अंतर्द्वंद्व की सहज अभिव्यक्ति

samajhकोमलता की पहली अनुगूंज किसी ने सुनी थी जो निरंतर अमरबेल की तरह फैलती रही. समाज, व्यवस्था, संस्कृति, परंपरा, स्नेह, सौहार्द, भाईचारा, रिश्ते-नाते के ताने-बाने सहित देश-दुनिया की समस्त सघन अनुभूतियां बड़ी बारीकी और चतुराई से कविता के पंक्तियों में चुन-चुन कर सजाए गए हैं. यह सूक्ष्म अभिव्यक्तियां ललित लालित्य के कविता संग्रह समझदार किसिम के लोग में एक-एक ऊंचाइयों को छूने में तल्लीन जान पड़ती हैं. अच्छे लोग/ अपनी आदतों के कारण अच्छे हैं/और बुरे लोग अपने कर्मों के कारण. यहीं से आभास होने लगता है कि कविता कितने सारे भावों के गहरे सागर में डूबने को विवश करने वाली है. जीवन के खट्टे-मीठे अनुभव के साथ-साथ दर्शन, ज्ञान की बातें भी बड़ी ही सहजता से आती चली गई हैं. क्या सीखा हमने/जाते हुए साल से/कुछ भी तो नहीं… इस कुछ नहीं में ही सब कुछ समाहित है. ज़रूरत है तो एक गहरी दृष्टि डालने की, जिससे अंदर के उदगार धीरे से समाज के क्रूर होते चेहरे पर उंगलियों के निशान बनाते हुए हैवान को इंसान में तब्दील कर जाए. ठस्स होती ज़िंदगी में/ बचा ही क्या है/खोने को और बोने को/बीज अंकुरित होने से पहले ही भ्रूण हत्या….

