रक्षा बजट में बढ़ोतरी समय की मांग

Santosh-Sirआज एक विदेशी चैनल पर बात करते हुए एक सवाल आया. सवाल था कि भारत ने अपने रक्षा बजट में बहुत ज़्यादा बढ़ोतरी की है और इस बढ़ोतरी से पाकिस्तान को काफी डर पैदा हो गया है या पाकिस्तान में काफी चिंता पैदा हो गई है. पाकिस्तान की चिंता स्वाभाविक है. पाकिस्तान और हिंदुस्तान में पिछले साठ साल से एक मनोवैज्ञानिक युद्ध लड़ा जा रहा है. पाकिस्तान में सत्ता के ऊपर बने रहने का सबसे आसान रास्ता हिंदुस्तान का विरोध और कश्मीर को लेकर लोगों के जज्बातों को झकझोरना है. उसमें कश्मीरियों को आज़ादी मिलेगी, शामिल नहीं है. आंतरिक भावना है कि कश्मीर पाकिस्तान में मिल जाए. दूसरी तरफ़ हिंदुस्तान में भी सत्ता के नज़दीक जाने का, सत्ता प्राप्ति का और सत्ता में बने रहने का यही अचूक नुस्खा है. पाकिस्तान का विरोध, पाकिस्तान को गालियां और पाकिस्तान को मिटाने की कसमें. और, इन सबके बीच अगर सीमा पर छोटी-सी झड़प हो जाए, तो वह हमारे देश के लिए इज्जत और सम्मान की बात हो जाती है.
जब हमने सेना से जानना चाहा कि दरअसल सीमा पर होता क्या है, तो बड़े सैन्य अधिकारियों के साथ जवानों ने भी बताया कि हमारे पास न वहां सिनेमा है, न नाटक है, न गीत है, न संगीत है. हमारे लिए मनोरंजन का एक ही साधन है और वह है गोलियां चलाना. जब पाकिस्तान के सिपाही अपने एकांत और तनाव से उकता जाते हैं, तो वे हम पर गोलियां बरसा देते हैं और जब हम इस स्थिति में होते हैं, तो हम भी गोलियां चला देते हैं. दरअसल, यह दोनों तरफ़ का मनोरंजन है. और, कभी वे हमारे लोगों के ऊपर हमला कर न केवल उन्हें घायल करते हैं, बल्कि उनकी जान ले लेते हैं और कभी हम उन पर हमला कर उनकी जान ले लेते हैं.
सेना इसे युद्ध का संकेत नहीं मानती है, छोटी-मोटी झड़पें मानती है, पर पाकिस्तान और हिंदुस्तान के अंदर इन घटनाओं को राष्ट्रवाद से जोड़ दिया जाता है. इसीलिए जब मुझसे उस विदेशी चैनल ने सवाल पूछा, तो मैंने उन्हें साफ़ कहा कि पाकिस्तान को हिंदुस्तान के रक्षा बजट की बढ़ोतरी से डरना नहीं चाहिए, क्योंकि भारत की सेना पारंपरिक हथियारों से युद्ध करती रही है. वे पारंपरिक हथियार अब सोफेस्टिकेटेड वेपेन में बदलने लगे हैं. दूसरी तरफ़ दुनिया में युद्ध की तकनीक बदल रही है. युद्ध की तकनीक अब टेक्नोलॉजिकल वार के रूप में सामने आई है. अब सैनिकों को आमने-सामने का युद्ध नहीं करना पड़ता. कहीं दूर बैठकर कंप्यूटर कंट्रोल्ड हथियार सही निशाने पर भेजने पड़ते हैं, जिससे दुश्मन का ऩुकसान होता है. मैं एटोमिक वेपेन्स की बात नहीं कर रहा, मैं सामान्य टेक्नोलॉजिकल वार की बात कर रहा हूं.
इसके बाद उस चैनल ने कुछ दर्शकों से मेरी बात कराई. उन दर्शकों ने कहा कि जब एक दहशतगर्द हिंदुस्तान में जाता है, तो हिंदुस्तान कांप उठता है. मैंने उसे जवाब दिया कि आप उसी ज़ेहनियत से बात कर रहे हैं, जिस ज़ेहनियत का शिकार हमारे देश में भी लोग हैं और आपके देश में भी हैं. और, वह ज़ेहनियत साठ साल से हमें अपने जाल में कैद किए हुए है. हिंदुस्तान के एक तरफ़ पाकिस्तान है, जहां से दहशतगर्दों के आने की बात आम तौर पर मानी जाती है. उन दहशतगर्दों से लड़ने के लिए पारंपरिक युद्ध और पारंपरिक हथियार काफी हैं, उसके लिए टेक्नोलॉजिकल वेपेन्स की ज़रूरत नहीं है. मैंने उस दर्शक को बताया कि हमारे दूसरी तरफ़ चीन है, जिसके साथ हमारे रिश्ते कभी दोस्ताना नहीं रहे.
पाकिस्तान के साथ हमारी तीन लड़ाइयां हुईं, जबकि चीन के साथ भारत की एक लड़ाई हुई, लेकिन उस एक लड़ाई के घाव आज तक हिंदुस्तानियों के दिलों में ताजा हैं. हिंदी-चीनी भाई-भाई का नारा लगा था. हिंदुस्तान में इस बात का दु:ख कम है कि उनकी ज़मीन पर चीन ने कब्जा कर लिया, बल्कि इस बात का दु:ख ज़्यादा है कि जिन्हें हमने सचमुच अपना भाई समझा था और हिंदी-चीनी भाई-भाई का नारा लगाया था, उन्होंने हमारे साथ विश्‍वासघात किया. इसलिए चीन की सैन्य ताकत को देखते हुए, उसके द्वारा हाल की घुसपैठ को देखते हुए हमें अपनी सैन्य क्षमता भी बढ़ानी है, हथियारों को भी आधुनिक करना है और तकनीकी युद्ध के लिए, जिसे टेक्नोलॉजिकल वॉर कहते हैं, अपने को तैयार करना है. चीन तकनीक के मामले में बहुत मजबूत देश है. चीन की वायु सेना और जल सेना हमसे कहीं ज़्यादा ताकतवर है.
मैंने पाकिस्तान के उस दर्शक से यह भी कहा कि कभी युद्ध न हो, ऐसा सभी चाहते हैं. और, शायद अब युद्ध होंगे भी नहीं, क्योंकि सभी के पास अब अलग-अलग किस्म के हथियार हैं, लेकिन इसके बावजूद कोई भी इस आशंका से इंकार नहीं करता कि युद्ध हो सकता है. इसलिए हिंदुस्तान को अपने रक्षा बजट में बढ़ोतरी करना पाकिस्तान के मद्देनज़र ज़रूरी नहीं है. पाकिस्तान एक छोटा मुल्क है. अगर पाकिस्तान के साथ हमारी लड़ाई होगी, तो वैसे ही नतीजे आएंगे, जैसे 1965, 1971 और करगिल युद्ध के समय आए थे, लेकिन चीन के साथ टेक्नोलॉजिकल वार के अलावा कोई चारा नहीं है. भारत की चीन से लगी सीमा कहीं भी साफ़ विभाजन में नहीं आती. मैकमोहन नामक एक रेखा है, जिसे अब कोई मानता नहीं है और चीन ने जितना हिस्सा अपने कब्जे में कर रखा है, उससे ज़्यादा वह कब्जा करना चाहता है. चीन का मानना है कि हिंदुस्तान का अरुणाचल प्रदेश पूरी तौर पर उसका हिस्सा है, हिंदुस्तान का हिस्सा नहीं है. और, वह इस हिस्से को उसी तरह मानता है, जैसे उसके दूसरे प्रांत हैं. अरुणाचल प्रदेश का कोई भी व्यक्ति अगर चीन जाना चाहे, तो उसे वीजा लेने की ज़रूरत नहीं है.
