प्रत्यक्ष काम नुकसानदायक नहीं

dhyanमन के प्रशिक्षण के लिए एक पद्धति सूझती है. जैसे योगासन करने से शरीर धीरे-धीरे मुड़ने और झुकने लगता है, वैसे ही मन को बदलने के लिए ऐसा कोई काम रोज करें, जिसका मुझे कोई फल नहीं मिलनेवाला हो. अर्थात प्रतिदिन त्याग की आदत डालूं. रोज निरर्थक कर्म करूं. क्या ऐसा करने से मैं थोड़ा निष्काम हो पाऊंगा?

हृदयरोग के विषय में आज की वैज्ञानिक समझ कैसे विकसित हुई, इस पर चुनिन्दा अध्यनों को पढ़ने पर गीता एवं ईशावास्योपनिषद के जिस रास्ते से जाने की मैं उम्मीद कर रहा था, उसकी वैज्ञानिकता मुझे अधिकाधिक समझ में आने लगी. हमारी व्यावसायिक कामों से उत्पन्न तनाव हृदयरोग का कारण बन सकता है. अमेरिका के राष्ट्रीय (हेल्थ एक्जामिनेशन सर्वे और हेल्थ ऐंड न्यूट्रिशन एक्जामिनेशन सर्वे) इन दो प्रसिद्ध सर्वेक्षणों के विश्‍लेषण में ऐसा देखा गया कि जिन्हें काम का तनाव अधिक था उन्हें हार्टअटैक चार गुना अधिक आए, लेकिन तनाव होता किस चीज से है? वैज्ञानिकों को ऐसा ज्ञात हुआ कि ज्यादा काम से तनाव नहीं होता है. तनाव होता है जिम्मेदारी से, समय के अभाव से काम के बारे में कोई मदद न मिलने से, लेकिन सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा था काम में नियत्रंण व स्वतंत्रता का. नियंत्रण जिनके स्वयं के हाथ में था, कैसा व कितना काम करें इसकी स्वतंत्रता थी, उन्हें तनाव कम था. जो परावलंबी थे, पर नियंत्रित थे उन्हें अधिक तनाव होता पाया गया. काम में तनाव के घटक समझ में आने के बाद, यह स्पष्ट हो गया कि प्रत्यक्ष काम नुकसानदायक नहीं है, लेकिन काम के कारण निर्मित होनेवाली फल की अकांक्षा आदमी पर जिम्मेदारी एवं समय का बोझ बढ़ाती है. निष्काम कर्म स्वाभाविक रूप से ही तनावरिहत होगा. जब काम में किसी और पर निर्भर रहना पड़ता है, कार्य करने की अथवा निर्णय लेने की स्वतंत्रता नहीं होती तब तनाव का निर्माण होता है. बड़े-बड़े उद्योगों, कंपनियों अथवा सरकारी प्रशासन का एक पुर्जा होकर जो मनुष्य काम करता है उसे स्वतंत्रता खोने का तनाव होता है. अतएव काम के नियोजन में यह देखना होगा कि प्रत्येक को काम में स्वतंत्रता और स्वाबलंबन हो. साथ ही काम की जगह मैत्रीपूर्ण वातावरण हो तो तनाव नहीं होगा. अर्थात काम के दौरान भी मनुष्य को प्रेम एवं संबंधों की आवश्यकता होती है. काम मनुष्य को नहीं मारता आधुनिक औद्योगिक संस्कृति में जिस प्रकार व जिन परिस्थितियों में काम करना पड़ता है. वे परिस्थितियां मनुष्य को मार डालती हैं. फ्रीडमैन एवं रोझमैन ने मनुष्य के व्यक्तित्व का हृदयरोग से क्या संबंध है इस पर खोज की. इससे टाइप ए एवं टाइप बी ये दो व्यक्तित्वों के ध्रुव समझ में आए. टाइप ए स्वभाव के मनुष्य हृदयरोग के अधिक शिकार होते हैं टाइप ए लोग कैसे होते हैं? उनकी पहचान के चिंह निम्न हैं.

