गर्भाशय कैंसर की चपेट में हैं लाखों महिलाएं, जानिए क्या है बचाव ?

तमाम तरह के कैंसरों की तरह गर्भाशय कैंसर की वजह भी एचपीवी है. यूटरस महिला का रिप्रोडक्टिव ऑर्गेन होता है. यह वह जगह है, जहां बच्चा विकसित होता है. दरअसल, यूटरस में दो पर्त होती हैं, मायमेट्रियम (बाहरी पर्त) और एंडोमेट्रियम (आंतरिक पर्त). जब कोई महिला गर्भवती होती है, तो एंडोमेट्रियम दिनोंदिन मोटी होने लगती है. एग फर्टाइल नहीं होता, तब वह पीरियड के दौरान बाहर निकल जाता है. जब महिला ओवरी से एग रिलीज करती है, तो वह फैलोपियन ट्यूब से यूटरस में चला जाता है, जहां वह फर्टिलाइज होकर बच्चे के रूप में बड़ा होता है. हालांकि, मेनोपॉज के बाद पीरियड नहीं आते और महिला उसके बाद मां नहीं बन पाती, तब यूटरस दिनोंदिन छोटा होता चला जाता है और एंडोमेट्रियम पतला और निष्क्रिय होता जाता है. यही वह समय होता है, जब महिलाओं में गर्भाशय कैंसर की आशंका बढ़ जाती है. 

p10

 क्या है वजह 

आम तौर पर शरीर में पुराने सेल्स मरते और नए सेल्स बनते रहते हैं. सामान्यत: शरीर की ज़रूरतों के अनुसार सेल्स बनते हैं, विकसित होते हैं, पुराने होते हैं, डैमेज होते हैं और मर जाते हैं. फिर नए सेल्स उनकी जगह ले लेते हैं. कई बार यह प्रक्रिया गलत हो जाती है. शरीर को ज़रूरत नहीं होती, फिर भी नए सेल्स बन जाते हैं और पुराने डैमेज सेल्स भी ख़त्म नहीं हो पाते. ये अधिक सेल्स ट्यूमर का रूप ले लेते हैं. कई बार एंडोमेट्रियम में सेल्स की असामान्य तरीके से वृद्धि होने लगती है.

एस्ट्रोजन आवश्यकता से अधिक बनने के कारण महिलाओं में एंडोमेट्रियम हाइपर-प्लाज्मिया की समस्या होती है. यूटरस की दीवार पर असामान्य तरीके से सेल्स की वृद्धि गर्भाशय कैंसर की वजह बन सकती है. यूटरस की दीवार पर हाइपर-प्लाज्मिया का बनना हमेशा कैंसर नहीं होता, लेकिन कई बार यह कैंसर का रूप ले लेता है. महिलाओं में हाइपर-प्लाज्मिया की समस्या 40 साल की उम्र के बाद शुरू होती है. ऐसे में डॉक्टर यूटरस को रिमूव करने की सलाह देते हैं. इसके अलावा पीरियड्स के दौरान अत्यधिक ब्लीडिंग होना, मेनोपॉज के बाद भी ब्लीडिंग होना, दो पीरियड्स के बीच में ब्लीडिंग होना भी इसकी वजह है. 

इसके अलावा जो महिला कभी मां न बनी हो, जिसने कभी हार्मोन थेरेपी ली हो, एस्ट्रोजन लिया हो बिना प्रोजेस्टेरॉन के, जिसके परिवार में गर्भाशय कैंसर, ओवरियन कैंसर, एंडोमेट्रियल और बे्रस्ट कैंसर का इतिहास रहा हो, उसे भी गर्भाशय कैंसर की आशंका बढ़ जाती है. 60 साल की महिलाओं में इस बीमारी का प्रभाव ज़्यादा देखा गया है, लेकिन अब 40 साल की महिलाओं में भी यह समस्या आम है. हाई ब्लड प्रेशर, हाइपरटेंशन एवं डायबिटीज के मरीजों में भी गर्भाशय कैंसर की आशंका ज़्यादा होती है. जिन महिलाओं में ज़्यादा मात्रा में एस्ट्रोजन का स्राव होता है, उनमें भी एंडोमेट्रियल कैंसर की आशंका होती है. ओवरवेट महिलाएं, जो फिजिकल वर्क आउट नहीं करतीं, उनमें ज़्यादा मात्रा में लगातार एस्ट्रोजन का स्राव होता है. ज़्यादा वसायुक्त भोजन भी गर्भाशयस कैंसर के जोखिमको बढ़ाता है.

