सूचना का अधिकार ज़रूरी है

IN11-VSS_PDS_17128f-(1)सूचना क़ानून को लागू हुए क़रीब पांच साल हो गए. इस दौरान सूचना क़ानून ने आम आदमी को कितना शक्तिशाली बनाया, आम आदमी कैसे सवाल पूछकर व्यवस्था में लगी दशकों पुरानी जंग छुड़ाने में सफल रहा, अपने अधिकार को पाने में सफल रहा आदि बिंदुओं से जुड़े चंद उदाहरण इस अंक में दिए जा रहे हैं, ताकि आप सभी सूचना क़ानून की ताक़त को जान सकें और इसके इस्तेमाल के लिए दूसरों को भी प्रेरित कर सकें.

बिना रिश्‍वत नौकरी

आरटीआई अब लोगों को बिना रिश्‍वत दिए नौकरी और प्रमोशन भी दिला रहा है. रेवाड़ी की सपना यादव ने गुड़गांव ग्रामीण बैंक में प्रोबेशनरी अधिकारी पद के लिए आवेदन किया था. चयन नहीं हो पाया तो आरटीआई के तहत सपना ने चयन प्रक्रिया से संबंधित प्रश्‍न पूछे. मामला सीआईसी गया, बैंक ने सूचना तो उपलब्ध नहीं कराई, अलबत्ता सपना को फोन कर प्रोबेशनरी अधिकारी के तौर पर बैंक ज्वाइन करने का अनुरोध ज़रूर किया. बिहार के मधुबनी ज़िले के  चंद्रशेखर ने जब पंचायत शिक्षक नियुक्ति के लिए घूस नहीं दी तो उन्हें यह कहकर नियुक्त नहीं किया गया कि जिस महाविद्यालय से उन्होंने प्रशिक्षण हासिल किया है, वह फ़र्ज़ी है. जबकि उसी महाविद्यालय से प्रशिक्षित अन्य लोगों की नियुक्ति कर दी गई. चंद्रशेखर ने जब प्रखंड विकास अधिकारी से इस मामले में सवाल किए तो उनकी नियुक्ति पंचायत शिक्षक के रूप में कर दी गई. उड़ीसा वन विकास निगम में सेक्शनल सुपरवाइज़र के पद पर कार्यरत गणपति बहरा को वरिष्ठता के आधार पर प्रमोशन नहीं दिया गया, जबकि उनके कनिष्ठों को प्रमोशन दे दिया गया. इस संबंध में आरटीआई आवेदन डालने पर उन्हें सेक्शनल सुपरवाइज़र से सब डिवीज़न मैनेजर के पद पर प्रमोट कर दिया गया.

पेंशन की टेंशन नहीं

बुज़ुर्गों के लिए भी आरटीआई जादू की छड़ी साबित हुआ है. उड़ीसा की 70 वर्षीय कनकलता त्रिपाठी की 13 सालों से लटकी पेंशन आरटीआई आवेदन डालने के बाद एक महीने में ही मिल गई. बिहार के मधुबनी ज़िले की गंगापुर पंचायत के 200 पेंशनार्थी राष्ट्रीय वृद्धावस्था एवं सामाजिक सुरक्षा पेंशन पाने के लिए उप डाकघर में खाता खुलवाने हेतु महीनों चक्कर लगाते रहे. आरटीआई के तहत लोगों ने आरटीआई आवेदन डालकर मधुबनी के डाक अधीक्षक से इस बारे में सवाल पूछे. डाक अधीक्षक ने मामले की जांच की. दोषी पोस्टमास्टर गणेश सिंह को तत्काल निलंबित करते हुए सभी पेंशनधारियों का खाता दूसरे डाकघर में खुलवा दिया गया.

राशन दुकानदारों की ख़बर

राशन चोरी और राशनकार्ड न बनना, ये दो समस्याएं हमारे देश में आम हैं, लेकिन जन वितरण प्रणाली में लगे घुन को भी आरटीआई ने धीरे-धीरे सा़ङ्ग किया है. दिल्ली में तो इसके सैकड़ों उदाहरण हैं. पुरी की अनासारा गांव की 68 वर्षीय जनातुन बेगम और उनके पति को अंत्योदय योजना के तहत मिलने वाला अनाज आरटीआई की वजह से दोबारा मिलने लगा. जहानाबाद ज़िले के कताई बिगहा गांव में ग्रामीणों को सही मात्रा में राशन और मिट्टी का तेल मिलने लगा है.

मिड डे मील में सुधार

अहमदाबाद में मिड डे मील योजना के तहत स्कूली बच्चों को दोयम दर्जे का भोजन मिलता था. भोजन में कई बार तो कीड़े भी पाए गए. भोजन की गुणवत्ता की जांच की कोई व्यवस्था नहीं थी. इस मामले में इंदुपुरी गोसाई ने आरटीआई के तहत जवाब-तलब किया तो न केवल लेबोरेट्री में भोजन की जांच हुई, बल्कि उसकी गुणवत्ता भी सुधरी और निगरानी की समुचित व्यवस्था हुई. यह सब एक सप्ताह के भीतर हो गया. इस तरह के अनेक मामले सामने आए हैं, जिनमें आरटीआई की बदौलत मिड डे मील व्यवस्था में गुणात्मक सुधार हो सका है.

पब्लिक स्कूल में एडमिशन

सूचना क़ानून का ही कमाल है कि दिल्ली की पुनर्वास बस्ती सुंदर नगरी में रहने वाला मोहन अब अर्वाचीन पब्लिक स्कूल में पढ़ता है. आरटीआई की बदौलत ही मोहन का दाखिला इस स्कूल में फ्रीशिप कोटे के तहत हो पाया है. दिल्ली में इस तरह के हज़ारों उदाहरण हैं. कल्याणपुरी में रहने वाली सुनीता ने तो सूचना के अधिकार का सहारा लेकर स्कूल की सभी छात्राओं को छात्रवृत्ति दिलाई. सुनीता ने आरटीआई के  तहत छात्रवृत्ति न मिलने का कारण पूछा. दो दिनों बाद ही अधिकारी स्कूल में इस संबंध में जांच करने आए. सुनीता ने बेबाकी से प्रिंसिपल की शिक़ायत की. इसके कुछ दिनों बाद स्कूल की सभी छात्राओं को छात्रवृत्ति वितरित कर दी गई. इसी तरह हरियाणा के सोनीपत ज़िले के सिलारपुर मेहता गांव की साठ वर्षीय सुमित्रा देवी ने आरटीआई की मदद से न स़िर्फ प्रशासन की लापरवाही उजागर की, बल्कि ग़रीब स्कूली लड़कियों के लिए साइकिल वितरण की सरकारी योजना और सर्वशिक्षा अभियान के तहत मिलने वाली स्कूल ड्रेस का लाभ भी छात्र-छात्राओं को पहुंचाया.

सड़क भी बनवाता है आरटीआई

देश के कई हिस्सों में सूचना के अधिकार ने सड़क निर्माण और मरम्मत में अहम भूमिका निभाई है. दिल्ली के मॉडल टाउन में रहने वाले मोहित अपने इला़के की सड़कों की दुर्दशा से परेशान थे. दिल्ली जल बोर्ड ने सीवर डालने के लिए उनके घर के आगे सड़क खोद दी थी. एमसीडी से इसी लापरवाही का जवाब मांगने के लिए मोहित ने आरटीआई दायर दी. आरटीआई की अर्जी आते ही एमसीडी हरकत में आया और सड़क मरम्मत का कार्य एक महीने से भी कम समय में संपन्न हो गया. उड़ीसा में भी ऐसी ही एक मिसाल देखी गई. पुरी ज़िले के कोणार्क क्षेत्र के करमंगा गांव में आरटीआई की बदौलत रातोंरात सड़क बनवा दी गई.

पहले फेल, फिर पास

मलयनाथ नालंदा ओपन यूनिवर्सिटी से पत्रकारिता की पढ़ाई कर रहे थे. परीक्षा में फेल होने पर उन्होंने आरटीआई के तहत विश्‍वविद्यालय प्रशासन से अपनी उत्तर पुस्तिका दिखाने की मांग की. उत्तर पुस्तिका की दोबारा जांच की गई तो पता चला कि वह प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण हैं.