73 नहीं, स़िर्फ 31 पर अमल

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जस्टिस राजेंद्र सच्चर की अध्यक्षता में वर्ष 2005 में गठित सच्चर समिति ने वर्ष 2006 में यूपीए सरकार को सौंपी गई अपनी रिपोर्ट में देश के मुसलमानों की बदहाली दूर करने और उनकी बेहतरी के लिए 76 अनुशंसाएं की थीं, जिनमें से 45 अनुशंसाओं पर आज तक कोई कार्यवाही नहीं की गई. बावजूद इसके, यूपीए सरकार झूठ दर झूठ बोलती जा रही है कि उसने 72/73 अनुशंसाएं मंज़ूर कर ली हैं.  

muslimघोटालों के लिए मशहूर केंद्र की मनमोहन सरकार ने एक बार फिर झूठ बोलना शुरू कर दिया है. इस बार यह झूठ मुसलमानों के कल्याणार्थ बनाई गई योजनाओं के बारे में बोला जा रहा है. वर्ष 2004 में जब मनमोहन सिंह पहली बार प्रधानमंत्री बने थे, तो उनकी सरकार ने देश में मुसलमानों के सामाजिक, आर्थिक एवं शैक्षणिक पिछड़ेपन का पता लगाने के लिए दिल्ली उच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश जस्टिस राजेंद्र सच्चर की अगुवाई में सच्चर समिति बनाई थी. इस समिति ने वर्ष 2006 में अपनी रिपोर्ट केंद्र सरकार को सौंप दी थी और अपनी जांच के आधार पर बताया था कि देश में मुसलमानों की हालत दलितों से भी बदतर है. मुसलमानों की हालत ठीक करने के लिए सच्चर समिति ने 76 अनुशंसाएं की थीं, जिनमें से 45 अनुशंसाओं पर अभी तक कोई कार्यवाही नहीं हुई है, लेकिन अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री के. रहमान खान लगातार झूठ बोल रहे हैं कि 73 अनुशंसाएं लागू की जा चुकी हैं. हैरानी की बात यह है कि अब प्रधानमंत्री भी उनकी हां में हां मिला रहे हैं. मनमोहन सिंह ने बीती 13 जनवरी को राज्य अल्पसंख्यक आयोगों की नवीं वार्षिक कांफ्रेंस में कहा कि उनकी सरकार ने सच्चर समिति की 76 में से 72 अनुशंसाएं मंज़ूर कर ली हैं और उन पर कार्यवाही हो रही है. इस कांफ्रेंस में सच्चर समिति के सदस्य सचिव रहे डॉक्टर ज़फर महमूद भी मौजूद थे, जिन्होंने प्रधानमंत्री के बयान को ग़लत क़रार देते हुए अपना विरोध जताया.

वर्ष 2004 में जब मनमोहन सिंह पहली बार प्रधानमंत्री बने थे, तो उनकी सरकार ने देश में मुसलमानों के सामाजिक, आर्थिक एवं शैक्षणिक पिछड़ेपन का पता लगाने के लिए दिल्ली उच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश जस्टिस राजेंद्र सच्चर की अगुवाई में सच्चर समिति बनाई थी. इस समिति ने वर्ष 2006 में अपनी रिपोर्ट केंद्र सरकार को सौंप दी थी और अपनी जांच के आधार पर बताया था कि देश में मुसलमानों की हालत दलितों से भी बदतर है.

चौथी दुनिया ने सच्चर समिति की सभी अनुशंसाओं का गहन अध्ययन करने के बाद पता लगाया है कि 76 में से 45 अनुशंसाओं पर अभी तक कोई काम नहीं हुआ है. आइए देखते हैं कि वे 45 अनुशंसाएं कौन-कौन सी हैं, जिन पर यूपीए सरकार ने कोई कार्यवाही नहीं की है……
1. सच्चर समिति ने अपनी प्रथम अनुशंसा में कहा था कि देश के मुसलमानों के पिछड़ेपन को दूर करने के लिए नीतियां बनाते समय समावेशी विकास एवं इस समाज को मुख्य धारा में शामिल करने पर सबसे ज़्यादा ज़ोर दिया जाना चाहिए और ऐसा करते समय इस बात का ध्यान रखना अति आवश्यक है कि मुसलमानों के विकास को सभी क्षेत्रों में यक़ीनी बनाया जाए और यह विकास देश में सभी जगहों पर दिखाई भी देता हो. यूपीए सरकार ने सच्चर समिति की यह प्रथम अनुशंसा लागू नहीं की.
2. सच्चर समिति ने अपनी दूसरी अनुशंसा में कहा था कि एक नेशनल डेटा बैंक तैयार किया जाए, जिसमें विभिन्न सामाजिक एवं धार्मिक वर्गों की जानकारी या एसआरसी और सभी महत्वपूर्ण आंकड़े उपलब्ध कराए जाएं, लेकिन यूपीए सरकार ने इसे भी लागू नहीं किया. अब तक देश में कोई भी नेशनल डेटा बैंक तैयार नहीं हुआ है.
3. सच्चर समिति ने अपनी तीसरी अनुशंसा में कहा था कि जब इस प्रकार के आंकड़े तैयार हो जाएं, यानी जब नेशनल डेटा बैंक पूरी तरह काम करने लगे, तो उसके बाद एक स्वतंत्र आकलन एवं निगरानी प्राधिकरण (एसेसमेंट ऐंड मॉनीटरिंग अथॉरिटी) बनाया जाए, जो इस बात का पता लगा सके कि जिन कार्यक्रमों या योजनाओं को लागू किया गया है, उनसे उन्हें (पात्रों को) कितना लाभ मिल रहा है. हकीकत तो यह है कि अभी तक न तो नेशनल डेटा बैंक बन पाया है और न ही आकलन एवं निगरानी प्राधिकरण.
4. सच्चर समिति ने अपनी चौथी अनुशंसा में कहा था कि चूंकि मुसलमानों में आम तौर पर यह सोच पाई जाती है कि उनके साथ समाज में हर स्तर पर भेदभाव बरता जाता है, इसलिए कोई ऐसा तंत्र बनाया जाए, जिससे उनकी यह शिकायत दूर की जा सके. इसलिए सच्चर समिति ने समान अवसर कार्यालय (इक्वल अपॉचुर्निटी ऑफिस) स्थापित करने का सुझाव दिया था, लेकिन संसद ने अपने पिछले मानसून सत्र में इस बिल को ख़ारिज कर दिया.
5. सच्चर समिति ने अपनी पांचवीं अनुशंसा में केंद्र सरकार को यह सुझाव दिया था कि वह आंध्र प्रदेश की तरह स्थानीय निकायों (लोकल बॉडिज) में अल्पसंख्यकों के प्रतिनिधित्व को यक़ीनी बनाए, लेकिन यूपीए सरकार ने इस पर भी कोई अमल नहीं किया.
6. सच्चर समिति ने अपनी छठवीं अनुशंसा में, परिसीमन (ऊशश्रळाळींरींळेप) के तहत आरक्षित निर्वाचन क्षेत्रों (ठशीर्शीींशव उेपीींर्ळींीशपलळशी) में जो कमियां पाई जाती हैं, उन्हें दूर करने का सुझाव दिया था, लेकिन मनमोहन सरकार ने इस पर भी कोई अमल नहीं किया.
7. सच्चर समिति ने सातवीं अनुशंसा में देश के दूसरे समुदायों के साथ मुसलमानों के मेल-मिलाप को यक़ीनी बनाने के लिए यूपीए सरकार से एक विविधता सूचकांक (ऊर्ळींशीीळींू खपवशु) तैयार करने के लिए कहा था, लेकिन मनमोहन सरकार ने इसे भी लागू नहीं किया.
8. सच्चर समिति ने कहा था कि चूंकि मुसलमान ग़रीब हैं और अधिकतर मुस्लिम परिवार एक कमरे के घर में रहते हैं, इसलिए विद्यार्थियों को एक कमरे के घर में ध्यानपूर्वक पढ़ाई करने में परेशानी होती है. इसे ध्यान में रखते हुए समिति ने विद्यार्थियों के लिए कम्युनिटी स्टडी सेंटर बनाने की सिफारिश की थी, लेकिन देश भर में हमें ऐसे केंद्र दिखाई नहीं देते. यूपीए सरकार के अल्पसंख्यक मंत्रालय की वेबसाइट पर सच्चर समिति की इस 13वीं अनुशंसा को लागू करने का कोई वर्णन नहीं मिलता है.
9. सच्चर समिति ने अपनी 14वीं अनुशंसा में कहा था कि चूंकि देश भर में अधिकतर मुस्लिम छात्र-छात्राएं हाईस्कूल की परीक्षा में असफल हो जाते हैं या फिर उससे पहले ही स्कूल छोड़ देते हैं, इसलिए उनकी आगे की पढ़ाई का इंतज़ाम करने के लिए सरकार टेक्निकल ट्रेनिंग की व्यवस्था करे और उन क्षेत्रों में आईटीआई खोले, जहां पर मुसलमानों की बड़ी आबादी रहती है, लेकिन मनमोहन सरकार ने यह अनुशंसा भी लागू नहीं की.
10. सच्चर समिति ने 15वीं अनुशंसा के तहत कहा था कि विश्‍वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) जो पैसा कॉलेजों और विश्‍वविद्यालयों को देता है, उसमें से कुछ हिस्सा विभिन्न वर्गों से संबंधित विद्यार्थियों की संख्या बढ़ाने के लिए लगाया जाना चाहिए. सच्चर समिति ने यहां पर भी एक डाइवर्सिटी इंडेक्स तैयार करने की बात कही है, लेकिन मनमोहन सरकार ने इसे भी लागू नहीं किया है.
11. सच्चर समिति ने अपनी 16वीं अनुशंसा में कहा था कि सभी सामाजिक एवं धार्मिक बिरादरियों में से जो बच्चे सबसे ज़्यादा ग़रीब हों, नियमित कॉलेजों एवं विश्‍वविद्यालयों में उनके प्रवेश के लिए अलग से कोई व्यवस्था की जानी चाहिए. लेकिन केंद्र की मनमोहन सरकार ने इस बारे में भी कोई पहल नहीं की.
12. अपनी 17वीं अनुशंसा में सच्चर समिति ने कहा था कि अल्पसंख्यक विद्यार्थियों, खासकर मुस्लिम लड़कियों के लिए उनके इलाक़ों में छात्रावास बनाया जाना चाहिए. सच्चर समिति ने तो यहां तक कहा था कि स्कूली बच्चों को पढ़ाई के लिए बेहतर वातावरण मिले, इसलिए ज़िला मुख्यालयों में बोर्डिंग हाउस का निर्माण होना चाहिए, जहां पर ग़रीब बच्चों के लिए अलग से ट्यूशन की भी व्यवस्था हो. लेकिन केंद्र सरकार ने देश भर में न तो कहीं पर छात्रावास बनवाए हैं और न बोर्डिंग हाउस.
13. सच्चर समिति ने अपनी 20वीं अनुशंसा के तहत कहा था कि जिन राज्यों में उर्दू बोलने वालों की संख्या अधिक है, वहां पर सरकार की तरफ़ से उर्दू माध्यम के स्कूल खोले जाने चाहिए, लेकिन मनमोहन सरकार ने यह अनुशंसा भी लागू नहीं की.
14. सच्चर समिति ने अपनी 21वीं अनुशंसा में कहा था कि उर्दू में मानक पाठ्य पुस्तकें उपलब्ध होनी चाहिए और जिन-जिन राज्यों में उर्दू बोलने वालों की संख्या ज़्यादा है, वहां के सरकारी और सरकारी सहायता से चलने वाले स्कूलों में उर्दू को वैकल्पिक विषय के रूप में पढ़ाया जाना चाहिए. यूपीए सरकार इस 21वीं अनुशंसा के लागू होने पर खामोश है. इसका मतलब तो यही निकलता है कि उसने इसे भी लागू नहीं किया है.