 ऐसे करें लक्षणों की पहचान

नब्बे प्रतिशत महिलाओं में गर्भाशय कैंसर की शुरुआती अवस्था में ब्लीडिंग होती है और कोई लक्षण सामने नहीं आता. इसके अलावा मेनोपॉज के बाद भी लगातार ब्लीडिंग होना (हालांकि कुछ महिलाओं को ब्लीडिंग नहीं होती, डिस्चार्ज होता है), एब्डोमेन में दर्द होना, यूरिन में दर्द होना, शारीरिक संबंध बनाने के दौरान दर्द होना आदि गर्भाशय कैंसर के लक्षण हैं. एडवांस स्टेज में पेल्विक पेन, वजन कम होना और एब्डोमेन में दर्द इसके लक्षण हैं.

लाइलाज नहीं है कैंसर

जांच

* पेल्विक एक्जाम – इसके तहत गर्भाशय, गुप्तांग और उसके आसपास की कोशिकाओं की जांच की जाती है कि कहीं आकार और आकृति में कोई बदलाव तो नहीं आया है.

* पैप स्मियर टेस्ट- इस टेस्ट से यूटरस कैंसर डिटेक्ट नहीं किया जा सकता. इसकी बनावट ऐसी होती है कि इससे सर्विक्स के कैंसर का तो पता लगाया जा सकता है, पर गर्भाशय के कैंसर का नहीं. कई बार इस टेस्ट से गर्भाशय कैंसर के बारे में पता चल जाता है, पर कई बार यह असफल भी हो जाता है.

* ट्रांसवजायन अल्ट्रासाउंड-  एक छोटे-सी डिवाइस, जिसे ट्रांस-ड्यूसर कहते हैं, गुप्तांग के अंदर डाली जाती है. इससे गुप्तांग की आंतरिक स्थिति पता चल जाती है. इसमें ओवरीज एवं यूटरस के आकार-आकृति और एंड्रोमेट्रियम की मोटाई का पता चल जाता है. गड़बड़ी महसूस होने पर डॉक्टर बायोप्सी की सलाह देते हैं.

समय पर जानकारी बचा सकती है जान

हिस्टोरोस्कोपी और बायोप्सी- हिस्टोरोस्कोपी में डॉक्टर गर्भाशय की आंतरिक स्थिति का जायजा लेते हैं. टेलिस्कोप जैसी एक डिवाइस होती है, जिसे हिस्टोरोस्कोप कहते हैं. इसके द्वारा गर्भाशय से कुछ कोशिकाएं निकाल कर लेबोरेटरी में जांच के लिए भेजी जाती हैं. बायोप्सी में भी गर्भाशय से कुछ कोशिकाएं निकाली जाती हैं. इसमें कई बार एनेस्थेसिया भी देना पड़ता है. इस दौरान कुछ घंटे अस्पताल में रुकना पड़ सकता है. इस टेस्ट के बाद कुछ दिनों तक हल्की ब्लीडिंग भी हो सकती है. इसके अलावा, कैंसर की आशंका होने पर सीटी स्कैन, एमआरआई और पेट (पॉजिट्रान एमीशन टोमोग्राफी) स्कैन भी किया जाता है.

अवस्था

पहले अवस्था में कैंसर से स़िर्फ गर्भाशय (यूटरस) प्रभावित होता है. दूसरी अवस्था में यह सर्विक्स तक फैल जाता है. तीसरी अवस्था में यह ओवरिज, फैलोपियन ट्यूब्स, वजायना एवं लिम्फ नोड्स तक पहुंच जाता है. चौथी अवस्था में यह ब्लैडर, रेक्टम, एब्डोमेन और शरीर के अन्य हिस्सों में फैल जाता है.

अब डॉक्टर्स बनाएंगे आपको वर्जिन

क्या है इलाज

हिस्टेरेक्टॉमी: एंडोमेट्रियल कैंसर में यूटरस रिमूव कर दिया जाता है. इसमें भी सर्जरी, रेडिएशन थेरेपी एवं किमोथेरेपी द्वारा इलाज किया जाता है. इलाज के दौरान नौसिया, एब्डोमिनल पेन जैसी समस्या आम है. रेडिएशन के बाद वजायना का पेल्विक एरिया सिकुड़ता चला जाता है. इससे शारीरिक संपर्क के दौरान दर्द हो सकता है. इसके अलावा, इलाज के बाद महिला मां नहीं बन सकती.

कैसे बचें

गर्भाशय कैंसर से काफी हद तक बचा जा सकता है. इसके लिए ज़रूरी है कि आपकी जीवन शैली काफी संयमित हो. शराब एवं सिगरेट का सेवन अन्य कैंसरों की तरह गर्भाशय कैंसर के जोखिम को भी बढ़ाता है. संतुलित एवं पौष्टिक आहार लें. अत्यधिक वसायुक्त आहार से परहेज करें. इसके अलावा फिजिकल वर्क आउट भी बेहद ज़रूरी है.

 

 

 

Share Article

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *