कवर स्टोरी-2राजनीति

पेड़ पर पैसा उगाने की कला

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अप्रैल-मई में होने वाले लोकसभा चुनावों से पहले जापान की एडवरटाइजिंग एवं पीआर कंपनी डेंट्सू इंडिया कांग्रेस पार्टी और राहुल गांधी के लिए एक बड़ा कैंपेन भी तैयार कर रही है. लेकिन उस एजेंसी की भी कलई तब खुल गई, जब राहुल के मैं नहीं हम वाले विज्ञापन पर विवाद हो गया. एजेंसी जो कैंपेन आम आदमी के सशक्तिकरण के कॉन्सेप्ट पर तैयार कर रही है और राहुल गांधी को एक एंग्री यंगमैन के रूप में पेश कर रही है, राहुल अपने बयानों से उन सारे प्रयासों पर पानी फेर दे रहे हैं. 

sgपिछले दिनों जब राहुल गांधी ने 9 से बढ़ाकर 12 सिलेंडरों पर सब्सिडी देने की घोषणा की, तो आर्थिक विश्‍लेषकों ने आम राय से यह व्याख्या की कि जब दो साल पहले यही निर्णय वापस लिया गया था, तब भी ऐसी ही आर्थिक परिस्थितियां देश के सामने थीं या इससे कमतर ही थीं, तब वही निर्णय आज दोहराया क्यों गया. उस वक्त प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा था कि पेट्रोलियम पदार्थों पर अगर सब्सिडी बढ़ाई जाएगी, तो अधिभार बढ़ेगा, उसके लिए पैसा कहां से आएगा. पैसा पेड़ पर नहीं उगता. लेकिन, अगर देश के आर्थिक माहौल को देखें, तो आपके आसपास ही ऐसे अनेक उदाहरण देखने को मिलेंगे, जब यह मानने की कोई वजह रह नहीं जाती कि पैसे पेड़ पर नहीं उगते.

हाल ही में आरटीआई के तहत एक जानकारी मिली कि किस तरह से उत्तर प्रदेश सरकार के वकील सरकार की तरफ़ से मुकदमों की पैरवी के नाम पर पैसे बना रहे हैं. यह क्रम बदस्तूर हर सरकारों में जारी है, फिर चाहे वह सपा हो या बसपा. बसपा नेता एवं अधिवक्ता सतीश चंद्र मिश्र और समाजवादी पार्टी के प्रवक्ता एवं अधिवक्ता गौरव भाटिया का नाम इस प्रकरण में सबसे ऊपर है.
आरटीआई के तहत उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से निचली अदालत, उच्च न्यायालय एवं उच्चतम न्यायालय में पेश होने वाले वकीलों के शुल्क ढांचे, चयन प्रक्रिया और मापदंड आदि की जानकारी मांगी गई थी. उत्तर प्रदेश न्याय विभाग के विशेष सचिव डॉ. अजय कृष्णविश्‍वेश ने इस प्रतिवेदन में जो जवाब दिया, उसके मुताबिक, उत्तर प्रदेश की मायावती सरकार में कैबिनेट मंत्री रहे सतीश चंद्र मिश्र 2009-10 से 2011-12 तक राज्य सरकार की ओर से सुप्रीम कोर्ट में पेश हुए. इस दौरान मिश्र ने अपनी फीस के रूप में राज्य सरकार से कुल 4,64,20,000 रुपये लिए, जबकि उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी की सरकार आने के बाद से गौरव भाटिया भी विभिन्न मुकदमों में पेश होकर आर्थिक लाभ उठा रहे हैं. सपा की विधि इकाई के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं उत्तर प्रदेश के पूर्व महाधिवक्ता वीरेंद्र भाटिया के पुत्र गौरव भाटिया को लगभग डेढ़ साल में सूबे के अपर महाधिवक्ता के तौर पर मुकदमों की पैरवी के लिए 47,69,677 रुपये का भुगतान किया गया है.
