जिन्हें अपने ही देश में वोट देने का हक़ नहीं

क्या मेघालय हिंदुस्तान का हिस्सा नहीं है? अगर यह सूबा इस देश का अंग है, तो मेघालय के क़रीब सात हज़ार लोगों को आज़ादी के 66 वर्षों बाद भी वोट देने का अधिकार क्यों नहीं है? आख़िर देश के बाकी हिस्सों की तरह यहां के लोगों को बुनियादी सुविधाएं मुहैया क्यों नहीं कराई गई हैं? 

voting6_20130223मेघालय को संपूर्ण राज्य का दर्ज़ा मिले चालीस साल गुज़र गए, लेकिन राज्य के एक समूह को आज भी चुनावों में वोट देने का अधिकार नहीं है. इस साल गारो जनजातीय समूह के 272 लोग संसदीय चुनाव में पहली बार हिस्सा लेंगे, हालांकि वे इससे पहले राज्य विधानसभा और स्वायत्त परिषद के चुनावों में मताधिकार का प्रयोग कर चुके हैं. ग़ौरतलब है कि लोकसभा चुनाव में पहली बार वोट देने जा रही गारो जनजाति पूर्वी खासी हिल्स ज़िले में बसी हुई है. इस समुदाय के 7000 लोगों ने आज़ादी के बाद से अभी तक किसी चुनाव में अपने मताधिकार का प्रयोग नहीं किया, क्योंकि उनके नाम राज्य की मतदाता सूची में शामिल नहीं हैं. मताधिकार से वंचित उक्त सभी लोग भारत-बांग्लादेश सीमा पर स्थित क़रीब 14 गांवों में पिछले कई वर्षों से रह रहे हैं. उनमें से स़िर्फ 272 लोगों के नाम मतदाता सूची में शामिल करके उन्हें मतदाता पहचानपत्र निर्गत किया गया है. बेशक वे पहली बार आम चुनाव में हिस्सा ले रहे हैं, लेकिन इसे विडंबना ही कहा जाएगा कि उन्हें अपने संसदीय क्षेत्र के उम्मीदवारों के बारे में कुछ भी पता नहीं है.

राज्य निर्वाचन आयोग का कहना है कि भारत एक लोकतांत्रिक देश है और यहां सभी नागरिकों को वोट देने का अधिकार है. आयोग के मुताबिक़, गारो जनजाति के 7000 लोगों को अभी तक मताधिकार नहीं मिला है, इस बात से पूरी तरह सहमत नहीं हुआ जा सकता. अगर सरकारी स्तर पर कोई लापरवाही है, तो उसे अविलंब दूर किया जाएगा, साथ ही मतदाताओं को जागरूक भी किया जाएगा. उल्लेखनीय है कि मेघालय में तीन प्रमुख जनजातियां हैं, गारो, खासी और जयंती. आबादी के लिहाज़ से गारो राज्य की दूसरी बड़ी जनजाति है. याद रखने वाली बात यह है कि वर्ष 1971 में हुए बांग्लादेश मुक्ति संग्राम के समय क़रीब 1500 ग़ैर स्थानीय आदिवासियों को विस्थापन का दंश झेलना पड़ा था. यही वजह है कि वे भारत-बांग्लादेश अंतरराष्ट्रीय सीमा के निकट बसे 14 गांवों में तबसे रह रहे हैं. वे शासन-प्रशासन की तरफ़ से मिलने वाली सुविधाओं से वंचित हैं.

देर से ही सही, अगर स्थानीय गारो जनजाति के 272 लोगों को मतदान का अधिकार मिला है, तो उसका स्वागत होना चाहिए. स्थानीय प्रशासन को बुनियादी सुविधाएं मुहैया करानी चाहिए. गारो जनजाति बहुल सभी चौदह गांवों के लोगों को मनरेगा के तहत काम मिलना चाहिए, ताकि उनकी आर्थिक स्थिति में सुधार हो. राज्य एवं केंद्र सरकार को चाहिए कि वे उनके लिए शिक्षा एवं स्वास्थ्य की सुविधाएं प्रदान करें. बहरहाल, इस बीच पी ए संगमा के नेतृत्व वाली एनपीपी ने गारोलैंड राज्य की मांग का समर्थन किया है. गारो हिल्स स्टेट मूवमेंट कमेटी (जीएचएसएमसी) ने संगमा के इस फैसले का स्वागत किया है. उसके मुताबिक़, एनपीपी का यह फैसला क़ाबिल-ए-तारीफ़ है. ग़ौरतलब है कि गारो जनजाति की समस्याओं के मद्देनज़र एनपीपी ने अपने चुनावी घोषणापत्र में इस समुदाय के हितों को शामिल किया है. गारो हिल्स स्टेट मूवमेंट कमेटी की मानें, तो पी ए संगमा का यह निर्णय क्षेत्र की जनता के लिए सही साबित होगा. उसके अनुसार, संगमा बतौर सांसद काफ़ी अच्छा काम करेंगे. वहीं दूसरी तरफ़ पी ए संगमा के इस समर्थन पर मेघालय के मुख्यमंत्री डॉ. मुकुल संगमा ने नाराज़गी ज़ाहिर की है. उनके अनुसार, यह स़िर्फ राजनीतिक फ़ायदे के लिए किया गया एक ़फैसला है और यह गारो जनजाति के हितों के ख़िलाफ़ है. उन्होंने कहा कि पी ए संगमा गारो जनजाति के लोगों को बेवकूफ बना रहे हैं. मुख्यमंत्री ने पी ए संगमा को भाजपा का एजेंट तक क़रार दे दिया. उनके इस बयान से प्रदेश भाजपा नेताओं में गहरी नाराज़गी है. ग़ौरतलब है कि मेघालय में एनपीपी का भाजपा के साथ गठबंधन है. वर्ष 2012 में पी ए संगमा को एनसीपी से निलंबित कर दिया गया था. उसके बाद उन्होंने एनपीपी नामक पार्टी का गठन किया