लाजवाब फनकार गुलज़ार

गीतकार, निर्देशक एवं पटकथा लेखक गुलज़ार को फिल्म जगत के सर्वोच्च सम्मान दादा साहब फाल्के अवॉर्ड-2013 के लिए चुना गया है. इस अवॉर्ड के लिए प्रतिष्ठित कलाकारों की सात सदस्यीय ज्यूरी ने सर्वसम्मति से उनके नाम की सिफारिश की. इस सम्मान के तहत उन्हें स्वर्ण कमल, 10 लाख रुपये और शॉल प्रदान किए जाएंगे. 

gulzarगुलज़ार सभी के चहेते हैं. गुलज़ार बच्चों के हैं, बड़ों के हैं, प्रेम करने वालों के हैं और दर्द भरे दिलों के भी हैं. सभी के दिलों की थाह है गुलज़ार को. बच्चों के लिए उन्होंने जंगल बुक एवं एलिस इन वंडरलैंड के शीर्षक गीत लिखे, जो बेहद प्रसिद्ध रहे. जंगल-जंगल पता चला है…, डोले रे डोले रे, नीला समंदर है आकाश प्याजी डूबे न डूबे मेरा जहाजी, हमको मन की शक्ति देना, लकड़ी की काठी काठी का घोड़ा जैसी रचनाएं करके वह बच्चों के प्रिय बन गए. उनके लिखे प्यार के नगमें जैसे, एक तुम्हारे कांधे का तिल…,रात टुकड़ों में बसर होती रही हम नींद से कोसों दूर कुछ-कुछ गिनते रहे, मेरा गोरा अंग लई ले…, हमने देखी है उन आंखों की महकती खुशबू, मैंने तेरे लिए ही सात रंग के सपने बुने, हर प्यार करने वाले दिल ने कभी न कभी सुने और गुनगुनाए ज़रूर होंगे. जब प्यार में नादानियां कीं, तो गुलज़ार की नज्म हमें याद आई. हमने इश्क मासूम है, इश्क में हो जाती हैं गलतियां, सब्र से इश्क महरूम है जैसे गाने सुने और गुनगुनाए. जब प्यार से दूर हो गए, तो यह सुनकर दिल को दिलासा दी कि हाथ छूटे भी, तो रिश्ते नहीं टूटा करते. जब-जब ज़िंदगी के ़फैसलों ने हैरान किया अथवा ज़िंदगी को समझने की कोशिश की, तो उन्हीं का गाना, तुझसे नाराज़ नहीं ज़िंदगी, हैरान हूं मैं…बार-बार सुना. गुलज़ार ने बताया कि दिल हमेशा जवान रहता है, दिल तो बच्चा है जी… उन्होंने बताया कि प्यार की कोई उम्र नहीं होती. कई बार उम्र के सुफैद हो जाने के बाद भी जवानी की कारी बदरी नहीं छंटती है. गुलज़ार उन लोगों में हैं, जो समय के साथ चले, तभी तो युवाओं के लिए उन्होंने चल छैंया-छैंया और कजरारे-कजरारे जैसे गीतों की रचना की.

चुनिंदा नज्में

हमें कोई ग़म नहीं था ग़म-ए-आशिक़ी से पहले

न थी दुश्मनी किसी से तेरी दोस्ती से पहले,

है ये मेरी बदनसीबी तेरा क्या कुसूर इसमें

तेरे ग़म ने मार डाला मुझे ज़िंदगी से पहले,

मेरा प्यार जल रहा है अरे चांद आज छुप जा

कभी प्यार था हमें भी तेरी चांदनी से पहले,

मैं कभी न मुस्कुराता जो मुझे ये इल्म होता

कि हज़ारों ग़म मिलेंगे मुझे इक खुशी से पहले,

ये अजीब इम्तिहां है कि तुम्हीं को भूलना है

मिले कब थे इस तरह हम तुम्हें बेदिली से पहले.

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अपनी आवाज़ की लर्ज़िश पे तो क़ाबू पा लूं

प्यार के बोल तो होठों से निकल जाते हैं,

अपने तेवर तो संभालो कोई ये न कहे

दिल बदलते हैं तो चेहरे भी बदल जाते हैं.

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मैं नज़र से पी रहा हूं ये समां बदल न जाए

न झुकाओ तुम निग़ाहें कहीं रात ढल न जाए,

मेरे अश्क भी हैं इसमें ये शराब उबल न जाए

मेरा जाम छूने वाले तेरा हाथ जल न जाए,

मेरी ज़िंदगी के मालिक मेरे दिल पे हाथ रखना

तेरे आने की खुशी में मेरा दम निकल न जाए,

अभी रात कुछ है बाकी न उठा नक़ाब साकी

तेरा रिन्द गिरते-गिरते कहीं फिर संभल न जाए,

इसी ख़ौफ़ से नशेमन न बना सका मैं अनवर

कि निग़ाह-ए-अहल-ए-गुलशन कहीं फिर बदल न जाए.

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तक़लीफ़-ए-हिज्र दे गई राहत कभी-कभी

बदला है यों भी रंग-ए-मोहब्बत कभी-कभी,

दिल ने तेरी जफ़ा को सहारा समझ लिया

गुज़री है यों भी हम पे मुसीबत कभी-कभी,

दुनिया समझ न ले तेरे ग़म की नज़ाकतें

करता हूं ज़ेर-ए-लब शिक़ायत कभी-कभी

है जिस तरफ़ निग़ाह तवज्जो उधर नहीं

होती है बेरुख़ी भी इनायत कभी-कभी,

आई शब-ए-फिराक़ तो घबरा गए शजी

आती है ज़िंदगी में क़यामत कभी-कभी.

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रफ़्ता-रफ़्ता वो मेरी हस्ती का सामां हो गए

पहले जां, फिर जान-ए-जां, फिर जान-ए-जाना हो गए.

दिन-ब-दिन बढ़ती गईं, उस हुस्न की रानाइयां

पहले गुल, फिर गुलबदन, फिर गुलबदाना हो गए.

आप तो नज़दीक से, नज़दीकतर आते गए

पहले दिल, फिर दिलरुबा, फिर दिल के मेहमां हो गए.

प्यार जब हद से बढ़ा सारे तकल्लुफ मिट गए

आप से फिर तुम हुए, फिर तू का उनवां हो गए.

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ज़िंदगी यूं हुई बसर तन्हा

क़ाफिला साथ और सफर तन्हा.

अपने साये से चौंक जाते हैं

उम्र गुज़री है इस कदर तन्हा.

रात भर बोलते हैं सन्नाटे

रात काटे कोई किधर तन्हा.

दिन गुज़रता नहीं है लोगों में

रात होती नहीं बसर तन्हा.

हमने दरवाज़े तक तो देखा था

फिर न जाने गए किधर तन्हा.

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आदतन तुमने कर दिए वादे

आदतन हमने ऐतबार किया,

तेरी राहों में हर बार रुक कर

हमने अपना ही इंतज़ार किया

अब ना मांगेंगे ज़िंदगी या रब

ये गुनाह हमने एक बार किया.

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ऐ मौत उन्हें भुलाए जमाने गुजर गए

आ जा कि जहर खाए जमाने गुजर गए,

ओ जाने वाले! आ कि तेरे इंतजार में

रास्ते को घर बनाए जमाने गुजर गए,

गम है न अब खुशी है न उम्मीद है न आस

सब से निजात पाए जमाने गुजर गए,

क्या लायक-ए-सितम भी नहीं अब मैं दोस्त

पत्थर भी घर में आए जमाने गुजर गए,

जाने बहार फूल नहीं आदमी हूं मैं

आ जा कि मुस्कुराए जमाने गुजर गए,

क्या-क्या तवक्कोअत थी आहों से ऐ खुमार

यह तीर भी चलाए जमाने गुजर गए.

गुलज़ार का जन्म पंजाब के झेलम ज़िले के दीना गांव में वर्ष 1943 में हुआ था. उनका असली नाम संपूरण सिंह है. वह अपने पिता की दूसरी पत्नी की इकलौती संतान हैं. सभी नौ भाई-बहनों में वह चौथे स्थान पर थे. उनकी मां उन्हें तब छोड़कर चली गईं, जब वह दूध पीते बच्चे थे. मां के आंचल की छांव और पिता का दुलार तक उन्हें नहीं मिला. उनका बचपन दिल्ली की सब्जी मंडी में बीता. बंटवारे के बाद उनका परिवार अमृतसर (पंजाब) आकर बस गया और गुलज़ार जीविकोपार्जन के लिए मुंबई चले गए. वहां वह बतौर मैकेनिक काम करते थे और खाली समय में कविताएं लिखते थे. गुलज़ार ने भारत-पाक विभाजन की त्रासदी न केवल झेली, बल्कि उसे नज़दीक से देखा और भोगा भी. गुलज़ार ने अपने करियर की शुरुआत 1962 में विमल राय की फिल्म बंदिनी से की थी. बंदिनी मिलने के पीछे एक कहानी है. एक बार उनकी दुकान पर उस जमाने के मशहूर संगीतकार सचिन देव बर्मन अपनी मोटर ठीक कराने आए. बातों-बातों में एस डी बर्मन मैकेनिक संपूरण सिंह कालरा यानी गुलज़ार की गीत लेखन प्रतिभा से परिचित हुए. बर्मन उन दिनों काफी परेशान थे. वजह यह थी कि फिल्म बंदिनी के गीत शैलेंद्र लिख रहे थे, लेकिन फिल्म के एक सीन पर लिखा उनका कोई भी गीत विमल राय को जम नहीं रहा था. उन्होंने मैकेनिक संपूरण सिंह को विमल राय से मिलाने की सोची. परेशानी यह थी कि विमल राय किसी भी बात को आसानी से स्वीकार नहीं करते थे. सचिन दा को उनके सामने अपनी बात रखने के लिए कई बार सोचना पड़ता था. उन्होंने विमल राय को संपूरण सिंह से मिलवाया.

विमल राय संपूरण सिंह की प्रतिभा से प्रभावित हुए और उन्हें बंदिनी के गीत लिखने के लिए चुन लिया गया. बंदिनी के गीत-मेरा गोरा रंग लईले, मोहे श्याम रंग दई दे, छुप जाऊंगी रात ही में, मोहे पी के रंग दई दे को स्वर दिया था लता मंगेशकर ने. इस गीत के हिट होते ही वह रातोंरात मोटर मैकेनिक संपूरण सिंह से गीतकार गुलज़ार बन गए. कुछ समय बाद विमल राय ने उन्हें अपना सहायक बना लिया. गुलज़ार ने विमल राय से फिल्म निर्माण सीखा. वह विमल राय को अपना गुरु मानते हैं. गुलज़ार ने विमल राय के प्रमुख सहायक ऋषिकेश मुखर्जी के साथ भी काम किया. इन दोनों का साथ हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के लिए काफी सफल साबित हुआ. ऋषि दा के लिए गुलज़ार ने सबसे पहले फिल्म आनंद के संवाद लिखे. फिल्म के लिए गुलज़ार को सर्वश्रेष्ठ संवाद लेखक का फिल्म फेयर अवॉर्ड भी मिला. यह गुलज़ार का पहला फिल्म फेयर अवॉर्ड था. इस फिल्म में गुलज़ार लिखित गीत-मैंने तेरे लिए ही सात रंग के सपने बुने को मुकेश ने अपनी आवाज़ दी, जिसे खूब पसंद किया गया. ऋषि दा के साथ गुलज़ार ने कई बेहतरीन फिल्में दीं. इनमें प्रमुख हैं, बावर्ची, गुड्डी, मिली, नमक हराम, गोलमाल, जंजीर और अभियान, जो सुपर हिट रहीं. कई हिट फिल्में देने के बावजूद कुछ मतभेदों की वजह से उन्होंने इन दोनों महान कलाकारों के साथ काम न करने का ़फैसला कर लिया. अपनी बनाई फिल्मों की कथा, पटकथा एवं संवाद भी गुलज़ार स्वयं लिखते हैं. समाज में उपेक्षित गूंगे-बहरों की समस्या पर आधारित गुलज़ार की फिल्म कोशिश ने राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त किया. गुलज़ार को डैनी बॉयल की फिल्म स्लमडॉग मिलिनेयर में गीत जय हो के लिए ऑस्कर अवॉर्ड और गैमी अवॉर्ड से सम्मानित किया गया. वहीं उन्हें वर्ष 2002 में साहित्य अकादमी पुरस्कार और वर्ष 2004 में पद्मभूषण अवॉर्ड भी मिला.