यह फेहरिस्त बहुत लंबी है. सुप्रीम कोर्ट के बहुत से वरिष्ठ अधिवक्ता भी हैं, जिन्होंने शीर्ष न्यायालय में उत्तर प्रदेश सरकार का पक्ष रखा है. उत्तर प्रदेश सरकार ने के के वेणुगोपाल, राकेश द्विवेदी, हरीश एन साल्वे और गोपाल सुब्रह्मण्यम जैसे वरिष्ठ अधिवक्ताओं को भी फीस के रूप में भारी-भरकम रकम अदा की है. उत्तर प्रदेश सरकार ने वर्ष 2007-08 से 31 अक्टूबर, 2013 तक सुप्रीम कोर्ट में प्रदेश सरकार का पक्ष रखने के लिए अधिवक्ता के के वेणुगोपाल को 2,40,76,000 रुपये, अधिवक्ता गोपाल सुब्रह्मण्यम को 1,47,45,000 रुपये, अधिवक्ता राकेश द्विवेदी को 1,24,29,300 रुपये और अधिवक्ता हरीश एन साल्वे को 63,97,500 रुपये का भुगतान किया है.
उच्चतम न्यायालय के वरिष्ठ पैनल अधिवक्ता की बहस की फीस 15 हज़ार रुपये, जबकि कनिष्ठ पैनल अधिवक्ता की फीस पांच हज़ार रुपये प्रति कार्य दिवस है. लेकिन यहां पर जो मौजूं सवाल है कि इतनी फीस लेने के बाद भी अधिकांश अधिवक्ता सरकार की ओर से पैरोकारी में असफल रहते हैं यानी अपने मुकदमे हार जाते हैं. अब सवाल यह है कि क्या सरकार जनता के इन पैसों को अपने वकीलों पर मुकदमे हारने के लिए लुटा रही है? भारत सरकार की तरफ़ से आयकर के समय पर भुगतान के जो विज्ञापन विभिन्न समाचार माध्यमों के जरिए जनता तक पहुंचाए जाते हैं, उनके लिए सरकार उक्त माध्यमों को करोड़ों रुपये शुल्क के तौर पर चुकाती है. सरकार प्रचार माध्यमों से लोगों को जागरूक करती है कि आप अपना आयकर समय से चुकाएं. देश में अधिकांश लोग आयकर में छूट पाने के लिए पब्लिक क्षेत्र की कंपनी एलआईसी में निवेश करते हैं, लेकिन आपको जानकर आश्‍चर्य होगा कि एलआईसी ही इस देश की सबसे बड़ी इनकम टैक्स डिफॉल्टर कंपनी है. 15 लाख करोड़ रुपये की संपत्ति वाली और देश की सबसे बड़ी बीमा कंपनी भारतीय जीवन बीमा निगम (एलआईसी) 7000 करोड़ रुपये से अधिक के आयकर डिफॉल्ट के आरोपियों की सूची में शीर्ष पर है.
यह जानकारी भी देश को सूचना के अधिकार के तहत ही मिली. आरटीआई कार्यकर्ता सुभाष चंद्र अग्रवाल ने जो जानकारी आयकर विभाग से हासिल की है, उसके मुताबिक, आयकर विभाग के अतिरिक्त निदेशक ने एक सूची जारी की है. एलआईसी 7000 करोड़ रुपये से अधिक के आयकर डिफॉल्ट के साथ इस लिस्ट में पहले पायदान पर है. हालांकि यह आंकड़ा साल 2011 तक का ही है, उसके बाद के आंकड़े अभी नहीं मिल पाए हैं और एलआईसी ऐसे किसी मामले से इंकार भी कर रहा है. एलआईसी के बाद आदित्य बिड़ला टेलीकॉम पर 2,372 करोड़, वोडाफोन इंफ्रास्ट्रक्चर पर 2,038 करोड़, आइडिया सेल्युलर पर 1,517 करोड़ और भारत पेट्रोलियम कॉरपोरेशन पर 1,494 करोड़ रुपये बकाया है. भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड पर भी 167.10 करोड़ रुपये का बकाया है. वहीं संस्थाओं के अलावा इस सूची में कई व्यक्तियों के भी नाम शामिल हैं, जिनमें एक प्रमुख नाम झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री मधु कोड़ा का भी है. वही सवाल फिर से एक बार खड़ा होता है कि सरकार कहती है कि अगर आप टैक्स नहीं चुकाएंगे, तो वह सुविधाएं कहां से देगी? तो आख़िर सरकार अपने ही संस्थानों से आयकर हासिल करने में फिसड्डी क्यों होती जा रही है? सरकार अपना राग पैसा पेड़ पर नहीं उगता, क्यों भूल जाती है?
