएं आ खड़ी हुई हैं.

अब जब नीतीश अलग हो चुके हैं तो वह अपनी सेक्युलर छवि को और दुरुस्त करने की फिराक में लगे हुए हैं. और यह भी सच है कि नीतीश अब राष्ट्रीय राजनीति में अलग-थलग पड़े हुए नेता हैं. एक चिंता जो उन्हें खाए जा रही है कि अब उनकी छवि को राष्ट्रीय स्तर पर प्रचारित करने वाला कोई बड़ा दल उनके पास नहीं है. दूसरी उहापोह कि स्थिति यह है कि अब वे किस आधार पर लोकसभा चुनाव में वोट मांगेंगे. किसके लिए लोकसभा की राजनीति करेंगे और किसके बदौलत करेंगे. इसी का नतीजा है कि वे वाम दलों के कन्वेंशन में शामिल होने दिल्ली भी जा रहे हैं. हालांकि, राजनीतिक प्रेक्षकों का मानना है कि यह नीतीश की मजबूरी भी है. भाजपा से अलग होने के बाद अब उनके सामने कई तरह के संकट एक साथ आ खड़े हुए हैं. पहला यह कि अब उनके पास कैडर की कमी है और दूसरा यह कि अब उन्हें राष्ट्रीय राजनीति में अपने अस्तित्व को भी बचाए रखने में भी मुश्किल आ रही है. यह भारतीय मानसिकता है कि अगर आपको खुद को सेक्युलर साबित करना है तो आपको वामदलों के करीब रहना होगा या फिर यह दिखाना होगा कि आप कांग्रेस के विरोधी नहीं हैं. इसी होड़ में नीतीश फिलहाल दोनों काम कर रहे हैं. नीतीश के करीबी भी मानते हैं कि नीतीश हमेशा अपने विकल्प खुले रखते हैं. यही वजह है कि भाजपा से अलग होने से पहले से ही कांग्रेस की तरफ उनका झुकाव दिखने लगा था. यह देखने को मिला कि भाजपा से अलग होने के बाद जदयू सपा की राह पर ही चल पड़ी. संसद के मानसून सत्र में जदयू सपा की तरह ही बयान और चर्चा में तो केंद्र का विरोध करते नजर आई, लेकिन मतदान में सरकार के सहयोग की राह चुन ली. यह गौर करने की बात है कि भाजपा के साथ रहते हुए जदयू अध्यक्ष शरद यादव ने खाद्य सुरक्षा विधेयक के कुछ प्रावधानों पर कड़ी आपत्ति जताई थी, लेकिन भाजपा से अलग होते ही पार्टी ने अपनी रणनीति बदल ली. दरअसल, गठबंधन की समाप्ति के बाद नीतीश कांग्रेस और वामदल दोनों को तौल रहे हैं, वहीं कांग्रेस के कुछ नेताओं से बातचीत पर लगता है कि कांग्रेस उत्तर प्रदेश की तरह ही राज्य में जदयू और राजद को एक साथ साधे रखने की रणनीति पर काम कर रही है.