हैरानी की बात यह है कि अब प्रधानमंत्री भी उनकी हां में हां मिला रहे हैं. मनमोहन सिंह ने बीती 13 जनवरी को राज्य अल्पसंख्यक आयोगों की नवीं वार्षिक कांफ्रेंस में कहा कि उनकी सरकार ने सच्चर समिति की 76 में से 72 अनुशंसाएं मंज़ूर कर ली हैं और उन पर कार्यवाही हो रही है. इस कांफ्रेंस में सच्चर समिति के सदस्य सचिव रहे डॉक्टर ज़फर महमूद भी मौजूद थे, जिन्होंने प्रधानमंत्री के बयान को ग़लत क़रार देते हुए अपना विरोध जताया.

15. सच्चर समिति ने 22वीं अनुशंसा के तहत कहा था कि सरकार कोई ऐसी व्यवस्था करे, ताकि मदरसे से पढ़कर निकलने वाले छात्र-छात्राओं को भी नियमित स्कूलों में प्रवेश मिल सके और साथ ही वे प्रतियोगी परीक्षाओं में भी भाग ले सकें, लेकिन यूपीए सरकार ने इस दिशा में भी कोई काम
नहीं किया.
16. सच्चर समिति ने अपनी 30वीं अनुशंसा में कहा था कि देश भर में अल्पसंख्यकों के कल्याण से संबंधित जो भी काम हो रहे हैं, उन्हें सरकार को हर तीन महीने में एक बार प्रकाशित करना चाहिए, ताकि यह पता चल सके कि अल्पसंख्यकों से संबंधित योजनाओं पर काम चल रहा है, लेकिन यूपीए सरकार ऐसा कोई काम नहीं कर रही है. इससे उसके खोखले दावों की पोल खुलती जा रही है.
17. सच्चर समिति ने अपनी 35वीं अनुशंसा में कहा था कि यूपीए सरकार अव्यवस्थित क्षेत्रों में काम करने वाले लोगों को सामाजिक सुरक्षा (सोशल सिक्योरिटी) उपलब्ध कराने की योजना पहले से बना रही है, जिसे जल्द ही लागू किया जाना चाहिए और उसमें मुसलमानों को भी शामिल करना चाहिए. सरकार ने इस क़ानून को संसद से तो पारित करा लिया है, लेकिन यह योजना अभी तक ज़मीन पर नहीं उतर पाई है. सरकार ने यह भी नहीं बताया है कि इससे मुसलमानों को कितना फायदा मिलने वाला है.
18. मुसलमान जीवन के हर क्षेत्र में पिछड़े हुए हैं, लेकिन सबसे ज़्यादा ख़तरनाक बात यह है कि सरकार की तरफ़ से लगातार अनदेखी के चलते उनके अंदर हीनभावना बहुत ज़्यादा पैदा हो गई है. इसलिए सच्चर समिति ने अपनी 36वीं अनुशंसा के तहत कहा था कि सरकारी नौकरियों और ख़ासकर अध्यापन, स्वास्थ्य, पुलिस एवं बैंकिंग सेवाओं में मुसलमानों की भर्ती करके उनकी यह हीनभावना दूर करने का काम किया जाना चाहिए और हर विभाग में समान अवसर कार्यालय बनाना चाहिए, लेकिन केंद्र सरकार ने इस पर भी कोई ध्यान नहीं दिया.
19. सच्चर समिति ने अपनी 38वीं अनुशंसा में कहा था कि मुसलमानों को भी अपना एनजीओ स्थापित करने में सहायता मिलनी चाहिए और मस्जिद की कमेटी के रूप में अगर कोई मुसलमान अपना ट्रस्ट स्थापित करना चाहता है, तो सरकार को ऐसी संस्थाओं की स्थापना में मदद करनी चाहिए, लेकिन अभी तक यह अनुशंसा भी लागू नहीं की जा सकी है.

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