क्या ऐसे वर्ल्डकप जीतेगी टीम इंडिया!

कप्तान धोनी के क़रीबी होने की वजह से सुरेश रैना लगातार टीम में बने हुए हैं, जबकि दूसरे खिलाड़ियों को एक सीरीज में असफल रहने पर या नए खिलाड़ियों को मौक़ा दिए बिना ही टीम से बाहर का रास्ता दिखाया जा रहा है. ऐसे खिलाड़ियों की भी कमी नहीं है, जो घरेलू क्रिकेट में बेहतरीन प्रदर्शन कर लगातार टीम इंडिया के दरवाजे खटखटाते रहे हैं, लेकिन रैना न तो टीम से बाहर गए, न ही उन्हें कोई चेतावनी दी गई. रैना ने अपना पिछला शतक  जनवरी 2010 में ढाका में श्रीलंका के ख़िलाफ़ लगाया था.

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क्रिकेट विश्‍वकप के आयोजन में तक़रीबन एक साल का वक्त बाकी है, लेकिन भारतीय टीम विश्‍व विजेता का खिताब बचाने के लिहाज से कतई काम करती नहीं दिख रही है. विदेशी धरती पर भारत का शर्मनाक प्रदर्शन जारी है. ऑस्ट्रेलिया, इंग्लैंड एवं दक्षिण अफ्रीका के बाद न्यूजीलैंड, हर जगह भारतीय बल्लेबाज तेज गेंदबाजों के आगे घुटने टेकते नज़र आए. बल्लेबाजों का ढेर होना समझ में आता है, लेकिन तेज और स्विंग गेंदबाजों के लिए माकूल पिचों पर तेज गेंदबाजों का असफल होना टीम इंडिया के लिए चिंता का विषय है. वर्तमान में टीम इंडिया जैसा प्रदर्शन कर रही है, उसके बूते क्या वह अपना खिताब बचा पाएगी? दुनिया भर में अपनी बल्लेबाजी के दम पर डंका बजाने वाले भारतीय बल्लेबाजों का बैंड बज रहा है. ढेरों रन लुटाते गेंदबाज असहाय और भारतीय कप्तान महेंद्र सिंह धोनी बगलें झांकते नज़र आ रहे हैं. कामयाबी के शिखर बैठे कप्तान महेंद्र सिंह धोनी की अगुवाई में भारतीय टीम ने जब न्यूजीलैंड में क़दम रखा, तो ऐसा लगा कि इस बार इतिहास बदलेगा. धोनी ने कहा कि वह विदेशी दौरों पर अपना रिकॉर्ड सुधारना चाहते हैं, लेकिन एक पखवाड़ा गुजरा नहीं कि टीम की कलई खुल गई. भारतीय टीम एक बार फिर ढेर हो गई. विदेशी जमीं पर एक बार फिर हार का मुंह देखना पड़ा है. लगता है कि भारतीय खिलाड़ियों को खुद से ज़्यादा खुदा पर भरोसा हो गया है. विराट कोहली एवं मोहम्मद शमी को छोड़कर और किसी खिलाड़ी के प्रदर्शन में निरंतरता नहीं है. कैप्टन कूल भी भारतीय टीम की नैया पार नहीं लगा पा रहे हैं. विदेशी पिचों पर बतौर कप्तान असफल रहने का दाग दौरा दर दौरा गहराता जा रहा है. भारतीय बल्लेबाजों की हालत पस्त है. शिखर धवन, रोहित शर्मा, अजिंक्य रहाणे एवं सुरेश रैना का बल्ला लगातार विदेशी पिचों पर नाकाम हो रहा है.
शिखर धवन ने चैंपियंस ट्रॉफी में अपने बल्ले का जौहर दिखाते हुए टीम इंडिया को चैंपियन बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की थी, लेकिन उसके बाद विदेशी धरती पर उनका बल्ला शांत ही रहा है. शिखर धवन ने अब तक भारत के लिए कुल 33 वनडे मैच खेले हैं. धवन ने 32 पारियों में 92.52 के धांसू स्ट्राइक रेट से कुल 1275 रन बनाए हैं. इस दौरान उनका उच्च स्कोर 119 रन रहा है, जिसमें उनके 5 शतक और 5 अर्द्धशतक शामिल हैं. वैसे तो शिखर धवन एक आला दर्जे के बल्लेबाज हैं, उन्होंने कई धमाकेदार पारियां भी खेली हैं, लेकिन पिछले कुछ मैचों में उनका जैसा प्रदर्शन रहा है, उससे सवाल उठना लाजिमी है. दक्षिण अफ्रीका के दौरे के दौरान धोनी ने गंभीर का नाम लिया था कि वह अभी भी उनकी योजनाओं में हैं. यदि धवन का बल्ला लगातार शांत रहता है, तो चयनकर्ता गंभीर को एक आख़िरी मौक़ा दे सकते हैं. यदि गंभीर को मौक़ा मिलता है, तो वह हाथ आए इस मौ़के को कतई खाली नहीं जाने देंगे. रणजी ट्रॉफी में गंभीर के खराब प्रदर्शन की वजह से शिखर कुछ दिन और शिखर पर बने रह सकते हैं. कोलकाता नाइट राइडर्स के कप्तान के रूप में गंभीर के पास वापसी करने का एक सुनहरा मौक़ा है. उससे पहले शिखर को सचेत हो जाना चाहिए.
कप्तान धोनी के क़रीबी होने की वजह से सुरेश रैना लगातार टीम में बने हुए हैं, जबकि दूसरे खिलाड़ियों को एक सीरीज में असफल रहने पर या नए खिलाड़ियों को मौक़ा दिए बिना ही टीम से बाहर का रास्ता दिखाया जा रहा है. ऐसे खिलाड़ियों की भी कमी नहीं है, जो घरेलू क्रिकेट में बेहतरीन प्रदर्शन कर लगातार टीम इंडिया के दरवाजे खटखटाते रहे हैं, लेकिन रैना न तो टीम से बाहर गए, न ही उन्हें कोई चेतावनी दी गई. रैना ने अपना पिछला शतक जनवरी 2010 में ढाका में श्रीलंका के ख़िलाफ़ लगाया था. वहीं, रैना ने अपना पिछला अर्द्धशतक अगस्त 2013 में जिम्बॉब्वे के ख़िलाफ़ लगाया था. चेतेश्‍वर पुजारा देशी-विदेशी धरती पर अपनी तकनीक और बल्ले का लोहा मनवा चुके हैं. उन पर टेस्ट खिलाड़ी का टैग लगाकर लगातार एकदिवसीय टीम से बाहर रखा जा रहा है. तेज पिचों पर खेलने के लिए तकनीकी सुदृढ़ता चाहिए. बल्लेबाजी तकनीक के मामले में पुजारा कहीं से कमतर नहीं हैं. जिस तरह चयनकर्ताओं ने 2003 के विश्‍वकप से पहले हेमांग बदानी पर लक्ष्मण से ज़्यादा विश्‍वास जताया और उन्हें विश्‍वकप में खेलने का मौक़ा दिया था, भले ही टीम इंडिया तब फाइनल तक पहुंचने में कामयाब रही थी, लेकिन बदानी का प्रदर्शन बेहद खराब रहा था. ठीक वैसी ही गलती इस बार पुजारा को नज़रअंदाज करके दोहराई जा रही है. चयनकर्ताओं को यह बात अपने जेहन में रखनी चाहिए कि अगला विश्‍वकप ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड में होना है और भारतीय टीम को हमेशा यहां की पिचों पर मुंह की खानी पड़ी है. बावजूद इसके खिलाड़ियों को निजी संबंध और व्यक्तिगत पसंद के आधार पर जगह मिल रही है, तो यह बेहद चिंताजनक है.
रोहित शर्मा ने ऑस्ट्रेलिया के ख़िलाफ़ घरेलू सीरीज में धमाकेदार प्रदर्शन किया, तो लगा कि वह अपनी लय में आ गए हैं, उन्हें अपार प्रतिभा का धनी मानने वाले लोगों को लगा कि सचिन तेंदुलकर के संन्यास लेने के बाद भारतीय टीम को एक ऐसा खिलाड़ी मिल गया है, जो अकेले ही विपक्षी गेंदबाजों को लोहे के चने चबवा सकता है, लेकिन रोहित भी घरेलू विकेटों के रणबांकुरे बने रहे. लगभग सभी विदेशी दौरों पर उनका बल्ला खामोश ही रहा. अनियमित तौर पर यदा-कदा उनका बल्ला चला, लेकिन उन पर विश्‍वास जता पाना बेहद मुश्किल लगता है. उनकी बॉडी लैंग्वेज बेहद सुस्त दिखाई पड़ती है. इसी वजह से वह विदेशी विकेटों पर तालमेल बैठा पाने में असफल रहे हैं. एक आल राउंडर की तरह टीम में जगह पाने वाले रविंद्र जड़ेजा का बल्ला बीच-बीच में थोड़ी-बहुत चमक दिखा जाता है, लेकिन उनकी ये पारियां भारतीय टीम को जीत के मुहाने पर नहीं पहुंचा पाती हैं. वह एक स्पिन गेंदबाज हैं, जो बल्लेबाजी कर सकता है, यही उनकी पहचान है. उनका बल्ला उनकी फिरकी के सामने खामोश ही दिखाई पड़ता है. गेंदबाजी के दम पर जड़ेजा आईसीसी रैंकिंग में पहले पायदान पर भी पहुंच गए थे, लेकिन बतौर बल्लेबाज वह पूरी तरह असफल रहे हैं. लंबे समय बाद रविंद्र जड़ेजा ने न्यूजीलैंड में लगातार दो अर्द्धशतक लगाए, लेकिन भारत की डूबती नैया को वह नहीं बचा पाए. भले ही वह विश्‍वकप की टीम में जगह पा लें, लेकिन विषम परिस्थितियों में वह बतौर बल्लेबाज असफल ही साबित हुए हैं.
गेंदबाजों का तो बहुत बुरा हाल है. देश हो या विदेश, गेंदबाज लगातार रन लुटाते रहे हैं और टीम की लुटिया डूबती रही है. घरेलू विकेटों पर बल्लेबाजों का बल्ला गेंदबाजों के घटिया प्रदर्शन पर पर्दा डाल देता है. विदेशी पिचों पर सभी की कलई खुल जाती है. तेज गेंदबाजों के लिए माकूल पिचों पर हमारे बल्लेबाज असहज और अप्रभावी हो जाते हैं. जिन पिचों पर विपक्षी गेंदबाज आग उगल रहे होते हैं, वहां हमारे गेंदबाज औसत दर्जे की गेंदबाजी करते हैं. उनकी गेंदबाजी अनियंत्रित और दिशाहीन हो जाती है, जिसका फायदा विपक्षी टीम के बल्लेबाज बेहतरीन तरीके से उठाते हैं और भारतीय टीम को मुंह की खानी पड़ती है. टीम में नए गेंदबाजों की जो खेप आई, जिसमें मोहम्मद शमी, उमेश यादव, वरुण ऐरोन, भुवनेश्‍वर कुमार, विनय कुमार एवं जयदेव उनदकर आदि शामिल हैं, में मोहम्मद शमी को छोड़कर कोई भी गेंदबाज स्थाई तौर पर टीम में जगह नहीं बना सका. इनमें से कोई एक सीरीज में अच्छा प्रदर्शन करता है, तो दूसरी में बदतर. युवा गेंदबाजों की मदद करने के लिए टीम में कोई अनुभवी गेंदबाज मौजूद नहीं है. जहीर बीसीसीआई के एकदिवसीय मैचों के प्लान में नहीं हैं. कप्तान धोनी जहीर खान को हालिया दक्षिण अफ्रीकी दौरे में एक बॉलिंग मेंटोर के रूप में ले गए थे. इससे ज़हीर खान की अहमियत का अंदाजा लग जाता है. गेंदबाज लगातार संघर्ष कर रहे हैं. 2015 में विश्‍वकप का खिताब बचाए रखने के लिए गेंदबाजी की समस्या का समाधान करना बेहद ज़रूरी है. गेंदबाजी भारतीय टीम की कमजोर कड़ी हमेशा से रही है. फिलहाल इसे मजबूती देने के लिए जहीर खान को टीम में बनाए रखना बेहद ज़रूरी हो गया है. यदि जहीर फिट हैं और टेस्ट मैचों में बेहतर गेंदबाजी कर रहे हैं, तो उन्हें बीसीसीआई किस आधार पर एकदिवसीय टीम में नहीं बनाए रखना चाहती है, यह समझ से परे है. ज़हीर खान की गैर मौजूदगी में टीम में सबसे सीनियर गेंदबाज ईशांत शर्मा हैं. ईशांत ने वर्ष 2008 में ऑस्ट्रेलियाई दौरे पर जो गेंदबाजी की थी, उसे देखकर लगा था कि भारतीय टीम को ज़हीर का उत्तराधिकारी मिल गया है, लेकिन ईशांत इंग्लैंड, ऑस्ट्रेलिया एवं दक्षिण अफ्रीका, सभी विदेशी दौरों पर असफल रहे हैं. न्यूजीलैंड के ख़िलाफ़ हालिया सीरीज में दो मैचों में ईशांत ने 59 के औसत से महज 2 विकेट लिए. ईशांत एकादश में बने रहने के लिए संघर्ष कर रहे हैं. ऐसा लग रहा है कि वह टीम में ज़्यादा दिनों तक अपना स्थान सुरक्षित नहीं रख पाएंगे. उनकी इकॉनोमी और स्ट्राइक रेट सवालों के घेरे में है. फील्डिंग और बल्लेबाजी भी उनकी मदद करती नहीं दिख रही है. शायद उनके विकल्प के रूप में ही घरेलू क्रिकेट में बेहतरीन गेंदबाजी करने वाले ईश्‍वर पांडे को न्यूजीलैंड दौरे पर भेजा गया है, ताकि वह विश्‍वकप के लिहाज से तैयारी कर सकें और वहां की परिस्थितियों के बारे में समझ विकसित कर सकें.
