समय पर जानकारी बचा सकती है जान

आज के भाग-दौड़ भरे जीवन में हर चीज पा लेने की जल्दबाजी के चलते हम स्वास्थ्य को पीछे छोड़ते जा रहे हैं, जिसके खामियाजे के रूप में कई बार ज़िंदगी से भी हाथ धोना पड़ता है. ऑफिस की टेंशन हो या घर की या फिर फैशन से प्रेरित होकर लोग सिगरेट और शराब अपना रहे हैं, लेकिन, दरअसल वे सीधे-सीधे मौत को न्योता दे रहे हैं. सिगरेट और शराब कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी को बढ़ावा देती हैं.

yuvअब क्रिकेटर युवराज सिंह को कैंसर होने की बात सामने आई थी, उनके पिता उनके इलाज के लिए भाग-दौड़ कर रहे थे और वह युवी की बीमारी को लेकर जिस तरह मीडिया से रू-ब-रू हो रहे थे, उससे साफ़ था कि उन्हें किसी भी सामान्य इंसान से ज़्यादा कैंसर जैसी घातक बीमारी के बारे में जानकारी थी, लेकिन वह भी शुरुआती अवस्था में कैंसर के लक्षण पहचान नहीं पाए. युवराज सिंह के पिता भी इन दिनों वोकल कॉड कैंसर से जूझ रहे हैं. जिन दिनों वह युवी का इलाज करा रहे थे, उन दिनों वह इस बीमारी की शुरुआती अवस्था में थे. कुछ महीने पहले ही उन्हें खुद को वोकल कॉड कैंसर होने का पता चला. उन्हें खांसी की शिकायत थी और सांस लेने में भी परेशानी होती थी. इसके लिए वह न्यूयॉर्क के एक डॉक्टर की सलाह पर दवाइयां ले रहे थे. दवा लेने पर उन्हें कुछ समय के लिए आराम मिल जाता था, पर धीरे-धीरे उनकी समस्या बढ़ती गई. योगराज सिंह खुशकिस्मत हैं कि वक्त रहते उनकी बीमारी पकड़ में आ गई, डॉक्टरों ने उनका ट्यूमर निकाल दिया है और अब वह स्वस्थ हो रहे हैं. लेकिन, सभी लोग इतने खुशकिस्मत नहीं होते. कैंसर एक जानलेवा बीमारी है. शुरुआती अवस्था में इसके बारे में पता भी नहीं चलता. और जब पता चलता है, तब तक बहुत देर हो चुकी होती है. बीएल कपूर हॉस्पिटल के डॉक्टर अमित अग्रवाल कहते हैं कि यह बीमारी लाइफस्टाइल की देन है. सिगरेट-शराब का चलन इन दिनों खासा बढ़ा है, जो कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी की मुख्य वजह है. डॉक्टर कपूर कहते हैं कि वोकल कॉड कैंसर का पता अन्य तरह के कैंसर से पहले लग जाता है, क्योंकि इसमें आवाज़ बदलने लगती है, गले में परेशानी महसूस होने लगती है. गले का कैंसर महिलाओं की तुलना में पुरुषों को ज़्यादा होता है. अब तक यह माना जाता था कि गले का कैंसर बढ़ती उम्र यानी 50 वर्ष से ज़्यादा के लोगों को अपनी चपेट में लेता है, लेकिन अब 20-25 वर्ष के युवा भी इस रोग से अछूते नहीं हैं.
क्या हैं कारण
अत्यधिक सिगरेट और शराब के कारण गले का कैंसर होता है. इनमें कुछ ऐसे केमिकल्स होते हैं, जो कैंसर का जोखिम बढ़ाते हैं. जो लोग सिगरेट और शराब दोनों का सेवन करते हैं, उन्हें कैंसर का ज़्यादा ख़तरा होता है. जो लोग किसी भी तरह का नशा करते हैं, अक्सर उनके खानपान में कमी देखी जाती है, जिससे पर्याप्त मात्रा में उन्हें विटामिन और मिनरल्स नहीं मिल पाते, जिससे वे कैंसर की चपेट में जल्दी आ जाते हैं. विटामिन सी, विटामिन बी एवं रेशे वाली साग-सब्जियां भोजन में शामिल करके कई तरह के कैंसर से बचा जा सकता है. गले के कैंसर के लिए कुछ केमिकल्स भी ज़िम्मेदार है. अगर आप फार्मेल्डीहाइड, आइसोप्रोपील, एल्कोहल, सल्फ्यूरिक एसिड या डीजल के धुएं के संपर्क में रहते हैं, उनमें गले के कैंसर का जोखिम बढ़ जाता है. इसके अलावा वे लोग, जो लकड़ी का काम करते हैं, कोयले और पेंट के धुएं के संपर्क में सालों से रह रहे हैं, उनमें भी वोकल कॉड कैंसर की संभावना बढ़ जाती है. वे लोग, जो कोयले को ईंधन के रूप में इस्तेमाल करते हैं, उन्हें भी इसके धुएं से परेशानी हो सकती है.
