इराक़ की राह पर अफ़ग़ानिस्तान

AFPGetty-518756898इराक़ से अमेरिकी सैनिकों की वापसी के तीन साल के बाद वहां के आज के हालात की कल्पना किसी ने भी नहीं की होगी. एक मुल्क के रूप में आज इराक़ के अस्तित्व पर ख़तरा मंडरा रहा है. ऐसा नहीं है कि इरा़क में हमेशा से शांति रही है. अमेरिकी हमले के बाद लगभग वर्षों तक उसके नियंत्रण के दौरान भी सांप्रदायिक हिंसा होती रही और बम धमाकों की गूंज भी लगातार सुनाई देती रही, लेकिन ऐसा पहली बार लग रहा है कि इरा़क का वजूद आज संकट में है. आईएसआईएस नामक चरमपंथी संगठन राजधानी बग़दाद के करीब तक पहुंच चुका है. दावा यह भी किया जा रहा है कि उन्होंने इरा़क की कई बड़ी तेल रिफाइनरियों पर क़ब्ज़ा कर लिया है. इराक की स्थिति केवल उसके लिए नहीं बल्कि सारी दुनिया के लिए चिंता का विषय है. सारी दुनिया की नज़र आज इराक पर है. चीन से लेकर भारत तक सभी के निहितार्थ वहां हैं. लेकिन, सबसे चिंता की बात अगर किसी के लिए है, तो वह है अफ़ग़ानिस्तान के लिए. आज इरा़क जिन कारणों से तबाही की कगार पर खड़ा है कमोबेश वैसी स्थितियां अफगानिस्तान में भी पैदा हो रही हैं.