पिछले एक साल में मोहम्मद शमी ने बेहतरीन प्रदर्शन किया है. थोड़े से समय में वह टीम इंडिया की गेंदबाजी की धुरी बनकर उभरे हैं. अपने छोटे से अंतरराष्ट्रीय करियर में शमी ने 24 एकदिवसीय मैचों में लगभग 29 के औसत से 40 विकेट लिए हैं. जबकि उनका साथ दे रहे युवा भुवनेश्‍वर कुमार ने 30 मैचों में 33 विकेट लिए हैं. टीम में बतौर स्पिन गेंदबाज खेलने वाले अश्‍विन भी तेज पिचों पर बेअसर नज़र आ रहे हैं. बल्लेबाजी के दम पर वह ज़्यादा दिनों तक टीम में नहीं बने रह पाएंगे. बतौर गेंदबाज उनका प्रदर्शन दक्षिण अफ्रीका और न्यूजीलैंड, दोनों में बेहद खराब रहा. दक्षिण अफ्रीका के ख़िलाफ़ वह तीन एकदिवसीय मैचों में 169 रन खर्च करके केवल एक विकेट और न्यूजीलैंड सीरीज के पहले चार मैचों में 190 रन देकर केवल एक विकेट हासिल कर सके. अमित मिश्रा को जब-जब मौक़ा मिला है, उन्होंने अपनी उपयोगिता साबित की, लेकिन धोनी का क़रीबी होने का फायदा अश्‍विन को मिला और उन्हें अमित मिश्रा पर वरीयता मिली. तेज पिचों में किया गया प्रदर्शन उन्हें विश्‍वकप की टीम में जगह दिला पाने के लिए नाकाफी है. अब तक खेले गए 74 एकदिवसीय मैचों में अश्‍विन 33.86 के औसत से केवल 97 विकेट हासिल कर सके हैं. इन आंकड़ों को विश्‍वस्तरीय स्पिन गेंदबाजी के लिहाज से बेहतरीन नहीं कहा जा सकता. जबकि अमित मिश्रा ने अब तक खेले गए 21 मैचों में 23 के औसत से 37 विकेट हासिल किए. वह विदेशी धरती पर भी सफल रहे हैं.
महेंद्र सिंह धोनी एक करिश्माई कप्तान हैं. उनकी कप्तानी का हर कोई कायल है. उनका आईसीसी प्रतियोगिताएं जीतने का रिकॉर्ड बहुत बेहतर है. इस वजह से उनसे पूरे देश को आशाएं हैं कि वह भारत को एक बार फिर से विश्‍व विजेता बनाएंगे. लेकिन, एक सेनापति तभी युद्ध जीत सकता है, जब उसके पास बेहतर युद्ध कौशल वाले सैनिक हों. यहां बतौर कप्तान धोनी को यह समझना होगा कि मेन इन यलो (चेन्नई सुपरकिंग्स) मेन इन ब्लू (टीम इंडिया) नहीं हो सकते हैं. उनकी जवाबदेही देश के प्रति है, न कि बीसीसीआई प्रमुख और चेन्नई सुपरकिंग्स के मालिक एन श्रीनिवासन के प्रति. धोनी को देश के लिए निजी संबंधों को तिलांजलि देनी होगी और अपने तरकश में वे अचूक तीर लाने होंगे, जो उन्हें एक बार फिर विश्‍वकप दिला सकें. अभी तक तो भारतीय चयनकर्ता भी ट्रायल एंड इरर मैथड एप्लाई करते दिख रहे हैं. उनके पास गेंदबाजों को लेकर कोई योजना नहीं है. जो खिलाड़ी विश्‍वकप बीसीसीआई और धोनी की योजनाओं में हैं, उन्हें समय रहते मा़ैका दिया जाना चाहिए, जिससे वे ज़्यादा से ज़्यादा मैच खेल सकें और खुद को क्रिकेट के महाकुंभ के लिए तैयार कर सकें. यदि बीसीसीआई ने समय रहते आवश्यक क़दम नहीं उठाए, तो रेत के महल को ढहने में बिल्कुल भी वक्त नहीं लगेगा.

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