नीतीश कांग्रेस को प्राथमिकता देंगे, यह दिखता भी है, लेकिन कांग्रेसी यह मानते हैं कि लालू के साथ बनने और निभने का उनका लंबा अनुभव है. ऐसे में नीतीश दुविधा की स्थिति में हैं. नीतीश ने दूसरे कार्यकाल में आने के बाद विधायक फंड को समाप्त कर दिया था. जदयू के कुछ नेता भी स्वीकारते हैं कि यही वजह है कि आज हमारे पास कार्यकर्ताओं की कमी भी है. पिछले दिनों ही जदयू ने सदस्यता बढ़ाने के लिहाज से पेड़ लगाओ अभियान भी चलाया था, लेकिन यह अभियान भी परवान नहीं चढ़ सका. अभी स्थिति यह है कि उन्हें कैडर क्राइसिस के दौर से गुजरना पड़ रहा है. साथ ही हाल के कुछ घटनाओं के बाद उनके फेस वैल्यू में भी गिरावट आई है. नीतीश इन दोनों मुश्किलों से निकलने के लिए वामदलों को साधना चाह रहे हैं. जदयू के एक सांसद ही कहते हैं कि बिहार में कांग्रेस को खोने के लिए कुछ बचा ही नहीं है और अगर हमारे मुखिया वामदलों से समझौता करते हैं तो उन्हें कम से कम दस जिलों में बढ़त हासिल हो सकती है. यह सच है कि नीतीश अपनी पार्टी के सेनापति भी खुद हैं और राजा भी और ऐसी स्थिति में उन्हें सूबे में राजद और भाजपा दोनों से लड़ना है. एक सीमा के बाद नीतीश भाजपा को कुछ नहीं कह सकते हैं, भले नरेंद्र मोदी के खिलाफ लाख बयानबाजी कर लें. ऐसे में उन्हें एक मजबूत साथी की सख्त आवश्यकता है. कांग्रेस विश्‍वास मत के दौरान नीतीश को समर्थन कर चुकी है, लेकिन नीतीश यह तय नहीं कर पा रहे हैं कि आखिर कांग्रेस में उनकी हैसियत लालू प्रसाद से अधिक होगी या नहीं. सीपीआई ने भी अपने एक विधायक के साथ उनका समर्थन किया ही है और इसमें कोई शक नहीं है कि सीपीआई सूबे में मजबूत पकड़ रखती है. सीपीएम का राज्य में भले ही मजबूत जनाधार नहीं हो, लेकिन एक राष्ट्रीय पार्टी की हैसियत से वह नीतीश की मददगार हो सकती है, लेकिन संशय यह है कि तीसरा मोर्चा बनेगा या नहीं. तीसरे मोर्चे की कल्पना वामदलों के बगैर नहीं की जा सकती है और वामदलों के शामिल होते ही ममता बनर्जी का बिदकना तय है. इसके बाद भी समस्या यह है कि कोई भी क्षेत्रीय क्षत्रप आसानी से किसी को अपना नेता स्वीकार नहीं करेगा. राजनीतिक विश्‍लेषक महेंद्र सुमन कहते हैं कि अल्पसंख्यक वोट के लिए भाजपा से अलग हो जाना ही काफी नहीं है. लालू कांग्रेस को बिना शर्त ही समर्थन करने को तैयार हैं, जो नीतीश से नहीं होगा, तो दिक्कत नीतीश के साथ है कि वे थर्ड फ्रंट में तो तब जाएंगे, जब बनेगा. अभी तो उसकी संभावना ही क्षीण है. यही वजह है कि नीतीश फिलहाल दो नावों की सवारी कर रहे हैं. वहीं माकपा के भगवान प्रसाद सिन्हा किसी तीसरे मोर्चे की संभावना से ही फिलहाल इन्कार करते हैं. उन्होंने कहा कि तीस अक्टूबर को, जो वाम मोर्चे का कन्वेंशन है, वह किसी तीसरे मोर्चे के गठन की कवायद नहीं है. हमारा कन्वेंशन तमाम धर्मनिरपेक्ष ताकतों को एक साथ लाने की कोशिश मात्र है. उन्होंने स्वीकारा कि तीसरा मोर्चा डिस्के्रडिट हो चुका है और इसके नेताओं ने अपनी साख गवां दी है. यह वामपंथियों के तीसरे विकल्प की राजनीति है. आगे उन्होंने कहा कि हमारी कोशिश है कि हम कांगे्रस की गलत नीतियों के चलते उभर कर आई सांप्रदायिक ताकतों और उसके तथाकथित गुड गवर्नेंस को उजागर किया जाए.

अब नीतीश के साथ समस्या यह है कि क्या वे उस कांग्रेस के साथ जाएंगे, जिनके विरोध की राजनीति करके ही वे यहां तक पहुंचे हैं? और गैर कांग्रेसवाद की परंपरा ही उनकी पहचान रही है. इसके अलावा, जो दूसरा विकल्प है तीसरे मोर्चे के रूप में, उसके बनने से पहले ही उस पर शंकाएं व्यक्त की जा रही हैं. ऐसे तीसरे मोर्चे के अन्य आकांक्षियों के साथ-साथ नीतीश की राह भी कठिन नजर आ रही है.

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