सृजन वही सबसे अधिक ग्रहणीय होता है जो सबके दिल-दिमाग को सहजता से समझ आए. अपने भावों के आवेग में बहा ले जाए. इंसान से इंसान को रू-ब-रू करवाए. समय के साथ क़दम से क़दम मिलाकर चलते हुए अपने साथ सभी को समाहित करते हुए ऐसा व्यवहार करे कि कोई आम न लगे, न ही कोई ख़ास लगे, बल्कि सबके सब एक ही भाव के प्रवाह में निरंतर बहते हुए देश-दुनिया के दृश्य पटल पर अपने क़दमों के चिन्ह्न छोड़ जाएं. यह निशानी ही भविष्य की मूल पूंजी/निधि और निहितार्थ का स्थान गढ़ कर लेती है. आर्थिक मंदी से घबराए लोग/सोना महंगा होगा/बाज़ार में ख़रीदारी का ज़ोर/हलवाई की दुकान में/सजी मिठाइयां इतराती हैं/…दुर्घटना, घटना, बहना/गहना, सजना, बिकना अनिवार्य अंग हो चुके हैं. ठस्स होती ज़िंदगी शीर्षक कविता में जीवन समाज और व्यवस्था के रूप का चित्रण बहुत ही तीखे, चुटीले और मीठे अंदाज़ में किया गया है.
ललित लालित्य जी के काव्य संग्रह समझदार किसिम के लोग में एक ही स्थान पर बहुत कुछ मौजूद है, जिसे हम आसानी से समझ सकते हैं/बोल-बतिया सकते हैं साथ ही किसी अनपढ़ को सहजता से उसके भाववेग में बहा सकते हैं. भले ही आज के दौर में हज़ारों कवि कविता रच रहे हों, मगर बहुत ही कम लोग हैं जो इतनी सरल किंतु सटीक रचनाएं रचते हैं, क्योंकि सबकी अपनी शैली होती है. अपना अंदाज़ होता है. विषय चयन का अपना एक तरीक़ा होता है. वैसे ललित जी की अपनी शैली केवल उनकी ख़ुद की नहीं, बल्कि हर उस आम व्यक्ति के जिह्वा की बात है जिसे वह अपने अंदर घुट रहे भावों से परे निकालना चाहता है. मुखर होकर अपनी बात रखना चाहता है. मेहनत से श्रद्धा से/ बिगड़े काम संभल जाते हैं/रोगी स्वस्थ हो जाते हैं/मुराद पूरी हो जाती है/अगर बैठे रहे कि/नाव आएगी तो पार जाऊंगा/… उठो बढ़ो, हिम्मत करो/शक्ति को समेटो, आगे बढ़ो/आगे ब़ढोगे तो समूची शक्ति/आपको उद्वेलित करेगी… जो उर्जा जोश, जूनून, उत्साह, उमंग, प्रेरणा और परिष्कार की बातें इनमें हैं वे मानवीय होने की सीख देती हैं और लेखक के हुनर का भी बोध होता है.
समझदार किसिम के लोग की कविता में जो प्रवाहमयता, भावप्रवणता, काव्य कौशल और बेतकल्लुफ अंदाज़ बयां होता है, वही सहजता से पाठकों को आकर्षित करती है. इस संग्रह को पढ़ते हुए मुझे रूसी कविताओं की याद सहज ही हो आती है. उनकी कविताओं में भी आम इंसान की शब्दावली बड़े ही सरल तरी़के से पिरोई हुई होती है. अपनी दुनिया में घिरे आदमी को पढ़िए. ख़ुद से मिलते हुए हर उस आदमी से मुलाक़ात हो जाएगी जो आदमी बनने के क्रम में है.
कविता के माध्यम से लेखक सबसे अधिक व्यक्ति, समाज, व्यवस्था और समय के क़रीब पहुंचता है. उसके पहुंचने के पीछे का उद्देश्य सबसे स्पष्ट होता है कि हम केवल अपने अंदर के कष्ट, पीड़ा, दर्द, तकलीफ़ और अभाव को अपने तक ही नहीं सहेंगे, बल्कि उसे उन तक भी ले जाएंगे जो उसे समझने के बजाय अपने अंदर के मनोभाव तक ही सीमित रखते हैं. नया रूप, महिलाएं ख़ुश हैं, फूल, पत्ती और तितली, ज़माने का विचित्र रंग, और नई दुनिया के लोग शीर्षक को देखें, पढ़े फिर ख़ुद से ़फैसला लेते हुए पुस्तक के
अवलोकन तक पहुंचें तो बेहतर उत्तर निकलकर आएं. एरियर और कैरियर में/सिमटे लोग/स्टेप्नी बने हुए हैं..
समाज के अंदर की सामयिकता का प्रश्‍न बड़ी ही करीने से सजा है. कई-कई पंक्तियां इस बात की गवाह भी हैं. तेज़ी से बढ़ते शहरीकरण, बाज़ारीकरण और उपभोक्तावादी प्रवृत्ति का खुलकर ख़ुलासा किया है. ऊंचे-ऊंचे शब्दों के महल से नहीं, बल्कि साधारण बोलचाल के शब्दों के माध्यम से मीठे अंदाज़ में अपनी बात को आम जन के हृदय की भावाभिव्यक्ति बना बैठे हैं. यह सब कुछ किसी रणनीति के तहत नहीं हुआ है, बल्कि स्वतः होते चला जा रहा है. कवि कोई किसी पूर्व प्लान के तहत आगे नहीं बढ़ता है, बल्कि अपने मन के भाव को बस ऐसे ही निकल देने देता है.
सामाजिक परिप्रेक्ष्य में व्यक्ति के अंदर मचल रहे अंतर्द्वद, परेशानियों, अंतर्विरोधों और जीवनशैली के प्रति ठोस किंतु सहानुभूति से परिपूर्ण सृजन के कई सारे सोपान आते चले गए हैं. सहजता, संवेदना, मार्मिकता, सामाजिकता, सरोकार और सहानुभूति की चरम के दर्शन करने हों तो इस संग्रह को ज़रूर पढ़ें. संग्रह में यह सब एक साथ अपनी पूरी सक्षमता के साथ मौजूद हैं. आज किसी को/कोई/आवाज़ नहीं देता/संदेशों के दौर में/सब अपनी दुनिया में व्यस्त हैं, जब वह लिखते हैं कि-मैला ढोते लोग/हम से कहीं/ ज्यादा स्वच्छ हैं… तब व्यंग्य की सोंधी फुहार मन में एक नए आवेग, प्रश्‍न और वंचना को छोड़ देती है. एक अजीब तरह पागलपन माध्यम से एक नये तरह के अंतरद्वंद को बड़ी ही सहजता और ख़ूबसूरती से पिरोते हुए लिखते हैं- पानी नहीं बरसा/जनता पगला गई/बिजली महंगी हुई/जनता पगला गई/ फिल्म पिट गई जनता पगला गई/…पैदल, पत्थर तोड़ती हुई/ जिसे दो वक्त रोटी भी नहीं/वो पगलाएगी नहीं तो क्या करेगी/… अधिकांश अभिव्यक्ति की शुरुआत सहज ढंग से हुई है, लेकिन जैसे-जैसे आगे बढ़ती गई हैं एक गंभीर रूप धारण करते हुए अपनी छप छोड़ती चली गई हैं. किसी भी संग्रह में सभी कविताएं अच्छी नहीं होतीं, ऐसा इस संग्रह में भी है. कुछ कविताएं बेहद अच्छी हैं, तो कुछ कमजोर, लेकिन कुल मिलाकर यह एक बेहतर संग्रह है. प

One thought on “अंतर्द्वंद्व की सहज अभिव्यक्ति

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *