अफगानिस्तान चुनाव के मायने

11भारत और पाकिस्तान के बीच कटु संबंधों की एक कड़ी अफगानिस्तान को माना जाता है. पाकिस्तान अक्सर भारत पर यह आरोप लगाता रहा है कि भारत अफगानिस्तान का इस्तेमाल उसे अस्थिर करने के लिए करता है. हालांकि, पाकिस्तान के इस आरोपों में ज़रा भी दम नजर नहीं आता. इन आरोपों-प्रत्यारोपों के बीच 6 अप्रैल को राष्ट्रपति के चुनाव के लिए मतदान संपन्न हुआ. राष्ट्रपति हामिद करजई के बाद कौन जंग से बिखरे हुए इस मुल्क की कमान संभालेगा इसका फैसला होना है. यह चुनाव न सिर्फ अफगानिस्तान के लिए, बल्कि अमेरिका, पाकिस्तान और भारत के लिहाज से भी काफी महत्व रखता है. अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की घोषणा के बाद काफी संख्या में अमेरिकी सैनिक देश वापस लौट चुके हैं और चरणबद्ध तरीके से रक्षा-सुरक्षा एवं प्रशासन की जिम्मेदारी अफगानिस्तानी सुरक्षा बल संभालने लगे हैं. चुनावों में तालिबान की धमकी के बावजूद कुल 6400 मतदान केंद्रों पर लोगों की लंबी कतारें लगी रही, तो इसका यही मतलब निकाला जा सकता है कि अफगानी नागरिक अब हिंसा के रास्ते से अलग विकास और लोकतंत्र को अधिक पसंद करने लगे हैं. हालांकि, चुनाव का परिणाम 24 अप्रैल से पहले आने की संभावना कम है. फिर भी ताजा रुझानों से साफ जाहिर होता है कि हामिद करजई के प्रति वहां की जनता का विश्‍वास कम हुआ है. इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि राष्ट्रपति चुनावों में पूर्व विदेश मंत्री अब्दुल्ला अब्दुल्ला ने अपने करीबी प्रतिद्वंदी अशरफ गानी पर बढ़त बनाई हुई है. हालांकि, यह शुरुआती नतीजा है. देश के कुल 26 प्रांतों के 10 फीसदी मतगणना का नतीजा घोषित किया गया है. इसमें उत्तर, दक्षिण, पूर्व, पश्‍चिमी प्रांत और काबुल शामिल हैं. इन प्रांतों में अब्दुल्ला अब्दुल्ला कुल 41.9 फीसदी मतों के साथ सबसे आगे हैं. वहीं, अशरफ गानी 37.6 फीसदी मतों के साथ दूसरे नंबर हैं, तो जलमई रसूल तीसरे नंबर पर हैं और उन्हें सिर्फ 9.8 फीसदी ही वोट मिले हैं.

ऐसा कहा जा रहा था कि जलमई रसूल ही करजई के उत्तराधिकारी होंगे. लेकिन, शुरुआती नतीजों से साफ है कि करजई का समर्थन मिलने के बावजूद वे सबसे पीछे चल रहे हैं. अब फिर चुनावी नतीजों की बात करें, तो अगर अंतिम नतीजे आने तक किसी भी उम्मीदवार को 50 फीसदी मत नहीं मिल पाता है, तो दो प्रमुख उम्मीदवारों के बीच निर्णायक चुनाव होगा.

अफगानिस्तान के लिए यह चुनाव इस लिहाज से भी महत्वपूर्ण है कि जो भी उम्मीदवार विजेता बनकर सामने आए उसे अमेरिका समर्थित सुरक्षा बलों की मदद के बिना ही तालिबान से मुकाबला करना होगा. साथ ही, युद्ध और आंतरिक सुरक्षा के मोर्चे पर विफल होने के बाद उनके सामने देश की अर्थव्यवस्था को भी मजबूत करने की जिम्मेदारी होगी. फिलहाल अफगानिस्तान की अर्थव्यवस्था पूरी तरह दूसरे देशों की मदद पर आश्रित है.

चुनावी मैदान में लादेन को आमंत्रित करने वाले अब्दुल सय्यफ भी

इस चुनाव का दिलचस्प पहलू यह भी है कि अब्दुल रसूल सय्यफ को भी 5 फीसदी वोट मिले हैं. सय्यफ कट्टरपंथी इस्लामिक माने जाते हैं. उन्हें भले ही महज 5 फीसदी वोट मिले हैं, लेकिन रन ऑफ मुकाबले में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं. ये वही सय्यफ हैं, जिन्होंने सबसे पहले अलकायदा प्रमुख ओसामा बिन लादेन को अफगानिस्तान आने का निमंत्रण दिया था.

भारत के लिए इस चुनाव की अहमियत

भारत के लिए अफगानिस्तान का महत्व पाकिस्तान से भी काफी महत्व रखता है. इस बात से सभी वाकिफ हैं कि अगर चुनावी नतीजों के बाद अफगानिस्तान अपनी नीतियों में बदलाव करता है, तो सबसे अधिक प्रभावित भारत होगा. भारत अफगानिस्तान के पुनर्निर्माण में मदद कर रहा है. सड़क निर्माण से लेकर तमाम बुनियादी ढांचों के विकास में भारत की मदद परियोजनाएं चलाई जा रही हैं. इनका वक्त-वक्त पर पाकिस्तान और तालिबान द्वारा विरोध किया जाता है.

रणनीतिक नजरिए से देखें, तो अफगानिस्तान के पश्‍चिम में होर्मुज जलसंधि और फारस की खाड़ी है, जबकि पूर्व में मलक्का जलसंधि और दक्षिणी चीन सागर है. वहीं, उत्तर की ओर मध्य एशिया का हिस्सा है, तो दक्षिण में यह अंटार्कटिका तक फैला है. अफ्रीका इन सभी क्षेत्रों का एक महत्वपूर्ण लिंक है. अगर देखें, तो अफगानिस्तान में भारत का हित दक्षिणी एशिया में अपनी स्थिति सुदृढ़ करने के लिहाज से अहम है.

रन ऑफ से हो सकता है फैसला

शुरुआती नतीजों से ऐसा लग रहा है कि राष्ट्रपति का फैसला रन ऑफ से होने वाला है. दरअसल, पहले दौर के नतीजों में अगर कोई भी प्रत्याशी 20 फीसदी से अधिक वोट पाने के बाद नहीं जीतता है, तो मई के आखिर में दूसरे दौर का मतदान यानी रन ऑफ होगा.

धांधली की चुनौती

तालिबानी धमकी के साये में हुआ चुनावी कुल मिलाकर शांतिपूर्ण ही रहा. लेकिन, चुनावों के बाद सबसे बड़ी चिंता यह जताई जा रही है कि कहीं विरोधी दल धांधली का आरोप लगाकर इसे खारिज न करने लगे. ऐसे में अफगानिस्तान अस्थिरता की ओर बढ़ने लगेगा और तालिबान को अपनी जड़ें जमाने का एक और मौका मिल जाएगा. हालांकि, चुनाव आयोजकों एवं पर्यवेक्षकों का कहना है कि 2009 के चुनाव की अपेक्षा इस बार धांधली कम हुई है. 2009 में लगभग 10 लाख वोट फर्जी मिले थे और बाद में उन्हें फेंक दिया गया. इस बार भी पर्यवेक्षकों को 1900 शिकायतें मिली हैं, जिनमें लगभग आधी ऐसी शिकायतें है जिनसे चुनावी नतीजे काफी प्रभावित हो सकते हैं.

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