दरअसल, हमारी रक्षा सेनाओं की स्थिति बहुत अच्छी नहीं है. कुछ तो भ्रष्टाचार छोटे पैमाने पर और कुछ भ्रष्टाचार बड़े पैमाने पर देश को खोखला कर चुका है. हमने जो युद्धपोत रूस से खरीदे, उनमें भी भ्रष्टाचार की गंध आई, उसकी जांच हुई, जिसमें तथ्य मिले हैं. हमने वायु सेना के लिए जो हेलिकॉप्टर खरीदे, लड़ाकू जहाज खरीदे, उन सौदों पर भी सवाल खड़े हुए हैं और थल सेना के लिए तो सामान आया ही नहीं. मुझे याद आते हैं कि पूर्व थल सेना अध्यक्ष एवं वर्तमान विदेश राज्यमंत्री जनरल वी के सिंह द्वारा तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को लिखे गए 12 पत्र. उन 12 पत्रों में से तीन से चार पत्र खुद या तो प्रधानमंत्री कार्यालय ने या फिर रक्षा मंत्रालय ने प्रेस को लीक किए. लेकिन जो ख़बरें बाहर आईं और जिनका कभी खंडन नहीं हुआ, वे यह कि अगर चीन या पाकिस्तान से युद्ध हो, तो हमारे देश के पास स़िर्फ तीन दिनों के युद्ध का गोला-बारूद है. मैं मानता हूं कि वह स्थिति अब नहीं होगी. इसलिए इतना बड़ा रक्षा बजट हिंदुस्तान की सेनाओं के कायाकल्प के लिए आवश्यक था.
हिंदुस्तान की सेनाओं का कायाकल्प होना चाहिए, उन्हें अच्छी ट्रेनिंग मिलनी चाहिए और सबसे बड़ी बात यह कि टेक्नोलॉजिकल वार के लिए उन्हें पूर्णतय: तैयार करना चाहिए. और, ये सारी चीजें बिना पैसे के नहीं होतीं. मेरा दृढ़ विश्‍वास है कि हिंदुस्तान की सेनाओं का आधुनिकीकरण और उन्हें टेक्नोलॉजिकल वार के लिए तैयार करने से न तो पाकिस्तान को डर होना चाहिए और न चीन को. शर्त इतनी है कि जिस भ्रष्टाचार के रोग ने भारतीय सेनाओं को खोखला कर दिया है, उससे कम से कम अब भारतीय सेना बचे, रक्षा मंत्री बचें, वित्त मंत्री बचें और प्रधानमंत्री बचें. और, ये सारे लोग मिलकर हिंदुस्तान की सेना को सर्वश्रेष्ठ सेना बनाएं और यह देखें कि इस पूरे तंत्र में सेना के भीतर भी कहीं ऐसे लोग तो नहीं हैं, जो इस भ्रष्टाचार को बढ़ाने में किसी तरह से विदेशियों का साथ दे रहे हों. यह परीक्षा प्रधानमंत्री जी, आपकी परीक्षा है.

संतोष भारतीय

संतोष भारतीय चौथी दुनिया (हिंदी का पहला साप्ताहिक अख़बार) के प्रमुख संपादक हैं. संतोष भारतीय भारत के शीर्ष दस पत्रकारों में गिने जाते हैं. वह एक चिंतनशील संपादक हैं, जो बदलाव में यक़ीन रखते हैं. 1986 में जब उन्होंने चौथी दुनिया की शुरुआत की थी, तब उन्होंने खोजी पत्रकारिता को पूरी तरह से नए मायने दिए थे.

You May also Like

Share Article

संतोष भारतीय

संतोष भारतीय चौथी दुनिया (हिंदी का पहला साप्ताहिक अख़बार) के प्रमुख संपादक हैं. संतोष भारतीय भारत के शीर्ष दस पत्रकारों में गिने जाते हैं. वह एक चिंतनशील संपादक हैं, जो बदलाव में यक़ीन रखते हैं. 1986 में जब उन्होंने चौथी दुनिया की शुरुआत की थी, तब उन्होंने खोजी पत्रकारिता को पूरी तरह से नए मायने दिए थे.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *