साल 2013 का साहित्यिक लेखा-जोखा

24TH__LITERATURE_FE_901564fसाल 2013 तमाम साहित्यिकगतिविधियों से भरा हुआ रहा. बिल्कुल प्रारम्भ में ही जयपुर लिटरेरी फेस्टिवल के दौरान आशीष नन्दी महज़ एक बयान के कारण भयंकर विवादों में उलझ गए और तमाम ऐसे लेखक उस कार्यक्रम में वैसा कार्यनिष्पादन नहीं कर सके जैसी उम्मीद थी. भारतीय मूल के कुछ विदेशी लेखकों ने तो अपने कार्यक्रमों में तमाम फेरबदल किए. ये सूचनाएं अक्सर सुर्खियों के ज़रिये लोगों तक पहुंचाई जाती रहीं. इसके बाद दिल्ली में पुस्तक मेले का आयोजन हुआ. फरवरी में आयोजित इस पुस्तक मेले में भारतीय ज्ञानपीठ, शिल्पायन, वाणी, राजकमल और सामयिक समेत अनेक प्रकाशकों ने ढेर सारी पुस्तकों का विमोचन कराया. देश के दूरदराज़ से कई नामी-गिरामी लेखक राजधानी आए जिन्होंने लौटकर पुस्तकों पर ख़ूबसूरत संस्मरण लिखे. हिन्दी में बेस्टसेलर जैसी कुछ अवधारणाएँ सामने आईं और उन पर जमकर चर्चाएं भी हुईं.

बहरहाल हिन्दी का पाठक वर्ग सिर्फ शहरों में ही नहीं रहता. बल्कि कहना चाहिए कि आज भी उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान, हरियाणा, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ समेत अन्य हिन्दी राज्यों के ग्रामीण इलाकों के पाठक ही हिन्दी के मूल आधार हैं. पर बहुत अफ़सोस की बात है कि इन आधारिक इलाकों में पुस्तकों या पुस्तकालयों का अभाव रहा है. फरवरी में बिहार के गया में एक दस दिवसीय पुस्तक मेला व शिक्षा संस्कृति महोत्सव का भव्य और सर्वसमावेशी आयोजन किया गया जो दिल्ली के पुस्तक मेले से भी कई गुना ज्यादा कामयाब रहा. यहां साहित्य के बादशाह प्रेमचन्द की तीन सौ से भी ज्यादा कहानियों का अत्यधिक प्रभावशाली नाट्य मंचन प्रस्तुत किया गया और पुस्तकों की संस्कृति को बल प्रदान करने के लिए गोष्ठियों से लेकर बाल-प्रतियोगिताओं का जोरदार आयोजन हुआ. बाद में पुस्तक संस्कृति अभियान की आवाज़ देश की संसद में भी गूंजी और नेशनल मिशन ऑन लाइब्रेरी का भी गठन किया गया.

मार्च में इन्दौर में दक्षिण एशियाई देशों की भाषायी पत्रकारिता को लेकर एक भव्य कार्यक्रम आयोजित किया गया जिसमें पाकिस्तान को छोड़कर दक्षेस के सभी देशों से साहित्यकार और पत्रकार आए और गम्भीर विचार-विमर्श हुए. डॉ. श्याम सखा श्याम ने हरियाणा साहित्य अकादमी में नई ऊर्जा का संचार करते हुए साहित्यकारों की मासिक गोष्ठियां जारी रखीं. मध्य प्रदेश के संगमन और लखनऊ के कथाक्रम की गूंज देर तक और दूर तक गूंजती रही. कथाक्रम में पूरे देश के साहित्यकार आए और कथाक्रम सम्मान काशीनाथ सिंह के हाथों कहानीकार जयनन्दन को दिया गया. लमही के ज़रिये विजय राय प्रेमचन्द की परम्परा को आगे बढ़ाते रहे लेकिन कुछ अजीब कारणों से लमही सम्मान को लेकर एक ग़ैर-ज़रूरी विवाद भी पनपा.

हिन्दी साहित्य के इलाके से समय-समय पर पुरस्कारों की ख़बरें भी आती रहीं. विद्वानों ने इन पुरस्कारों के निर्णयों पर अपनी सहमतियां-असहमतियां दर्ज़ कराईं और तमाम साहित्यिक समाचारों को मसालेदार बनाया. ज्ञानपीठ पुरस्कार तेलुगु के रावुरी भारद्वाज को दिया गया. रावुरी जी इस बात की एक बड़ी मिसाल हैं कि औपचारिक डिग्री-डिप्लोमा का साहित्य सृजन से कोई रिश्ता नहीं होता. दुखद है कि पुरस्कार पाने के करीब हफ्ते भर के अन्दर ही उनका निधन हो गया. रमाकान्त स्मृति कहानी पुरस्कार कथाकार किरण सिंह को उनकी कहानी संझा के लिए, साहित्य अकादमी का युवा पुरस्कार अर्चना भैंसारे को उनके कविता संग्रह कुछ बूढ़ी उदास औरतें के लिए, भारत भूषण अग्रवाल कविता पुरस्कार प्रांजल धर को उनकी कविता कुछ भी कहना ख़तरे से खाली नहीं के लिए दिया गया. शैलप्रिया सम्मान, परम्परा सम्मान, ऋतुराज सम्मान, अंजना सहजवाला और हेमन्त स्मृति सम्मान की भी चर्चाएं होती रहीं.

समय के चक्र ने इस साल अनेक नामी-गिरामी लोगों को हमसे छीन लिया. इनमें विमर्शों के शहंशाह राजेन्द्र यादव, लोक के महारथी विजयदान देथा (प्यार से इन्हें बिज्जी नाम से जाना जाता है), व्यंग्य सम्राट के. पी. सक्सेना, नए लेखकों की हौसला अफजाई के लिए विख्यात आलोचक परमानन्द श्रीवास्तव, बच्चों के लिए विपुल साहित्य रचने वाले हरिकृष्ण देवसरे, विख्यात चित्रकार और रंगकर्मी विजय सोनी और मशहूर लेखक ओमप्रकाश वाल्मीकि समेत अनेक लोग शामिल हैं. कल्पना करके भी हृदय में एक रिक्तता और सन्नाटे का एहसास होता है कि आज हम एक ऐसी दुनिया में हैं जिनमें ये लोग नहीं हैं. हालांकि इनकी रचनाएं हमें और आने वाले लोगों को इनकी याद दिलाती रहेंगी. नाइजीरियाई लेखक चिनुआ अचेबे और नोबेल पुरस्कार विजेता डोरिस लेसिंग का निधन विश्व साहित्य की अपूर्णीय क्षतियां हैं. बेहद अफसोस की बात है कि यह सूची काफी लम्बी है.

साहित्य अकादमी ने युवा लेखकों के प्रोत्साहन हेतु एक योजना का आगाज किया और इस योजना के तहत जो प्रथम पुस्तक प्रकाशित की गई वह चर्चित कवि कुमार अनुपम का कविता संग्रह बारिश मेरा घर है रही. उपन्यासकार और वरिष्ठ पत्रकार प्रदीप सौरभ ने नेशनल दुनिया अख़बार के ज़रिए रोज़ कविताएं छापने का सराहनीय काम शुरू किया और जारी रखा. हिन्दी भाषा के लिए यह बेहद महत्वपूर्ण काम माना गया. आज जब आए दिन इस बात पर स्यापा होता रहता है कि मुख्यधारा के मीडिया में साहित्य के लिए स्पेस लगातार सिकुड़ता ही जा रहा है, तब प्रदीप सौरभ की यह पहल निश्‍चित ही काबिले तारीफ है. नया ज्ञानोदय, पाखी और पब्लिक एजेंडा ने कुछ शानदार विशेषांक निकाले. सुशील सीतापुरी के सम्पादन में शब्दसत्ता’ ने रंगकर्मी विजय राय पर एक ख़ूबसूरत विशेषांक निकाला. असुविधा, समालोचन, जनपक्ष, अनुनाद, जानकीपुल, अपनी माटी, हिन्दी समय और आपका साथ साथ फूलों का जैसे साहित्यिक ब्लॉग्स ने साहित्य की बहसों को ज़िन्दा बनाए रखा. इसके अलावा वर्ष भर फ़ेसबुक पर किताबों के विमोचन का सिलसिला ज़ारी रहा. साल के जाते-जाते नामवर सिंह और रामविलास पासवान के हाथों पप्पू यादव की आत्मकथा द्रोहकाल का पथिक का विमोचन भी हुआ. इस मुद्दे पर भी तमाम तरीके की राय सामने आई. पहले तहलका में प्रियदर्शन ने लिखा और बाद में जनपक्ष ब्लॉग पर इसी विषय पर एक नया लेख अशोक कुमार पाण्डेय ने प्रकाशित किया. नाटकीयता से लबरेज और सुखद-दुखद समाचारों के बीच यह साल गुज़र गया. अब अगले साल के साहित्य को पढ़ने और जानने की नई उम्मीदें  सामने हैं.

  • तरूण कुमार

    मंच के कवि देवाल आशीष जी के निधन को भुला दिया गया ।जो श्रृंगार के जाने माने कवि थे देश…….