लगभग आठ वर्षों के नियंत्रण के बाद अमेरिका ने इरा़क से अपनी सेना वापस बुला ली और शासन से लेकर सुरक्षा तक की तमाम जिम्मेदारियों इराक़ियों के हवाले कर दी. सद्दाम हुसैन के दौरान जंग में यह मुल्क इतना टूट चुका था कि विभिन्न संाप्रदायिक गुट उभार लेने लगे. आज इराक शिया, सुन्नी और कुर्द मुख्यतः इन तीन सांप्रदायिक गुटों के संघर्ष के बीच फंसा हुआ है. अतः कहा जा सकता है कि दिसंबर, 2011 में जब अमेरिका ने इराक से अपनी सेना वापस बुलाई थी, उस वक्त इराक़ी सरकार पूरे देश का नियंत्रण अपने हाथ में लेने के लिए तैयार नहीं थी. अब स्थिति नियंत्रण से बाहर हो चुकी है, तो अमेरिका प्रत्यक्ष तौर पर इरा़क में सैन्य हस्तक्षेप करने से बच रहा है. बावजूद इसके लगता है कि अमेरिका ने अपनी ग़लतियों से कोई सबक नहीं सीखा है. आज जिस वजह से इराक गृहयुद्ध की चपेट में है और अपने वजूद की लड़ाई लड़ रहा है, कमोबेश वही हालात अफगानिस्तान में भी दिख रहे हैं. हालांकि, इराक और अफगानिस्तान की आबादी, भौगोलिक परिवेश और ऐतिहासिक परिस्थितियों में काफी अंतर हैं, लेकिन अफगानिस्तान में सुरक्षा और राजनीतिक घटनाक्रमों के जो हालात बन रहे हैं उन्हें नजरअंदाज करना बहुत बड़ी भूल हो सकती है.
अब एक नज़र अफगानिस्तान की स्थिति पर डालते हैं. अमेरिका ने अफ़ग़ानिस्तान से अपने अधिकांश सैनिकों को वापस बुला लिया है. बाक़ी बचे जवान अफ़गानी सेना और सैन्य बलों को प्रशिक्षण देने का काम कर रहे हैं. इराक में जब चरमपंथी मजबूत हो रहे थे और कई इलाकों में बड़ी तेज़ी से अपनी पैठ बना रहे थे, उस वक्त वहां की सरकार उनके प्रति कठोर दमनकारी रुख अपनाए हुए थी. सरकार विरोधियों से बातचीत के पक्ष में नहीं दिख रही थी. इसी का नतीजा है कि आज इराक़ अस्थिरता के दौर में पहुंच चुका है. अफ़ग़ानिस्तान से भी जल्दी ही अमेरिकी सेना स्वदेश लौट जाएगी. इसके बाद सुरक्षा की पूरी कमान अफगानी सुरक्षा बलों के जिम्मे होगी. ऐसे में पूर्ण प्रशिक्षण के अभाव में तालिबान से लड़ना अफग़ानी सेना के लिए बड़ी चुनौती होगी. एक वक्त में तालिबान से बातचीत को लेकर पहल की गई थी, लेकिन वह प्रयास भी पूरी तरह असफल रहा. यानी वहां इराक जैसे हालात अगर अभी नहीं हैं, तो अगले कुछ वर्षों में बनते दिख रहे हैं. इराक़की ही तरह अफ़ग़ानिस्तान में चरमपंथी आतंकवादी संगठन पूरी तरह संगठित हैं और उन्हें फंड भी काफी मिलते हैं. ऐसे में जब अमेरिका सेना पूरी तरह से अफगानिस्तान छोड़ देगी, तो वे विभिन्न जगहों पर क़ब्जे की कोशिश कर सकते हैं. तालिबान एकबार काबुल पर क़ब्जा कर चुका है. कई वर्षों तक उसकी वहां सरकार भी रही. इसमें कोई शक नहीं कि वह ऐसा दोबारा नहीं करेगा.
इराक में जब चुनाव हुए, तो सभी को लगा कि वहां लोकतांत्रिक सरकार सत्ता में है, लेकिन इस दौरान राजनीतिक भ्रष्टाचार काफी बढ़ा. इराक के प्रधानमंत्री नूरी-अल-मलिकी के बारे में कहा जाता है कि उन्होंने देश को एकजुट करने की जगह एक ख़ास समूह को नजरअंदाज किया, उसी तरह हामिद करजई ने भी अपने 12 साल के कार्यकाल में बतौर राष्ट्रपति अफगानिस्तान को एकजुट करने के लिए बहुत कम प्रयास किए हैं. पिछले दिनों अफगानिस्तान में राष्ट्रपति पद के लिए चुनाव हुए. दोनों उम्मीदवारों की राजनीति का आकलन करें, तो ऐसा नहीं लगता कि उनकी प्राथमिकता में अफ़ग़ानिस्तान को सशक्त मुल्क बनाने की कोई योजना भी है, क्योंकि उनमें से एक अब्दुल्लाह  ने 14 जून को हुए रन-ऑफ चुनाव प्रक्रिया का ही बहिष्कार कर दिया. नतीजतन, अफ़ग़ानिस्तान इराक़ की तुलना में राजनीतिक तौर पर अधिक विभाजित हो सकता है.
अफ़ग़ानिस्तान के भविष्य के लिए अगर थोड़ी उम्मीद दिखती है, तो वह है अफगान नेशनल आर्मी. इराकी आर्मी की ही तरह अमेरिकी सेना के जाने के बाद अफगानिस्तान की सुरक्षा की जिम्मेदारी अफगान आर्मी पर ही होगी. इराक की ही तरह अफगानी सेना को प्रशिक्षण अमेरिकी सेना द्वारा ने दिया है. इराक में अमेरिकी प्रशिक्षित इराकी सेना का हश्र हमारे सामने है. साथ ही, अफगानिस्तान के पास पहले कभी कोई राष्ट्रीय सुरक्षा बल नहीं रहा है.अफ़ग़ानिस्तान में इराक़जैसे हालात की चिंता हामिद करजई को भी है. तभी उन्होंने कहा भी है कि अफ़ग़ानिस्तान में कभी इराक जैसी स्थिति नहीं पैदा होगी. लेकिन, उनके महज बयानों को छोड़ दें, और यदि ऐसा हो तो कोई आश्‍चर्य की बात नहीं होगी. अगर अमेरिका अपनी योजना के मुताबिक 2014 के अंत तक अफ़ग़ानिस्तान से पूरी सेना हटा लेता है, तो इराक जैसे हालात निश्‍चित रूप से आ सकते हैं.
हालांकि, अफगानिस्तान को दूसरा इराक बनने से रोकने के लिए अमेरिका के पास अभी वक्त है. बशर्ते उसने जो ग़लतियां इराक में की हैं, वो दोहराई न जाएं. अपनी ग़लती को सुधारने के लिए उसके पास मौक़ा है. इस दरम्यान वह किसी भी मुश्किल हालात से निपटने के लिए उसे अफगानी सेना को बेहतर तरीके से प्रशिक्षत करना होगा. साथ ही, जब नया राष्ट्रपति अपना कार्यभार संभालेगा तो उस पर सभी गुटों से संधि के लिए कूटनीतिक दबाव बनाया जाए. लेकिन जो काम पिछले 10 सालों में नहीं हो सका वह काम चंद महीनों में कैसे हो पाएगा, जबकि सेना को जल्दी वापस बुलाने का ओबामा पर घरेलू दवाब भी है.

Share Article

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *