लोकसभा 1952 से अब तक…

पहली लोकसभा (1952)

6देश की पहली लोकसभा का गठन वर्ष 1952 में हुआ. पहले लोकसभा चुनाव के बाद भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (कांग्रेस) 364 सीटों के साथ सत्ता में आई. पार्टी ने कुल पड़े वोटों का 45 प्रतिशत हिस्सा हासिल किया था. पंडित जवाहर लाल नेहरू देश के पहले निर्वाचित प्रधानमंत्री बने. स्वतंत्र भारत में चुनाव होने के पूर्व ही नेहरू के दो पूर्व कैबिनेट सहयोगियों ने कांग्रेस के वर्चस्व को चुनौती देने के लिए अलग राजनीतिक दलों की स्थापना कर ली थी. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने एक ओर जहां अक्टूबर, 1951 में जनसंघ की स्थापना की, वहीं दूसरी ओर दलित नेता बी आर अंबेडकर ने अनुसूचित जाति महासंघ (जिसे बाद में रिपब्लिकन पार्टी का नाम दिया गया) को पुनर्जीवित किया. अन्य दल भी उस समय सामने आए थे, जिनमें आचार्य कृपलानी की किसान मज़दूर प्रजा परिषद, राम मनोहर लोहिया एवं जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व वाली समाजवादी पार्टी और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी शामिल हैं.

दूसरी लोकसभा (1957)

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस पहली लोकसभा यानी 1952 की अपनी सफलता की कहानी 1957 में हुए दूसरे लोकसभा चुनाव में भी दोहराने में कामयाब रही. कांग्रेस के 490 उम्मीदवारों में से 371 जीतने में कामयाब रहे. पंडित जवाहर लाल नेहरू सत्ता में वापस लौटे. कांग्रेस के सदस्य फिरोज गांधी का उदय भी इस चुनाव में देखा गया. उन्होंने उत्तर प्रदेश के रायबरेली निर्वाचन क्षेत्र से अपने निकटतम प्रतिद्वंद्वी नंद किशोर को 29,000 से अधिक मतों के अंतर से हराया.

तीसरी लोकसभा (1962)

2 अप्रैल, 1962 को तीसरी लोकसभा का गठन हुआ. नेहरू जी फिर से प्रधानमंत्री बने. दिल का दौरा पड़ने से 27 मई, 1964 को उनका निधन हो गया, तब 2 सप्ताह के लिए गुलजारी लाल नंदा ने उनकी जगह ली. कांग्रेस द्वारा लाल बहादुर शास्त्री को नया नेता चुने जाने तक उन्होंने कार्यवाहक प्रधानमंत्री के रूप में काम किया. शास्त्री के देहांत के बाद कांग्रेस एक बार पुन: नेताविहीन हो गई. नेहरू की बेटी इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्री बनने से पहले एक बार फिर नंदा को एक महीने से कम समय के लिए कार्यवाहक प्रधानमंत्री बनाया गया. मोरारजी देसाई के विरोध के बाद भी इंदिरा गांधी 24 जनवरी, 1966 को प्रधानमंत्री बनीं.

चौथी लोकसभा (1967)

1967 में पहली बार कांग्रेस ने निचले सदन में क़रीब 60 सीटें खो दीं, उसे केवल 283 सीटों पर जीत हासिल हुई. कांग्रेस को एक बड़ा झटका सहना पड़ा, क्योंकि बिहार, केरल, उड़ीसा, मद्रास, पंजाब एवं पश्‍चिम बंगाल में ग़ैर-कांग्रेस सरकारें बनीं. इंदिरा गांधी को 13 मार्च को प्रधानमंत्री के रूप में शपथ दिलाई गई. असंतुष्ट आवाज़ें शांत रखने के लिए उन्होंने मोरारजी देसाई को भारत का उप-प्रधानमंत्री एवं वित्त मंत्री नियुक्त किया.

पांचवीं लोकसभा (1971)

1971 में इंदिरा गांधी ने ग़रीबी हटाओ के चुनावी नारे के साथ 352 सीटों पर जीत दर्ज की. भारत-पाकिस्तान युद्ध में आई बड़ी आर्थिक लागत, दुनिया में तेल की क़ीमतों में वृद्धि और औद्योगिक उत्पादन में गिरावट ने आर्थिक कठिनाइयां बढ़ा दी थीं. 12 जून, 1975 को इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने चुनावी भ्रष्टाचार के आधार पर इंदिरा गांधी के 1971 के चुनाव को अवैध ठहरा दिया. इस्ती़फे की बजाय इंदिरा गांधी ने देश में आपातकाल की घोषणा की और पूरे विपक्ष को जेल में डाल दिया.

छठवीं लोकसभा (1977)

कांग्रेस सरकार द्वारा आपातकाल की घोषणा 1977 के चुनाव में मुख्य मुद्दा थी. 23 जनवरी को इंदिरा गांधी ने मार्च में चुनाव कराने की घोषणा की और सभी राजनीतिक कैदियों को रिहा कर दिया. चार विपक्षी दलों-कांग्रेस (ओ), जनसंघ, भारतीय लोकदल और समाजवादी पार्टी ने जनता पार्टी के रूप में मिलकर चुनाव लड़ने का ़फैसला किया. कांग्रेस को स्वतंत्र भारत में पहली बार चुनाव में हार का सामना करना पड़ा और जनता पार्टी के नेता मोरारजी देसाई ने 298 सीटें जीतीं. देसाई 24 मार्च को भारत के पहले ग़ैर-कांग्रेसी प्रधानमंत्री बने. लगभग 200 सीटों पर कांग्रेस की हार हुई. इंदिरा गांधी और उनके बेटे संजय गांधी भी चुनाव हार गए.

सातवीं लोकसभा (1980)

चरण सिंह और जगजीवन राम प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई से खुश नहीं थे. जनता पार्टी 1979 में विभाजित हो गई. अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी ने पार्टी छोड़ दी और बीजेएस ने सरकार से समर्थन वापस ले लिया. देसाई ने संसद में विश्‍वास मत खोने के बाद इस्तीफ़ा दे दिया. चरण सिंह ने प्रधानमंत्री के रूप में जून 1979 में शपथ ली. कांग्रेस ने समर्थन का वादा किया, लेकिन बाद में पीछे हट गई. जनवरी 1980 में चुनाव की घोषणा हुई. कांग्रेस ने लोकसभा में 351 सीटें जीतीं और जनता पार्टी या बचे हुए गठबंधन को 32 सीटें मिलीं.

आठवीं लोकसभा (1984-89)

31 अक्टूबर, 1984 को प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद राजीव गांधी ने अंतरिम प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली. नवंबर 1984 में चुनाव की घोषणा कर दी गई. कांग्रेस ने भारी बहुमत से जीत हासिल की. उसने 409 लोकसभा सीटें और कुल मतों का 50 फ़ीसद अपने नाम किया. तेलुगुदेशम पार्टी 30 सीटों के साथ संसद में दूसरी सबसे बड़ी पार्टी बन गई. यह भारतीय संसद के इतिहास के उन दुर्लभ रिकॉर्डों में से एक है, जिसमें कोई क्षेत्रीय पार्टी मुख्य विपक्षी दल के रूप में उभरी.

नौवीं लोकसभा (1989)

9वीं लोकसभा का चुनाव भारतीय चुनावी राजनीति में कई मायनों में ऐतिहासिक घटना रहा. इस चुनाव ने राजनेताओं के वोट मांगने का तरीका बदल लिया. उस वक्त जाति और धर्म के आधार पर वोट मांगना केंद्र बिंदु बन गया था. विश्‍वनाथ प्रताप सिंह राजीव गांधी के सबसे बड़े आलोचक थे. उन्हें शीघ्र ही मंत्रिमंडल से बर्खास्त कर दिया गया. उन्होंने अरुण नेहरू और आरिफ मोहम्मद खान के साथ जनमोर्चा का गठन किया. 11 अक्टूबर, 1988 को जनमोर्चा, जनता पार्टी, लोकदल और कांग्रेस (एस) के विलय से जनता दल की स्थापना हुई. द्रमुक, तेदेपा और अगप सहित कई क्षेत्रीय दल जनता दल से मिल गए और नेशनल फ्रंट की स्थापना की गई. 525 सीटों के लिए यह चुनाव 22 नवंबर एवं 26 नवंबर, 1989 को 2 चरणों में संपन्न हुआ. नेशनल फ्रंट के लिए लोकसभा में यह आसान बहुमत हासिल हुआ, राष्ट्रीय मोर्चे के सबसे बड़े घटक जनता दल ने 143 सीटें जीतीं और उसने वाममोर्चे और भारतीय जनता पार्टी के बाहरी समर्थन से सरकार बनाई. विश्‍वनाथ प्रताप सिंह भारत के 10वें प्रधानमंत्री बने और देवीलाल उप-प्रधानमंत्री. उन्होंने 2 दिसंबर, 1989 से 10 नवंबर, 1990 तक कार्यभार संभाला. लालकृष्ण आडवाणी द्वारा राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद मुद्दे पर रथयात्रा शुरू करने और मुख्यमंत्री लालू यादव द्वारा बिहार में आडवाणी को गिरफ्तार किए जाने के बाद भाजपा ने वीपी सिंह सरकार से समर्थन वापस ले लिया. सिंह ने विश्‍वास मत हारने के बाद इस्तीफ़ा दे दिया. चंद्रशेखर 64 सांसदों के साथ जनता दल से अलग हो गए और उन्होंने समाजवादी जनता पार्टी बनाई. उन्हें बाहर से कांग्रेस का समर्थन मिला और वह भारत के 11वें प्रधानमंत्री बने. आख़िरकार उन्होंने भी 6 मार्च, 1991 को इस्तीफ़ा दे दिया, जब कांग्रेस ने आरोप लगाया कि सरकार राजीव गांधी की जासूसी करा रही है.

दसवीं लोकसभा (1991)

10वीं लोकसभा का चुनाव मंडल आयोग की सिफारिशें लागू करने और राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद के चलते मंडल-मंदिर चुनाव भी कहा जाता है. मतदान के पहले दौर के एक दिन बाद यानी 20 मई, 1991 को तमिल ईलम लिबरेशन टाइगर्स द्वारा श्रीपेरुंबुदूर (तमिलनाडु) में चुनाव प्रचार के दौरान पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या कर दी गई. इस चुनाव में महज 53 प्रतिशत मतदान हुआ. एक त्रिशंकु संसद बनी, जिसमें 232 सीटों के साथ कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी और 120 सीटों के साथ भाजपा दूसरे स्थान पर रही. जनता दल स़िर्फ 59 सीटों के साथ तीसरे स्थान पर रहा. 21 जून को कांग्रेस के पीवी नरसिम्हाराव ने प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली.

ग्यारहवीं लोकसभा (1996)

11वीं लोकसभा के लिए हुए चुनाव परिणामों से एक बार फिर त्रिशंकु संसद बनी और 2 वर्ष तक राजनीतिक अस्थिरता रही. इस दौरान देश के 3 प्रधानमंत्री बने. भाजपा को 161 सीटें और कांग्रेस को 140 सीटें मिलीं. अटल बिहारी वाजपेयी ने 16 मई को प्रधानमंत्री के रूप में पदभार संभाला, लेकिन 13 दिनों के बाद इस्तीफ़ा दे दिया. जनता दल के नेता देवेगौड़ा ने एक जून को संयुक्त मोर्चा गठबंधन सरकार बनाई, जो 18 महीने चली. इसके बाद देवेगौड़ा के विदेश मंत्री इंद्र कुमार गुजराल ने अप्रैल 1997 में प्रधानमंत्री के रूप में पदभार संभाला.

बारहवीं लोकसभा (1998)

इस चुनाव ने भाजपा के नेतृत्व वाले गठबंधन को 265 सीटों का कार्यकारी बहुमत प्रदान किया. इस संदर्भ में 15 मार्च को राष्ट्रपति के आर नारायणन ने अटल बिहारी वाजपेयी को अगली सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया. 19 मार्च को वाजपेयी ने दूसरी बार प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली.

तेरहवीं लोकसभा (1999)

17 अप्रैल, 1999 को वाजपेयी लोकसभा में विश्‍वास मत हार गए, फलस्वरूप उनकी गठबंधन सरकार ने इस्तीफ़ा दे दिया. पिछले चुनाव 1996 और 1998 में हुए थे, इसलिए 1999 के चुनाव 40 महीने में तीसरी बार हो रहे थे. 6 अक्टूबर को आए परिणामों में राजग को 298 सीटें मिलीं और कांग्रेस एवं उसके सहयोगियों को 136 सीटों पर विजय प्राप्त हुई. वाजपेयी ने 13 अक्टूबर को तीसरी बार देश के प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली.

चौदहवीं लोकसभा (2004)

20 अप्रैल से 10 मई 2004 के बीच 4 चरणों में आम चुनाव हुए. कांग्रेस अपने सहयोगियों की मदद से 335 सदस्यों (बसपा, सपा, एमडीएमके और वाममोर्चा के बाहरी समर्थन सहित) का बहुमत प्राप्त करने में सफल रही. चुनाव के बाद हुए इस गठबंधन को संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) कहा गया. पूर्व वित्त मंत्री डॉ. मनमोहन सिंह देश के प्रधानमंत्री बने.

पंद्रहवीं लोकसभा (2009)

मई 2009 में 15वीं लोकसभा के चुनाव परिणाम घोषित हुए और कांग्रेस के नेतृत्व वाले संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) ने लोकसभा का नेतृत्व करने का जनादेश हासिल किया. प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को दोबारा देश का नेतृत्व करने का अवसर मिला.

 

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चुनावी कहानी, आंकड़ों की जुबानी

  • 2009 के आम चुनाव में सुरक्षाकर्मी: 12 लाख
  • रूस की सेना से ज़्यादा सुरक्षाकर्मी चुनाव में तैनात
  •  रूसी सेना में शामिल कुल सैनिकों की संख्या: 8.45 लाख
  • 2009 में चुनाव आयोग के इस्तेमाल में लाई गई ट्रेनों की संख्या: 119
  • 2009 में चुनाव आयोग के इस्तेमाल में लाए गए हेलिकॉप्टरों की संख्या: 55
  • सर्वाधिक वोटरों वाला लोकसभा क्षेत्र: मलकाजगिरी (आंध्र प्रदेश), 29.53 लाख वोटर
  • सबसे कम वोटरों वाला लोकसभा क्षेत्र: लक्षद्वीप, 47,972 वोटर
  • भारतीय चुनाव आयोग से मान्यता प्रात राष्ट्रीय पार्टियों की संख्या: 06
  • भारतीय चुनाव आयोग से मान्यता प्राप्त कुल प्रांतीय पार्टियों की संख्या: 45
  • भारतीय चुनाव आयोग में पंजीकृत राजनीतिक पार्टियों की कुल संख्या: 702
  • 1952 में चुनाव का प्रति मतदाता खर्च: 0.60 पैसे
  • 2004 में चुनाव का प्रति मतदाता खर्च: 17 रुपये
  • 2009 में चुनाव का प्रति मतदाता खर्च: 12 रुपये

 

महत्वपूर्ण जीत, महत्वपूर्ण हार

1957 के दूसरे आम चुनाव में पहली बार ऐसे बड़े नेता चुनाव लड़े और जीते, जो आगे चलकर भारतीय राजनीति के शीर्ष पर पहुंचे. इलाहाबाद से कांग्रेस के टिकट पर लाल बहादुर शास्त्री जीते. सूरत से कांग्रेस के ही टिकट पर मोरारजी देसाई जीते थे. जनसंघ के नेता अटल बिहारी वाजपेयी के संसदीय जीवन की शुरुआत इसी आम चुनाव से हुई थी. उन्होंने उत्तर प्रदेश की तीन सीटों से एक साथ चुनाव लड़ा था. वह बलरामपुर संसदीय क्षेत्र से तो जीत गए थे, लेकिन लखनऊ और मथुरा में उन्हें हार का सामना करना पड़ा था. मथुरा में तो उनकी जमानत भी जब्त हो गई थी. लखनऊ से कांग्रेस के पुलिन बिहारी बनर्जी ने उन्हें हराया था, जबकि मथुरा से निर्दलीय उम्मीदवार राजा महेंद्र प्रताप की जीत हुई थी. 1957 में वीवी गिरि को एक निर्दलीय से हार का मुंह देखना पड़ा. उत्तर प्रदेश की चंदौली लोकसभा सीट से डॉ. लोहिया को कांग्रेस के त्रिभुवन नारायण सिंह ने हराया था. चंद्रशेखर ने भी पहला चुनाव 1957 में ही पीएसपी के टिकट पर लड़ा था, तब बलिया और गाजीपुर के कुछ हिस्से मिलाकर रसड़ा संसदीय सीट थी. चंद्रशेखर ने इसी सीट से चुनाव लड़ा था और तीसरे नंबर पर रहे थे. 

  • चुनाव आयोग के रिकॉर्ड के मुताबिक़ जिला किन्नौर (हिमाचल प्रदेश) निवासी 97 वर्षीय श्याम सरन नेगी सबसे वरिष्ठ मतदाता हैं. नेगी 1952 के चुनाव में सब से पहले वोट डालने वालों में से एक थे.
  • इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन का उपयोग पहली बार केरल के परुर विधान सभा क्षेत्र के 50 पोलिंग बूथों पर 1982 में हुआ था.
  • अटल विहारी वाजपेयी  पहले राजनेता हैं जिन्होंने 6 अलग अलग निर्वाचन क्षत्रों से चुनाव जीता है. बलरामपुर – 1957, 1967, ग्वालियर- 1971, नई दिल्ली-1977, 1980, विदिशा-1991, गांधीनगर-1996, लखनऊ-1991, 1996, 1998.
  • चार राज्यों, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, गुजरात और दिल्ली, से लोक सभा चुनाव जीतने वाले अटल विहारी वाजपई पहले राजनेता हैं.
  • 7 अप्रैल से शरू होकर 16 मई तक चलने वाले और 9 चरणो में संपन्न होने वाले ये लोक सभा चुनाव भारत में अब तक सब से लम्बी अवधि तक चलने वाले चुनाव हैं.
  • भारतीय मतदाता आम चुनाव (लोक सभा) 2014 में पहली बार नोटा (इन में से कोई नहीं) विकल्प इस्तेमाल  करेंगे.

राजीव, राजमोहन और मेनका

राष्ट्रपिता महात्मा गंाधी के पौत्र 78 वर्षीय राजमोहन गांधी पूर्वी दिल्ली से आम आदमी पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ रहे हैं. इससे पहले पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के खिलाफ राजमोहन गांधी जनता दल के टिकट पर 1989 में अमेठी से चुनाव लड़ चुके हैं, लेकिन राजमोहन गांधी को 1989 के लोकसभा चुनाव में राजीव गांधी से करारी हार मिली थी. उस चुनाव में राजीव गांधी को 2,71,407 और राजमोहन गांधी को 69,269 मत प्राप्त हुए थे. अमेठी लोकसभा सीट से गांधी परिवार की ही बहु मेनका गांधी ने राजीव गांधी के खिलाफ निर्दलीय चुनाव लड़ा था और वह हार गई थीं.

नेहरू बनाम लोहिया

फूलपुर संसदीय हमेशा से चर्चा में रही है यहां 1962 में दो आजादी के लड़ाई लड़ने वाले दो दोस्तों बीच कड़ी टक्कर हुई थी. वह दो दोस्त कोई और नहीं बल्कि जवाहर लाल नेहरू और डॉ राम मनोहर लोहिया थे. लोहिया ने ही गैर-कांग्रेस वाद का सिद्धांत दिया और कांग्रेस की हर नीति का डॉ लोहिया ने विरोध किया. लोहिया ने इसी कांग्रेस विरोध के चलते 1962 में जवाहर लाल नेहरू के खिलाफ इलहाबाद के फूलपुर लोकसभा चुनाव लड़ा था, लेकिन उनको उस चुनाव में हार का सामना करना पड़ा. इसी कारण डॉ लोहिया ने भारतीय जनसंघ का साथ लेने में भी संकोच नहीं किया. इस रणनीति के कारण 1967 के आम चुनाव के बाद उत्तर और पूर्वी भारत के कई राज्यों से कांग्रेस को सत्ता गवानी पड़ी और डॉ लोहिया ने राजनीति में सफलता हासिल की.

इंदिरा बनाम राजनारायण

1971 में रायबरेली से इंदिरा गांधी के खिलाफ लोकबंधु राजनारायण ने चुनाव लड़ा था. इंदिरा गंधी जीत गई. लेकिन  राजनारयण ने इदिरा गांधी खिलाफ सरकारी मशीनरी का दुरूपयोग करने और धोखा धड़ी का आरोप लगाते हुए उनके खिलाफ इलाहाबाद उच्च न्यायालय में याचिका दायर की. इस मामले की सुनवाई करते हुए इलाहाबाद उच्च न्यायालय के जज जगमोहन सिंहा ने 12 जून 1975 इंदिया गांधी के चुनाव को अवैध ठहरा दिया और इंदिरा गंाधी को 6 साल तक पद से वंचित कर दिया. उसके बाद इंदिरा गांधी ने सुप्रीम कोर्ट से इस आदेश पर स्टे ले लिया. इसके बाद इंदिरा गांधी ने 25 जून 1975 तत्काल पूरे देश में इमरजेंसी लगा दिया जो 21 मार्च 1977 तक पूरे 21 महीने तक लागू रहा और उस दौरान विपक्षी पार्टी के नेताओं को जेल में डाल दिया गया. उसके 1977 हुए लोकसभा चुनाव में लोकबंधु राजनारायण ने इदिरागांधी के खिलाफ जनता पार्टी की ओर से चुनाव लड़ा और इंदिरा गांधी हार गईं.

 

 

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