खानपान
फ्रेस फ्रूट एंड वेजिटेबल जूस गले के कैंसर का जोखिम कम करते हैं. ये एंटीऑक्सिडेंट से भरपूर होते हैं. इनमें विटामिन ए, सी और ई होते हैं. पश्‍चिमी देशों में अधिकतर लोग प्रोसेस्ड फूड पर निर्भर हैं, जो कैंसर का जोखिम बढ़ाते हैं. आजकल ज़्यादा उपज के लिए कृषि में रसायनों का प्रयोग धड़ल्ले से हो रहा है, जो कैंसर जैसी बीमारी की एक बड़ी वजह बन रहा है.
जेनेटिक कारण
सेल्स के अत्यधिक वृद्धि के कारण कैंसर होता है. जीन एब्नॉर्मल चेंजेज को रोकता है. जीन में एब्नॉर्मल चेंजेज को म्यूटेशन कहते हैं. म्यूटेशन दो तरह के होते हैं-इनहेरिटेड और एक्वायर्ड (सोमैटिक). इनहेरिटेड जीन म्यूटेशन बच्चों में माता-पिता से एग या स्पर्म के ज़रिये पहुंचता है. म्यूटेशन हर सेल्स में मौजूद रहते हैं. यही वजह है कि कैंसर जेनेटिक भी हो सकता है. अगर परिवार में किसी को कैंसर है, तो यह अन्य सदस्यों को भी हो सकता है. यह माता-पिता से बच्चों को भी हो सकता है.
लक्षण
अगर आपकी आवाज़ तीन सप्ताह से ज़्यादा समय से भारी हो रही है, तो यह गले के कैंसर का लक्षण हो सकता है. इसके अलावा, खाना निगलने में परेशानी होना, दर्द, जलन, खाते समय सेंसशन होना भी गले के कैंसर के लक्षण हो सकते हैं. कई प्रकार के कैंसर में वजन कम होने लगता है. सांस लेने में समस्या, कफ, गले में गांठ जैसा महसूस होना और कान में खुजली होना भी इसके लक्षण हैं. इन लक्षणों को महसूस करते ही तत्काल चेकअप कराना चाहिए, क्योंकि एडवांस स्टेज में पहुंच जाने के बाद इस रोग का इलाज बेहद मुश्किल होता है. हालांकि इनमें से कई समस्याएं अन्य कारणों से भी हो सकती हैं, पर इनके महसूस होते ही तुरंत टेस्ट कराना चाहिए. डॉक्टर कहते हैं कि पुरुषों को होने वाले कैंसरों में दूसरा बड़ा कैंसर है लिरिंग्स कैंसर. इसमें वोकल कॉर्ड में ट्यूमर बन जाता है, जिससे बोलने में परेशानी होने लगती है. यह कैंसर अत्यधिक सिगरेट और शराब के सेवन से होता है. डॉक्टर कहते हैं कि गले के ग्लोटीस और सब-ग्लोटीस के बीच वोकल कॉड होता है. लंबे समय तक स्मोकिंग करने से यहां ट्यूमर बनने लगता है. इससे गले में दर्द होने लगता है. शुरुआत में पता चल जाए, तो इसमें सर्जरी की जाती है या फिर रेडियो थेरेपी दी जाती है, जबकि एडवांस स्टेज में सर्जरी और रेडियो थेरेपी दोनों दी जाती है. अगर किसी कारणवश ट्यूमर न निकल पाए, तो रेडियो थेरेपी और किमो थेरेपी दोनों एक साथ करनी पड़ती है.
कहां कराएं इलाज
देश में कैंसर के इलाज के लिए कई सरकारी और ग़ैर सरकारी संस्थान हैं. सरकारी संस्थानों में मुफ्त या काफ़ी कम शुल्क में इलाज होता है. हम आपको बता रहे हैं, कुछ ऐसे ही संस्थानों के बारे में…

  •  कमला नेहरू मेमोरियल हॉस्पिटल, इलाहाबाद, उत्तर प्रदेश.
  •  चितरंजन नेशनल कैंसर इंस्टीट्यूट, कोलकाता, पश्‍चिम बंगाल.
  •  किदवई मेमोरियल इंस्टीट्यूट ऑफ ओंकोलॉजी, बंगलुरू, कर्नाटक.
  •  गुजरात कैंसर रिसर्च इंस्टीट्यूट, अहमदाबाद, गुजरात.
  •  कैंसर हॉस्पिटल एंड रिसर्च सेंटर, ग्वालियर, मध्य प्रदेश.
  •  इंडियन रोटरी कैंसर इंस्टीट्यूट, एम्स, नई दिल्ली.
  •  आरएसटी हॉस्पिटल एंड रिसर्च सेंटर, नागपुर, महाराष्ट्र.
  •  इंदिरा गांधी इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस, पटना, बिहार.
  •  आचार्य तुलसी रीजनल सेंटर ट्रस्ट एंड रिसर्च इंस्टीट्यूट, बीकानेर, राजस्थान.
  •  संजय गांधी पोस्ट ग्रेजुएट इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस, लखनऊ, उत्तर प्रदेश.

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