अमेरिका की राह पर इजरायल

गलत आरोप लगाकर हजारों लोगों की हत्याएं करने का गुनाह करते हुए दुनिया अमेरिका को पहले भी देख चुकी  है. उसकी इस हरकत की वजह से इराक आज पूरी तरह बर्बादी की कगार पर आ चुका है. इजरायल को मासूम फलस्तीनियों पर हमले करते हुए देख कर अमेरिका की याद आ रही है. बीते एक पखवा़डे से जो वजह बताकर इजरायल मासूम फलस्तीनियों को मौत के घाट उतार रहा है वह वजह गलत साबित हो चुकी है. इसके बावजूद बेंजामिन नेतान्याहू इन हमलों को न रोकने के लिए प्रतिबद्ध दिख रहे हैं. अब सवाल यह है कि आखिर यह जंग समाप्त कब होगी?

2014_7$img25_Jul_2014_AP7_2पहले खा़डी युद्ध के दौरान अमेरिका ने जो गलती की थी उसी गलती को आज इजरायल दोहरा रहा है. इस युद्ध की शुरुआत कुवैत की रक्षा के लिए की गई थी और इसकी समाप्ति सद्दाम हुसैन से बदले के रूप में हुई थी. इस बदले की कार्रवाई में हजारों बेगुनाह लोग मारे गए. 1991 में अमेरिका ने कुवैत की रक्षा के लिए कुवैत पर हवाई हमला किया था. उसके बाद गठबंधन सेनाओं की तरफ से लगातार हवाई हमले होते रहे. नतीजतन सद्दाम हुसैन की फौज परास्त होकर वापस लौट गई. इराकी फौज की वापसी के बाद खा़डी युद्ध के लंबे समय तक चलाने का कोई औचित्य नहीं बच गया था. सद्दाम हुसैन के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय क्रिमिनल कोर्ट में मुकदमा चलना चाहिए था लेकिन अमेरिका ने ऐसा नहीं किया और हमले जारी रखे. यहां तक कि 2003 में सद्दाम हुसैन गिरफ्तार कर लिए गए फिर इराक की एक अदालत ने उन्हें फांसी की सजा दे दी.
यहां पर इस घटना जिक्र सिर्फ इसलिए किया गया है क्योंकि पहले खा़डी युद्ध के दौरान कुवैत से इराकी फौजियों की वापसी अगर एक बार हो गई थी तो फिर इराक पर अमेरिकी हमले का कोई औचित्य ही नहीं रह गया था. अमेरिका ने इराक पर व्यापक विनाश के हथियारों का बहाना बनाकर दोबारा हमला किया. जबकि सद्दाम हुसैन लगातार इस बात का विरोध करते रहे कि उनके पास ऐसे कोई हथियार मौजूद नहीं हैं और उनकी फांसी के बाद अमेरिका ने यह माना कि इराक के पास कोई रासायनिक या जैविक हथियार नहीं था.
अब सवाल यह उठता है कि झूठी बूनियाद के ऊपर इराक पर जो इतनी ब़डी तबाही मचाई गई जिसकी भरपाई कभी नहीं की जा सकती है. अपनी इस गलती से अमेरिका ने सबक क्यों नहीं सीखा और आज इजरायल भी वह गलती दोहरा रहा है जो अमेरिका ने इराक में की थी और अफसोस की बात यह है कि अमेरिका इजरायल की इस गलती में साथ दे रहा है. इजरायल के रवैये से मशहूर वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंसटीन के कथन की याद आ रही है. जब उन्हें इजरायल का राष्ट्रपति बनने का प्रस्ताव दिया गया था तो उन्होंने कहा था कि मैं किसी ऐसे देश का राष्ट्रपति बनना नहीं पसंद करूंगा जिसकी बुनियाद बेगुनाहों के आंसुओं, बेकसूरों के खून, उनकी सरजमीन से उन्हें उजा़ड कर की गई हो. आइंसटीन ने कई दशक पहले इजरायल की कू्ररता को महसूस कर लिया था मगर अमेरिका को आज तक इजरायल में कोई कमी नहीं नजर आ रही है.