अभिनेता संजीव कुमार गुलज़ार की पहली पसंद थे. शायद इसीलिए उनकी फिल्मों अंगूर, कोशिश, आंधी, परिचय, नमकीन, मौसम में संजीव कुमार ही थे. गुलज़ार ने विनोद खन्ना, नसीरुद्दीन शाह, अमोल पालेकर एवं जितेंद्र को भी अपनी फिल्मों में लिया. गुलज़ार ने नसीरुद्दीन शाह को लेकर ऐतिहासिक धारावाहिक मिर्जा गालिब बनाया, जिसे बेहद सराहा गया. गुलज़ार इस उम्र में भी उतनी ही ऊर्जा के साथ लेखन में व्यस्त हैं.

मीना कुमारी

अभिनेत्री मीना कुमारी और गुलज़ार के रिश्ते काफ़ी भावनात्मक थे. मीना कुमारी ने मरने से पहले अपनी तमाम डायरियां और शायरी की कापियां गुलज़ार को सौंप दी थीं. गुलज़ार ने उन्हें संपादित कर प्रकाशित भी कराया. दोनों की भेंट फिल्म बेनज़ीर के सेट पर हुई थी. गुलज़ार जब स्वतंत्र फिल्म निर्देशक बने, तो उन्होंने फिल्म मेरे अपने की मुख्य भूमिका मीना कुमारी को दी. वर्ष 1972 में मीना चल बसीं. आज भी गुलज़ार मीना कुमारी को याद करके भावुक हो जाते हैं.

राखी

अपने जमाने की खूबसूरत एवं प्रतिभाशाली अभिनेत्री राखी से गुलज़ार ने शादी की. राखी और गुलजार की प्रेम कहानी किसी फेयरीटेल से कम नहीं थी. हालांकि दोनों का रिश्ता ज़्यादा दिनों तक नहीं चला. मतभेद की शुरुआत तब हुई, जब गुलज़ार ने फिल्म मासूम के लिए राखी की बजाय उनकी प्रतिद्वंद्वी शर्मिला टैगोर को साइन किया. शर्मिला और राखी दोनों अपने जमाने की बेहतरीन अभिनेत्रियां थीं. तभी राखी ने बिना गुलज़ार से पूछे यशराज की फिल्म कभी-कभी साइन कर ली, जो सुपरहिट रही. कहा जाता है कि गुलज़ार राखी की इस अवहेलना से काफी नाराज़ हुए. उनके रिश्ते में इतनी कड़ुवाहट आ गई कि राखी उनसे अलग रहने लगीं. जब राखी और गुलज़ार अलग हुए, तब उनकी बेटी मेघना लगभग डेढ़ वर्ष की थी, पर मेघना को दोनों का ही प्यार मिलता रहा. अलगाव के बाद गुलज़ार ने लिखा था:-

शहर की बिजली गई/बंद कमरे में बहुत देर तलक/कुछ दिखाई न दिया/तुम गई थी जिस दिन उस रोज भी/ऐसा ही हुआ था.

 

प्रमुख फिल्में

गुलज़ार की फिल्मों की विशेषता यह है कि उनके पात्र भावुक और संवेदनाओं से भरे होते हैं. स्त्री-पुरुष संबंधों की बारीकियां गुलज़ार की विशेषता है. उनकी फिल्मों के गीत कथानक के ताने-बाने में बुने होते हैं. गुलज़ार का दर्शन है कि कोई रिश्ता कभी ख़त्म नहीं होता, कोई रिश्ता कभी मरता नहीं है. हमेशा भावनाएं ही काम आती हैं. अंतत: भरोसा और विश्‍वास की जीत होती है. उन्होंने बतौर निर्देशक  फिल्म मेरे अपने (1971), परिचय (1972), कोशिश (1972),  अचानक (1973), खुशबू (1974), आंधी (1975),  मौसम (1976),  किनारा (1977),  किताब (1978),  अंगूर (1980),  नमकीन (1981),  मीरा (1981),  इजाजत (1986), लेकिन (1990), लिबास (1993),  माचिस (1996), हुतूतू (1999) आदि में काम किया.

टीवी सीरियल

मिर्जा गालिब (1988), किरदार (1993).

 

प्रमुख किताबें

चौरस रात (लघु कथाएं, 1962), जानम (कविता संग्रह, 1963),  एक बूंद चांद (कविताएं, 1972), रावी पार (कथा संग्रह, 1997), रात, चांद और मैं (2002), रात पश्मीने की, खराशें (2003).

 

प्रमुख एलबम

सुरमई रात 2013, अक्सर 2012, गुलज़ार नज्म 2012, मरासिम (जगजीत सिंह/1999), ख्वाहिश-ए ड्रिम कम ट्रू 2002, सनसेट प्वाइंट 2000.


 

 

दादा साहब फाल्के अवॉर्ड से सम्मानित कलाकार

1969-देविका रानी, अभिनेत्री

1970-बी एन सरकार, निर्माता

1971-पृथ्वीराज कपूर, अभिनेता (मरणोपरांत)

1972-पंकज मलिक, संगीत निर्देशक

1973-रूबी मायर्स (सुलोचना), अभिनेत्री

1974-बोमी रेड्डी नरसिम्हा रेड्डी, निर्देशक

1975-धीरेंद्र नाथ गांगुली, अभिनेता-निर्देशक

1976-कानन देवी, अभिनेत्री

1977-नितिन बोस, छायाकार-निर्देशक-लेखक

1978-राय चंद बोराल, संगीतकार-निर्देशक

1979-सोहराब मोदी, अभिनेता-निर्देशक-निर्माता

1080-पैडी जयराज, अभिनेता-निर्देशक

1981-नौशाद अली, संगीतकार

1982-एल वी प्रसाद, अभिनेता-निर्देशक-निर्माता

1983-दुर्गा खोटे, अभिनेत्री

1984-सत्यजीत राय, निर्देशक

1985-वी शांताराम, अभिनेता-निर्देशक-निर्माता

1986-बी नागी रेड्डी, निर्माता

1987-राज कपूर, अभिनेता-निर्देशक

1988-अशोक कुमार, अभिनेता

1989-लता मंगेशकर, पार्श्‍व गायिका

1990-ए नागेश्‍वर राव, अभिनेता

1991-भालजी पेंढारकर, निर्माता-लेखक

1992-भूपेन हजारिका, संगीतकार-संगीत निर्देशक

1993-मजरूह सुल्तानपुरी, गीतकार

1994-दिलीप कुमार, अभिनेता

1995-डॉ. राजकुमार, अभिनेता

1996-शिवाजी गणेशन, अभिनेता

1997-प्रदीप, गीतकार

1998-बी आर चोपड़ा, निर्देशक-निर्माता

1999-ऋषिकेश मुखर्जी, निर्देशक

2000-आशा भोसले, पार्श्‍व गायिका

2001-यश चोपड़ा, निर्देशक-निर्माता

2002-देव आनंद, अभिनेता-निर्देशक-निर्माता

2003-मृणाल सेन, निर्देशक

2004-अडूर गोपालकृष्णन, निर्देशक

2005-श्याम बेनेगल, निर्देशक

2006-तपन सिन्हा, निर्देशक

2007-मन्ना डे, गायक

2008-वी के मूर्ति, छायाकार

2009-डी रामानायडू, निर्माता-निर्देशक

2010-लालकृष्ण बालाचंदर, निर्देशक

2011-सौमित्र चटर्जी, अभिनेता

2012-प्राण