सारी ज़िम्मेदारी मनमोहन सिंह की

अपने पूर्ववर्ती प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की तरह मनमोहन सिंह कश्मीर का मसला सुलझाना चाहते थे और पाकिस्तान के साथ शांति संबंध स्थापित करना चाहते थे. उन्होंने इसके लिए कोशिश भी की, लेकिन सफल नहीं हो सके. दरअसल, विदेश मंत्रालय इस बात को जानता है कि अगर भारत और पाकिस्तान के बीच शांति संबंध स्थापित हो जाते हैं, तो वह अपने अस्तित्व में रहने की प्रमुख वजह खो देगा.

Manmohan-Singh-3जैसे-जैसे पुराने साल की यादें धुंधली होती जा रही हैं, अफ़वाहें ज़ोर पकड़ रही हैं कि चुनाव से पहले मनमोहन सिंह की जगह राहुल गांधी देश के प्रधानमंत्री बन सकते हैं. बीते सितंबर में दाग़ी सांसदों के लिए लाए गए अध्यादेश को जब राहुल ने फाड़ा था, तो लगा था कि शायद समय आ गया है कि उन्हें नौ महीने के लिए विदेश मंत्री का कार्यकाल दिया जाए, लेकिन सब कुछ आख़िरी समय के लिए छोड़ना कांग्रेस की स्टाइल बन गई है. संभव है, आम चुनाव नज़दीक होने की वजह से अब कोई परिवर्तन किया जाए.
वर्ष 2009 में जीत के बाद जब मनमोहन सिंह को ऐसा लगने लगा कि उनकी वजह से पार्टी को ज़्यादा सीटें मिली हैं, तभी से वरिष्ठ कांग्रेसी नेताओं ने उन्हें नीचा दिखाना शुरू कर दिया. इंदिरा कांग्रेस में यह पहला नियम है कि सभी सफलताओं का सेहरा परिवार के सिर बंधता है और सभी नाकामियों का ठीकरा दूसरे लोगों के सिर फूटता है. इसलिए आख़िरी वक्त में इस बात की लगातार अफ़वाह है कि राहुल बाबा अब पद संभालेंगे. मनमोहन सिंह विदेशी संबंधों में बहुत ज़्यादा असरकारी साबित नहीं हो सके. देश के भीतर भी राजनीतिक दबाव के कारण ज़्यादातर समय उन्हें शांत ही रहना था. उनकी कैबिनेट ने उनकी बेइज़्ज़ती की. खुलेआम देखा गया कि मंत्री उनकी कैबिनेट में रहने से ज़्यादा राहुल गांधी की कैबिनेट में रहना चाहते हैं. मंत्रियों को छोटे से छोटे निर्णय के लिए भी 10 जनपथ रिपोर्ट करना पड़ता था. यह 10 जनपथ ही था, जहां आख़िरी निर्णय होता था.
इस प्रकार कांग्रेस ने बीते लगभग पांच वर्षों से मनमोहन सिंह को नेपथ्य में भेज दिया है. पार्टी परेशानी झेल रही है, लेकिन इसकी तोहमत राहुल गांधी को नहीं दी जा सकती है, किसी और को ही इसकी ज़िम्मेदारी लेनी होगी. यह ज़िम्मेदारी मनमोहन सिंह के सिर ही होगी. लेकिन इससे भी ज़्यादा महत्वपूर्ण परेशानी यह है कि क्या मनमोहन सिंह अपना कार्यकाल पूरा कर पाएंगे? जवाहर लाल नेहरू के बाद वह दूसरे प्रधानमंत्री होंगे, जो पांच वर्ष का अपना दूसरा कार्यकाल पूरा करेंगे. ऐसी अवस्था में, जबकि गांधी-नेहरू परिवार के नाम ही देश की ज़्यादातर उपलब्धियां हैं, तो किसी सिंह को इसमें जगह कैसे दी जा सकती है? इतिहास को बचाने के लिए उन्हें तुरंत निकाल दिया जाना चाहिए.
हम जब मनमोहन सिंह के दस साल के कार्यकाल की तरफ़ देखते हैं, तो पाते हैं कि आख़िर किस तरह यूपीए-1 में उन्होंने अच्छा काम किया और यूपीए-2 में कितना ख़राब प्रदर्शन किया. यूपीए-1 में उन्होंने न्यूक्लियर डील पर मज़बूत निर्णय शक्ति का प्रदर्शन किया था, जिससे देश की जनता काफ़ी ख़ुश हुई थी. उन्होंने वामपंथी दल को बाहर कर दिया था. भारत और अमेरिका के संबंधों को बेहतर बनाना मनमोहन सिंह का देश के लिए स्थायी योगदान है. वर्तमान समय में विदेश मंत्रालय एक झूठ बोलने वाली आईएफएस अधिकारी को बचाने में अमेरिकी मित्रभाव को खो रहा है और शायद वह मनमोहन सिंह की इस सबसे बड़ी सफलता को नुकसान पहुंचाने में कामयाब भी हो जाए. वे लोग, जो अमेरिका से घृणा करते हैं और नैम (गुट निरपेक्ष देश) से प्रेम करते हैं, इस मित्रभाव के टूटने से प्रसन्न होंगे. अमेरिका विरोधी होना ब्रांड इंदिरा कांगे्रस का हिस्सा है.
