अमीर-ग़रीब के बीच की खाई बढ़ रही है

देश में एक तरफ़ तो हालत तो यह है, तो वहीं दूसरी तरफ़ कॉरपोरेट सेक्टर ज़्यादा से ज़्यादा मुनाफ़ा कमाने की कोशिश में लगा हुआ है, इसलिए उसका टर्न ओवर भी बढ़ता जा रहा है. इस व्यवस्था में प्रतियोगिता है. दरअसल, जितनी कड़ी प्रतियोगिता होगी, लोग उतना ही ज़्यादा अपने प्रतिद्वंद्वी को हराने के लिए किसी भी हथकंडे का इस्तेमाल करेंगे. नतीजतन, भ्रष्टाचार का पनपना स्वाभाविक है. जब तक कॉरपोरेट सेक्टर में सुधार नहीं होता, तब तक ऊपरी स्तर पर भ्रष्टाचार को नियंत्रित नहीं किया जा सकता. 2-जी स्पेक्ट्रम एक उदाहरण भर है कि कॉरपोरेट सेक्टर अपने प्रतिद्वंद्वी को हराने के लिए किस तरह और कहां तक जा सकता है.   

82687605.previewप्रधानमंत्री मनमोहन सिंह एक बार फिर से देश की अर्थव्यवस्था को लेकर सकारात्मक नजर आ रहे हैं. पिछले कई मौकों पर उन्होंने अर्थव्यस्था को लेकर अपनी सकारात्मक सोच जाहिर की और कहा कि अर्थव्यवस्था के लिहाज से ज्यादा निराश होने की जरूरत नहीं है जल्द ही अच्छे दिन आने वाले हैं. मनमोहन सिंह ने यह भी कहा कि अर्थव्यवस्था में उतार-चढ़ाव होता रहता है, इसलिए हमें भरोसा है कि विकास दर में तेजी आएगी.
विकास दर पर न केवल काफी बातें होती हैं, बल्कि चर्चाएं भी होती रहती हैं. विपक्ष सरकार पर यह कहकर हमला बोलता है कि अर्थव्यवस्था के मुद्दे पर सरकार असफल रही है और लेकिन महत्वपूर्ण सवाल विकास के आंकड़े नहीं, विकास का कंटेंट है. 1991 में हम लोगों से वादा किया गया था कि आर्थिक सुधारों से विकास दर बढ़ेगी, समृद्धि आएगी, जो समाज के हर तबके तक पहुंचेगी और इस सबसे ग़रीबी ख़त्म हो जाएगी, लेकिन तेईस साल बीत गए, ग़रीबी और ग़रीब अब भी हैं. ऊपरी स्तर पर दिखने वाली चमक-दमक का नीचले स्तर पर कोई फ़ायदा होता नहीं दिखा और न कोई फ़ायदा हुआ.

सरकार कुछ निश्‍चित आंकड़ों से बचना चाहती है. एक बहुत बड़ी चिंता यह है कि कृषि क्षेत्र में निवेश बिल्कुल भी नहीं है. सरकार इस दिशा में बात भी नहीं करती. अगर इस विषय पर अभी नहीं सोचा गया, तो दस साल बाद हमें ज़बरदस्त रूप से अनाज की कमी की समस्या से जूझना पड़ेगा. उत्पादन का आंकड़ा भले ही बढ़ा है, लेकिन ग़ौरतलब है कि उसी अनुपात में जनसंख्या भी बढ़ी है. आज उन लोगों में गुस्सा है, जो  मीडिया में दिखाई जा रही चमक-दमक से भरी चीजें नहीं ख़रीद पा रहे हैं और बाज़ार से अलग कर दिए गए हैं.

