राष्ट्रीय संकट का निवारण कैसे हो

यह संघर्ष राष्ट्र के वर्तमान संकट से उबरने की अनुक्रिया का एक अविच्छिन्न भाग होगा. यह संघर्ष स्थानीय, क्षेत्रीय अंतरराष्ट्रीय प्रश्‍नों से जुड़ा होगा. यदि स्थानीय संघर्ष समुचित ढंग से चलाया जाए, तो उससे लोगों का मनोबल और आत्मविश्‍वास बढ़ेगा, लेकिन इसके संदर्भ में एक विशेष सावधानी भी रखनी होगी.

राष्ट्रीय संकट के संदर्भ में उत्प्रेरित अनुक्रिया राष्ट्रीय तथा स्थानीय दोनों स्तरों पर सक्रिय होगी. इस मोटे तौर पर निम्नलिखित तीन खंड होंगे.

1-जिसे गांधी जी रचनात्मक प्रवृत्ति कहते थे उसके द्वारा लोगों को सक्रिय बनाना.

2-स्थानीय अथवा राष्ट्रीय प्रश्‍नों पर स्थानीय एवं राष्ट्र स्तरीय प्रतिरोधात्मक आंदोलन करना.

3-राजनीतिक प्रक्रिया में हस्तक्षेप.

राष्ट्रीय अनुबंधनात्मक एकता तथा लोकतंत्री चेतना के बचाव के लिए परिस्थिति की प्रबल मांग है कि विभिन्न जाति, भाषा और संप्रदाय वाले लोग एक-दूसरे के साथ आत्मसम्मान और सौहार्द के साथ जीवन बिताने के अभ्यासी बनें, ताकि आम लोगों के बीच उत्पन्न होने वाली अशांति के लिए राज्य को अपनी सैनिक और पुलिस की सशस्त्र शक्ति का उपयोग करने की आवश्यकता समाप्त हो सके. सामाजिक अथवा व्यवसायिक क्षेत्र में उत्पन्न होने वाले सभी प्रश्‍नों-यथा भेदभाव, उचित मजदूरी की मांग, बंधुआ मजदूर प्रथा, सांप्रदायिक तथा जातिगत तनाव के निराकरण के लिए समझाने-बुझाने अथवा सत्याग्रह का उपाय काम में लाया जाए. गांव और नगर के नागरिक केवल सरकार द्वारा नियुक्त पुलिस अथवा सैन्य बल के भरोसे ही अपना जीवन जी सकें, यह स्थिति बदलनी चाहिए, क्योंकि बिना इसके बदले राष्ट्रीय संकट का स्थायी निवारण हो नहीं सकता.

वस्तुत: इस दिशा में हमारा प्रयास तो और अधिक दूरगामी होना चाहिए. स्थान-स्थान के समूह छोटे-छोटे लोकतंत्री समाज के रूप में एकजुट होकर जीना सीखें, ताकि उनके आधार पर एक विकेन्द्रित समाज-व्यवस्था का रूप निखर सके. इस प्रकार का एक संगठित समूह अपने-आप को अपने बीच के नवोदित गुंडातत्व के चंगुल से भी मुक्त रख सकेगा. अपने क्षेत्र में एक नए ढंग की अर्थव्यवस्था खड़ी करना रचनात्मक कार्य का मुख्य लक्ष्य रहेगा. राष्ट्र से निवेदन में जिस दिशा का संकेत है, उसी की ओर यह प्रयास उन्मुख होना चाहिए. कृषि की ऐसी योजना बनानी होगी कि बाज़ार के साथ उसकी निर्भरता कम हो और वह अधिकाधिक आत्मनिर्भरता की लक्ष्य-पूर्ति में सहायक हो सके. ग्रामीण उद्योग भी खड़े करने होंगे. गांव में रहने वाले लोगों को यह संकल्प लेना होगा कि उनके गांव का कोई भी स्वस्थ आदमी बेरोज़गार नहीं रहेगा, कोई भूखा नहीं होगा और न कोई बिना घर के होगा. यह असंभव नहीं है. कहा जाता है कि चीन के तमाम कम्यून्स (सामुदायिक ग्रामीण समूह) में ऐसा हुआ है.

गांव के लोग बड़े-बड़े उद्योगों द्वारा तैयार की जाने वाली ऐसी चीज़ों के बहिष्कार का भी निर्णय लें सकते हैं जो उनके गांव अथवा पास पड़ोस में तैयार होती हैं. व्यक्तिगत स्तर पर लोग संकल्प पत्र भरकर सामूहिक निर्णय के लिए एक मजबूत आधार तैयार कर सकते हैं. भारत और इंडिया के बीच प्रच्छन्न मुक़ाबले की जो वस्तुस्थिति मौजूद है, उसकी प्रत्यक्ष जानकारी लोगों के सामने अनायास ही उपस्थित होगी, जब वे खेती की उपज का उचित मूल्य तय करते समय खेती में लगने वाली लागत (बीज, उर्बरक, कीटनाशक, बिजली, डीजल आदि के ख़र्च) का हिसाब लगाएंगे और पाएंगे कि इंडिया यानी बड़े-बड़े संगठित उद्योगों वाला क्षेत्र किस प्रकार भारत यानी कृषि क्षेत्र को लगातार चूस रहा है. ऐसे प्रश्‍न और प्रसंग गांव के लोगों को देश की गंभीर समस्याओं से परिचित कराएंगे. वर्तमान संदर्भ में गांव की भूमिका कितनी महत्वपूर्ण है, यह उन्हें समझना होगा. विकेंद्रीकरण के विचार को समझने के साथ-साथ ही उन्हें सबसे अलग-अलग कटकर रहने के ख़तरे से भी बचना होगा. इस प्रकार की जागरूकता का एक राष्ट्र-स्तरीय अभिक्रम भी चलाना होगा. जिसके अंतर्गत सरकार द्वारा लागू होने वाले कार्यक्रम और उसकी पृष्ठभूमि में निहित नीतियों पर निगरानी रखी जाए और कार्यक्रम का जो अंश आम लोगों के हित के विरुद्ध हो, उसके प्रति जनमत तैयार किया जाए. यदि आवश्यक और संभव हो तो उसके विरुद्ध सत्याग्रह भी किया जाए.

संघर्ष-

संघर्ष राष्ट्र के वर्तमान संकट से उबरने की अनुक्रिया का एक अविच्छिन्न भाग होगा. यह संघर्ष स्थानीय और राष्ट्रीय प्रश्‍नों से जुड़ा होगा. यदि स्थानीय संघर्ष समुचित ढंग से चलाया जाए तो उससे लोगों का मनोबल और आत्मविश्‍वास बढ़ेगा, लेकिन इसके संदर्भ में एक विशेष सावधानी भी रखनी होगी. जो भी स्थानीय कार्यक्रम अपनाया जाए, उसके राष्ट्रीय परिपे्रक्ष्य को भी अच्छी तरह लोगों के ध्यान में लाया जाए, क्योंकि राष्ट्रीय परिस्थिति प्रेक्ष्य के अभाव में अनेक सफल स्थानीय संघर्ष केवल सीमित क्षेत्र में अपना प्रभाव दिखा सके यानी कुल मिलाकर उनके द्वारा लोकशक्ति के लिए कोई देन प्राप्त नहीं हो सकी. निकट भविष्य में ही स्वतंत्रता और लोकतंत्र के मुद्दे को लेकर जन-आंदोलन छेड़ने की आवश्यकता होगी. ये मुद्दे ठीक-ठीक किस रूप में उभरेंगे, समय के साथ यह स्पष्ट होगा, लेकिन अभी इतना तो माना ही जा सकता है कि रोटी और स्वतंत्रता के साथ उसका अविच्छिन्न संबंध होगा. छोटे-छोटे स्थानीय मुद्दों को लेकर बड़ी संख्या में व्यापक जन-आंदोलन छेड़ने होंगे. सर्वसेवा संघ के अध्यक्ष की मान्यता है कि कृषि-उपज की उचित मूल्यनीति लागू करने के लिए समूचे भारत के किसानों को राष्ट्र-व्यापी हड़ताल करनी होगी. उसका स्वरूप कुछ इस ढंग का हो सकेगा कि यदि कृषि-उपज खलिहान से किसान के घर पहुंचने तक बाज़ार में पैदावर का उचित मूल्य न मिले तो किसान दो महीने तक अपनी उपज बाज़ार में नहीं बेचेगा. गांव के भीतर के लोगों के लिए आपस में तय किए गए मूल्य पर उपज बिकती रहेगी.

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