लाइलाज नहीं है कैंसर

कैंसर एक जानलेवा बीमारी है. कोई भी शख्स कभी भी इसकी चपेट में आ सकता है. महिलाएं हों, पुरुष हों या फिर बच्चे, कोई भी इससे अछूता नहीं है.  सही समय पर सही जानकारी, बीमारी की पहचान और इलाज से ही आपकी जान बच सकती है. 

vaccine_1491943cपूरे विश्‍व में करोड़ों लोग कैंसर से जूझ रहे हैं. विश्‍व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक, विकासशील देशों में 2015 तक कैंसर से होने वाली मौतों की संख्या 25 लाख से बढ़कर 65 लाख होने की आशंका है. भारत में जागरूकता के अभाव के चलते कैंसर से होने वाली मौतों का आंकड़ा लगातार बढ़ता जा रहा है.
आम तौर पर शरीर में आवश्यकतानुसार सेल्स बनती रहती हैं. लगातार नई सेल्स बनती रहती हैं और पुरानी सेल्स मरती रहती हैं. सेल्स के नष्ट होने की प्रक्रिया को एपॉप्टोसिस कहते हैं, लेकिन कैंसरस सेल्स अनियंत्रित रूप से बढ़ती और विकसित होती हैं, ये नष्ट नहीं होती हैं. सेल्स डैमेज होने या असंतुलित रूप से बढ़ने के कारण गांठ की शक्ल ले लेती हैं. कैंसरस सेल्स ब्लड और लिम्फ सिस्टम के माध्यम से शरीर के अन्य हिस्सों में फैलने लगती हैं, और धीरे-धीरे ट्यूमर का रूप ले लेती हैं. कैंसर सौ से भी ज़्यादा प्रकार के होते हैं. इन सभी का नामकरण ऑर्गन या सेल्स के प्रकार के नाम पर किया गया है. बढ़ती उम्र के साथ कैंसर की आशंका भी बढ़ने लगती है.

ट्यूमर दो प्रकार के होते हैं:

  1. बिनाइन (इशपळसप) जिसे कैंसर रहित कहा जाता है.
  2. मेलिग्नेंट (चरश्रळसपरपीं) जो कैंसरस होता है.

बिनाइन ट्यूमर धीरे-धीरे बढ़ता है और यह फैलता नहीं है. जबकि मेलिग्नेंट ट्यूमर तेजी से बढ़ता है और अन्य टिशूज को भी नष्ट करता है. यह पूरे शरीर में फैल जाता है. मेलिगनेंट ट्यूमर ही कैंसर होता है. सभी प्रकार के कैंसर शरीर में सेल्स की अत्यधिक वृद्धि के कारण ही होते हैं.
क्यों होता है कैंसर
शोधकर्ताओं का कहना है कि इसके पीछे कोई एक कारण नहीं है. जेनेटिक, लाइफ स्टाइल, नशीले पदार्थों का सेवन, डाइट, विभिन्न प्रकार के इंफेक्शन, विभिन्न प्रकार के रसायन एवं रेडिएशन आदि इसके मूल में होते हैं. इन दिनों पुरुषों में फेफ़डे में, पेट और लीवर(जिगर) के कैंसर ज़्यादा हो रहे हैं, वहीं महिलाओं में ब्रेस्ट, स्टमक, कोरोलेक्टल और सर्वाइकल कैंसर के मामले बढ़ते जा रहे हैं.
ह्यूमन पैपिलोमा वायरस
कैंसर ह्यूमन पैपिलोमा वायरस या एचपीवी के कारण होता हैं, जो लगभग 100 से भी ज़्यादा तरह के होते हैं,
अब-तक इनमें 58 तरह के वायरसों की पहचान हो चुकी है. एचपीवी वायरस को नंबरों के आधार पर पहचाना जाता है. जैसे एचपीवी-6, एचपीवी-11, एचपीवी-16 और एचपीवी-18. इनमें से एचपीवी-16 और एचपीवी-18 से संबंधित मामले भारत में ज़्यादा देखे गए हैं. ये वायरस शरीर के कई हिस्सों को प्रभावित करते हैं. कुछ वायरस शारीरिक संबंधों से त्वचा के माध्यम से ट्रांसफर होते हैं. ये जनन अंगों को प्रभावित करते हैं, जबकि कुछ वायरस शरीर के अन्य हिस्सों, जैसे उंगलियों, हाथ, चेहरा और गला आदि को भी प्रभावित करते हैं. अगर कोई व्यक्ति एचपीवी वायरस से संक्रमित है और उसमें यह वायरस सुप्तावस्था(स्लीपिंग स्टेट) में है, तब भी उसके पार्टनर के संक्रमित होने की संभावना होती है. सभी तरह के कैंसर के लिए एचपीवी ज़िम्मेदार है, लेकिन हेपेटाइटिस बी और सी लीवर कैंसर के लिए ज़िम्मेदार होते हैं. बच्चों में कैंसर के लिए इपस्टिन-बार वायरस ज़िम्मेदार होता है.
कार्सिनोजिंस के कारण
इसमें सीधे तौर पर हमारा डीएनए डैमेज होता है, जिससे कैंसर की आशंका बढ़ जाती है. टोबैको, एस्बेस्टस, आर्सेनिक, फार्मेल्डिहाइड, आइसोप्रोपिल, एल्कोहल, सल्फ्यूरिक एसिड या डीजल का धुआं, रेडिएशन, जैसे कि गामा और एक्स-रे, सूर्य की रोशनी, कार का एक्जॉस्ट फ्यूम्स के संपर्क में रहने से कैंसर की आशंका बढ़ जाती है. ये फ्री रेडिकल्स सेल्स को डैमेज करते हैं और शरीर के फंक्शन में बाधक बनते हैं. गले के कैंसर के लिए कुछ केमिकल्स भी ज़िम्मेदार हैं. अगर आप फार्मेल्डीहाइड, आइसोप्रोपील, एल्कोहल, सल्फ्यूरिक एसिड या डीजल के धुएं के संपर्क में रहते हैं, तो गले के कैंसर का जोखिम बढ़ जाता है.
जेनेटिक कारण
जीन एब्नॉर्मल चेंजेज को रोकता है. जीन में एब्नॉर्मल चेंजेज को म्यूटेशन कहते हैं. म्यूटेशन दो तरह के होते हैं-इनहेरिटेडरी और एक्वायर्ड (सोमैटिक). इनहेरिटेडरी जीन म्यूटेशन बच्चों में माता-पिता से एग या स्पर्म के जरिये पहुंचता है. म्यूटेशन हर सेल्स में मौजूद रहते हैं. कैंसर जेनेटिक भी हो सकता है. अगर परिवार में किसी को कैंसर है, तो यह अन्य सदस्यों को भी हो सकता है. यह माता-पिता से बच्चों को भी हो सकता है.
नशे का सेवन
जो लोग सिगरेट, सिगार या तंबाकू का सेवन करते हैं, उन्हें कैंसर हो सकता है.
डाइट
जिन लोगों की डाइट काफी कम होती है या जो लोग हेल्दी डाइट नहीं लेते, उन्हें पर्याप्त मात्रा में विटामिन और मिनरल्स नहीं मिल पाते. ऐसे लोग कैंसर की चपेट में जल्दी आते हैं. दरअसल, उन लोगों के शरीर में रोग प्रतिरोधक क्षमता कम होती है, इस कारण वे जल्द ही इस बीमारी के प्रभाव में आ जाते हैं.
सूर्य की रोशनी
तेज धूप और सूर्य की किरणों से भी कैंसर हो सकता है. अल्ट्रा-वॉयोलेट रे स्किन कैंसर का प्रमुख कारण होती हैं.
रेडिएशन
विभिन्न प्रकार के रेडिएशंस के कारण भी कैंसर हो सकता है. एक्स-रे भी नुक़सानदायक हो सकते हैं. बार-बार एक्स रे कराने से बचना चाहिए.
खानपान
इन दिनों खान-पान में काफी बदलाव आया है. समयाभाव के कारण ताजा बनाने और खाने का चलन ख़त्म होता जा रहा है. हॉट डॉग्स, प्रोसेस्ड मीट, फ्रेंच फ्राईज, चिप्स क्रेकर एवं कुकीज का अत्यधिक सेवन भी कैंसर का कारण बन सकता है. पश्‍चिमी देशों में अधिकतर लोग प्रोसेस्ड फूड पर निर्भर हैं, जो कैंसर का जोखिम बढ़ाते हैं. आजकल ज़्यादा उपज के लिए कृषि में रसायनों का प्रयोग धड़ल्ले से हो रहा है, जो कैंसर जैसी बीमारी की एक बड़ी वजह बन रहा है. विटामिन सी, विटामिन बी एवं रेशे वाली साग-सब्जियां भोजन में शामिल करके कई तरह के कैंसर से बचा जा सकता है. ताजे फल और सब्जियों के जूस गले के कैंसर का जोखिम कम करते हैं. ये एंटीऑक्सिडेंट से भरपूर होते हैं. इनमें विटामिन ए, सी और ई होते हैं. प्रदूषण, मेडिकल टेस्ट, इंफेक्शन और कई बार दुर्घटनाओं को भी कैंसर के लिए जिम्मेदार माना जाता है.
कैंसर को मुख्य रूप से पांच भागों में बांटा गया है:-

  1. कार्सिनोमा: यह शरीर के आंतरिक अथवा बाहरी भाग में ढका होता है, जैसे गले का कैंसर, ब्रेस्ट कैंसर और कोलोन कैंसर.
  2. सार्कोमा: यह हड्डियों, कार्टिलेज, चर्बी, कनेक्टिव टिश्यूज, मांसपेशियों और अन्य टिशूज़ को प्रभावित करता है.
  3. लिम्फोमा: लिम्फ नोड्स और इम्यून सिस्टम के टिश्यूज को प्रभावित करता है.
  4. ल्यूकेमिया: यह बोन मैरो और रक्त प्रवाह को प्रभावित करता है.
  5. एडिनोमा: यह थायराइड, पित्त, एड्रीनल ग्लैंड और अन्य ग्लैंडयूलर टिश्ाूज़ को प्रभावित करता है.

कैंसर की जांच
लक्षण के आधार पर कैंसर की जांच की जाती है. एक्स-रे, सीटी स्कैन, एमआरआई स्कैन, पीइटी स्कैन और अल्ट्रासाउंड द्वारा पता लगाया जाता है कि शरीर के किस हिस्से में ट्यूमर है और कौन से अंग उससे प्रभावित हैं. एंडोस्कोपी की सहायता भी ली जाती है. माइक्रोस्कोप की मदद से सेल की जांच करके कैंसरस सेल्स का पता लगाया जाता है, इसे बायोप्सी कहते हैं. कैंसरस सेल्स उच्च स्तर पर रसायन उत्सर्जित करते हैं, जिसे पीएसए (प्रोस्टेट स्पेसिफिक एंटीजन) कहते हैं. इसका पता लगाने के लिए डॉक्टर शरीर में शुगर, फैट, प्रोटीन और डीएनए का मोलीक्यूल लेवल भी पता लगाते हैं.
लक्षण
अलग-अलग तरह के कैंसर के अलग-अलग लक्षण होते हैं. कुछ कैंसर के प्रभाव हमें जल्दी नहीं दिखते, जैसे ब्रेस्ट में गांठ का जल्दी पता नहीं चलती, सर्वाइकल कैंसर के प्रभाव भी जल्दी पता नहीं चलते, जबकि स्किन कैंसर के प्रभाव तिल के रूप में या त्वचा में बदलाव के रूप में दिखने लगते हैं. इसके अलावा, मुंह के कैंसर में साइड में सफेद दाग या जीभ में सफेद स्पॉट्स दिखने लगते हैं. ब्रेन ट्यूमर का प्रभाव इस रूप में पता चलता है कि इंसान की सोचन समझने की क्षमता प्रभावित होने लगती है, चक्कर आना, सिर दर्द होना, दौरे पड़ना जैसे लक्षण दिख सकते हैं. पैंक्रियाज के कैंसर में त्वचा और आंख पीली होने लगती है. कोलोन कैंसर का लक्षण है कि व्यक्ति को कब्ज़ और डायरिया की शिकायत होती है. कैंसर सेल्स शरीर की शक्ति सोखने लगते हैं और शरीर के नॉर्मल हार्मोन फंक्शन को प्रभावित करते हैं. इससे बुखार, अत्यधिक पसीना, एनेमिया और वजन कम होने जैसे लक्षण शरीर में दिख सकते हैं.
कैंसर क्योर फाउंडेशन के अनुसार कैंसर के निम्न लक्षण हैं…
ब्लड कैंसर : पेशाब में खून आना, पेशाब के बाद दर्द या जलन होना, बार-बार पेशाब आना आदि ब्लड कैंसर के लक्षण हो सकते हैं.
बोन कैंसर : हड्डी में दर्द होना या उसके आस-पास सूजन होना, हड्डी में फ्रैक्चर या टूट-फूट, कमजोरी महसूस होना, मोटापा होना, वजन कम होना, बार-बार संक्रमण होना, कमजोरी, उल्टी, कॉन्स्टिपेशन, पैरों में दर्द या ऐंठन बोन कैंसर के लक्षण हैं.
ब्रेन कैंसर : सुस्ती, आंखों में समस्या, कमजोरी, हाथों-पैरों में तकलीफ होना, चक्कर आना, याददाश्त कमजोर होने लगना, सिरदर्द, उल्टी जैसा महसूस होना ब्रेन कैंसर के लक्षण हैं.
ब्रेस्ट कैंसर : ब्रेस्ट में अलग से उभार या गांठ, निप्पल्स के आकार में परिवर्तन, निप्पल से द्रव या पानी का निकलना, बे्रस्ट की त्वचा में परिवर्तन आदि.
आंत का कैंसर : पेट में दर्द होना, कब्ज़, अपच, डायरिया, वजन कम होना, भूख में कमी होना, चेहरे का मुर्झाना, उल्टी होना और मल में खून आना.
किडनी कैंसर : पेशाब में खून आना, उच्च रक्तचाप(बल्डप्रेशर) का होना.
ल्यूकेमिया : कमजोरी, पीलापन, बुखार एवं फ्लू के समान लक्षण, रक्तस्राव, बड़े हुए लिम्फ नोड्स, लीवर एवं हड्डियों में दर्द, जोड़ों में दर्द, बार-बार संक्रमण, वजन कम होना आदि ल्यूकेमिया के लक्षण हैं.
गले का कैंसर : लंबे समय से कफ की समस्या होना, कफ के साथ खून आना, सीने में दर्द, आवाज़ का तीन सप्ताह से ज़्यादा समय से भारी होना, खाना निगलने में परेशानी, दर्द, जलन, खाते समय गले में सेंसशन होना.
ओरल कैंसर : मुंह में घाव होना, घाव का न भरना, दर्द, ब्लीडिंग, सांस लेने में दिक्कत, बोलने में परेशानी.
ओवेरियन कैंसर : एव्डोमीनल स्वेलिंग अर्थात पेट पर सूजन, असामान्य रूप से योनि से स्राव, हाजमें में तकलीफ होना आदि ओवेरियन कैंसर के लक्षण हैं.
पैंक्रियाज कैंसर : एव्डोमिनल के ऊपरी भाग में दर्द, पीठ में दर्द, त्वचा पीली होना, पेट दर्द.
प्रोस्टेट कैंसर : यूरिन में तकलीफ, बार-बार पेशाब महसूस होना, पेशाब में जलन या दर्द, पेशाब के साथ खून आना.

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