शीत युद्ध के आसार

रूसी संसद के मंच पर रूस के साथ क्रीमिया की विलय संधि पर जब हस्ताक्षर हो रहे थे, तो उस समय अमेरिका और पश्‍चिमी देश बेचारे बने सब कुछ होता देख रहे थे. अंतत: रूस ने अमेरिका की धमकियों की परवाह किए बिना क्रीमिया का विलय कर ही लिया. यह एक युगांतकारी घटना थी, जो आने वाले दिनों में विश्‍व के देशों को नए शीत युद्ध के अनिश्‍चित भविष्य की ओर ले जाएगी. संभावना इसकी भी है कि इस घटना के बाद दुनिया बहुध्रुवीय व्यवस्था की तरफ़ अग्रसर होगी. इस घटना का परिणाम चाहे जो भी हो, लेकिन इतना तो तय है कि सोवियत संघ के विघटन के बाद हाशिये पर चला गया रूस अब मुख्य धारा में आकर अमेरिका और पश्‍चिमी देशों के लिए नई चुनौती बन गया है. 

13रूस द्वारा क्रीमिया के विलय की कार्रवाई की दुनिया भर में निंदा हो रही है. अमेरिका ने भी रूस की इस कार्रवाई का कड़ा प्रतिरोध शुरू कर दिया है. इस मुद्दे पर रूस की उग्रता और विरोधी देशों की तनातनी के कारण विश्‍व जिस तरह से सुलग रहा है, उससे शीत युद्ध की स्थिति उत्पन्न हो गई है. आने वाला समय इन देशों के बीच अशांति और अस्थिरता का दौर लेकर आएगा, इस बात से कोई इंकार नहीं कर सकता. हम यह बात इसलिए कह रहे हैं कि पिछले कुछ वर्षों से विश्‍व किसी भी देश के मुद्दे पर दो फाड़ होने जा रहा है. कभी अफगानिस्तान, तो कभी इराक, तो कभी अन्य किसी देश के लिए विश्‍व के देश गुटबाजी करने से बाज नहीं आ रहे हैं.

सबसे बड़ी बात है कि यह गुटबाजी किसी देश की हित रक्षा के लिए नहीं, बल्कि उस देश से अपने निजी स्वार्थों की सिद्धि के लिए होती है. यह विश्‍व के किसी भी देश के लिए ठीक नहीं है. दूसरी बात यह है कि अगर वैश्‍विक देशों का यही रवैया रहा, तो आने वाला समय पूरे विश्‍व के लिए ख़तरनाक हो सकता है और तीसरे विश्‍व युद्ध से कतई इंकार नहीं किया जा सकता. ऐसा नहीं कि क्रीमिया संकट पहली बार विश्‍व के सामने आया है. पश्‍चिमी देशों की तनातनी रूस के साथ पहले भी हो चुकी है. 160 साल पहले 25 मार्च, 1854 को विश्‍व के प्रमुख अख़बार द इकोनॉमिस्ट ने जब रूस के साथ पश्‍चिमी देशों की तनातनी की ख़बर प्रकाशित की थी, तो उसके मात्र 3 दिनों बाद ही ब्रिटेन ने युद्ध की घोषणा कर दी थी. तो क्या आज के हालात फिर से विश्‍व युद्ध की तरफ़ इशारा कर रहे हैं? हालांकि आज की तारीख में युद्ध इतना आसान नहीं है, लेकिन रूस के जिद्दी स्वभाव के कारण इस बात से इंकार भी नहीं किया जा सकता है.