अब सवाल यह उठता है कि झूठी बूनियाद के ऊपर इराक पर जो इतनी ब़डी तबाही मचाई गई जिसकी भरपाई कभी नहीं की जा सकती है. अपनी इस गलती से अमेरिका ने सबक क्यों नहीं सीखा और आज इजरायल भी वह गलती दोहरा रहा है जो अमेरिका ने इराक में की थी और अफसोस की बात यह है कि अमेरिका इजरायल की इस गलती में साथ दे रहा है.

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में कुल 47 सदस्य हैं उनमें 17 सदस्य किसी वजह से इस बार वोटिंग में हिस्सा नहीं ले सके जबकि 29 देशों ने इजरायल के खिलाफ वोट किया. अमेरिका अकेला ऐसा देश है जिसने इजरायल के समर्थन में वोट किया था. दरअसल वो इजरायल की कारगुजारियों को सही समझता है और उसके दावे को जायज ठहरा रहा है कि इजरायल के तीनों ल़डकों को अगवा और कत्ल करने में हमास का हाथ था. जबकि हमास के मुखिया पहले दिन से इस बात से इंकार कर रहे हैं लेकिन हमास की अपील सुनने की बजाए इजरायल ने गाजा पर हवाई और जमीनी हमले कर दिए. जिसके कारण 1500 से ज्यादा लोग मारे गए और हजारों लोग जख्मी हैं, जिनमें ब़डी संख्या औरतों और बच्चों की है. लेकिन तीन हफ्ते के बाद इजरायल पुलिस के फॉरेन प्रेस के प्रमुख इंस्पेक्टर मकीरोजन फील्ड ने ब्रिटिश न्यूज एजेंसी के सामने खुलासा किया कि इन तीनों ल़डकों के कत्ल में हमास का हाथ नहीं है. अब सवाल यह है कि छानबीन किए बिना ही गाजा पर हमला क्यों किया गया और अब जब कि सच्चाई सामने आ गई है तो इस तबाही की जिम्मेदारी कौन लेगा? क्या इराक ही अवस्था यहां की भी हो जाएगी और अमेरिका की तरह इजरायल भी इसे एक मामूली गलती बताकर हजारों लोगों की मौत से दामन झा़ड लेगा. शायद यह इसलिए किया जा रहा है जिससे इजरायली रिहायशी इलाकों को और फैलाया जा सके.
हमास पर आरोप क्यों लगाए गए ?
12 जून को तीन इजरायली ल़डकों को अगवा कर लिया गया. ये सभी किशोरवय ल़डके थे. इन तीनों को वेस्ट बैंक के दक्षिण से अगवा किया गया था जिनमें से एक ने किसी तरह से इजरायली पुलिस से संपर्क साध कर अपहरण की जानकारी दी थी. इस कॉल को रिकॉर्ड भी किया. इस कॉल में पीछे से अरबी में बातें करते हुए लोग सुनाई दिए. यहीं से इजरायल को शक हुआ कि इनका अपहरण फलस्तीनियों ने किया है. इस शक को और मजबूती इस वजह से मिली क्योंकि इजरायली जेलों में बंद 300 फलस्तीनी कैदियों ने 50 दिनों से भूख हडताल कर रखी थी. इनमें से कई की हालत खराब है. उनकी मांग है कि इजरायल ने उन्हें बेकसूर कई सालों से जेल में बंद कर रखा है. हमास कई बार उनकी रिहाई के लिए प्रदर्शन कर चुका है लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई.
इसी शक की बुनियाद पर इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतान्याहू ने 15 जून को इस बात की घोषणा कर दी कि इन ल़डकों को हमास ने अगवा किया है. इसके बाद इजरायली सुरक्षा एजेंसियां इन ल़डकों की तलाश में जगह-जगह छापे मारकर फलस्तीनियों को गिरफ्तार करने लगीं. इसके लिए जब एजेंसियों ने जनीन कैंप में घुसने की कोशिश की तो वहां मौजूद फलस्तीनियों ने उन्हें यह कहते हुए रोकने की कोशिश की कि प्रेसिडेंट महमूद अब्बास इस बात से पहले ही इंकार कर चुके हैं कि ल़डकों का अपहरण हमास ने नहीं किया है. इजरायल इस अपहरण के पीछे हमास की साजिश बता रहा था इसलिए उसने गाजा की उत्तरी बस्तियों को खाली करने का आदेश दे दिया. जब मामला आगे ब़ढने लगा तो इजरायल ने फौजी कार्रवाईयां शुरू कर दीं इसके जवाब में फलस्तीन की तरफ से भी कार्रवाई की गई और उसके बाद जो फलस्तीनियों के साथ हुआ वह दुनिया के सामने है.