चिंता ज़ाहिर की जाती है कि विकास दर घट रही है और दूसरी तरफ़ योजना आयोग यह बताता है कि शहर में जो भी व्यक्ति 32 रुपये प्रतिदिन से अधिक कमाता है, वह ग़रीब नहीं है. ये आंकड़े इधर-उधर हो सकते हैं, लेकिन यह बताने के लिए किसी अर्थशास्त्री की ज़रूरत नहीं है कि 32 रुपये वास्तव में दिन-प्रतिदिन के ख़र्च के लिए कितने कम हैं. हां यह अलग बात है कि इस देश के नेता पांच-दस रुपये में भरपेट भोजन मिल जाने का दावा करते हैं. यह विडंबना ही है. वास्तव में ज़रूरत अर्थव्यवस्था को पुनर्संगठित करने की है, ताकि उसमें निचले तबके का समावेश भी हो सके. ग्रामीण क्षेत्रों में जहां एक तरफ़ किसान हैं, वहीं दूसरी तरफ़ भूमिहीन मज़दूर भी हैं. शहरी क्षेत्रों में सड़कों पर और झुग्गी-झोपड़ियों में रहने वाले लोग हैं. सच तो यह है कि अमीर और ग़रीब के बीच की खाई और असमानता दिन-प्रतिदिन बढ़ती ही जा रही है. 1991 से पहले भले ही विकास दर कम रही हो, लेकिन इस तरह की विशालकाय असमानता नहीं देखने को मिलती थी.
सरकार कुछ निश्‍चित आंकड़ों से बचना चाहती है. एक बहुत बड़ी चिंता यह है कि कृषि क्षेत्र में निवेश बिल्कुल भी नहीं है. सरकार इस दिशा में बात भी नहीं करती. अगर इस विषय पर अभी नहीं सोचा गया, तो दस साल बाद हमें ज़बरदस्त रूप से अनाज की कमी की समस्या से जूझना पड़ेगा. उत्पादन का आंकड़ा भले ही बढ़ा है, लेकिन ग़ौरतलब है कि उसी अनुपात में जनसंख्या भी बढ़ी है. आज उन लोगों में गुस्सा है, जो मीडिया में दिखाई जा रही चमक-दमक से भरी चीजें नहीं ख़रीद पा रहे हैं और बाज़ार से अलग कर दिए गए हैं. सरकार उस गुस्से को नजरअंदाज क्यों कर रही है यह समझ से परे है. आज ज़रूरत इस बात की है कि तत्काल रोज़गार सृजन पर ध्यान दिया जाए, ताकि युवा पीढ़ी रोज़गार के अवसरों में आ रही लगातार कमी की वजह से निराश न हो. हम भले ही इस बात पर खुश हो रहे हैं कि भारत सबसे युवा देश बनने जा रहा है, लेकिन हम उन युवा हाथों में रोजगार कैसे देगें यह भी हमें ही सोचना होगा.
देश में एक तरफ़ तो हालत तो यह है, तो वहीं दूसरी तरफ़ कॉरपोरेट सेक्टर ज़्यादा से ज़्यादा मुनाफ़ा कमाने की कोशिश में लगा हुआ है, इसलिए उसका टर्न ओवर भी बढ़ता जा रहा है. इस व्यवस्था में प्रतियोगिता है. दरअसल, जितनी कड़ी प्रतियोगिता होगी, लोग उतना ही ज़्यादा अपने प्रतिद्वंद्वी को हराने के लिए किसी भी हथकंडे का इस्तेमाल करेंगे. नतीजतन, भ्रष्टाचार का पनपना स्वाभाविक है. जब तक कॉरपोरेट सेक्टर में सुधार नहीं होता, तब तक ऊपरी स्तर पर भ्रष्टाचार को नियंत्रित नहीं किया जा सकता. 2-जी स्पेक्ट्रम एक उदाहरण भर है कि कॉरपोरेट सेक्टर अपने प्रतिद्वंद्वी को हराने के लिए किस तरह और कहां तक जा सकता है.

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One thought on “अमीर-ग़रीब के बीच की खाई बढ़ रही है

  • February 5, 2014 at 3:15 PM
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    एक बहुत बड़ी चिंता यह है कि कृषि क्षेत्र में निवेश बिल्कुल भी नहीं है. सरकार इस दिशा में बात भी नहीं करती. अगर इस विषय पर अभी नहीं सोचा गया, तो दस साल बाद हमें ज़बरदस्त रूप से अनाज की कमी की समस्या से जूझना पड़ेगा. उत्पादन का आंकड़ा भले ही बढ़ा है, लेकिन ग़ौरतलब है कि उसी अनुपात में जनसंख्या भी बढ़ी है. आज उन लोगों में गुस्सा है, जो मीडिया में दिखाई जा रही चमक-दमक से भरी चीजें नहीं ख़रीद पा रहे हैं और बाज़ार से अलग कर दिए गए हैं.

    वास्तव में ज़रूरत अर्थव्यवस्था को पुनर्संगठित करने की है, ताकि उसमें निचले तबके का समावेश भी हो सके. ग्रामीण क्षेत्रों में जहां एक तरफ़ किसान हैं, वहीं दूसरी तरफ़ भूमिहीन मज़दूर भी हैं. शहरी क्षेत्रों में सड़कों पर और झुग्गी-झोपड़ियों में रहने वाले लोग हैं. सच तो यह है कि अमीर और ग़रीब के बीच की खाई और असमानता दिन-प्रतिदिन बढ़ती ही जा रही है

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