क्रीमिया पर रूस के कब्जे से पूरे विश्‍व का राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक एवं सांस्कृतिक ताना-बाना बिखर गया है. हालात ये हैं कि अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने क्रीमिया को रूस में मिलाए जाने के मुद्दे पर मास्को के ख़िलाफ़ पश्‍चिमी देशों की एकजुटता का आह्वान किया है. ओबामा जब हेग गए, तो वहां उन्होंने जी-7 देशों की एक आपातकालीन बैठक बुलाई, जिसमें इस बारे में चर्चा की गई कि शीत युद्ध के बाद से पूर्व-पश्‍चिम के इस सबसे बड़े गतिरोध के हल के लिए क्या क़दम उठाए जाएं? रूस को लेकर इन देशों में इतनी नाराज़गी है कि अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा एवं शीर्ष आर्थिक शक्तियों ने यूक्रेन में रूस की सैन्य कार्रवाई के ख़िलाफ़ दबाव बनाने के लिए जून में सोची में प्रस्तावित जी-8 शिखर बैठक के स्थान पर ब्रसेल्स में जी-7 की शिखर बैठक बुलाए जाने की बात कही और उसमें रूस को शामिल न करने पर भी विचार किया गया. कनाडा, फ्रांस, जर्मनी, इटली, जापान, ब्रिटेन, अमेरिका, यूरोपीय परिषद के अध्यक्ष एवं यूरोपीय आयोग के अध्यक्ष ने इस ़फैसले पर मुहर लगाई. जी-7 देशों ने एक संयुक्त बयान में कहा है कि जब तक रूस अपने रवैये में बदलाव नहीं करता है, तब तक हम जी-8 शिखर बैठक में भाग नहीं लेंगे और पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार, जून 2014 में सोची के बजाय ब्रसेल्स में जी-7 देशों की बैठक होगी. कुछ देश पहले से ही रूस को संगठन से बाहर करने की राय दे रहे थे, लेकिन जर्मनी जैसे देशों का कहना है कि रूस अब भी संगठन का सदस्य है. हालांकि यह कहीं से ठीक नहीं है, क्योंकि वैश्‍विक देशों द्वारा वार्ता के मंच को कभी ध्वस्त नहीं करना चाहिए. अगर ऐसा होता है, तो संघर्षरत देशों से वार्ता की रही-सही गुंजाइश भी ख़त्म हो जाएगी और बेवजह की तनातनी बढ़ेगी.
सवाल यह कि ये देश रूस पर किस तरह की कार्रवाई करना चाहते हैं? अगर ये देश रूस पर कार्रवाई की बात करते हैं, तो सवाल उठता है कि इनके द्वारा की जाने वाली कार्रवाई का अंजाम क्या होगा? क्या ये रूस पर आर्थिक प्रतिबंध लगाएंगे या किसी अन्य तरह का प्रतिबंध. जिस अंदाज में पश्‍चिमी देशों ने रूस को सतर्क किया है कि वह आगे कोई कार्रवाई न करे, क्योंकि उसके अंजाम खराब हो सकते हैं. ऐसे में चिंता इस बात की भी है कि अगर विश्‍व के देशों के बीच तनातनी बढ़ती है, तो वह किस हद तक जाएगी? सवाल यह भी है कि क्या रूस पर कार्रवाई ही एकमात्र रास्ता बचा है? रूस या अन्य देश आपस में मिलकर क्या कोई बीच का रास्ता नहीं निकाल सकते? क्रीमिया के मुद्दे पर रूस लगातार उग्र रुख अख्तियार किए हुए है. अगर रूस चाहता, तो आज जो हालात हैं, वे नहीं होते, क्योंकि विश्‍व के देशों द्वारा लगातार चेतावनी देने के बाद भी रूस ने उनकी बात पूरी तरह से अनसुनी कर दी. क्या रूस कुछ मुद्दों पर शांति से काम नहीं ले सकता? हालांकि, रूस कह रहा है कि वह पश्‍चिमी देशों के साथ लगातार संपर्क में बना रहना चाहता है, लेकिन रूस की नीतियां उसकी कथनी और करनी में फर्क बता रही हैं.
क्रीमिया के मुद्दे पर दुनिया के औद्योगिक देशों और रूस के बीच तनातनी के कारण जी-8 का अस्तित्व ख़त्म हो गया है. इससे पूरे विश्‍व की अर्थव्यवस्था पर गहरी मार पड़ने वाली है. जापान के शेयर जिस तेजी से लुढ़क रहे हैं, यह उसका ताजा उदाहरण है. इसके अतिरिक्त अमेरिका का डाउ जोन्स भी नीचे गिरकर बंद हुआ था. विशेषज्ञ बताते हैं कि आने वाले दिनों में यूक्रेन के राजनीतिक संकट का प्रभाव पूरे विश्‍व पर और अधिक देखने को मिलेगा. इस बीच यूरोप की साझा मुद्रा यूरो पर भी एशियाई
बाज़ारों में विपरीत असर पड़ रहा है. यूरो का मूल्य कमजोर पड़ रहा है. भारतीय रुपया भी यूरो के मुकाबले थोड़ा चढ़ा है, हालांकि डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपया मजबूत होकर 60.4 फ़ीसद तक पहुंच गया है. रूस का यूरोप के अंदर बहुत महत्व है, क्योंकि यूरोप में गैस की कुल खपत का 25 फ़ीसद रूस से आता है. इस तरह से यहां खर्च होने वाली ज़्यादातर गैस रूस से ही सप्लाई की जाती है. ऐसे में रूस पर ज़्यादा दबाव डालने से यूरोप की अर्थव्यवस्था पर विपरीत असर पड़ेगा. विदेश नीति के जानकारों का मानना है कि ऐसी कार्रवाइयों से यूरो नीचे जाएगा, क्योंकि मध्य यूरोप ज़्यादातर गैस रूस से लेता है और यूरो जोन का रूस के साथ गहरा आर्थिक संबंध है. दूसरी तरफ़ यूक्रेन रूस एवं दूसरे यूरोपीय देशों के बीच की अहम कड़ी है. आधी से ज़्यादा गैस सप्लाई पाइप लाइन यूक्रेन से गुजरती है. लिहाजा, सप्लाई बंद होने से यूरोपीय देशों में गैस महंगी हो सकती है. साथ ही यूक्रेन गेहूं और मक्के का बड़ा निर्यातक है. गेहूं और मक्के का निर्यात रुकने से अनाज के दाम बढ़ेंगे. ऐसे में किसी तरह की पाबंदी सीधे यूरो को प्रभावित करेगी.
क्रीमिया संकट पर संयुक्त राष्ट्र संघ का रवैया पहले उत्पन्न संकटों की तरह उदासीन है. सीरिया हो या अफगानिस्तान, इराक हो या विश्‍व के अन्य देश, संयुक्त राष्ट्र संघ ने अपनी सार्थकता कभी सिद्ध नहीं की. यह बात समय-समय पर उठती रहती है कि संयुक्त राष्ट्र संघ पर अमेरिका और पश्‍चिमी देशों का प्रभुत्व है और ये देश इस वैश्‍विक संस्था के मार्फत अपना उल्लू सीधा करते हैं. हालांकि, संयुक्त राष्ट्र संघ के महासचिव बान की मून ने रूस और यूक्रेन के बीच सीधी बातचीत की मांग की है. मून को विश्‍वास है कि रूस और यूक्रेन के संबंध बहाल करने का एकमात्र मार्ग राजनीतिक समाधान है. सवाल यह उठता है कि क्रीमिया को रूस द्वारा मिला लेने के बाद यह बातचीत कितनी सार्थक होगी, बातचीत किस मुद्दे पर होगी, यह पूरी दुनिया को पता है. मतलब यह कि जब तक संयुक्त राष्ट्र संघ विद्रोही या संघर्षरत देशों की आंखों में आंखें डालकर नहीं देखेगा, तब तक उसके आदेश को ये देश ठेंगे पर रखकर चलते रहेंगे. रूस न कल कमजोर था और न आज कमजोर है. चूंकि वह एक परमाणु संपन्न देश है, इसलिए अमेरिका सहित अन्य पश्‍चिमी देशों को भी रूस की नीतियों, उसके क़दमों एवं निर्णयों का खुलकर विरोध करने में सौ बार सोचना पड़ता है. दूसरी तरफ़ रूस को भी अपनी और सामने वाले की ताकत पता है, इसीलिए वह किसी की परवाह नहीं करता और अपनी मनमानी करता रहता है. आज उसने यूक्रेन को लेकर मनमानी की है, लेकिन कल भी उसने सीरिया मामले पर हस्तक्षेप किया था, तो उस समय अमेरिका की हिम्मत नहीं हुई थी कि वह रूस के क़दमों का सीधा विरोध दर्ज कर सके.
अब बात करते हैं रूस के मुद्दे पर भारत के रुख की. क्रीमिया संकट पर भारत ने एक प्रकार से रूस का समर्थन ही किया है. तभी तो रूसी राष्ट्रपति पुतिन ने कहा कि चीन और भारत ने यूक्रेन संकट के बारे में संयत और सही रवैया अपना कर रूस को राहत प्रदान की है. आज विश्‍व बहुत तेजी से एकध्रुवीय से बहुध्रुवीय राष्ट्र की तरफ़ बढ़ रहा है. ऐसे में भारत को भी कूटनीति का परिचय देते हुए इस बात का ख्याल रखना चाहिए कि वह इन राष्ट्रों की खेमेबंदी में पीछे न रह जाए. रूस ने भले ही भारत की तारीफ़ में कसीदे काढ़े हों, लेकिन भारत को यह ध्यान रखना होगा कि रूस द्वारा उसकी तारीफ़ पश्‍चिमी देशों के लिए जले पर नमक छिड़कने जैसी रही होगी. इसलिए भारत को चाहिए कि वह उचित कूटनीति का प्रयोग करते हुए न तो किसी के बहुत क़रीब जाए और न किसी से बहुत दूर. मतलब यह कि भारत अंतरराष्ट्रीय संबंधों में, खास तौर पर तब, जब दो राष्ट्रों के बीच कोई मामला हो, उदासीनता का परिचय दे.

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