वास्तव में पैसा पेड़ पर नहीं उगता की दोबारा शुरुआत राहुल गांधी के ही कारण हुई. प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भले ही इस बात की चिंता करते हों कि सब्सिडी इसलिए नहीं दी जा सकती, क्योंकि अधिभार बढ़ेगा, लेकिन राहुल गांधी अपनी इमेज बिल्डिंग के लिए प्रधानमंत्री की इस चिंता को धता बता रहे हैं. तक़रीबन दो महीने पहले पार्टी और राहुल गांधी की इमेज संवारने के लिए जापान की पीआर एजेंसी डेंट्सू की इंडिया इकाई को 500 करोड़ रुपये का ठेका दिया गया. एजेंसी प्रिंट, डिजिटल और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में राहुल गांधी की दमदार मौजूदगी पर काम कर रही है. इसी तैयारी के चलते राहुल गांधी का मीडिया साक्षात्कार भी आयोजित किया गया, लेकिन पीआर एजेंसी तो केवल राहुल के बाहरी व्यक्तित्व को ही निखार सकती है, बेहतर प्रस्तुत कर सकती है. भीतर तो जो वह हैं, उसे केवल राहुल अपने प्रयासों से ही बदल सकते हैं. इसीलिए जब राहुल गांधी ने पहली बार एक अंग्रेजी चैनल को साक्षात्कार दिया और उसके बाद जिस तरह चौतरफ़ा आलोचना झेली, उसने यह सवाल खड़ा कर दिया कि राहुल की इमेज बिल्डिंग के नाम पर यह पैसा क्यों बहाया जा रहा है.
अप्रैल-मई में होने वाले लोकसभा चुनावों से पहले जापान की एडवरटाइजिंग एवं पीआर कंपनी डेंट्सू इंडिया कांग्रेस पार्टी और राहुल गांधी के लिए एक बड़ा कैंपेन भी तैयार कर रही है. लेकिन उस एजेंसी की भी कलई तब खुल गई, जब राहुल के मैं नहीं हम वाले विज्ञापन पर विवाद हो गया. एजेंसी जो कैंपेन आम आदमी के सशक्तिकरण के कॉन्सेप्ट पर तैयार कर रही है और राहुल गांधी को एक एंग्री यंगमैन के रूप में पेश कर रही है, राहुल अपने बयानों से उन सारे प्रयासों पर पानी फेर दे रहे हैं. याद कीजिए, अंग्रेजी न्यूज चैनल को दिए गए इंटरव्यू में राहुल गांधी का वह बयान, जिसमें 1984 के दंगों के बारे में पूछे जाने पर वह कहते हैं कि मैं व्यक्तिगत तौर पर उन दंगों में शामिल नहीं था. जो लोग शामिल थे, उन्हें सजा मिल चुकी है. इसके बाद सिख समुदाय के लोगों ने इस बात को लेकर खासा बवाल किया कि राहुल गांधी स्पष्ट करें कि वे कौन से कांग्रेसी थे, जो 1984 के सिख दंगों में शामिल थे. राहुल की इमेज बनने के बजाय दिनोंदिन बिगड़ती ही जा रही है. जो आगामी लोकसभा चुनाव रागां बनाम नमो के तौर पर देखा जा रहा था, वह अब खिसक कर नरेंद्र मोदी बनाम अरविंद केजरीवाल की ओर बढ़ गया है. क्या 500 करोड़ खर्च करके राहुल गांधी अपनी ऐसी ही इमेज बनाना चाहते थे? यह तो उन्हें फ्री में ही हासिल हो जाती. इन पैसों का हिसाब अगर जनता मांगे, तो जाहिर है कि राहुल गांधी उसे यही जवाब देंगे कि पैसा पेड़ पर नहीं उगता.
लेकिन अब जब चुनाव नजदीक आ गया है, तो कांग्रेस सरकार उन्हीं योजनाओं को नए सिरे से लागू कर रही है, जिनके लिए वह कल तक अधिभार का रोना रो रही थी. मौजूदा समय में कुल जीडीपी का 14 प्रतिशत हिस्सा सब्सिडी पर खर्च किया जा रहा है. सब्सिडी पर खर्च को लेकर कोई प्रश्‍नचिन्ह नहीं है, लेकिन सवाल इस बात पर ज़रूर है कि आख़िर इस क़दम से जनता के पैसे से जनता को ही तो लुभाया जा रहा है और वह भी अपने राजनीतिक फायदे के लिए. ग़ौर करिए कि जहां भी सब्सिडी दी जा रही है, वहीं पर भ्रष्टाचार सबसे ज़्यादा है. अनाज माफिया खाद्यान्नों पर दी जाने वाली सब्सिडी के चलते ही सस्ता अनाज खरीद कर कालाबाज़ारी कर रहे हैं, तो मंजूनाथ और यशंवत सोनावणे जैसे अधिकारी तेल सब्सिडी से उपजे माफियाओं के हाथों मारे जा रहे हैं. एक और सवाल है कि जब सरकारी खजाने की हालत पतली हो, तो राजकोषीय घाटे को बढ़ाने वाले क़दमों के अर्थव्यवस्था पर संभावित असर को लेकर सबको चिंतित होना चाहिए. यूपीए सरकार यही कर रही है. और यह हथियार केवल यूपीए सरकार ही नहीं, राज्य सरकारें भी हथिया रही हैं. दिल्ली में आम आदमी पार्टी अपने चुनावी फायदे के लिए जनता का ही पैसा लेकर सब्सिडी के नाम पर बिजली कंपनियों को सौंप रही है. उत्तर प्रदेश में सरकार हर घटना के बाद कंबल और खाद्यान्नों के पैकेट बांटकर अपनी ज़िम्मेदारी पूरी मान लेती है. वास्तव में ऐसे क़दम रोग को कम नहीं करते, बल्कि रोग को बढ़ाते हैं.
इस मुद्दे पर सरकारें सामान्य दिनों में जो कहती हैं, व्यवहार में (खासकर चुनाव क़रीब आने पर) वे खुद उसका उल्लंघन करती हैं. जिस सब्सिडी का लाभ संपन्न तबके हथिया लेते हैं, अक्सर उन्हें भी तर्कसंगत बनाने का साहस वे नहीं दिखातीं. इसकी एक मिसाल डीजल है, जिस पर सरकार अभी भी प्रति लीटर लगभग साढ़े आठ रुपये सब्सिडी दे रही है, जबकि खुद पेट्रोलियम मंत्रालय के पेट्रोलियम प्लानिंग एंड एनालिसिस सेल द्वारा कराए गए अध्ययन के मुताबिक, देश में डीजल की 70 फ़ीसद खपत परिवहन में होती है. डीजल पर दी जा रही कुल 92,061 करोड़ रुपये की सब्सिडी में लगभग 12,100 करोड़ रुपये का लाभ प्राइवेट कारों एवं यूटिलिटी वेहिकल्स के मालिक उठा रहे हैं, जबकि कमर्शियल कारों एवं यूवीज को 8,200 करोड़ और भारी कमर्शियल वाहनों को 26,000 करोड़ रुपये की सब्सिडी का फायदा मिल रहा है. 1500 करोड़ रुपये की सब्सिडी अन्य क्षेत्रों को जाती है, जिनमें जनरेटर और मोबाइल टावर चलाना शामिल है. सरकार कहती है कि डीजल सब्सिडी को कृषि क्षेत्र एवं सार्वजनिक परिवहन के नाम पर खर्च किया जा रहा है, जबकि हकीकत यह है.
जनता के पैसे अपनी जेबों में रखकर सरकार आंखें तरेर रही है कि हम आपको सब्सिडी दे रहे हैं, हम आपके लिए काम कर रहे हैं. और देश की जनता स़िर्फ और स़िर्फ इन राजनीतिक चालबाजियों को देखने-सहने को मजबूर है. वह पैसा जो सपा-बसपा के वकील ले रहे हैं, वह पैसा जो एलआईसी आयकर न जमा करके अपनी जेब में डाल रहा है, वह पैसा जिसके दम पर राहुल गांधी अपनी ब्रांडिंग कर रहे हैं, वह सब जनता का पैसा है. लेकिन उसके लाभ में जनता कहां है? यह पैसा कभी भी पेड़ पर नहीं उगा, यह देश की जनता की मेहनत का पैसा है और जिस पर कोई और कुंडली मारे बैठा है.

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