आम आदमी की पॉवर पॉलिटिक्स

हिंदी फिल्मों का किरदार अब मेरा जूता है जापानी और पतलून इंग्लिस्तानी की इलीट छवि से बाहर निकल कर आम आदमी की ओर बढ़ रहा है, जहां वह अपने प्यार के लिए नहीं, समाज के लिए लड़ता है. राजनीतिक हक़ के लिए लड़ता है. भ्रष्ट व्यवस्था के ख़िलाफ़ लड़ता है. हालांकि पहले भी ऐसी फिल्में बनती रही हैं, लेकिन पिछले कुछ वर्षों से आंदोलनों के माध्यम से समाज में आम जनता की भागीदारी बढ़ी है, तो फिल्मी जगत भी ऐसे विषयों को तरजीह देने लगा है.

back-16ट्रासपेरेंसी इंटरनेशनल की ओर से जारी दुनिया के भ्रष्टाचारी देशों की सूची में भारत 94वें नंबर पर है. भारत में भ्रष्टाचार बहुत बड़ा मुद्दा है. राजनीतिक पार्टियां आएदिन एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगाती और एक-दूसरे को बड़ा भ्रष्टाचारी होने का तमगा देती रहती हैं. अगर भ्रष्टाचार का सफाया हो जाए, तो देश दिन दूनी-रात चौगुनी तरक्की कर सकता है, लेकिन यह कम होने के बजाय दिनोंदिन बढ़ता जा रहा है. देश की तरक्की में बाधक इस समस्या को बॉलीवुड में भी खूब फिल्माया गया. जब-जब देश की राजनीति ने करवट ली, तब-तब उससे प्रेरणा लेकर सिल्वर स्क्रीन ने उसे अपना विषय बनाया. समाजसेवी अन्ना हजारे के आंदोलन पर प्रकाश झा ने फिल्म सत्याग्रह बना डाली, तो सन्नी भी कहां पीछे रहते, उन्होंने भी भ्रष्टाचार से त्रस्त आम आदमी पर आधारित फिल्म सिंह साहब दी ग्रेट बना डाली. यह आइडिया सोहेल खान को इतना भाया कि उन्होंने आम आदमी लहर से प्रभावित होकर सलमान खान को लेकर फिल्म जय हो बना डाली.
आम आदमी की कहानी बयां करती सलमान स्टारर इस फिल्म का डायलॉग-आम आदमी सोता हुआ शेर है, को काफी पसंद किया गया. आइए जानते हैं, क्या है फिल्म की कहानी. जय (सलमान खान) एक आम आदमी है, जिसने भ्रष्टाचार और अन्याय के ख़िलाफ युद्ध छेड़ रखा है. जय का एक ही मिशन है, लोगों की सहायता करना. वह इस सिद्धांत पर काम करता है कि लोगों की मदद करो और फिर उनसे कहो कि वे धन्यवाद बोलने की जगह दूसरों की सहायता करें. इस तरह से मददगार लोगों की संख्या लगातार बढ़ती रहेगी. इस मिशन में जय का सामना एक बड़े राजनेता (डैनी) और उसके परिवार से होता है. जय भूतपूर्व आर्मी ऑफिसर है और वह किसी भी चुनौती से नहीं घबराता. जय का विश्‍वास है कि देश की सेवा करने के लिए यूनिफॉर्म पहनना ज़रूरी नहीं है, लेकिन उसकी बहन गीता (तब्बू) डरती है कि इस लड़ाई का परिणाम उसके पूरे परिवार को भुगतना पड़ सकता है. गीता अपने भाई जय पर दबाव डालती है कि वह राजनेता से समझौता कर ले. जय परिवार की भलाई के लिए ऐसा कर भी लेता है, लेकिन इस कारण उसे काफी जलालत सहनी पड़ती है और वह अपना आपा खो बैठता है. इसके बाद वह राजनेता के ख़िलाफ आर-पार की लड़ाई छेड़ देता है. हालांकि जय नहीं जानता कि जिन लोगों की उसने अब तक मदद की है, वे उसके लिए इकट्ठा हो रहे हैं, ताकि जय हो की गूंज दूर तक सुनाई दे.
फिल्में समाज का आईना होती हैं, फिल्मों में वही दिखाया जाता है, जो समाज में होता है. हर तरफ़ भ्रष्टाचार का बोलबाला है, जनता भी अब इस मुद्दे को लेकर काफी जागरूक हो गई है. ऐसा नहीं है कि बॉलीवुड में केवल हाल में ही राजनीति पर आधारित फिल्में बनने लगी हैं. इस विषय पर पहले भी कई फिल्में बन चुकी हैं. इस बार हम आपको बता रहे हैं, ऐसी ही कुछ फिल्मों के बारे में…
सत्याग्रह
समाजसेवी अन्ना हजारे के आंदोलन पर प्रकाश झा ने फिल्म सत्याग्रह बनाई. इस फिल्म ने समीक्षकों की खूब वाहवाही लूटी, लेकिन यह बॉक्स ऑफिस पर कुछ खास कमाल नहीं कर पाई. हालांकि प्रकाश झा इसे अपनी अब तक की बेहतरीन फिल्म मानते हैं. यह फिल्म भारतीय लोकतंत्र और राजनीति की पृष्ठभूमि में ही रची गई है. झा कहते हैं, यह दिमागी राजनीति को दिखाती है. इसमें सत्ता को हासिल करने के दांव दिखाए गए हैं. कुल मिलाकर यह सत्ता पर अंदर और बाहर से पकड़ रखने वालों की कहानी है. प्रकाश झा ने इससे पहले भी राजनीति पर आधारित कई फिल्में बनाई हैं, जिन्हें काफी सराहा गया, जैसे गंगाजल, अपहरण, राजनीति एवं आरक्षण. फिल्म राजनीति की सफलता से प्रभावित होकर वह राजनीति-2 भी बना रहे हैं. झा खुद बिहार में राजनीति में दो बार किस्मत आजमा चुके हैं और दोनों ही बार उन्हें नाकामी हाथ लगी.
औरंगजेब
इस फिल्म को अतुल सबरवाल ने डायरेक्ट किया और आदित्य चोपड़ा ने प्रोड्यूस. फिल्म की कहानी गुड़गांव के रियल स्टेट माफियाओं एवं राजनेताओं की साठगांठ से ज़मीन की दलाली और एक पुलिस ऑफिसर के राजनीतिक महत्वाकांक्षा पर आधारित है. यह कहानी बताती है कि सरकार ने किसानों से कौड़ियों के दाम ज़मीन खरीद कर किस तरह उसे करोड़ों-अरबों रुपये में भू-माफियाओं को बेच दी.
हज़ारों ख्वाहिशें ऐसी
निर्देशक सुधीर मिश्रा ने भारतीय राजनीति को बहुत क़रीब से देखा और जाना है. उनके दादा डीपी मिश्रा इंदिरा गांधी के बेहद क़रीबी थे और उनके चाचा बृजेश मिश्रा राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) की सरकार में राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार थे. शायद यहीं से प्रेरणा मिली उन्हें राजनीति पर आधारित फिल्म बनाने की. उनकी फिल्म हज़ारों ख्वाहिशें ऐसी वर्ष 2005 में रिलीज हुई थी. फिल्म की कहानी राजनीतिक बदलाव के दौर से गुजर रहे तीन युवाओं पर आधारित थी. इस फिल्म में आपातकाल से पहले और उसके बाद का घटनाक्रम दिखाया गया था. देश के एक गंभीर मुद्दे नक्सलवाद को भी उन्होंने अपनी फिल्म में दर्शाया.
रंग दे बसंती
राकेश ओम प्रकाश मेहरा की फिल्म रंग दे बसंती कॉलेज गोइंग युवाओं की कहानी है. कॉलेज में युवाओं की यह आम धारणा होती है कि देश के राजनीतिज्ञ भ्रष्ट हैं. युवाओं में इस कदर गुस्सा है कि वे मानते हैं कि राजनेताओं को उड़ा दिया जाए. यह फिल्म इस विचार पर आधारित है कि क्रांति की ज़रूरत आज भी है. आज भी राम प्रसाद बिस्मिल, चंद्रशेखर आज़ाद जैसे लोगों की ज़रूरत है, जो इस सड़ चुके तंत्र को साफ़ करें.
आंधी
फिल्म आंधी को प्रोड्यूस किया था गुलजार ने. फिल्म के मुख्य कलाकार थे संजीव कुमार एवं सुचित्रा सेन. फिल्म एक ऐसे कपल पर बनी थी, जो शादी के कुछ समय बाद ही अलग हो जाता है और पत्नी एक बड़ी राजनेता बन जाती है. कैंपेन के दौरान वह एक होटल में रुकती है, जहां उसकी मुलाकात उसके पति से होती है. तब माना गया कि यह फिल्म तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के जीवन पर आधारित है. वहीं कुछ लोगों का मानना था कि यह फिल्म राजनीतिज्ञ तारकेश्‍वरी सिन्हा के जीवन पर आधारित है. हकीकत जो भी हो, पर इंदिरा गांधी जब तक सत्ता में थीं, तब तक आंधी पूरी तरह से रिलीज नहीं हो पाई. जब 1977 में इंदिरा गांधी की सरकार की विदाई हुई, तभी जाकर आंधी पूरी तरह से थियेटरों में रिलीज हो पाई.
गरम हवा
फिल्म गरम हवा इस्मत चुगतई की एक शॉर्ट स्टोरी पर बनी थी. यह हिंदी सिनेमा की सर्वश्रेष्ठ फिल्मों में से एक मानी जाती है. विभाजन की त्रासदी पर आधारित यह फिल्म जूता व्यापारी सलीम मिर्ज़ा (बलराज साहनी) के इर्द-गिर्द घूमती है, जो विभाजन के बाद पाकिस्तान नहीं जाना चाहते. सलीम मिर्ज़ा के रिश्तेदार एक-एक करके पाकिस्तान जा रहे हैं. उनके भतीजे कासिम से उनकी बेटी अमीना निकाह करना चाहती है, पर कासिम भी अपने पिता के साथ पाकिस्तान चला जाता है, इस वायदे के साथ कि वह हिंदुस्तान आएगा और उससे निकाह करेगा. सलीम को उम्मीद है कि एक दिन सब ठीक हो जाएगा. सलीम का व्यवसाय प्रभावित होता है, इसकी वजह काफी हद तक उसका मुसलमान होना है. अपने वायदे के अनुसार कासिम निकाह करने भारत आता है, पर उसे राजनीतिक कारणों से निकाह के पहले ही गिरफ्तार कर वापस पाकिस्तान भेज दिया जाता है. अमीना और कासिम की यह आख़िरी मुलाकात है. अब उसका निकाह शमशाद (जलाल आगा) से होने वाला है, पर व्यवसाय में हो रही मुश्किलों के कारण शमशाद भी पाकिस्तान चला जाता है. सलीम मिर्जा का बड़ा बेटा भी व्यवसाय में हो रहे घाटे को देखते हुए पाकिस्तान जाना चाहता है. सलीम मिर्जा अपनी बेटी, पत्नी (शौकत आज़मी) एवं छोटे बेटे सिकंदर (फारुख शेख) के साथ भारत में रह जाता है. अमीना अपनी शादी न हो पाने से फिर मायूस है. बंटवारे के बाद मुसलमानों को पाकिस्तान में अच्छे मौ़के मिल सकने की उम्मीद, भारत में उनके साथ हो रहा भेदभाव, घर से बेघर हो जाने और बेटी का गम जैसी परिस्थितियां सलीम मिर्ज़ा की हिम्मत तोड़ देती हैं. फिल्म में दो देशों के बीच मजहब की राजनीति को दिखाया जाता है, वहीं दोनों मजहबों में आपसी विश्‍वास को भी दिखाया जाता है. मुस्लिम तांगे वाला कहता है कि यहां के हिंदू भाई बहुत अच्छे हैं, वे चमड़े के धंधे को हाथ भी नहीं लगाएंगे.
मेरे अपने
यह फिल्म बेरोज़गारी की समस्या पर आधारित है. इसकी कहानी कुछ ऐसे बेरोज़गार युवकों के इर्द-गिर्द घूमती है, जिनका कोई विजन नहीं है. वे गली-मुहल्लों में हुड़दंगई करते हैं और बात-बात में मरने-मारने के लिए उतारू हो जाते हैं. विनोद मेहरा और शत्रुघ्न सिन्हा के नेतृत्व में युवकों की टोलियां आपस में लड़ती हैं और इस लड़ाई में मीना कुमारी, जिन्हें सभी प्यार से नानी कहते हैं, उनकी गोली की शिकार हो जाती हैं.
गुलाल
अनुराग कश्यप लिखित फिल्म गुलाल कई किरदारों के जरिए आगे बढ़ती है. छात्र राजनीति, राजपूतों द्वारा अलग राज्य की मांग, नाजायज औलाद का गुस्सा, प्रेम कहानी, युवा आक्रोश का गलत इस्तेमाल जैसे विषय लेकर बनी इस फिल्म में गालियों का जमकर इस्तेमाल किया गया. इस बारे में अनुराग का कहना था कि यथार्थ दिखाने के लिए ऐसा किया गया. आज के दौर पर कटाक्ष करते हुए इस फिल्म में अमर शहीद राम प्रसाद बिस्मिल की ग़ज़ल सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है…पर एक पैरोडी भी है, जो कुछ इस तरह है…
ओ रे बिस्मिल, काश! आते आज तुम हिंदोस्तां
देखते कि मुल्क़ सारा यह टशन में, थ्रिल में है.
आज के जलसों में बिस्मिल, एक गूंगा गा रहा
और बहरों का वो रेला नाचता महफ़िल में है.

इसके अलावा श्याम बेनेगल की मंथन, आज का एमएलए, गांधी माई फादर, सरदार एवं किस्सा कुर्सी का आदि भी राजनीति पर बनी बेहतरीन फिल्में हैं.

 

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