30 जून को तीनों ल़डकों की लाश अल खलील से मिली. तब यह जाकर यह राज खुला कि इस घटना के पीछे हमास का नहीं बल्कि किसी आतंकी संगठन का हाथ है. लाश मिलने के बाद जर्मनी के टीवी चैनल जेडडीएफ पर एक रिपोर्ट आई जिसमें कहा गया कि अपहरण के कुछ दिन बाद ही इजरायली पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों को यह पता चल गया था कि इन सब के पीछे हमास का हाथ नहीं है. यह मामला सिर्फ अपहरण का नहीं है क्योंकि रिकॉर्डिंग में जो आवाजें सुनाई दे रही थीं उसमें तीनों ल़डकों को गर्दन को नीचे झुकाने के लिए कहा गया और बाद में दस गोलियां चलने की आवाज भी आई. लेकिन इसके बाद भी इजरायल हमास पर आरोप लगा कर हमले करता रहा.
हैरानी की बात यह है कि इजरायल इस हमले में किसी की परवाह नहीं कर रहा है. सुरक्षा परिषद के 29 देश इस हमले की निंदा कर चुके हैं. संयुक्त राष्ट्र संघ बार फौजी कार्रवाई रोक कर शांतिपूर्वक इस समस्या को सुलझाने की अपील कर चुका है लेकिन नेतान्याहू की नियत ल़डाई को आगे तक खींचने की है. उन्होंने कहा भी है कि जब तक फलस्तीन के सारे हथियार समाप्त नहीं हो जाते तब तक यह ल़डाई जारी रहेगी. इजरायल के पीएम अपने इस फैसले को अमली जामा पहनाने के लिए किस हद तक जा सकते हैं इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि अंतरराष्ट्रीय कानून की अनदेखी करते हुए वे रिहायशी इलाकों और बच्चों के स्कूल को भी निशाना बना रहे हैं. हाल ही में संयुक्त राष्ट्र संघ की रिलीफ एजेंसी अवनजदा के स्कूल को स्कूल को निशाना बनाया जिसमें कम से कम बीस बच्चे मारे गए. यह हमला किसी गलती की वजह से नहीं हुआ था क्योंकि संयुक्त राष्ट्र संघ के रिलीफ एंड वर्क एजेंसी के डायरेक्टर क्रिस गेनिज के मुताबिक इजरायली फौजी को 17 बार बताया गया था कि इस स्कूल में शरणार्थी पनाह लिए हुए हैं. इस हमले की भर्त्सना करते हुए संयुक्त राष्ट्र संघ के गाजा में रिलीफ मिशन के डायरेक्टर बॉब टर्नर का कहना है कि इजरायली हमला जानबूझ कर किया गया जो हैवानियत की निशानी है.
ये जंग कब रुकेगी
मिस्र की तरफ से पहले भी युद्ध विराम की कोशिश की गई थी लेकिन सिर्फ 6 घंटे के विराम के बाद इजरायली हमले शुरू हो गए जिसके जवाब में हमास ने कई रॉकेट दागे. मिस्र एक बार फिर युद्ध विराम की कोशिश कर रहा है जिसके लिए नया मसौदा तैयार किया गया है जिससे दोनों देशों की सहमति हो. इस बार मिस्र ने फलस्तीन की तरफ से हमास के प्रतिनिधि को भी शामिल किया है जबकि पहले युद्ध विराम के दौरान हमास शामिल नहीं था. लेकिन सबसे बडा सवाल यह है कि इस कोशिश का क्या हश्र होगा? प

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