एनजीओ को राजनीति से दूर रहने की ज़रूरत है

VBK-MEDHA-_30371fएक वक्त था, जब अपराधियों के सहारे कई नेता चुनाव जीतते थे. बाद में इन अपराधियों को लगा कि जब वे किसी को चुनाव जीता सकते हैं, तो ख़ुद क्यों नहीं चुनाव लड़ सकते हैं. इस तरह पहले अपराध का राजनीतिकरण हुआ और अब राजनीति का ही अपराधीकरण हो चुका है. कुछ इसी तरह का किस्सा देश में संचालित लाखों ग़ैर सरकारी संगठनों (एनजीओ) की भी है. नब्बे के दशक से लागू आर्थिक उदारीकरण के बाद देश में अचानक एनजीओ की संख्या बढ़ने लगी. सरकार की तरफ से और विदेशों से पैसे आने का ज़बरदस्त सिलसिला भी शुरू हुआ. एनजीओ की अवधारणा इस उद्देश्य के साथ लाई गई थी कि, इससे सरकार के कार्यों को ज़मीन तक ले जाने में इसकी भूमिका होगी और साथ ही कई ऐसे सेक्टर में काम करेगी जहां सरकार सीधे-सीधे नहीं पहुंच पाती. वैसे एनजीओ के पीछे एक और सरकारी अवधारणा है, जो काफ़ी महत्वपूर्ण है और उसके राजनीतिक कारण भी हैं. सरकारों ने हमेशा से इन एनजीओ को सेफ्टी वॉल्व (सुरक्षा कवच) के तौर पर इस्तेमाल किया है. उदारीकरण से उपजे सामाजिक-आर्थिक असंतुलन को कम करने के लिए सरकारों ने इन एनजीओ का इस्तेमाल किया. स्थानीय स्तर पर शुरू हुए कई ऐसे जनांदोलन देखे गए हैं, जिनका नेतृत्व एनजीओ ने किया. हालांकि अंत में उन आंदोलनों का काफ़ी बुरा हश्र हुआ. यह सही है कि देश में कई अच्छे क़ानून इन्हीं एनजीओ के प्रयासों से बने. मसलन, सूचना का अधिकार कानून. अगर जल, जंगल और ज़मीन से जुड़े आंदोलनों जैसे, कुडनकुलम, महान संघर्ष और एकता परिषद की अधिकार यात्रा पर नज़र डालें, तो ये सभी आंदोलन अंत में असफल रहे. ग़ौरतलब है कि ये तमाम आंदोलन किसी न किसी एनजीओ की मदद से ही चलाए जाते रहे हैं. ऐसे में यह शक और गहरा होता है कि कहीं न कहीं ये एनजीओ सरकार के हित में ही एक सेफ्टी वाल्व की तरह काम करते हैं. हालांकि, अब इन एनजीओ की भूमिका बदल रही है. कल तक राजनीतिक हथियार के तौर पर इस्तेमाल होते रहे ये एनजीओ अब ख़ुद राजनीति में कूद चुके हैं. लोकसभा चुनाव 2014 इसका जीता-जागता उदाहरण है, क्योंकि इस चुनाव में रिकॅार्ड संख्या में एनजीओ से जुड़े लोगों ने शिरकत की. ये अलग बात है कि इन्हें हार का सामना करना पड़ा. एसपी उदय कुमार (कुडनकुलम आंदोलन) और मेधा पाटेकर (एनएपीएम) जैसे एनजीओ जगत के बड़े नाम आम आदमी पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़े, लेकिन उन्हें बुरी तरह से हार का सामना करना पडा. इसके अलावा, और भी कई ऐसे उम्मीदवार थे, जिनका प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से एनजीओ से रिश्ता रहा है. आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल भी ख़ुद बनारस से नरेंद्र मोदी के ख़िलाफ़ चुनाव मैदान में थे. जैसा कि सभी जानते हैं कि उनका रिश्ता भी एनजीओ से है. बहरहाल, एनजीओ से जुड़े लोगों का चुनाव लड़ने पर कोई क़ानूनी रोक तो नहीं है, लेकिन जिस तरी़के से इन पर विदेशी धन लेने और एनजीओ को मिले पैसे का चुनाव में इस्तेमाल का आरोप लगता रहा है, उससे एक नैतिक सवाल के साथ-साथ कई क़ानूनी सवाल भी उठते है. अगर किसी मामले में यह सावित होता है कि एनजीओ या किसी अन्य पेशे से जुड़ा कोई शख्स विदेश से अनुदान के रूप में मिले पैसे से चुनाव लड़ता है या विदेशी अनुदान से संचालित कोई एनजीओ चुनाव लड़ रहे व्यक्ति की मदद करता है, तो यह निश्‍चित रूप से एक गंभीर मामला बन जाता है. इस चुनाव के दौरान यह ख़बर भी आई कि बस्तर से चुनाव लड़ रही सोनी सोरी की मदद के लिए सैकड़ों एनजीओ आगे आए थे.
ऐसे में सवाल यह है कि एनजीओ का मूल काम, यानी स्थानीय स्तर पर विकास कार्यों में सहयोग करने और जन जागरूकता फैलाना है, वे उससे हटकर क्या राजनीतिक गतिविधियों में शामिल हो सकते हैं या होने चाहिए? क्या ऐसे एनजीओ को काम करने की इज़ाज़त देनी चाहिए, जो पैसा तो विदेशों से लेते हैं, लेकिन उसका इस्तेमाल देश के भीतर अराजकता पैदा करने के लिए करते हैं? आईबी की हालिया रिपोर्ट यह बताती है कि ओडिशा, झारखंड और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में, जहां जंगलों और उनसे जुड़े संसाधनों के व्यावसायिक दोहन के ख़िलाफ़ हिंसक संघर्ष हो रहे हैं, नर्मदा और अनेक नदियों के मुद्दे पर आदिवासी और राज्य सरकारें आमने-सामने हैं. इस आंदोलन को हवा देने का आरोप वहां सक्रिय एनजीओ पर लगते रहे हैं. इनमें बहुत सारे संगठनों को विदेशी धन मिलता है. ज़ाहिर है ऐसे एनजीओ की कार्यप्रणाली पर सवाल ज़रूर खड़े होंगे. इसके अलावा, इस देश में प्रत्येक 600 आदमी पर एक एनजीओ है, लेकिन ज़मीन पर काम करने वाले एनजीओ की संख्या इसके मुक़ाबले कहीं कम है.
निश्‍चित रूप से मौजूदा समय में एनजीओ एक धंधा के रूप में तब्दील हो चुका है. ग्रीन पीस पर आईबी की हालिया रिपोर्ट इसकी सबसे अच्छी मिसाल है. पर्यावरण जागरूकता अभियान चलाने का दावा करने वाले एनजीओ ग्रीनपीस पर इंटेलीजेंस ब्यूरो की रिपोर्ट में यह ख़ुलासा हुआ है कि हालिया लोकसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी के कुछ उम्मीदवारों को भी एनजीओ ने धन मुहैया कराया था. आईबी ने मध्यप्रदेश के सीधी से लोकसभा चुनाव लड़ रहे आप प्रत्याशी पंकज सिंह की जानकारी निकालनी शुरू कर दी है. आप प्रत्याशी पंकज सिंह सितंबर 2012 से फरवरी 2013 तक ग्रीनपीस संस्था के साथ जुड़े रहे थे. पंकज इस संस्था में बतौर कंसलटेंट काम करते थे और मध्यप्रदेश में ग्रीनपीस के आंदोलन के प्रति लोगों को जागरूक करने का काम करते थे. हालांकि, आम आदमी पार्टी ने इस मामले में सफाई दी है कि पंकज सिंह ने लोकसभा चुनाव लड़ने से पहले ही एनजीओ से इस्तीफ़ा दे दिया था, लेकिन आईबी ने स्थानीय ज़िला निर्वाचन अधिकारी कार्यालय और स्टेट इंटेलीजेंस ब्यूरो से भी आप उम्मीदवार का ब्योरा मांगा है. बहरहाल, एनजीओ की बदलती भूमिका को देखते हुए यह ज़रूरी हो जाता है कि इसकी नई भूमिका की जांच की जाए और यह सुनिश्‍चित किया जाए कि कम से कम विदेशी फंड या देशी फंड भी लेने वाले एनजीओ को राजनीतिक गतिविधियों से दूर रखा जा सके.

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2 thoughts on “एनजीओ को राजनीति से दूर रहने की ज़रूरत है

  • May 18, 2017 at 7:03 PM
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    मनीष जी बहुत दुःख होता है , की सबसे जादा ये NGO, धर्म-परिवर्तन, के लिए खर्च किया जाता है, जिसका अपने तनिक सा भी जिक्र नहीं किया अपने, दूसरा अपने मीडिया समूहों का भी जिक्र नहीं किया, जो सबसे जादा अरगाकता इस देश में फैलाते हैं, तीसरा अपने उन राजनेताओं का भी जिक्र नहीं किया गया , जो NGO, बना कर देश को जबरदस्त लुटते है, आपने राजीव दीक्षित जी का जिक्र कभी नहीं किया, जिन्होंने सबसे पहले इन गद्दारों की पोल खोली थी, तबसे ही इन गद्दारों के असली चेहरे, देश के सामने आये, ??, क्या उस महान देश भक्त को आप नहीं जानते भक्त को बिलकुल नहीं , , जिसकी हत्या इस वजेह से ही हुई, इसी वजेह से आप जैसे पत्रकारों की दुकाने सोसल मडिया सेहटा दीं गईं, वन्देमात्रम

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  • July 15, 2014 at 12:51 PM
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    २०११ में हमें इसकी समझ हो गया था, इसलिये अन्ना की नौटंकी नहीं चला और चेला समूह की दरभंगा भी नहीं चले। और इस बातको अन्ना भी भलीभांति जानता है।

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