सोशल मीडिया का राजनीतिक दखल

facebook16 वीं लोकसभा के चुनाव को यदि तकनीक का चुनाव कहा जाए तो यह कतईं गलत नहीं होगा. चुनाव प्रचार से लेकर मतदान और मतगणना तक सब कुछ नई तकनीक पर आधारित था. तकनीक के सफल उपयोग के लिए इन चुनावों को हमेशा याद किया जाएगा. ये चुनाव कई मायनों में पिछले चुनावों से अलग थे. इन चुनावों को एक अलग रंग देने में फेसबुक और ट्विटर जैसी सोशल नेटवर्किंग साइट्स ने महत्वपूर्ण और आंशिक रुप से निर्णायक भूमिका अदा की है. अप्रत्याशित रुप से इस चुनाव का एक सिरा परंपरागत डोर टू डोर कैंपेने शैली पर तो दूसरा उस स्तंभ पर टिका था, जिसे सोशल नेटवर्किंग या नया मीडिया कहा जाता है. फेसबुक और ट्विटर  का आविष्कार करने वालों ने यह सपने में भी नहीं सोचा होगा कि उनकी खोज दुनिया भर में लोकतंत्र के महापर्व का एक प्रमुख अंग बन जाएंगी. जहां हर किसी को स्वच्छंद विचार रखने की आजादी होगी.

पिछले कुछ दशकों में यह देखा गया था कि देश का आम नागरिक और युवा राजनीतिक भागीदारी कम हुई थी. यह तबका राजनीतिक गलियारो में होने वाले विचार विमर्श में अपने विचार बहुत कम या कहें न के बराबर रखता था. गावों और कस्बों का राजनीतिक परिदृश्य बदल गया था. वहां के नुक्कडों और चाय की दुकानों में होने वाली राजनीतिक परिचर्चाओं में भाग लेने वालों की संख्या में भारी कमी आई थी. लेकिन समय बदला और सूचना क्रांति ने इस तस्वीर को पूरी तरह बदल दिया. लैपटॉप और मोबाइल के रुप मेंे युवाओं के हाथ ऐसा हथियार आ गया था जिसने राजनीतिक समीकरणों को बदलने की  ताकत थी. सोशल मीडिया युवाओं को अनायास ही राजनीतिक परिचर्चा की मुख्यधारा में ले आया और डेमोक्रेटिक डेफिसिट की भरपाई कर दी. सोशल मीडिया ने नेता और जनता के बीच को एक नए सिरे से परिभाषित किया है.

सोशल मीडिया की ताकत के बारे में दुनिया ने अरब अपराइजिंग से जाना था. भारतीय राजनीति का सोशल मीडिया की ताकत से परिचय वर्ष 2011 में अन्ना हजारे के लोकपाल आंदोलन ने करवाया था. दिल्ली में हो रहे इस आंदोलन की लपटें देखते ही देखते पूरे देश में फैल गईं. टीवी पर आंदोलन की पल पल की खबर लेकर हर कोई सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर लोगों से इस आंदोलन में भाग लेने की अपील कर रहा था. असर ऐसा हुआ कि देश के कोने कोने में लोग सरकार के विरोध और अन्ना के समर्थन में खड़े दिखाई दिए. स्थानीय स्तर पर हो रहे प्रदर्शन की राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा हो रही थी. इसके बाद तो बड़ी संख्या में राजनेताओं ने सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर उपस्थिति दर्ज कराने की होड़ सी मच गई. इसके बाद आम आदमी पार्टी का गठन हुआ और युवा एक बार फिर से राजनीति और राजनीतिक परिचर्चा की मुख्यधारा में लौट आया. राजनीतिक और वैचारिक लड़ाई फेसबुक वॉल पर लड़ी जाने लगी. 2009 में हुए लोकसभा चुनावों के दौरान देश के केवल एक राजनेता कांग्रेस शशि थरूर के ट्विटर पर 6000 से अधिक फॉलोअर थे. अधिकांश नेता खासकर युवा लोगों से सीधा संवाद करते नजर आने लगे. चुनावी मौसम के आने के बहुत पहले ही सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर प्रधानमंत्री पद के दावेदारों की लड़ाई शुरू हो गई थी.

वर्तमान में भारत में 10 करोड़ फेसबुक यूजर हैं. जिसमें से 7.3 करोड़ ऐसे यूजर हैं जो फेसबुक पर एक्टिव रहते हैं. 16 वीं लोकसभा के लिए हुए आमचुनावों में मतदान करने के लिए 81 करोड़ मतदाता तैयार थे. उम्मीदवारों के सामने सबसे बड़ी चुनौती इन 81 करोड़ मतदाताओं तक पहुंचना था. सोशल नेटवर्किंग पर प्रचार का मुख्य लक्ष्य युवा वर्ग था. उनमें भी वह युवा जो कि पहली बार मतदान करने जा रहा था. इस बार लोकसभा चुनावोंं में पहली बार मतदान कर रहे युवाओं की संख्या लगभग 12 करोड़ थी, अप्रत्यक्ष तौर पर उन्हीं के हाथों में सत्ता की चाभी थी. यही वर्ग देश का सबसे ज्यादा पढ़ा लिखा वर्ग है. यही वर्ग देश को आगे ले जाना चाहता है.

राजनीतिक दलों के लिए इन युवाओं को अपने पाले में ले आना आसान काम नहीं था. तार्किक आधार पर ही उन्हें अपने पाले में खीचा जा सकता है. इसके लिए बड़े दलों ने कमर कस ली थी. आज का शहरी वोटर पहले की अपेक्षा राजनीति और सुशासन को लेकर ज्यादा गंभीर दिखाई पड़ता है. इसलिए नवोदित आम आदमी पार्टी और भारतीय जनता पार्टी ने सबसे पहले सोशल नेटवर्किंग प्लेटफॉर्म को गंभीरता से लिया और इसे चुनावी अखाड़ा बना दिया. कांग्रेस, सपा, बसपा और कम्युनिस्ट पार्टियां इस लड़ाई में पिछड़ती दिखीं. सोशल मीडिया की पहुंच देश के गांवों में भी है भले ही इसका उपयोग करने वालों की संख्या वहां कम हो. सपा, बसपा जैसे स्थापित राजनीतिक दल अपना परंपरागत वोट हासिल करने में सफल रहे लेकिन जो युवा सोशल नेटवर्क पर बहस करता दिखता है उन तक अपनी बात पहुंचाने में असफल रहे. इस बात से कोई भी दल अनभिज्ञ नहीं था कि इस बार युवाओं के वोट ही देश की दिशा को निर्धारित करेंगे. परिणाम आए तो ऐसा ही हुआ उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी 22 प्रतिशत वोट पाने के बावजूद केवल पांच और बसपा 19 प्रतिशत वोट पाने के बाद एक भी सीट हासिल नहीं कर पाई. सोशल मीडिया पर इन दोनों पार्टियों की उपस्थिति न के बराबर ही थी शायद इसीलिए उन्हें वोट हासिल नहीं हो पाया. भाजपा ने सोशल नेटवर्किंग नें अथाह उपस्थिति दर्ज की और 73 सीटों पर अपना परचम लहराया. लेकिन लोकसभा चुनावा आम आदमी पार्टी के संदर्भ में यह बात गलत साबित हुई है. दिल्ली विधानसभा चुनावों में आम आदमी पार्टी के पक्ष में माहौल बनाने में सोशल मीडिया ने महत्वपूर्ण भूमिका अदा की थी.

16 वीं लोकसभा के लिए हुए चुनाव में सभी पार्टियों ने सोशल नेटवर्किंग पर कुल मिलाकर 400-500 करोड़ रुपये खर्च किए हैं. जो कि कुल चुनावी खर्च का लगभग 10 प्रतिशत है. लोकसभा चुनावों में इंटरनेट और सोशल नेटवर्किंग का खर्च उस स्तर तक पहुंच गया था कि चुनाव आयोग से  किसी भी वेबसाइट या सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर चुनावी विज्ञापन लगाने से पहले अनुमति लेना अनिवार्य कर दिया था. इन चुुनावों में सोशल मीडिया ने मोदी लहर बनाने में एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा की. सोशल मीडिया की लोकप्रियता में दिनों दिन हो रहा इज़ाफा यह बताता है कि आने वाले समय में चुनाव प्रचार का यह एक प्रमुख हथियार साबित होगा. सोशल मीडिया के कारण अनावश्यक में चुनाव प्रचार में होने वाले खर्च में भी कमी आएगी. जो कि सीधे तौर पर जनता के हित में होगा. फिलहाल देश की लगभग दस प्रतिशत आबादी सोशल मीडिया की पहुंच में है. ऐसे में इस प्रचार माध्यम पर जरूरत से ज्यादा किया जाने वाले खर्च का कोई औचित्य नहीं है. हालांकि सोशल मीडिया ने परंपरा से हटकर जनता और जनप्रतिनिधियों के बीच सीधा संपर्क बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है.  अभी साफ तौर पर यह कहना जल्दबाजी होगी कि सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर काम करने वाले ओपीनियन मेकर होते हैं. सोशल नेटवरिंग साइट्स पर चलाए जाने वोटर्स अवेयरनेस कैंपेन ने मतदान प्रतिशत को बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है. 2009 की तुलना में इस बार 10 प्रतिशत से ज्यादा बढ़ोत्तरी हुई है.

फिलहाल सोशल नेटवर्किंग साइट्स के अंतर्गत किया जाने वाला प्रचार आदर्श आचार संहिता के अंतर्गत नहीं आता है. इसलिए सोशल नेटवर्किंग की चुनावी पटकथा की असली हीरो पब्लिक रिलेशन एजेंसी हैं. जो तमाम राजनीतिक दलों के प्रचार की कमान संभल रही हैं. स्वयं में सोशल मीडिया अभी इतना ताकतवर नहीं हुआ है कि वहां की लोकप्रियता को वोटों में तब्दील किया जा सके. सोशल मीडिया को कंट्रोवर्सीज क्रिएट करने में महारथ हासिल है. कोई विवादास्पद विषय यदि सोशल नेटवर्किंग साइट्स में आता है और एक बार कमेंट और शेयरिंग -पैटर्न में तेजी आती है तब इसे एक बड़े रुप में टीवी और समाचार पत्रों में जगह मिल जाती है. यहां लोग लकीर के फकीर भी हैं जो मेरी मुर्गी की एक टांग का राग अलापते रहते हैं. ऐसे में एक चुनावी परिचर्चा की गंभीरता कम हो जाती है. इस तरह की चुनौतियों से उबरकर ही सोशल नेटवर्किंग एक बेहतरीन चुनावी मंच साबित होगा.

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