पैसा चुनाव जीत रहा है, मुद्दा नहीं

आजकल समाचारपत्रों में, टेलीविज़न चैनलों पर, एफ एम रेडियो पर, सड़कों के किनारे लगे होर्डिंग्स पर, सोशल मीडिया में मोदी और उनका विकास मॉडल ही नज़र आता है. कांग्रेस और दूसरे राजनीतिक दल इस मामले में काफी पीछे छूट गए हैं. लेकिन, भाजपा द्वारा चलाए जा रहे विज्ञापन के इस तूफानी हमले में जो रक़म खर्च की जा रही है, वह भी असाधारण है. मीडिया में भाजपा के सूत्रों के हवाले से आई ख़बरों के मुताबिक़ यह रक़म पांच हज़ार करोड़ रुपये है, हालांकि विपक्षी दल और भाजपा के आलोचक इस खर्च को दस हज़ार करोड़ रुपये से ज़्यादा आंक रहे हैं. क्या है मोदी लहर, मोदी के विकास मॉडल और इस चुनाव में हावी मुद्दों का सच, पढ़िए इस रिपोर्ट में… 1

अक्सर राह चलते आपने सड़क किनारे किसी टॉर्च बेचने वाले को देखा होगा. टॉर्च बेचने वाला जोर-जोर से बोलता है कि रात में आपको सांप न काट ले, इसलिए अपने पास टॉर्च रखिए. अब आपको अंधेरे में सांप काटे न काटे, लेकिन एकबारगी आप इस बारे में सोचेंगे ज़रूर. हो सकता है, आप टॉर्च खरीद भी लें. बस, यहीं पर टॉर्च बेचने वाले का मकसद पूरा हो जाता है. कुछ ऐसी ही कहानी आज भारतीय राजनीति में देखने-सुनने को मिल रही है. आज़ादी के बाद पहली बार ऐसा देखने को मिल रहा है, जब एक अकेला आदमी अपनी पार्टी, अपने संगठन से बड़ा बना दिया गया है. पहली बार आम चुनाव मुद्दों पर नहीं, बल्कि एक आदमी के करिश्माई (तथाकथित) व्यक्तित्व के सहारे लड़ा जा रहा है. यह तथाकथित करिश्माई व्यक्तित्व हैं नरेंद्र मोदी. पारंपरिक एवं न्यू मीडिया के जरिये मोदी के विकास पुरुष की छवि देश-दुनिया में पहुंचा दी गई. गुजरात के विकास को सर्वोत्तम मॉडल बताया गया. इस सर्वोत्तम मॉडल और उसकी असलियत की चर्चा इस स्टोरी में विस्तार से की गई है. यह सब करने के लिए मीडिया के जरिये हज़ारों करोड़ रुपये खर्च किए गए हैं. कैसे, कहां और कितने पैसे खर्च हुए हैं, इसका पूरा विवरण इस स्टोरी में दिया जा रहा है. ये विवरण किसी आरोप, किसी कल्पना के आधार पर नहीं दिए गए हैं, बल्कि ये ऐसे तथ्य हैं, जिन्हें भाजपा के कई वरिष्ठ नेताओं ने स्वीकार किया है और ये ऐसे खर्च हैं, जिन्हें आप अपनी आंखों से देख सकते हैं. खर्च की बात करने से पहले यह स्पष्ट करना ज़रूरी है कि चुनाव खर्च के मामले में किसी भी पार्टी के लिए कोई अधिकतम सीमा निर्धारित नहीं है. इस पर अंकुश लगाने के लिए कोई ठोस मैकेनिज्म नहीं है. हां, उम्मीदवारों के लिए अधिकतम सीमा 70 लाख रुपये ज़रूर तय की गई है. पार्टियां चाहे जितना खर्च करें. इसका अर्थ यह हुआ कि पार्टियां चुनाव से पहले या चुनाव के दौरान चाहे जितना खर्च करें, इसकी कोई सीमा नहीं है. मसलन, पार्टी की तरफ़ से चुनाव के लिए अपने स्टार प्रचारकों की घोषणा की जाती है. इन स्टार प्रचारकों पर जो खर्च आता है, वह पार्टी के खाते में जाता है, न कि उम्मीदवारों के खाते में. लेेकिन, इसके लिए भी एक नियम है. अगर स्टार प्रचारक जिस मंच से भाषण देता है और उस मंच पर पार्टी का उम्मीदवार भी हो, तो वह खर्च उम्मीदवार के खाते में चला जाता है. यहां यह भी ध्यान दिया जाना चाहिए कि किसी भी राजनीतिक दल का चुनाव प्रचार चुनाव की घोषणा होने, यानी आचार संहिता लागू होने से पहले ही शुरू हो जाता है. जैसे, जबसे भाजपा ने नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया, तभी से मोदी  पूरे देश में घूम-घूमकर रैली कर रहे हैं. ऐसे में इस तरह के खर्च को भी चुनावी खर्च ही माना जाएगा. बहरहाल, सबसे पहले शुरुआत करते हैं वहां से, जब नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया गया. तभी से नरेंद्र मोदी ने देश भर में रैली करना शुरू किया. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, उनकी एक-एक रैली में 7 से 10 करोड़ रुपये का खर्च आता है. यह गणना करके बताया गया है कि उनकी रैली में मंच, गाड़ियां, तकनीकी टीम, कैमरा, क्रेन समेत अन्य कई खर्च शामिल होते हैं. देश के सारे चैनलों को मोदी की पर्सनल टेक्निकल एवं कैमरा टीम के लोग मोदी के रैली के विजुअल उपलब्ध कराते हैं. यह टीम नरेंद्र मोदी की हरेक रैली में साथ चलती है. एक उदाहरण लेते हैं, पटना की हुंकार रैली का. कथित तौर पर इस रैली के लिए 6000 बसें, 20,000 एसयूवी, 11 ट्रेनें बुक कराई गई थीं. 30 फीट का एक डायनेमिक स्क्रीन लगा था. विशेष मंच तैयार किए गए थे. मोटे तौर पर हिसाब लगाएं, तो एक बस का किराया 5 हज़ार से 15 हज़ार रुपये होता है. औसतन इस खर्च को 10 हज़ार भी मान लिया जाए, तो 6 हज़ार बसों का किराया होता है 6 करोड़ रुपये. इसी तरह 20 हज़ार यूएसवी का किराया बनता है 4 करोड़ रुपये. 11 ट्रेनें सरकारी दर पर भी बुक कराई जाएं, तो उनका किराया बनता है क़रीब एक करोड़ रुपये. इस हिसाब से स़िर्फ पटना की हुंकार रैली में लोगों को लाने के लिए ट्रांसपोर्ट पर 11 करोड़ रुपये खर्च किए गए. संभव है कि यह खर्च थोड़ा कम हो जाए, क्योंकि आम तौर पर राजनीतिक दलों को ट्रांसपोर्टर सस्ती दरों पर वाहन मुहैया करा देते हैं, यानी ये 11 करोड़ रुपये 8 करोड़ भी हो सकते हैं. अन्य मदों मसलन हेलिकॉप्टर, बैनर, नाश्ता, पानी एवं सुरक्षा आदि का खर्च शामिल कर लें, तो यह एक बहुत बड़ी रकम हो जाती है. मोदी इस तरह की दर्जनों रैलियां आचार संहिता लागू होने से पहले कर चुके हैं और चुनाव ख़त्म होने तक क़रीब दो सौ के आसपास रैलियां कर चुके होंगे. चुनाव से पहले वाली मोदी की रैलियों का खर्च भारतीय जनता पार्टी के खाते में डालें, तो यह एक बहुत बड़ी रकम होगी. हालांकि, इस रकम का पक्का हिसाब लगाना कठिन है, लेकिन हुंकार रैली की तर्ज पर मोदी ने बड़े-बड़े शहरों में दर्जनों मेगा रैलियां की हैं. पटना की हुंकार रैली पर होने वाले खर्च को मानक मान लिया जाए, तो बड़े-बड़े शहरों में हुईं उनकी रैलियों पर होने वाले खर्च का एक अंदाजा तो लगाया ही जा सकता है. इसके अलावा, चुनाव के दौरान स्टार प्रचारक होने के नाते मोदी की रैली का खर्च पार्टी के खाते में जाएगा. हालांकि, जिन मंचों पर पार्टी का उम्मीदवार मौजूद होगा, वहां का खर्च उस उम्मीदवार के खाते में चला जाएगा. लेेकिन, रैलियों पर होने वाला यह खर्च एक झांकी भर है. असली खर्च इसके आगे शुरू होता है. इसे आप एडवर्टिजमेंट वार (युद्ध) भी कह सकते हैं. इसे आप गोएबल्स थ्योरी का व्यवहारिक प्रयोग भी कह सकते हैं. थोड़ा संशोधन करते हुए यह कह सकते हैं कि यहां अगर पूर्णत: झूठ का प्रचार नहीं हो रहा, तो पूरा सत्य भी सामने नहीं लाया जा रहा है. यानी अर्द्धसत्य को पूर्णसत्य बनाकर लगातार इस तरह पेश किया जा रहा है, मानो वही अंतिम सत्य हो. यह अर्द्धसत्य दरअसल, एडवर्टिजमेंट के रूप में पिछले कई महीनों से टीवी पर दिखाया जा रहा है. भाजपा की ओर से 10 से 30 सेकेंड के क़रीब 25 एडवर्टिजमेंट बनाए गए हैं. टीवी एडवर्टिजमेंट रेट के मुताबिक, 30 सेकेंड के एड के लिए 80 हज़ार रुपये लगते हैं. भाजपा ने तीन महीने के लिए 2000 स्पॉट प्रतिदिन हिंदी, अंग्रेजी और क्षेत्रीय भाषाओं के चैनल पर बुक कराए हैं. इसके अलावा, गुजरात विकास से जुड़े एड पहले से ही आ रहे हैं. अब अगर इसका औसत हिसाब लगाएं, तो एक दिन में 12 करोड़ रुपये एडवर्टिजमेंट पर खर्च हो रहे हैं. इस हिसाब से तीन महीने में टीवी एडवर्टिजमेंट पर भाजपा की ओर से क़रीब 11 सौ करोड़ रुपये खर्च हो चुके होंगे. इसके अलावा, भाजपा ने देश भर में 15,000 होर्डिंग लगाए हैं. 3 लाख से 15 लाख रुपये माहवार किराए की दर से तीन महीने के लिए ये होर्डिंग लगाए गए हैं. इस मद में क़रीब 2 हज़ार करोड़ रुपये से अधिक की लागत आ रही है. प्रिंट मीडिया के लिए भी भाजपा ने जबरदस्त रूप से एडवर्टिजमेंट बांटने की योजना बनाई. देश के 50 अख़बारों में 40 दिन तक, प्रतिदिन 4 से 5 एडवर्टिजमेंट दिए गए. इसके लिए क़रीब 500 करोड़ रुपये का बजट रखा गया है. मैग्जीन वाले शिकायत न करें, इसका इंतजाम भी भाजपा ने किया है. मैग्जीन के लिए अलग से 150 करोड़ रुपये का एडवर्टिजमेंट बजट रखा गया है. अकेले टी-20 वर्ल्डकप के लिए ही 150 करोड़ रुपये का एडवर्टिजमेंट दिया गया. इस बहती गंगा में कोई प्यासा न रहे, इसके लिए इंटरनेट, एफएम रेडियो आदि के लिए अलग से 35 करोड़ रुपये का एडवर्टिजमेंट तैयार किया गया. अब यहां सवाल उठता है कि बिहार में नीतीश कुमार ने भी विकास किया. वहां भी सड़क, बिजली, सरकारी नौकरियों में महिलाओं की संख्या में बढ़ोत्तरी, क़ानून-व्यवस्था में सुधार, महिला सशक्तिकरण जैसे काम होते हुए दिखे. लेेकिन, इस चुनाव में तक़रीबन हरेक सर्वेक्षण नीतीश कुमार को 3 से 4 सीटें दे रहा है. तो क्या इस चुनाव में विकास का मुद्दा गौण हो गया है? दूसरी तरफ़, मोदी इसी बिहार या उत्तर प्रदेश में जाकर विकास के नाम पर, गुजरात के विकास की बात करके वोट मांग रहे हैं. क्या ये दोनों बातें अंतर्विरोधी नहीं हैं? जाहिर है, नरेंद्र मोदी के विकास की बात मीडिया के जरिये फैलाई जा रही है, जहां एडवर्टिजमेंट के नाम पर हज़ारों करोड़ रुपये खर्च किए जा रहे हैं. अगर इतना ही पैसा या मीडिया मैनेजमेंट का हुनर नीतीश कुमार के पास होता, तो शायद वह भी मीडिया और एडवर्टिजमेंट के जरिये अपनी विकास गाथा का ढिंढोरा पीट-पीटकर छाए रहते. यानी इस चुनाव में भाजपा की ओर से जिस विकास की बात कही जा रही है, वह मीडिया के जरिये, हज़ारों करोड़ रुपये खर्च करके गढ़ी गई है, क्योंकि अगर सचमुच इस चुनाव में विकास एक मुद्दा होता, तो नीतीश कुमार इस चुनावी दौड़ में इतने पीछे नहीं दिखते. क्या यह सही नहीं है कि उत्तर प्रदेश, बिहार या अन्य राज्यों में एक बार फिर राजनीतिक समीकरण यानी जातीय समीकरण ने विकास के मुद्दे को इस चुनाव में गौण कर दिया है? सवाल है कि जिस विकास की बात मोदी अपने भाषणों में करते हैं, उसका मतलब क्या है? कैसा विकास और किसका विकास?  सवाल है कि जो युवा वर्ग इन चुनावी एडवर्टिजमेंट के मायाजाल में फंस कर मोदी के समर्थन में आएगा, उसे मोदी कहां से रा़ेजगार देंगे? महंगाई को कैसे कम करेंगे, कितने दिनों में कम करेंगे, इसकी रूपरेखा क्या है उनके पास? मोदी मैन्यूफैक्चरिंग, प्रोसेसिंग, पैकेजिंग के जरिये रोज़गार सृजन की बात करते हैं. चीन हमारे यहां अपने माल की डंपिंग कर रहा है. हमारी विदेशी मुद्रा चीन जा रही है. ऐसे में मोदी क्या करेंगे? क़रीब 48 बिलियन डॉलर का हम स़िर्फ सेलफोन जैसे इलेक्ट्रॉनिक सामान का आयात कर रहे हैं. क्या हम भारत में सेलफोन नहीं बना सकते? हम डॉलर में भुगतान करते हैं. सेलफोन के लिए हमें चीन की ज़रूरत है. क्या नरेंद्र मोदी ने इसका कोई समाधान देने की बात कही है? मोदी भारत को विश्‍वगुरु बताते हैं. वह कहते हैं कि हम बड़ी संख्या में शिक्षक तैयार करके विदेशों में भेज सकते हैं. लेकिन, सवाल है कि इस देश में जबसे शिक्षा का अधिकार क़ानून लागू हुआ है, तबसे सभी बच्चों को शिक्षा देने के लिए पर्याप्त संख्या में न तो शिक्षक हैं और न स्कूल. नेशनल नॉलेज कमीशन के मुताबिक, अभी भी देश में सैकड़ों विश्‍वविद्यालयों और हज़ारों प्रोफेसरों की ज़रूरत है. ऐसे में शिक्षक तैयार करके विदेश भेजने की बात हास्यास्पद नहीं है, तो और क्या है? गुजरात के औद्योगिक विकास से किसका फायदा हुआ? सवाल है कि यही मॉडल पूरे देश में लागू करके मोदी किसका विकास करना चाहेंगे? गुजरात मॉडल से गुजरात के आदिवासियों, दलितों और ग़रीबों का कितना भला हुआ? गुजरात में 80 हज़ार दलितों ने अभी हाल में बौद्ध धर्म अपनाया है. गुजरात के आदिवासियों के नाम पर आने वाली विकास योजनाओं का हश्र और भी खराब है. उदाहरण, केंद्र सरकार ने आदिवासी लड़कों एवं लड़कियों के लिए छात्रावास बनाने की योजना शुरू की थी. इसके तहत गुजरात सरकार को वर्ष 2010-11 में 1296.43 लाख रुपये का अनुदान मिला, लेकिन मोदी सरकार प्रदेश में एक भी छात्रावास नहीं बनवा सकी. वर्ष 2011-12 में यही स्थिति रही. उसी तरह 2012-13 में भी 187.06 लाख रुपये मिले, लेकिन छात्रावास का निर्माण नहीं हो सका. कुछ यही कहानी गुजरात आश्रम स्कूल योजना की रही. आदिवासी बच्चों की शिक्षा के लिए आश्रम स्कूल की स्थापना के लिए 2010-11 में 1887.53 लाख रुपये मोदी सरकार को मिले. सरकार ने इस धनराशि से 8 विद्यालय खोले, लेकिन उसके बाद इस योजना के क्रियान्वयन में लापरवाही बरती गई. वर्ष 2011-12 में भी केंद्र सरकार की ओर से 15 करोड़ रुपये की धनराशि राज्य सरकार के खाते में आई, लेकिन ये रुपये खजाने की शोभा बढ़ाते रहे. आंकड़ों के अनुसार, आदिवासी इलाकों में वोकेश्‍नल ट्रेनिंग के लिए वर्ष 2011-12 में केंद्र सरकार की ओर से 228.96 लाख रुपये गुजरात सरकार को मिले, लेकिन उसे खर्च नहीं किया गया. यही स्थिति आगामी वर्षों में भी रही. इससे जाहिर होता है कि आदिवासियों के कल्याण के लिए गुजरात सरकार कितनी गंभीर है. मुसलमानों के संदर्भ में मोदी का व्यवहार ऐसा है, मानो वह कहना चाहते हों कि मुसलमान उन्हें वोट न दें, तो भी कोई बात नहीं है. ऐसा शायद इसलिए भी है, क्योंकि जब मोदी ने सद्भावना उपवास शुरू किया, तब मंशा यह थी कि इससे उनकी छवि थोड़ी नर्म बनेगी, लेकिन ऐसा हुआ नहीं. अब खुद उनके या उनके सिपहसालार अमित शाह के बयान से यही लगता है कि उन्हें इस देश की 20 फ़ीसद आबादी की कोई चिंता नहीं है. सवाल है कि इतनी बड़ी आबादी को अलग-थलग करके आप कैसे और कितना विकास कर सकते हैं? बहरहाल, इस चुनाव में बातें विकास की भले हो रही हों, लेकिन जिस तरीके से धनबल का इस्तेमाल हो रहा है, वह विकास के मुद्दे पर भारी पड़ रहा है. बेशक गुजरात में भी विकास हुआ है और नरेंद्र मोदी को इसका श्रेय मिलना चाहिए. संभव है कि उन्हें इस लोकसभा चुनाव में फायदा भी मिल जाए या मिलता हुआ दिख रहा है, लेकिन इस चुनाव में सचमुच अगर बात स़िर्फ विकास की होती, तो उस सूची में महाराष्ट्र भी आता, बिहार भी आता, हरियाणा भी आता, तमिलनाडु भी आता, क्योंकि आंकड़े बताते हैं कि विकास यहां भी हुआ है. नीतीश कुमार ने भी बिहार को विकास की पटरी पर लाने का काम किया है, लेकिन आज चुनावी सर्वेक्षणों में वह कहीं भी शामिल होते नहीं दिख रहे हैं. तो फिर क्या इस चुनाव में जीत के लिए विकास से इतर भी कई चीजें चाहिए? जाहिर है, पैसा वह चीज है, जो आज इस चुनाव में मुद्दों पर भारी पड़ गया.- साथ में  शफ़ीक़ आलम


एनडीए में कितने दल हैं?

यह धारणा है कि नरेंद्र मोदी की वजह से भाजपा को दूसरे दलों का समर्थन नहीं मिलने वाला है. मोदी ने इसके लिए भी एक भ्रम फैलाया कि वर्तमान में एनडीए अब तक का सबसे विशाल गठबंधन है. वैसे नरेंद्र मोदी अपने भाषणों में एनडीए का जिक्र नहीं करते हैं, लेकिन दो इंटरव्यू में नरेंद्र मोदी ने एनडीए की बात की. दोनों ही बार अलग-अलग बयान दिए. पहली बार कहा कि एनडीए 25 दलों का गठबंधन है. दूसरी बार यह बढ़कर 30 हो गया. अब सवाल है कि आख़िर एनडीए में कितने दल हैं? क्या ये दल चुनाव आयोग द्वारा मान्यताप्राप्त हैं या फिर मोदी ने स़िर्फ नंबर बढ़ाने के लिए इन दलों को एनडीए में शामिल किया है. अगर 30 दल हैं, तो वे किन-किन राज्यों में हैं और कितनी सीटों पर लड़ रहे हैंहैरानी तो इस बात की है कि देश के बड़े-बड़े पत्रकारों ने मोदी से बातचीत तो की, लेकिन वे यह सवाल नहीं पूछ सके कि मोदी लोगों को भ्रमित क्यों कर रहे हैं.

काला धन वापस कैसे लाएंगे?

नरेंद्र मोदी ने काले धन के मामले पर अभी से ही उलझाना शुरू कर दिया. एक टीवी इंटरव्यू में मोदी ने कहा कि सरकार बनने के बाद वह आकलन करेंगे कि विदेशी बैंकों में काला धन है या नहीं? और अगर है, तो कितना है? उन्होंने कहा कि इसके लिए एक लीगल टीम बनाई जाएगी, क़ानून बदलना होगा, दूसरे देशों के साथ संधि करनी पड़ेगी. वैसे यही बात तो कांग्रेस पार्टी भी अब तक कहती आई है. पहला सवाल यह है कि क्या मोदी को अब तक यह नहीं मालूम है कि विदेशी बैंकों में देश का काला धन है? अगर दूसरे देशों के साथ संधि न हो पाई, तब क्या होगा? कहने का मतलब यह कि मोदी काले धन पर साफ़-साफ़ क्यों नहीं बोल रहे हैं? दूसरी बात यह है कि मोदी देश के अंदर फैले काले धन के बारे में कुछ क्यों नहीं बोलते?

अपरिपक्व बयान

नरेंद्र मोदी ने पाकिस्तान को लेकर जो बयान दिए हैं, उनका पाकिस्तानी राजनयिकों ने स्वागत किया है. मोदी ने पाकिस्तान को यह इशारा दिया है कि विदेश नीति में वह अटल बिहारी वाजपेयी की नीतियों को आगे बढ़ाएंगे. सवाल यह है कि क्या चुनाव हो गए हैं? क्या भाजपा चुनाव जीत चुकी है? नरेंद्र मोदी को यह समझना चाहिए कि देश में अभी भी एक सरकार है, विदेश मंत्रालय है. भारत की राजनीति का एक अहम पहलू है कि विदेश नीति को लेकर देश में विवाद नहीं होता. सरकार किसी भी दल की आए, लेकिन विदेश नीति के साथ छेड़छाड़ नहीं की जाती. मोदी ने चुनाव के दौरान ही इस तरह के बयान देकर भारत सरकार की अवहेलना की है. इस तरह का बयान अगर चुनाव नतीजे आने के बाद दिया जाता, तब भी कोई बात होती, लेकिन चुनाव प्रचार के दौरान ऐसे बयान देकर मोदी ने अपने बड़बोलेपन और अपरिपक्वता का परिचय दिया है.

ब्यूरोक्रेसी में हलचल का मतलब?

देश में चुनाव हो रहे हैं, लेकिन दिल्ली के मंत्रालयों में काम ठप्प पड़ चुका है. ऐसा लग रहा है कि सरकारी तंत्र छुट्टी पर चला गया है. वरिष्ठ अधिकारियों ने यह मान लिया है कि नई सरकार आने वाली है और वह बिल्कुल नए तरीके से चलने वाली है. कई अधिकारी अभी से ही भारतीय जनता पार्टी और मोदी के नज़दीकियों से रिश्ते बनाने में जुटे हैं. ऐसा माना जा रहा है कि सत्ता परिवर्तन के साथ-साथ देश में अधिकारियों की बड़े पैमाने पर छुट्टी और तबादले की प्रक्रिया शुरू होगी. कई अधिकारी तो ऐसे हैं, जो पिछले कई सालों से चुप थे, वे अब फाइलों में सरकारी नीतियों पर ही सवाल उठाने लग गए हैं. वे इसलिए सवाल उठा रहे हैं, ताकि  अगली सरकार को बता सकें कि वे पिछली सरकार के चहेते अधिकारी नहीं थे. अगर नई सरकार आने के बाद बड़े पैमाने पर अधिकारियों का तबादला हुआ, तो यह एक गलत प्रथा की शुरुआत होगी. अधिकारी वर्ग का ग़ैर-राजनीतिक रहना ज़रूरी है. यह हमारे प्रजातंत्र की ज़रूरत है. ब्यूरोक्रेसी का राजनीतिकरण ख़तरनाक है. चुनाव नतीजे आने में ज़्यादा दिन शेष नहीं हैं. यह तभी पता चलेगा कि क्या ये अधिकारी भारतीय जनता पार्टी या मोदी के इशारे पर ऐसा कर रहे हैं या फिर नई सरकार के सामने अपने नंबर बढ़ाने के लिए दिखावा कर रहे हैं. देखिए, चुनाव के बाद क्या होता है?

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