बाबू भाई थीबा :मेहनत से मिला म़ुकाम

बॉलीवुड में आज इंडियन मोशन पिक्चर्स प्रोड्यूसर एसोसिएशन में टीवी के चेयरमैन, टाइटल कमेटी के चेयरमैन और डिस्प्यूट कमेटी के को-कॉन्विनर जैसे मुख्य पदों पर आसीन हैं बाबूभाई थीबा. फिल्म और टेलीविज़न प्रोड्यूसर बाबू भाई ने अपने कॅरियर की शुरुआत मशहूर फिल्म कलाकार विनोद खन्ना के सेक्रेट्री के रूप में की. फिल्म जगत के सबसे बड़े सम्मान दादा साहब फाल्के अवार्ड से सम्मानित बाबू भाई थीबा आज किसी परिचय के मोहताज नहीं.

theebaसेक्रेट्रीशिप आपका शौक है या पेशा ?

मैं एक मिडिल क्लास फैमिली से हूं. शुरुआती दिनों में मैंने ऑल इंडिया रेडियो में नौकरी की. मैं फिल्मस्टार्स का इंटरव्यू करता था. तब उनसे सवाल करता कि आपको कितना पैसा मिलता है. उनका जवाब होता, लाखों रुपये. तब मुझे लगता था कि उनके आई क्यू लेवेल से मेरा आई क्यू लेवेल तो कहीं ज़्यादा है. जबकि मेरी सैलरी सिर्फ 8 हज़ार रुपये हैं. जब मेरे बाल सफ़ेद हो जाएंगे, तब मेरी सैलरी होगी 25 हज़ार रुपये. मुझे लगा कि ईमानदारी और मेहनत के साथ ज्यादा कमाई करनी है तो फिल्म इंडस्ट्री का रुख करना चाहिए.

आप कब मुंबई आए?

मैं वर्ष 1972 में मुंबई आया.

आपने शुरुआत कब की?

मैं जाने माने प्रोड्यूसर मनमोहन देसाई के पास गया और उनसे काम करने की इच्छा जताई. उन्होंने कहा कि यहां अलग तरह की योग्यता चाहिए और वो आपके पास नहीं हैं. बेहतर है आप वापस चले जाएं. मेरे लिए यह चैलेंज था.  एक साल मेहनत करने के बाद मैं मनमोहन देसाई प्रोडक्शन में हेड ऑफ प्रोडक्शन था. यहां मेरी मुलाकात विनोद खन्ना से हुई. तब उनके सेक्रेटरी मुकेश बट्ट थे. मुकेश बीमार थे और उन्हें असिस्टेंट की ज़रूरत थी. उन्होंने मुझे ट्रायल पर रखा. मुकेश के अस्पताल से आने के बाद विनोद खन्ना ने उन्हें कहा कि यह लड़का अच्छा काम करता है. फिर उन्होंने मुझे कंटिन्यू किया. कुछ ही समय बाद बॉलीवुड में जिनके पास अच्छे सेक्रेटरी नहीं थे, उन्हें मेरा नाम सुझाया जाने लगा. फिर मुझे स्टार्स के फोन आने लगे. पहले मेरे पास तीन चार आर्टिस्ट थे. बाद में मेरे पास 15 ऐक्टर्स हो गए. मैं पहला सेक्रेटरी था, जिसने अपना ऑफिस खोला और बहुत सारे लोगों को स्टाफ रखा.

आपने बड़े स्टार्स के  साथ काम किया. क्या आजकल ऐक्टर्स का दखल ज़्यादा बढ़ गए हैं ?

कोई भी इंडस्ट्री डिमांड और सप्लाई पर चलती है. बड़े स्टार, जिनके नाम से फिल्म बिकती है. उन्हें लगता है कि मेरे नाम से फिल्म बिकती है, तो क्यों न अपना प्राइज़ अपने स्टेटस के हिसाब से लूं. पहले के कलाकर अभिनय से दिल से जुड़े होते थे. आज के कलाकर अभिनय को सिर्फ पेशा समझते हैं.

आपने फिल्में भी प्रोड्यूस की हैं. कैसा अनुभव रहा? 

मेरी सारी गुजराती फिल्में सिल्वर जुबली थीं. बढ़िया अनुभव था. पर फिल्म मेकिंग से मुझे खास फायदा नहीं हुआ. हालांकि मैंने लागत वसूल कर ली. यह  समय मुनाफे के लिए अच्छा है. हम हॉलीवुड कि इकोनॉमी के करीब आ गए हैं. इंटरनेशनल फिल्म इंडस्ट्री के भी क़रीब हम पहुंच रहे हैं, यह अच्छी बात है.

आपका फेवरेट ऐक्टर कौन है?

आज के समय में मेरा फेवरेट एक्टर सलमान ख़ान हैं.

आपका फेवरेट डाइरेक्टर कौन है?

मेरे फेवरेट डाइरेक्टर हैं अब्बास मस्तान.

आपके फेवरेट प्रोड्यूसर कौन हैं ?

यश चोपड़ा थे, जिन्होंने बेहतरीन फिल्में दीं.

क्या आप सनी लियोनी के सेके्रटरी बनेंगे ?

प्रिन्सिपली देखा जाए तो, मैं उनके साथ काम ना करूं, लेकिन प्रोफेशनली देखा जाए तो मुझे कोई एतराज़ नहीं है.

बॉलीवुड के इंटरनेशनल बिज़नेस को कैसे देखते हैं?

सिनेमा के इंटरनेशनल बिज़नेस को आप फिल्मों और टेलीविजन के कलेक्शन को देखकर समझ सकते हैं. पहले 100 प्रतिशत में से 80 प्रतिशत कलेक्शन इंडिया से होती थी. 20 प्रतिशत ओवरसीज़ से होती थी. आज सिनेरियो यह हो गया है कि हमारी 50 प्रतिशत इनकम इंडिया से होती है और 50 प्रतिशत ओवरसीज से होती है.

आपकी सेवाओं के लिए फिल्मों के सबसे बड़े सम्मान दादा साहेब फाल्के अवॉर्ड से सम्मानित किया गया है. क्या आप इसके हक़दार हैं ?

अगर भारत सरकार ने मुझे इसका हक़दार समझा है तो इस पर सवाल उठाने वाला मैं कौन हो सकता हूं.

इंडियन मोशन पिक्चर्स प्रोड्यूसर एसोसिएशन में आप टेलीविजन प्रोग्राम्स के चेयरमैन हैं. क्या आप इस जिम्मेदारी को निभा  पाते हैं?

सच कहूं तो मैं पूरी तरह से इस जिम्मेदारी को नहीं निभा पा रहा, लेकिन कोशिश रहती है कि जितना बन पड़े करूं.

इन दिनों किन तरह की परेशानियों का सामना टेलीविजन प्रोड्यूसर्स क़र रहे हैं?

टेलीविजन प्रोड्यूसर्स की सबसे बड़ी समस्या है चैनल का बढ़ता दख़ल. चैनल बड़े से बड़े प्रोड्यूसर को आजादी नहीं देता कि वो अपना क्रिएटिव दिमाग लगा सकें. किसी भी तरह की क्रिएटीवीटी दिखा सकें. अपने हिसाब से आर्टिस्ट ला सकें, सेट्स लगा सकें, शूटिंग कर सकें. खुद टेक्निशियंस चुन सकें. अब प्रोड्यूसर सिर्फ एक्ज़ीक्यूटिव प्रोड्यूसर बन कर रह गया है. चैनल मालिक बस चैनल की नौकरी करते हैं.

इंडियन मोशन पिक्चर्स प्रोड्यूसर असोसिएशन की डिसप्यूट कमेटी के आप को-कॉन्विनर हैं. आप वहां किस तरह के डिसप्यूट फ़ेस करते हैं?

डिसप्यूट कमेटी में तरह तरह के केस आते हैं. फाइनेंसर और प्रोड्यूसर के डिसप्यूट, प्रोड्यूसर और टेक्नीशियन्स के बीच, प्रोड्यूसर और रायटर के बीच, प्रोड्यूसर और म्यूजिक डाइरेक्टर, प्रोड्यूसर और एक्टर्स के बीच. ज्यादातर इसमें पैसे और नाम का झगड़ा होता है. जज की कुर्सी पर बैठ कर हमें दोनों तरफ कि बात सुनकर इंसाफ करना पड़ता है.

क्या आप सेक्रेट्रीशिप को आर्टिस्ट मैनेजमेंट का नाम दे सकते हैं?

ये सभी भविष्य के स्टार्स हैं. इसलिए इन्हें मैं सेलेब्रीटी कहूंगा. इसे मैं मैनेजमेंट सेलेब्रेटी का नाम दूंगा.

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