अपने पूर्ववर्ती प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की तरह मनमोहन सिंह कश्मीर का मसला सुलझाना चाहते थे और पाकिस्तान के साथ शांति संबंध स्थापित करना चाहते थे. उन्होंने इसके लिए कोशिश भी की, लेकिन सफल नहीं हो सके. दरअसल, विदेश मंत्रालय इस बात को जानता है कि अगर भारत और पाकिस्तान के बीच शांति संबंध स्थापित हो जाते हैं, तो वह अपने अस्तित्व में रहने की प्रमुख वजह खो देगा. यह बात साफ़ है कि भाजपा और संघ पाकिस्तान के साथ शांति प्रक्रिया में रोड़े नहीं अटकाएंगे, क्योंकि भाजपा के ही नेता अटल बिहारी वाजपेयी शांति प्रयासों के लिए शायद सबसे बेहतरीन नेताओं में से एक थे, लेकिन धर्मनिरपेक्ष नेताओं को कुछ करना होगा, क्योंकि उन पर इस बात के आरोप लगने की आशंका है कि वे पाकिस्तान के प्रति नरम रुख़ रखते हैं. एक बात तो पक्की है कि इंदिरा कांग्रेस के सत्ता में रहते पाकिस्तान के साथ शांति संबंध स्थापित हो सकने की संभावनाएं क्षीण ही हैं. इस वजह से मनमोहन सिंह पाकिस्तान के साथ शांति का अपना स्वप्न पूरा कर पाने में नाकाम ही रहे.
अब हम उनकी आर्थिक नीतियों की तरफ़ देखते हैं. पूर्व में लिए गए उनके मज़बूत निर्णयों की तरह यूपीए-1 में भी कुछ अच्छे परिणाम देखने को मिले (शायद इसके लिए पूर्ववर्ती एनडीए शासन को शाबाशी दी जा सकती है, जिसने मनमोहन सिंह द्वारा शुरू किए गए आर्थिक सुधारों को लगभग उसी रूप में जारी रखा था). लेकिन जैसे ही यूपीए-2 पर नज़र दौड़ाते हैं, यहां तक कि 2008 की आर्थिक मंदी के बाद भी, तो पाते हैं कि आर्थिक मंदी 2010 के बाद भी बनी रही. राष्ट्रीय सलाहकार परिषद ने जीडीपी ग्रोथ पर बहुत ज़्यादा ध्यान नहीं दिया, स़िर्फ शहरी मध्य वर्ग के लाभ के बारे में ही विचार किया. इस वजह से खाद्य पदार्थों की महंगाई को हथियार बनाकर ग्रामीण भारत को अत्यधिक मात्रा में सब्सिडी दी गई. साथ ही क्रोनी कैपिटलिज्म (ऐसा पूंजीवाद, जिसमें येन केन प्रकारेण फायदा कमाया जाता है) को चुनाव फाइनेंस करने के लिए बढ़ावा दिया जाता रहा. मनमोहन सिंह की साफ़ छवि को ढाल बनाकर कई घोटाले किए गए. लेकिन इस बार फिर मनमोहन सिंह पर गर्व किया जाना चाहिए, जिन्होंने आरटीआई कानून बनाया, जिसके ज़रिए इन घोटालों का पदाऱ्फाश हो सका. इन घोटालों की वजह से स़िर्फ मनमोहन सिंह ही नहीं, बल्कि पूरी सरकार की छवि ख़राब हुई. नीतियों की कमज़ोरी ने आख़िरकार परिणाम दिखा ही दिया.
बहुत से लोग यह पूछते हैं कि मनमोहन सिंह ने इस्तीफ़ा क्यों नहीं दे दिया? ऐसा इसलिए, क्योंकि यह उनके काम करने का तरीक़ा नहीं है. वह ऐसे व्यक्ति नहीं हैं, जो हर बात पर इस्तीफ़ा दे. उन्हें राजनीतिक पद देकर एक जहरीला पात्र थमा दिया गया, लेकिन चूंकि वह ईमानदार और विश्‍वासपात्र व्यक्ति हैं, इसलिए उन्होंने इसे ले लिया. अब उन्हें यह राजनीतिक ज़हर पीना ही होगा, जो उनके लिए ज़हरीला साबित होगा. लाख अपमानों के बावजूद उन्हें राजनीति से जाते समय गांधी परिवार को धन्यवाद कहना ही होगा.

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