1-अस्पष्ट उद्देश्यों की प्राप्ति करने की कल्पना से प्रेरित

2-यश,प्रगति, सामाजिक मान्यता कि प्रबल इच्छा

3-स्पर्धा से ग्रस्त

4-शीघ्रता की इच्छा सदैव बने रहना

5-हॉस्टिलिटी(बैर), क्रोध, शत्रुत्व से भरे.

संक्षेप में कहें तो आज का एक्जीक्यूटिव  आगे चलकर उन्होंने टाइप ए व्यक्तित्व के दो अंग अथवा घटक सबसे खतरनाक पाए. हास्टिलिटी व निराशावादी दृष्टिकोण ये कैसे प्रगट होते है संसार अथवा लोग बुरे हैं. ऐसा बार-बार कहना, दूसरों के प्रति अविश्‍वास की भावना, नकारात्मक भावना, बारंबार  प्रकट होने वाला संताप और आक्रामकता इन रूपों में ये सामने आते हैं. ये सब मृत्यु के दूत हैं.

ग्रौसार्थ एवं मैटिसेक नामक दो शोधकर्ताओं ने ऐसा पाया कि तर्क एवं बुद्धि पर अधिक जोर देने वाले एवं अपनी भावनाओं को नकराने वाले मनुष्यों को हृदयरोग दस गुना अधिक होता है. इन्हें कैंसर भी सर्वाधिक अधिक होता है. कुल मिलाकर मन एवं स्वभाव का शरीर पर, विशेषत: हृदय पर, बहुत गहरा प्रभाव पड़ता है. शारीरिक हृदय एवं भावनिक हृदय इनका अति निकट का संबंध है. इसलिए अपना मन और भावना जांचे बगैर और उन्हें शुद्ध किए गए बगैर हृदयरोग से मुक्ति नहीं.

अरे, ये तो आध्यात्मिक और संतों द्वारा कही बात ही हो गई, योग, अध्यात्म व भक्ति ये व्यक्तित्व बदलने का एवं चित्तशुद्धि के मार्ग ही तो हैं. हृदयरोग होने के बाद भी यह परिवर्तन किया जा सकता है, यह आर्निश के अध्ययन से सिद्ध हुआ. टाइप ए पद्धति का व्यक्तित्व बदलने के व उससे हृदयरोग का खतरा कम होने के अन्य प्रयोग भी हुए हैं. आर्निश की गु्रप उपचार-पद्धति में आहार, स्वभाव, धूम्रपान व व्यायाम की आदतें बदलने के अतिरिक्त, श्‍वासन, तनाव का विसर्जन, ध्यान, छोटे समूह में अपनी भावनाओं का अनुभव करना एवं नाते-रिश्ते का निर्माण करना ये अनेक घटक होने के कारण कुल प्रभावी रहा.

पाश्‍चात्य संशोधनकर्ताओं ने हृदयरोग के अनेक कारण ढ़ूंढ़ निकाले हैं. कुछ कारण व्यक्तित्व के अंदर छिपे होते हैं और कुछ बाहर समाज में छिपे होते हैं और कुछ बाहर समाज से पैदा होते हैं. कुछ आंतरिक, कुछ बाह्य सामाजिक. क्या एक-एक कारण के लिए अलग-अलग उपाय किएं जाएं? प्रत्येक टुकड़े लिए अलग गोली, अलग औषधि, अलग उपाय? ऐसे टुकड़ो के बजाय एक भिन्न जीवन दर्शन की , समाज रचना की व समग्र  जीवनशैली की आवश्यकता है. गांधी जी के मार्ग से अथवा आर्निश की उपचार-पद्धति से, कहीं से भी शुरू करें, अंत में भोगप्रिय इंद्रियों को संयमित करके नैसर्गिक आहार व शरीर-श्रम पर जोर देनेवाली, निष्काम कर्म कहनेवाली, अन्य मनुष्यों से प्रेम व कर्तव्य के रिश्तों से जोड़नेवाली, यौगिक आध्यात्मिक समग्र जीवनशैली-यही उपाय मुझे दिखाई दे रहा था.

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